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एक लड़के के चिट्ठी फेंकने पर अमिताभ ने क्यों छोड़ दी राजनीति?

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लाल बहादुर शास्त्री विश्वनाथ प्रताप मुरली मनोहर जोशी और अमिताभ बच्चन अगर हम पूछे कि इन चारों में कौन सा नाम अलग है तो आप हट से कहेंगे अमिताभ बच्चन शायद इसलिए कि तीन का संबंध राजनीति से है और चौथे का फिल्मों से लेकिन असल बात कुछ और भी है पहले तो इन चारों में कॉमन चीज यह है कि यह सभी इलाहाबाद यानी आज के प्रयागराज लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं और चौथा शख्स इस मायने में अलग है कि उसने सियासत की इस ऐतिहासिक जमीन पर चुनावी जीत का जो रिकॉर्ड दर्ज कराया उसे ना यह तीन दिग्गज नेता कभी छुपाए और ना ही उसके 40 साल बाद आज तक कोई नेता तोड़ पाया।

1984 के लोकसभा चुनाव में अमिताभ बच्चन ने यहां हेमवती नंदन बहुगुणा को रिकॉर्ड 187000 वोटों से हराया था लेकिन बहुगुणा को हराना इतना आसान नहीं था वह यहां से पहले भी जीत चुके थे कई बार केंद्र में मंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे और कभी पीएम पद के दावेदार भी थे शायद यही वजह थी कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस सीट से अपना ट्रंप कार्ड खेलते हुए उस दौर के सबसे चमकदार चेहरे और अपने पुराने दोस्त अमिताभ बच्चन को कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतार दिया था ।

अमिताभ की धमाकेदार जीत ने रातों रात उन्हें सिनेमा के पर्दे से सियासत का सुपरस्टार भी बना दिया फिल्मों में गरीबी बेईमानी और भ्रष्टाचार से लड़ने वाले एंग्री यंग मैन से अब असल जिंदगी में कुछ कर दिखाने की उम्मीदें बांधी जाने लगी थी लेकिन रील और रियल में काफी फर्क है यह उम्मीदें यह सपने जल्द ही किसी शीशे के मानिंद चटक गए न साल बाद ही अचानक अमिताभ बच्चन ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और राजनीति को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया अमिताभ ने राजनीति क्यों छोड़ी यह सवाल आज भी एक अबूझ पहेली खुद अमिताभ की माने तो इसके पीछे बोफोर्स कांड की फजीहत नहीं बल्कि असम में उनके साथ हुआ एक वाकया जिम्मेदार था ।

लेकिन अमिताभ के चाहने वाले भी दूसरी थरी यानी अमिताभ के बयान पर कम ही भरोसा करते हैं और पहली वजह यानी बोफोर्स कांड में इतने सियासी पेंच हैं कि जितने सुलझाएं उतने नए सवाल पैदा होते जाते हैं इन्हीं में से निकला एक अहम सवाल आज भी मौजू है कि जिस गांधी परिवार के साय में अमिताभ ने कभी फिल्मी करियर शुरू किया था जिसके घायल होने पर इंदिरा गांधी पल भर में दिल्ली से मुंबई पहुंच गई जिस पर राजीव गांधी को भी इतना भरोसा था कि शादी से पहले इटली से आई उनकी दुल्हनियां सोनिया को एक डेढ़ महीने तक अमिताभ के घर पर रखा गया था और तो राजीव ने पीएम बनने के एक महीने के भीतर ही अमिताभ को राजनीति में बुला लिया इतने प्रगड़ संबंधों के बीच आखिर ऐसा क्या हो गया कि वह भरोसा वह दोस्ती और वह उम्मीदें टूटती चली गई कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि अमिताभ ने सक्रिय राजनीति भले ही छोड़ी हो राजनीति ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा उन पर किसी ना किसी पार्टी की सरपरस्ती हमेशा बनी रही ।

लेकिन यह पार्टी कांग्रेस तो नहीं थी राजीव के निधन के बाद से अमिताभ और गांधी परिवार के बीच रिश्तों में दरार कुछ इस कदर बढ़ गई कि अमिताभ सार्वजनिक रूप से गांधी परिवार पर कटाक्ष करने लगे और उधर से भी कोई कोताही नहीं बख्शी गई यूपीए शासन में अमिताभ पर इनकम टैक्स के छापे और जुल्मो सितम खूब बढ़ गए थे बहरहाल हम लौटते हैं आज के अहम सवाल पर कि अमिताभ ने राजनीति क्यों छोड़ी कई बार बदकिस्मती भी चमकदार ड्रेस में आती है हम बुरे वक्त की आ को भी अच्छे दिनों की दस्तक समझ लेते हैं ।

शायद अमिताभ के साथ भी यही हुआ 1984 में कांग्रेस को मिली जीत असल में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जनता में नाराजगी और हमदर्दी की लहर पर सवार होकर आई थी सड़कों के सवाल यूं ही सुलग रहे थे गरीबी बेईमानी और भ्रष्टाचार से लड़ने वाले एंग्री यंग मैन के जिन किरदारों को भुना करर अमिताभ संसद तक पहुंचे थे उनकी भिड़ंत जमीनी हकीकत से होने लगी इसी बीच ब फोर्स की चिंगारी आई 1986 में भारत ने स्वीडन से 400 तोपें खरीदने का सौदा किया था।

इसकी कीमत 1 अरब 30 करोड़ डॉलर थी बाद में एक रिपोर्ट ने सनसनी मचा दी कि सौदे में 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी प्रधानमंत्री राजीव समेत गांधी परिवार के करीबी लोग निशाने पर आ गए एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिन लोगों के मार्फत राजीव को पैसे मिले हैं उनमें अमिताभ बच्चन और उनके ल निवासी भाई अजिताभ बच्चन भी शामिल है इस खबर ने अमिताभ बच्चन के फिल्मी करियर और कमाई दोनों में आग लगा दी राजीव कैबिनेट के वित्त मंत्री और इस खुलासे के दौरान ही तीन महीने के लिए रक्षा मंत्री बनाए गए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सिर्फ कांग्रेस ही नहीं छोड़ी बल्कि खुलकर राजीव के खिलाफ आ गए इत्तेफाक से बीपी सिंह उसी जमीन से आते थे जहां से अमिताभ ने सियासी सफर शुरू किया था इलाहाबाद की दीवारों पर अमिताभ का नाम बोफोर्स दलाल के रूप में लिखा जाने लगा अमिताभ ने बोफोर्स की आंच लगते ही 1987 में ही सांसदीय बीपी सिंह ने ना केवल यह सीट जीती बल्कि प्रधानमंत्री भी बन गए अमिताभ हमेशा से कहते रहे कि उनका इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं और उन्होंने लंदन की अदालत में कानूनी लड़ाई जीतकर बोफोर्स के आरोपों से क्लीनचिट हासिल कर ली लेकिन जनता का दिल जीतने में समय लगा अब उन्हें फिल्में नहीं मिल रही थी और जो फिल्में बन रही थी उन्हें प्रोड्यूसर इस डर से रिलीज नहीं कर रहे थे कि लोग फिलहाल अमिताभ को देखना नहीं चाहते 1987 में उनकी एक भी फिल्म रिलीज नहीं हुई।

लेकिन 1988 में शहंशाह का हिट होना उनके लिए टर्न अराउंड साबित हुआ लेकिन अगले ही साल तूफान जादूगर और मैं आजाद हूं जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धड़ाम हुई बड़े प्रोड्यूसर्स के हाथ ख खींचने से मायूस अमिताभ ने केसी बोकाडिया जैसे नए फिल्म निर्माताओं पर दांव लगाया 1990 में आई आज का अर्जुन हिट हुई लेकिन आगे फिर फ्लॉप का सिलसिला उधर गांधी परिवार को इससे भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी लोकसभा चुनाव में सत्ता गई पर इटली के बिजनेसमैन और ताबो क्वात्रो की के साथ रिश्तों के सवाल ने पीछा नहीं छोड़ा राजीव गांधी के निधन के बाद तो अमिताभ और गांधी परिवार के बीच दरार बढ़ती ही चली गई रशीद किदवई की किताब नेता अभिनेता बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स में अमिताभ और गांधी परिवार के रिश्तों की खूब पड़ताल की गई इसमें लिखा है कि अमिताभ की मां तेजी बच्चन की बदौलत ही इलाहाबाद से दिल्ली तक दोनों परिवार करीब आए थे लेकिन तेजी के निधन पर गांधी परिवार का कोई सदस्य नहीं गया हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के चौथे खंड दश दवार से सोपान तक का हवाला देते हुए किदवई बताते हैं कि सरोजिनी नायडू ने 1900 192 में हरिवंश राय और उनकी पत्नी तेजी कौर सूरी को पहली बार नेहरू परिवार में आमंत्रित किया था और वहीं से तेजी और इंदिरा के बीच आजीवन बनी रहने वाली दोस्ती की शुरुआत हुई।

लेकिन साल 2000 आते-आते इन दो परिवारों में देखादी भी बंद हो गई अमिताभ तो सार्वजनिक रूप से कहने लगे कि वह लोग राजा हैं और हम रंक हैं साल 2004 में जया बच्चन ने एक रैली में कहा कि जो लोग हमें राजनीति में लाए वह हमें मजदार के बीच छोड़ गए जब हम मुसीबत में थे तो उन्होंने हमसे किनारा कर लिया वे लोगों को धोखा देने के लिए जाने जाते हैं उनके ऐसे बयान पर कई बार कांग्रेस ने भी पलटवार किया गांधी परिवार ने भी परोक्ष रूप से जताया कि अमिताभ बच्चन ने उनके बुरे वक्त में भी साथ नहीं दिया दोनों परिवारों के बीच तल्खी का एक उदाहरण यह भी है कि 18 फरवरी 1997 को प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाडरा की शादी होनी तय हुई थी उससे एक दिन पहले यानी 17 फरवरी को ही अमिताभ बच्चन ने अपनी बेटी श्वेता और उद्यमी अखिल नंदा की शादी तय कर दी कई कांग्रेसी नेताओं ने कहा कि बच्चन का यह फैसला प्रियंका गांधी की बहुचर्चित शादी को ओवर शैडो करने के लिए था बहरहाल कांग्रेस से छिटक के बाद अमिताभ बच्चन ने समाजवादी पार्टी से नजदीकियां और फिर गुजरात के मुख्यमंत्री और आपके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भरोसा हासिल किया लेकिन खुलकर राजनीतिक पाले में अब कभी नहीं आए इस सवाल पर कि उन्होंने 1987 में राजनीति क्यों छोड़ दी बच्चन ने अपने एक ब्लॉग में ये जताने की कोशिश की कि इसके पीछे ब फोर्स नहीं बल्कि असम की एक दिलचस्प घटना थी उन्होंने लिखा कि 1987 में असम दौरे पर मेरा हेलीकॉप्टर गलत डेस्टिनेशन पर उतरने को मजबूर किया गया यह पोजीशन का काम था एक यंग स्टूडेंट घेरा तोड़ने में कामयाब हो गया और वह दौड़कर मेरे पास आया और एक कागज का टुकड़ा फेंक गया इसमें लिखा था मिस्टर बच्चन मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं लेकिन मैं आपकी पार्टी के साथ नहीं हूं प्लीज आप स्टेट छोड़ दी आप मेरी जिंदगी को कठिन बना रहे हैं क्योंकि मैं दो इच्छाओं के बीच फंसा हुआ हूं अमिताभ ने लिखा कि इस पर्ची ने मुझे अंदर से हिला दिया और मुझे लगा कि मैं एक साथ दोनों भूमिकाओं के साथ न्याय नहीं कर पा रहा और मुझे राजनीति छोड़ देनी चाहिए और मैंने राजनीति छोड़ दी सच्चाई जो भी हो।

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