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भारती सिंह को हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत।

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भारती सिंह को कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है। या अल्लाह रसगुल्ला दही भल्ला इस पूरे मामले पर बवाल हुआ था। क्या था यह पूरा मामला? और 16 साल बाद अब भारती को बॉम्बे हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। ना सिर्फ भारती को बल्कि एक्टर शेखर सुमन को भी इस पूरे मामले में राहत मिली है।

हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने शेखर सुमन और भारती सिंह से जुड़ी उनके खिलाफ एफआईआर रद्द कर दी है। मामला काफी पुराना था। यह मामला 2010 के कॉमेडी शो से जुड़ा था जिसमें या अल्लाह रसगुल्ला दही बल्ला शब्द बोले गए थे। शिकायत रजा एकेडमी के प्रतिनिधि ने दर्ज कराई थी।

अदालत ने कहा था कि खानेपीने की चीजों का मजाक धार्मिक भावनाओं का अपमान नहीं है। यह एंटरटेनमेंट शो का मामला था और इसे उसी नजर से देखना भी चाहिए और समझना भी चाहिए। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। जस्टिस अमित बोरकर ने एक्टर शेखर सुमन और कॉमेडियन भारती सिंह की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।

अदालत ने कहा कि यह शो एक कॉमेडी एंटरटेनमेंट शो था और इसे उसी तरीके से देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने माना कि कॉमेडी शो में बोले गए शब्दों को गंभीर धार्मिक कमेंट्स की तरह नहीं देखा जा सकता। किसी भी सीन या डायलॉग को पूरे संदर्भ के साथ समझना जरूरी है। सिर्फ कुछ शब्द अलग करके आरोप बनाना सही नहीं है। अदालत ने दोनों की याचिका स्वीकार कर फैसला कर दिया है। अपना फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि कॉमेडी शो को किसी धार्मिक या राजनीतिक भाषण की तरह नहीं देखा जा सकता। एंटरटेनमेंट शो को सिर्फ मस्तीमजाक की तरह लेना चाहिए ना कि कुछ चुने हुए शब्दों के आधार पर। अगर किसी प्रस्तुति का उद्देश्य मनोरंजन है तो उसे इसी नजर से देखना चाहिए।

किसी भी बयान को समझने के लिए पूरा संदर्भ जरूरी है। आधे अधूरे शब्दों में अपराध नहीं बनता। ऐसे मामलों में मंशा सबसे महत्वपूर्ण होती है। केवल शब्द पर्याप्त नहीं होते। इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका मंजूर कर यह फैसला सुना दिया है।

इस मामले में शिकायत रजा एकेडमी के एक रिप्रेजेंटेटिव की तरफ से दर्ज शिकायत की गई थी। कोर्ट ने पाया कि शिकायत करने वाले शख्स ने शायद खुद पूरा शो देखा ही नहीं। शिकायत कुछ लोगों की बातों और उनके आधार पर [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे बढ़ाई गई जिसके बाद एफआईआर दर्ज हुई। कोर्ट ने साफ कहा कि आईपीसी की धारा 295 ए के तहत किसी भी अपराध के लिए जानबूझकर या गलत इरादा होना जरूरी है। अगर ऐसा इरादा साबित नहीं होता है तो मामला आगे नहीं टिक सकता।

ऐसे मामलों में सबूत सबसे जरूरी होते हैं और अदालत उसी के आधार पर फैसले देती है। इस पूरे मामले को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि सीआर नंबर 265 ऑफ 2010 वाली एफआईआर बिना किसी शुरुआती जांच के दर्ज की गई। कोर्ट के मुताबिक आरोपों की सच्चाई की पहले सही जांच नहीं हुई थी।

शिकायत केवल कुछ लोगों की जानकारी और दावों के आधार पर अदालत ने कहा कि ऐसे बिना पुष्टि के गंभीर आरोप लगाना सही तरीका नहीं है। पुलिस को पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए ताकि गलत केस ना बने। न्याय प्रक्रिया का पालन जरूरी है और अदालत इसे गंभीर मानते हुए साफ संदेश दे रही है। तो फाइनली 16 साल बाद शेखर सुमन और भारती सिंह को कोर्ट की तरफ से राहत मिल गई है।

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