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रानी लक्ष्मीबाई की मौत के बाद क्या हुआ पीठ पर बंधे उस बच्चे का? रूह कंपा देगी यह दास्तान!

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साल 1857 में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देने वाली महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्से हम सबने सुने हैं इस देश में शायद ही कोई ऐसा बदनसीब होगा जिसने उनके बारे में ना सुना हो उनके युद्ध की सबसे बड़ी वजह थी दलहोजी का कानून जिसे हड़प नीति या डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स कहा जाता है यानी कि भारत की किसी भी रियासत के राजा के पास अगर उसका सगा बेटा नहीं है तो अंग्रेज उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला सकते थे इसी शर्त को लेकर रानी जंग के मैदान में कूदी थी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गई थी आज लोग रानी लक्ष्मीबाई को तो जानते हैं लेकिन उस बच्चे की कहानी बहुत कम लोगों को पता है जिसे अपनी पीठ पर बांधकर उन्होंने जंग लड़ी थी जिसके चलते झांसी एक युद्ध का मैदान बन गया था आज के इस वीडियो में मैं आपको यही कहानी सुनाने वाला हूं कि रानी लक्ष्मीबाई की मौत के बाद उनके बेटे का क्या हुआ तो वीडियो को एंड तक जरूर देखिएगा दोस्तों क्योंकि

अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे से पहचानोगे दोस्तों यह कहानी उस दत्तक पुत्र की है जिसे राजा बनने के लिए गोद लिया गया लेकिन सिंहासन उसे नसीब नहीं हो सका रानी लक्ष्मीबाई के इस दत्तक पुत्र का नाम था आनंद राव आनंद राव का जन्म हुआ था साल 1849 में महाराष्ट्र के परोला में कहते हैं कि उनके राजा बनने की भविष्यवाणी हुई थी खैर साल मौत हो चुकी थी आनंदराव के पिता का नाम था वासुदेव वो रिश्ते में लक्ष्मीबाई के भाई लगते थे राजा के राज्य को बचाने के लिए वासुदेव ने अपने बेटे को महाराजा गंगाधर राव को सौंप दिया इसके बाद आनंद राव को एक नया नाम मिला दामोदर राव यह नाम महाराजा गंगाधर राव के उस बेटे का नाम था जिनकी मृत्यु हो चुकी थी अब तय हो गया था कि पिता के बाद वह राजा बनेंगे यानी आनंद राव अब दामोदर राव हो गए हालांकि हुआ यह कि महाराजा ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह पाए और बेटे को गोद लेने के कुछ दिन बाद ही उनकी भी मौत हो गई इसके बाद सत्ता हाथ आई महारानी लक्ष्मीबाई के हाथ इस टाइम तक दामोदर राव बेहद छोटे थे इसलिए रानी लक्ष्मीबाई ने संरक्षिका की भूमिका निभाई हालांकि यह बात अंग्रेजों को पसंद नहीं आई उन्होंने झांसी को तय कर लिया था ईस्ट इंडिया कंपनी में मिलाने के लिए महाराजा के जाने के बाद लक्ष्मीबाई

ने अपना एक दूत कलकत्ता भेजा लॉर्ड डलहौजी के पास यह तब भारत के गवर्नर जनरल हुआ करते थे इन्होंने ही भारत के राज्यों को हड़पने के लिए डॉक्ट्रिन ऑफ लैब्स की पॉलिसी बनाई थी इधर लक्ष्मीबाई ने संदेश भिजवाया कि झांसी के अगले महाराज दामोदर राव होंगे उधर डलहौजी ने डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स का हवाला देकर दामोदर राव को राजा मानने से मना कर दिया ये पॉलिसी कहती थी कि अगर राजा का अपना बेटा नहीं है तो गोद लिया हुआ बेटा राज्य का वारिस नहीं माना जाएगा बल्कि इसकी जगह पर यह राज्य अंग्रेजों के कंट्रोल में चला जाएगा इस काले कानून का इस्तेमाल करके चंबल सतारा जैसी रियासतों को हड़पा जा चुका था और अब दलहोजी की नजर झांसी की ओर थी रानी लक्ष्मीबाई ने भी खूब कोशिश की इस कानून से लड़ने के लिए लेकिन अंग्रेज जो थे वो तैयार नहीं हुए रानी ने अदालत में जॉन लैंग नाम के एक अंग्रेज वकील की मदद से केस भी लड़ा लेकिन आखिरी फैसला सुनाते हुए कंपनी ने कहा कि झांसी पर दामोदर राव का अधिकार नहीं होगा यह रियासत ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा हो गई और बदले में रानी को हर साल पांच 000 पेंशन मिलेगी ईस्ट इंडिया कंपनी के इस फरमान से भड़की झांसी की रानी ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया इसी लड़ाई को लड़ते-लड़ते ग्वालियर में उन्होंने वीर गति प्राप्त की यहां से रानी लक्ष्मीबाई की कहानी भी खत्म होती है और झांसी की रियासत अंग्रेजों को मिल जाती है लेकिन सवाल है कि उनके बेटे का क्या वो बेटा जिसे उन्होंने गोद लिया था इस बात को जानने के लिए किताब बहुत इंपॉर्टेंट है इस किताब का नाम है इतिहास च सहली या इतिहास में यात्राएं इस किताब में हिस्टोरियन वाई एन केलकर ने दामोदर राव की पूरी जर्नी को बताया है इस किताब के हिसाब से जब रानी

लक्ष्मीबाई की मृत्यु हुई तो उनके वफादार ने दामोदर राव को अपने साथ रखा उस वक्त दामोदर राव बहुत छोटे थे खुद रानी लक्ष्मीबाई उन्हें अपनी पीठ पर बांधकर लड़ाई लड़ रही थी इसलिए दामोदर का ख्याल रखना बहुत ज्यादा जरूरी था लक्ष्मीबाई की मृत्यु के वक्त कुल 60 लोग थे जो अंग्रेजों से लड़ाई में बच गए थे इसमें से नाने खान रिसालदार गणपत राव नाम के एक मराठा रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने दामोदर राव के संरक्षण की जिम्मेदारी ली कुल 22 घोड़ों और 60 ऊंटों के साथ यह लोग बिठूर के पेशवा नाना साहेब के भाई राव साहिब के शिविर से अलग हो गए और अपना रास्ता तलाशने का फैसला किया इस दौरान दामोदर राव की रक्षा करते हुए रघुनाथ सिंह मुश्किल रास्तों को पार कर रहे थे और बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ निकल गए पूरे रास्ते में किसी ने इनकी मदद नहीं की सब के सब अंग्रेजों से डरे हुए थे इसीलिए इन्होंने नदी के किनारे घने जंगलों में डेरा डाला इस दौरान खुले आसमान के नीचे उन्हें सोना पड़ा चाहे सर्दी हो या गर्मी सबके हालात एक जैसे थे हालत इतनी खराब हो गई थी कि जंगली फलों और जामुन पर ही गुजारा करना पड़ रहा था इस टाइम पर अंग्रेज गांव-गांव घूमकर उनकी तलाश कर रहे थे इसलिए उन्हें डर था कि गांव में मदद मांगने पर कहीं उन्हें पकड़ ना लिया जाए फिर कई दिनों के बाद एक व्यक्ति खाना देने के लिए मान गया इसके बाद लोगों की नजरों से बचने के लिए सभी 60 लोग 10-10 के ग्रुप में बट गए और अलग-अलग रहना शुरू कर दिया यह किताब बताती है कि यह गांव ललितपुर था इसके मुखिया ने भी हर महीने ₹5000000 बताया जाता है कि ग्वालियर से भागते वक्त उनके पास ₹ हज थे लेकिन वह इन दो सालों में पूरी तरह से खत्म हो गए इसी के चलते उस मुखिया ने भी उन्हें भगा दिया जो

उनकी मदद कर रहा था यही नहीं मुखिया ने उनके घोड़ों को भी वापस नहीं किया यहां से निकलकर यह लोग ग्वालियर के पास एक गांव पहुंचे जहां पर एक मुखबिर ने अंग्रेजों को विद्रोही होने की खबर सुना दी इस तरह अंग्रेजों ने उन्हें विद्रोही समझकर पकड़ लिया हालांकि किसी को अभी तक पता नहीं था कि गिरफ्तार हुए विद्रोहियों में से एक लड़का रानी लक्ष्मीबाई का बेटा है इस तरह दामोदर राव के संरक्षक को मिस्टर फ्लिंक के बारे में पता चला फ्लिंक अंग्रेजों के पॉलिटिकल एजेंट थे और झांसी के एक रिसालदार से उनके अच्छे रिश्ते हुआ करते थे मराठा सरदारों ने फिर फ्लिंक से मदद मांगने का फैसला किया फ्लिंक से मिलकर उन्हें समझाया गया कि दामोदर राव बहुत छोटे हैं उन्हें इस तरह से सजा नहीं मिलनी चाहिए यह सुनकर फ्लिंक ने इंदौर में तैनात एक ब्रिटिश कर्नल को यह बात बताई कर्नल ने सरेंडर की शर्त पर मौत की सजा ना देने की बात कही इस तरह दामोदर राव को ग्वालियर से इंदौर ले जाया गया हालांकि इंदौर ले जाने से पहले उन्हें न महीने जेल में रखा गया जबकि इस टाइम पर उनकी उम्र बेहद कम थी तमाम मुश्किलों के बाद मई 1860 में दामोदर राव को इंदौर ले जाया गया

और यहां उन्हें कश्मीर के मुंशी धर्म नारायण के हवाले कर दिया गया कंपनी ने उनके साथियों को अलग कर दिया और इसके साथ ही 0000 की सालाना पेंशन तय कर दी उस टाइम पर दामोदर राव के पास इन रुपयों को एक्सेप्ट करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था क्योंकि उस वक्त वो बहुत छोटे हुआ करते थे और उनका ख्याल रखा जाना बहुत ज्यादा जरूरी था इसके बाद क्या हुआ इसकी बहुत कम जानकारी मिलती है इतिहास में लेकिन कहा जाता है कि दामोदर राव अपनी जिंदगी के आखिरी दिन बेहद गरीबी में बिता रहे थे आगे चलकर उन्हें एक बेटा भी हुआ और इसी बेटे से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का परिवार आज भी जिंदा है आज भी खुद के नाम के आगे झांसी वाले लिखकर दामोदर राव का परिवार झांसी में रहता है साल 1906 में दामोदर राव की मृत्यु हो गई थी तब से लेकर आज तक उनका परिवार इंदौर में ही रह रहा है और गुमनामी का जीवन जी रहा है दोस्तों यह थी कहानी रानी लक्ष्मीबाई के बेटों की अब आपको यह कहानी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताइएगा वीडियो को लाइक और शेयर करना ना भूले और ऐसी इंटरेस्टिंग कहानियों के लिए इतिहास से जुड़े रहने के लिए हिस्ट्री

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