है राह में कलियां खिलाकर यार जाल बिछाए खड़ी बहार ओ रे मुसाफिर आज ये दास्तान है उस शख्स की जिसके नाम में तो प्रेम झलकता था लेकिन पर्दे पर आते ही उसके काम से फैल जाया करती थी चारों तरफ खौफ और दहशत फन उठा देने वाली नागिन का पहले से ही सर कुचल देना चुन्नी लाल की खास आदत है आज यह दास्तान है उस बेमिसाल चेहरे की जिसे देखकर पर्दे पर सहम जाती थी बड़ी-बड़ी हीरोइनें और सिनेमा हॉल में बैठा हर दर्शक भी लेता था नफरत से अपनी मुट्ठियां। माना के लाला नागराज के कांटे का कोई मंसर नहीं। मगर तेरी सुंदरता ने मुझे काट लिया है। हाय हाय ऐसा काट लिया है कि किसी करवट कोई चैन नहीं। आज मैं कहां जाएगा तू मेरी जान?
आज ये कहानी है उस शख्स की जिसने सिनेमा में खलनायकी को सिर्फ डराने तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे एक स्टाइल दिया। एक ठहराव दिया। एक ऐसा अंदाज दिया जिसमें आवाज कम और असर ज्यादा था। अरे मैंने तुम्हें शराफत से कहा था तुम नहीं माने। अब ये बच्चा मेरे पास रहेगा। अगर तुम चाहते हो कि यह बच्चा जिंदा रहे तो तुम्हें वही करना होगा जो मैं चाहता हूं। करोगे? नहीं। जिसने यह दिखा दिया कि असली खौफ वो नहीं जो दिखे। असली खौफ वो है जो धीरे-धीरे दिल में उतर जाए। अरे तू क्या और तेरी औकात क्या? नागपाल अगर पत्थर को भी डस ले तो उसका कलेजा भी पानी हो जाए। आज की कहानी है उस मशहूर खलनायक की जिसे पर्दे पर देखने वाले लोग भले ही गालियां देते थे लेकिन असल जिंदगी में उसके अनोखे स्टाइल और बोलने के अंदाज के दीवाने थे। अरे अब वो करेगा क्या? नंगा नहाएगा क्या? अब नो छोड़ेगा क्या? बाजी अपने हाथ में है। आज बात फिल्म इंडस्ट्री के उस भोला की, जो असल जिंदगी में शराफत की मूरत था। मगर कैमरा ऑन होते ही वो पार कर देता था शैतानियत की सारी हदें। सांप से मैंने यह सीखा है
जो मुझे दूध पिलाता है उसी को मैं डस लेता हूं। आज ये दास्तान है उस दौर के ऐसे खतरनाक खलनायक की जिसके खौफ से लोग उन्हें असल जिंदगी में सामने देखकर छुपा लिया करते थे अपनी-अपनी बीवियां। हम इधर से आ रहे हैं तो वहां चार पांच कपल जा रहे थे उधर। अच्छा जी। तो उन्होंने कहा साहब के अरे अरे प्रेम चोपड़ा आ रहा है बीवियों को बचाओ बीबियों को बचाओ आज ये कहानी है एक ऐसे हैंडसम और कद्दावर नौजवान की जो मुंबई की गलियों में हीरो बनने का सपना लेकर आया था पर तकदीर ने उसे बना दिया बॉलीवुड का सबसे बड़ा विलेन तुम तो जानते हो साले साहब यार जानवर से मैंने कुछ ना कुछ सीखा है उल्लू से मैंने एक आदत सीखी की है। वो अपना घोंसला कभी नहीं बनाता। दूसरे परिंदों के घोंसलों पर कब्जा कर लेता है। यह कहानी है उस दौर की जब राजेश खन्ना का रोमांस लोगों के दिलों पर राज कर रहा था और अमिताभ बच्चन का गुस्सा सिस्टम को चुनौती दे रहा था। लेकिन उसी दौर में एक ऐसा चेहरा भी था जो ना प्यार में पड़ा ना हीरो बनकर लड़ाई लड़ी बल्कि उसने लोगों के भरोसे को ही बना लिया अपना हथियार। 500 का सौदा किया है मैंने तेरी लांडिया का। मेरी बेटे का आज ये दास्तान है उस गूंजती हुई रौपदार आवाज की जिसने जब पहली बार कहा कि प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा तो पूरा हिंदुस्तान उस नाम का हो गया कायल। प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा।
जी हां, कोई और नहीं। हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के सबसे दिग्गज खलनायक प्रेम चोपड़ा की। जो मुझसे नहीं डरता वो मरता है। शंभू मैं जो आग लगाता हूं उसे बुलाना ही जानता हूं। अगर मैंने उस सरथरी लड़की का गुरूर नहीं तोड़ दिया तो मेरा नाम भी कुमार नहीं। पुलिस को रिपोर्ट करने की गलती ना करना। कहीं घबराहट में मुझसे गोली चल गई तो बेचारा रवि मुफ्त में मारा जाएगा। लेकिन दोस्तों ऐसा क्या हुआ कि जिस खलनायक से पूरी दुनिया थर-थर कांपती थी, उसे फिल्म के सेट पर सबके सामने भीड़ के बीच में एक मशहूर हीरोइन ने सरेआम गाल पर जड़ दिया था ज़ोरदार थप्पड़ और क्यों बॉलीवुड पर राज करने वाले इस सुपरस्टार विलेन को टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में करनी पड़ी मामूली सी क्लर्क की नौकरी बताएंगे आपको सब कुछ तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं बॉलीवुड के सबसे हैंडसम विलेन यानी प्रेम चोपड़ा की जिंदगी की यह सबसे गहरी और सनसनीखेज दास्तान। इस मुलाकात का मुझे बहुत दिनों से इंतजार था। नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में। कितना मजा आ रहा है। ओ कितना इस खौफनाक पर्दे के विलन की असली कहानी शुरू होती है 23 सितंबर 1935 से।
लाहौर की वो जमीन जो उस वक्त हिंदुस्तान का हिस्सा थी। वहीं एक बच्चे ने जन्म लिया। नाम रखा गया प्रेम चोपड़ा। एक सामान्य पंजाबी परिवार जहां जिंदगी सीधी साधी थी। सपने सीमित थे और रास्ते पहले से तय माने जाते थे। उनके पिता रणवीर लाल चोपड़ा एक अनुशासन पसंद और सख्त मिजाज इंसान थे जो एक बड़ी कंपनी में अकाउंट्स ऑफिसर के पद पर तैनात थे। उनके लिए जिंदगी का मतलब था स्थिरता, एक पक्की नौकरी और एक सुरक्षित भविष्य। मां रोशनी देवी घर को संभालने वाली संस्कारों से भरी हुई महिला जिनकी दुनिया उनके परिवार तक ही सीमित थी। ऐसे माहौल में पले बढ़े प्रेम चोपड़ा के लिए भी यही सोचा गया कि वो पढ़ाई करें, नौकरी करें और एक साधारण सी जिंदगी जिएं। लेकिन जिंदगी हमेशा प्लान के हिसाब से नहीं चलती। सन 1947 आया और साथ लाया वो बंटवारा जिसने सब कुछ बदल दिया। लाहौर जो कभी अपना था लेकिन अब अचानक पराया हो गया। घर, गली, यादें सब कुछ पीछे छूट गया। चोपड़ा परिवार को मजबूरन सब कुछ छोड़कर शिमला आकर बसना पड़ा। जहां प्रेम का बचपन वादियों के बीच बीता। यह सिर्फ शहर बदलने की कहानी नहीं थी। यह एक ऐसी शुरुआत थी, जिसमें दर्द था, अनिश्चिंतता थी, और एक अजीब सा खालीपन था। एक छोटा बच्चा यह सब देख रहा था, समझ रहा था और शायद यही वो अनुभव थे जिन्होंने उसके अंदर एक गहराई पैदा कर दी। एक ऐसी समझ जो बाद में उसके हर किरदार में झलकने वाली थी। प्रेम के पिता चाहते थे
कि उनका बेटा पढ़ लिखकर डॉक्टर या फिर आईएएस ऑफिसर बने। लेकिन उनके मन में तो स्कूल के दिनों से ही अभिनय का बीच पनप चुका था। शिमला की उन्हीं वादियों में एक ऐसा किस्सा हुआ जिसने प्रेम की पूरी जिंदगी बदल दी। दरअसल जवानी के जोश में प्रेम अपने दोस्तों के साथ चोरी छिपे सिगार पीने की कोशिश कर रहे थे। तभी अचानक उनके पिता वहां आ धमके। पिता ने उन्हें सिगार पीते देख बीच सड़क पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। उस एक थप्पड़ की गूंज ऐसी थी कि प्रेम ने उस दिन के बाद कभी भी सिगरेट या फिर शराब को हाथ नहीं लगाया। पिता के इसी अनुशासन के साथ उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की और फिर रुख किया सपनों के शहर मुंबई का। मुंबई आने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती घर चलाने की थी। क्योंकि पिता का साफ कहना था कि सिर्फ एक्टिंग के भरोसे नहीं रहा जा सकता। ऐसे में प्रेम चोपड़ा ने टाइम्स ऑफ इंडिया के सर्कुलेशन डिपार्टमेंट में नौकरी शुरू की। वह सुबह-सुबह अखबारों की छपाई और वितरण का काम देखते और शाम को स्टूडियोज के चक्कर काटते। वो दिन में नौकरी करते और उनके दिमाग में सिर्फ एक ही ख्याल घूमता रहता था कि फिल्मों में काम कैसे मिले। ऑफिस से निकलकर वो स्टूडियोज के चक्कर लगाते, ऑडिशंस देते, लोगों से मिलते लेकिन हर बार एक ही जवाब मिलता। देखेंगे। अभी आप फिट नहीं बैठते फिर कभी आना। दोस्तों, यह वही दौर था जहां कई लोग हार मान लेते हैं। लेकिन प्रेम चोपड़ा ने हार नहीं मानी। मजेदार बात यह है कि ऑडिशन के लिए छुट्टी लेने के लिए वह ऑफिस में अपनी शादी तय होने का बहाना बनाते
और जब वापस आते तो कहते कि लड़की सही नहीं थी। इसीलिए शादी टूट गई। प्रेम चोपड़ा जब टाइम्स ऑफ इंडिया में काम करते थे तो उन्हें अक्सर अपनी महत्वाकांक्षाओं और दफ्तर की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। दिलचस्प बात यह है कि वो अपने ऑफिस के सहयोगियों के बीच भी अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरते थे। जब कभी उन्हें किसी फिल्म के ऑडिशन के लिए जाना होता तो वह अपने बॉस के पास जाकर बड़े दुखी मन से कहते कि उनके किसी करीबी रिश्तेदार का देहांत हो गया है और उन्हें गांव जाना पड़ेगा। एक बार तो हद ही हो गई जब वो एक ही चाचा के मरने का बहाना तीन-तीन बार बना चुके थे। चौथी बार जब उन्होंने फिर वही बहाना बनाया तो उनके बॉस ने हंसते हुए कहा, प्रेम तुम्हारे चाचा आखिर कितनी बार मरेंगे? कम से कम रिश्तेदारों के नाम तो बदल लिया करो। इस किस्से को प्रेम चोपड़ा आज भी बड़े चाव से सुनाते हैं और कहते हैं कि उस नौकरी ने ही उन्हें असल जिंदगी में इंप्रोवाइजेशन यानी मौके पर एक्टिंग करना सिखाया। कहीं भी चली जाओ बनारस का टिकट दे दो। हर बार चली जाओ और चीज चाहे तो बताओ टिकट सुनशान भूमि को चली जाओ। दफ्तर में की गई यह छोटी-मोटी एक्टिंग बहुत जल्द पर्दे पर एक बड़े तूफान में बदलने वाली थी। इतनी मेहनत के बाद भी उन्हें काम नहीं मिल रहा था। तभी एक दिन लोकल ट्रेन के सफर ने उनकी तकदीर बदल दी। ट्रेन में एक अनजान शख्स ने उनके फोटोग्राफ्स देखे और उन्हें एक पंजाबी फिल्म के लिए ऑडिशन देने को कहा। किस्मत ने साथ दिया और उन्हें फिल्म चौधरी करनाल सिंह में हीरो का रोल मिल गया। जिसके लिए उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला। आ गया ह मार के बल्ले बल्ले बल्ले बल्ले। लेकिन असली पहचान तब मिली जब 1965 में फिल्म शहीद में उन्होंने शहीद सुखदेव का किरदार निभाया जिसे आज भी याद किया जाता है।
रानी मिट गई अपनी आन पे। आज उसी को पहन के निकला। पहन के निकला। हालांकि प्रेम चोपड़ा हीरो बनना चाहते थे लेकिन महबूब खान और मनोज कुमार जैसे दिग्गजों ने उनकी आंखों में एक अलग आग देखी। फिल्म वो कौन थी में उनके विलेन के अंदाज को देखकर फिल्म इंडस्ट्री हैरान रह गई। मरने से पहले रास्ते सुनो। तुम्हारी मां तुम्हारी शादी संज्ञा से करना चाहती थी। और मैं भी यही चाहता था। महबूब खान ने उनसे साफ कह दिया था कि तुम हीरो के लिए नहीं बल्कि विलेन के तौर पर इतिहास रचने के लिए पैदा हुए हो। फिर 1967 आया और साथ लेकर आया एक फिल्म उपकार। इस फिल्म में उनका रोल भले हीरो का नहीं था लेकिन असल में इतना गहरा था कि लोगों की नजरें उन पर टिक गई। उनके चेहरे में वो सादगी भी थी और उसी के अंदर छुपी चालाकी भी और यही कॉम्बिनेशन उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बना रहा था। मतलब ये कि जिंदगी के बेहतरीन साल लगाने के बाद इसे क्या पसीने के चंद कतरे। इस फिल्म के बाद इंडस्ट्री ने उन्हें एक नए नजरिए से देखना शुरू किया। अब वो सिर्फ एक स्ट्रगलिंग एक्टर नहीं रहे। अब वो एक ऐसे कलाकार बन चुके थे जो कहानी में मोड़ ला सकता था। प्रेम चोपड़ा का फिल्मी सफर किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं रहा। जहां उन्होंने हीरो से ज्यादा शोहरत खलनायक बनकर बटोरी। 60 और 70 के दशक में उनके विलन गिरी का ऐसा दौर था कि स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी ही सस्पेंस पैदा कर देती थी। उन्होंने उस दौर के सबसे बड़े सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ दो रास्ते, कटी पतंग, अपना देश और प्रेम नगर जैसी कुल 19 फिल्मों में काम किया। जिसमें से 15 फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही। सिर्फ राजेश खन्ना ही नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन के साथ त्रिशूल, दोस्ताना और काला पत्थर जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी एक्टिंग का लोहा बनवाया। लेकिन असली कमाल यह था कि वो कभी ओवरएक्टिंग नहीं करते थे। जहां बाकी विलन जोर-जोर से हंसते थे, गुस्से में चिल्लाते थे। वहीं यह शख्स बस हल्की सी मुस्कान के साथ अपना खेल खेल जाता था। और यही चीज दर्शकों को सबसे ज्यादा डराती थी। फिल्म जुगनू हो, काला सोना हो या फिर बाद के सालों में आई कई और फिल्में उन्होंने हर बार अपने किरदार में एक नई परत जोड़ दी। कभी वो लालची बने, कभी धोखेबाज, कभी ऐसा इंसान जो सामने से शरीफ दिखता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह से खतरनाक होता है और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। एक ही तरह का विलिन होते हुए भी कभी एक जैसे वो लगे ही नहीं। मैं वो भला हूं जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूं। धीरे-धीरे यह हालत हो गई कि लोग फिल्मों में हीरो को देखने से पहले यह देखने लगे कि प्रेम चोपड़ा का रोल क्या है? क्योंकि उन्हें पता था कि असली खेल वहीं से शुरू होगा। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस इतनी मजबूत हो चुकी थी कि कई बार वो हीरो पर भी भारी पड़ जाते थे। उनकी एंट्री, उनका चलना, उनका बोलने का तरीका सब कुछ इतना सटीक होता था
कि दर्शक उन्हें नजरअंदाज कर ही नहीं पाते थे। धोखेबाज आदमी हमारे धंधे में हर एक के लिए खतरनाक हो सकता है। और सबसे दिलचस्प बात यह थी कि जितनी नफरत लोग उनके किरदार से करते थे, उतना ही ज्यादा उन्हें देखने के लिए उत्सुक भी रहते थे। यहीं से वह एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गए जहां वह सिर्फ फिल्म का हिस्सा नहीं रहे। वह फिल्म की जरूरत बन गए। वक्त बदला तो प्रेम चोपड़ा ने खुद को भी बदल लिया। जब विलन गिरी का दौर थोड़ा धीमा हुआ तो उन्होंने राजा बाबू और खिलाड़ी जैसी फिल्मों में विलन गिरी के साथ-साथ कॉमेडी का ऐसा तड़का लगाया कि दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाए। कर्बला तो जल्दी आ। उन्होंने ब्लैक एंड वाइट फिल्मों से अपना सफर शुरू किया और रणबीर कपूर की रॉकेट सिंह और एनिमल जैसे आज के दौर के सिनेमा तक अपनी धाक जमाए रखी। प्रेम चोपड़ा का जितना खतरनाक चेहरा लोगों ने पर्दे पर देखा असल जिंदगी में वो इंसान उतना ही शांत, सलीकेदार और परिवार से जुड़ा हुआ था। यह फर्क ही उन्हें और दिलचस्प बनाता है। क्योंकि जिस आदमी से लोग फिल्मों में डरते थे, वही आदमी अपने घर में एक जिम्मेदार पति, एक स्नेही पिता और एक बेहद साधारण इंसान की तरह जी रहा था। उनकी शादी हुई उमा चोपड़ा से जो राज कपूर की पत्नी कृष्णा की सगी बहन थी। यानी राज कपूर उनके साडू भाई थे। उनकी तीन बेटियां हैं रक्षा, पुनीता और प्रेरणा और दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने परिवार को हमेशा लाइमलाइट से दूर रखा। उन्हें एक सामान्य जिंदगी देने की कोशिश की। कपूर खानदान से पारिवारिक रिश्ते की वजह से राज कपूर ने उन्हें फिल्म बॉबी में सिर्फ एक सीन के लिए बुलाया। शुरू में प्रेम एक सीन के लिए तैयार नहीं थे।
लेकिन उनके साले प्रेमनाथ के समझाने पर उन्होंने वो रोल किया और उनका वो डायलॉग प्रेम नाम है मेरा। प्रेम चोपड़ा हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गया। प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा। यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं था। यह एक ऐलान था। एक ऐसा ऐलान जिसने दर्शकों के दिल में उनके लिए एक अलग जगह बना दी। लोग इस लाइन को दोहराने लगे। थिएटर में तालियां बजने लगी और एक विलेन एक ब्रांड बन गया। अब हालात यह थे कि फिल्म में उनका होना ही काफी था यह समझने के लिए कि कहानी में ट्विस्ट जरूर आएगा। यह खाल ये गोश्त ये हड्डियां जितनी तकलीफ बर्दाश्त कर सकती हैं तकलीफ इन्हें इससे कहीं ज्यादा की जा सकती है। प्रेम चोपड़ा की विलनगिरी का असर आम लोगों पर किस कदर था इसका एक बहुत ही मशहूर किस्सा है। एक बार प्रेम चोपड़ा अपने पिता के साथ चंडीगढ़ के एक पार्क में टहल रहे थे। उन्हें टहलता देख वहां से गुजर रहे कुछ लोग आपस में कानफूसी करने लगे। जैसे ही प्रेम चोपड़ा उनके करीब पहुंचे, उन लोगों ने चिल्लाकर कहा, अपनी बीवियों को छिपा लो। देखो प्रेम चोपड़ा आ गया है। जब उनके पिता ने यह सुना, तो वह पहले तो हैरान रह गए। लेकिन फिर उन्होंने बड़े गर्व से प्रेम की तरफ देखा और कहा, बेटा, लोग तुम्हें असलियत में बुरा समझ रहे हैं। इसका मतलब यह है कि तुम अपनी एक्टिंग में पूरी तरह से कामयाब हो गए हो। यह सुनकर प्रेम की आंखों में आंसू आ गए थे। यह किस्सा यह बताने के लिए काफी है कि प्रेम चोपड़ा ने अपनी अदाकारी से लोगों के दिलों में नफरत की ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी जिसे पार कर पाना किसी भी दूसरे विलेन के लिए नामुमकिन था। लोग तो आस्तीन में सांप बांधते हैं लेकिन तुम तो आस्तीन के बिच्छू निकले। हमें डसनी है। प्रिंट चोपड़ा की जाबाजी का एक ऐसा वाक्या है जो बहुत कम लोग जानते हैं। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें एक असली तेंदुए के साथ फाइट सीन शूट करना था। हालांकि सुरक्षा के इंतजाम किए गए थे लेकिन जानवर तो आखिर जानवर ही होता है। जैसे ही कैमरा रोल हुआ तेंदुए ने अचानक अपना आपा खो दिया और वो सीधे प्रेम चोपड़ा की गर्दन की तरफ लपका। सेट पर मौजूद हर शख्स की जान फलक में अटक गई थी। सबको लगा कि आज तो कोई बड़ा हादसा हो जाएगा। लेकिन प्रेम चोपड़ा ने गजब की फुर्ती दिखाई और अपनी बाह तेंदुए के मुंह के आगे कर दी। गनीमत यह रही कि ट्रेनर ने वक्त रहते तेंदुए को काबू में कर लिया। वरना प्रेम चोपड़ा का बचना नामुमकिन था। ताज्जुब की बात यह है कि इतना खौफनाक मंजर होने के बावजूद प्रेम चोपड़ा ने सिर्फ एक छोटा सा ब्रेक लिया और पट्टी बांधकर दोबारा सीन शूट करने के लिए पहुंच गए। उनकी इसी हिम्मत को देखकर पूरी यूनिट ने खड़े होकर उनके लिए खूब तालियां बजाई। लेकिन जान जोखिम में डालकर शूट करने वाले इस कलाकार की सादगी का आलम यह था कि लोग उन्हें असल जिंदगी में विलेन समझकर उनसे बात तक करने से डरते थे। एक बार एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें एक शादी में देख लिया और वह इतना डर गई कि उन्होंने अपना पर्स कस के पकड़ लिया और वहां से भागने लगी। प्रेम चोपड़ा ने उन्हें रोका और बड़े प्यार से कहा, माताजी मैं सिर्फ फिल्मों में बुरा हूं। असलियत में तो मैं भी आपके बेटे जैसा ही हूं। तब जाकर उस महिला की जान में जान आई। यह छोटे-छोटे किस्से गवाह हैं कि प्रेम चोपड़ा ने अपने किरदारों को किस कदर जिया था।
लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि जिस इंसान से पूरी दुनिया खौफ खाती थी उसकी अपनी जिंदगी में एक ऐसा किस्सा भी हुआ जिसने उन्हें हिला कर रख दिया। दरअसल प्रेम चोपड़ा पर्दे पर अक्सर रेप सीन किया करते थे और इसी दौरान एक एक्ट्रेस ने उन पर जोर से पकड़ने का आरोप लगाया। बदला लेने के लिए उस एक्ट्रेस ने डायरेक्टर के साथ मिलकर फिल्म में एक थप्पड़ मारने का सीन जबरदस्ती जुड़वाया। जब शूट शुरू हुआ तो उस एक्ट्रेस ने प्रेम चोपड़ा को इतनी जोर से असली में थप्पड़ मारा कि उनका गाल लाल हो गया और पूरा सेट सन रह गया। प्रेम ने यह अपमान चुपचाप सह लिया क्योंकि वह असल जिंदगी में महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे। प्रेम चोपड़ा में एक दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कभी अपने किरदारों को हल्के में नहीं लिया। हर रोल को वो पूरी गंभीरता से निभाते थे। चाहे वह छोटा हो या बड़ा और शायद यही वजह थी कि उनके निभाए हुए किरदार आज भी याद किए जाते हैं। अवार्ड्स की बात करें तो उनके बेमिसाल योगदान के लिए उन्हें कई फिल्म फेयर अवार्ड्स और लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। लेकिन सच यह है कि उनका सबसे बड़ा अवार्ड वो पहचान थी जो उन्हें दर्शकों से मिली। वो डर, वो नफरत और वो याद जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। कंट्रोवर्सी की बात करें तो उनका करियर लगभग साफ सुथरा रहा। ना कोई बड़ा विवाद, ना कोई ऐसा स्कैंडल जिसने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया हो। हां, एक दौर ऐसा जरूर था जब फिल्मों में दिखाए जा रहे नेगेटिव किरदारों को लेकर बहस होती थी और उनके रोल्स को भी उनमें शामिल किया जाता था। लेकिन उन्होंने हमेशा यही कहा कि वह सिर्फ एक कलाकार हैं और उनका काम है कहानी को असरदार बनाना। प्रेम चोपड़ा जी की जिंदगी हमें बताती है कि एक तरफ वो इंसान है जो अपने घर में एक पिता है, एक पति है। एक ऐसा आदमी है जो साधारण जिंदगी जीता है, हंसता है। अपने परिवार के साथ वक्त बिताता है और दूसरी तरफ वही चेहरा है जो पर्दे पर आते ही लोगों के दिलों में एक अजीब सा डर पैदा कर देता है। एक ऐसा डर जो चीखता नहीं लेकिन अंदर तक उतर जाता है। यह वही फर्क है जो एक आम इंसान और एक बड़े कलाकार के बीच होता है क्योंकि हर कोई बुरा किरदार निभा सकता है लेकिन उसे इस तरह निभाना कि लोग उसे सच मान लें। यह हर किसी के बस की बात नहीं होती। प्रेम चोपड़ा ने सिर्फ फिल्मों में काम नहीं किया। उन्होंने अपने किरदारों को जिया है। उन्हें महसूस किया है और इस तरह निभाया है कि वह किरदार पर्दे से निकलकर लोगों की यादों में बस गए। वह जब स्क्रीन पर आते थे तो कहानी बदल जाती थी। रिश्तों का मतलब बदल जाता था और दर्शकों की धड़कनें तेज हो जाती थी क्योंकि उन्हें पता होता था कि अब कुछ ऐसा होने वाला है जो सीधा दिल पर असर करेगा। समय के साथ सिनेमा बदला, कहानियां बदली, चेहरे बदले। लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो वक्त के साथ फीके नहीं पड़ते बल्कि और गहरे होते जाते हैं। और उन्हीं नामों में से एक नाम है प्रेम चोपड़ा। उन्होंने हमें समझाया कि खलनायक होना सिर्फ बुरा होना नहीं है।
खलनायक वो होता है जो कहानी को मजबूती देता है जो हीरो को हीरो बनाता है और जो दर्शकों को भावनाओं के उस मोड़ तक ले जाता है जहां से कहानी यादगार बन जाती है। आज भी जब उनकी फिल्में देखी जाती हैं तो लोग सिर्फ कहानी नहीं देखते। वो उस एहसास को महसूस करते हैं जो उन्होंने अपने हर किरदार में डाला था। एक खामोश साजिश, एक छुपा हुआ खतरा और एक ऐसा अंदाज जो किसी और के पास नहीं था और शायद यही वजह है कि वो सिर्फ एक एक्टर नहीं रहे। वो एक पहचान बन गए। एक स्टाइल बन गए। एक ऐसा नाम जो सिनेमा के इतिहास में हमेशा जिंदा रहेगा। क्योंकि कुछ कलाकार फिल्में नहीं करते। वह यादें बनाते हैं और प्रेम चोपड़ा उन्हीं कलाकारों में से एक हैं। जब भी हिंदी सिनेमा के सबसे खतरनाक, सबसे यादगार और सबसे अलग खलनायक की बात होगी तो एक आवाज जरूर गूंजेगी धीमी ठहरी हुई लेकिन पूरी ताकत के साथ। प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा। प्रेम चोपड़ा जी ने आजादी से पहले का भी हिंदुस्तान देखा और उसको जिया और आजादी के बाद के हिंदुस्तान को वो आज 91 साल की उम्र में देख रहे हैं। हिंदी सिनेमा के कई युग आएंगे जाएंगे और न जाने कितने कलाकार इस हिंदी सिनेमा के इतिहास को चार चांद लगाएंगे। लेकिन इन्हीं समय प्रेम चोपड़ा जी का नाम हमेशा अनंत काल तक आसमान की ऊंचाइयों में एक चमकदार सितारे की तरह जगमगाता रहेगा। जिसकी चमक शायद ही कभी कम होगी। प्रेम चोपड़ा जी वो अभिनेता हैं जिन्होंने दिलीप कुमार, मनोज कुमार, देवानंद, प्राण, शशि कपूर, ऋषि कपूर, शम्मी कपूर, राज कपूर, लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, धर्मेंद्र जैसे स्वर्गीय महान अभिनेताओं और गायिकाओं और अभिनेत्रियों के साथ काम किया। और आज अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, शत्रुघन सिन्हा जी को छोड़ दिया जाए तो प्रेम चोपड़ा ब्लैक एंड वाइट से लेकर रंगीन दुनिया का वो आखिरी सितारा है जिसको दुनिया कभी खोना नहीं चाहेगी। बॉलीवुड नवेल प्रेम चोपड़ा जी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है। तो दोस्तों, यह थी उस खलनायक की दास्तान जिसने बुरा बनकर भी लोगों का ढेर सारा प्यार जीता। आपको प्रेम चोपड़ा जी की कौन सी फिल्म या डायलॉग सबसे ज्यादा पसंद है? कमेंट्स में अपनी राय जरूर दें और ऐसी ही फिल्मी कहानियों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें। मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक आप सब अपना और अपने परिवार का बहुत ख्याल रखें और सुरक्षित रहें। धन्यवाद। कल सूरज की पहली किरण तुम्हारी आखरी सांस खींच लेगी।