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जब एंबेसडर थी सत्ता की पहचानः कैसे मारुति 800 ने गिराया लाल बत्ती वाली गाड़ी का रुतबा ?

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साल 2005 बिहार की सत्ता में एक बड़ा उलटफेर हुआ। कई सालों की सियासी उठापठक के बाद नीतीश कुमार बिहार के नए मुख्यमंत्री बने। सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार ने सिस्टम के पुराने तौर तरीकों को उखाड़ फेंकने का फैसला किया। फिर चाहे वह भ्रष्टाचार पर नकेल कसना हो या फिर बिहार को जंगल राज बना चुके माफियाओं को जेल की चार दीवारी में कैद करना हो। बिहार की खस्ताहाल सड़कों से लेकर नेताओं के काफिले तक सब कुछ बदला जाने लगा और इसी बदलाव की चपेट में आई एक भारीभरकम सफेद रंग की सरकारी गाड़ी जो दशकों से विधायकों से लेकर सांसदों और यहां तक कि प्रधानमंत्री तक की पहचान का अहम हिस्सा थी। खैर नए मुख्यमंत्री ने फरमान सुनाया कि कैबिनेट को नया लुक देना है। इसलिए अब यह धीमी और पुरानी गाड़ियां नहीं चलेंगी। जिसके बाद बिहार सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च कर उस पुरानी गाड़ी की जगह तेजतर्रार Tata इंडिगो और Mahindra Scorpio जैसी 58 मॉडर्न गाड़ियां ऑर्डर की गई। लगा कि अब बिहार के मंत्रियों का काफिला किसी कॉर्पोरेट कंपनी के सीईओ जैसा हाईटेक और चुस्त दिखेगा। लेकिन यह नयापन ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सका। इन नई और चमचमाती गाड़ियों में घूमने वाले मंत्रियों को एक अजीब सी बेचैनी सताने लगी क्योंकि अब लोग उनका काफिला देखकर किनारे नहीं हटते थे। इन नई गाड़ियों के चलते जनता को लगता ही नहीं था कि कोई बड़ा नेता या मंत्री उनके बीच आया है। मंत्रियों को भी लगने लगा कि वह कोई मंत्री नहीं बल्कि किसी प्राइवेट कंपनी के मैनेजर बन गए हैं।

इस नई कार के चलते वो पहले वाला खौफ, वो जलवा, वो भौकाल सब गायब हो गया था। फिर क्या था? महज 2 साल बाद ही इन माननीयों ने हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने मुख्यमंत्री से शिकायत की कि नई गाड़ियों में उन्हें वो इज्जत नहीं मिल रही जो उन्हें मिलनी चाहिए। जब सब मंत्रियों ने एक सुर में शिकायत की तो मुख्यमंत्री को उनकी बात सुननी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि नीतीश कुमार को अपने मंत्रियों की शान और वोट बैंक को बनाए रखने के लिए अपने ही फैसले को बदलना पड़ा और बिहार सरकार को वही पुरानी भारीभरकम सफेद रंग की 18 गाड़ियां फिर से खरीदनी पड़ी। एक ऐसी गाड़ी जो सिर्फ लोहे का ढांचा भर नहीं थी। वो हिंदुस्तान की सड़कों पर सत्ता, पावर और रुतबे का चलता फिरता सिंबल थी। जब वो सड़क से गुजरती थी तो लोग समझ जाते थे कि सरकार आ रही है। एक ऐसी गाड़ी जिसने 50 साल तक भारत की सड़कों पर राज किया। एक ऐसा दौर था जब किसी के दरवाजे पर यह सफेद गाड़ी खड़ी हो जाती थी तो पूरे मोहल्ले को पता चल जाता था कि इस घर में किसी बड़े वीआईपी का आना हुआ है। यह गाड़ी एक स्टेटस सिंबल थी जो बिना कुछ बोले सामने वाले का रसूख बयां कर देती थी। नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबरगांव। आज किस्सा के इस एपिसोड में कहानी हिंदुस्तान की सड़कों की बेताज बादशाह रही एंबेसडर कार की। बताएंगे कि कैसे आजादी के बाद एक नए भारत के निर्माण के साथ इस कार का जन्म हुआ। कैसे ब्रिटेन की मॉरिस ऑक्सफोर्ड भारत आकर एंबेसडर बन गई। और देखते ही देखते नेताओं और नौकरशाहों की पहली और इकलौती पसंद बन गई। बात होगी उस दौर की जब एंबेसडर में लाल बत्ती का मतलब ही पावर हुआ करता था। चाहे कोई बिजनेसमैन हो या कोई अमीर आदमी। इस गाड़ी के लिए उन्हें 5-प साल का इंतजार करना पड़ता था। बात होगी उस वाक्य की भी जब देश के प्रधानमंत्री वाजपेई एंबेसडर में फंस गए थे और उन्हें बाहर निकालने के लिए सुरक्षा कर्मियों की मदद लेनी पड़ी थी और यही वो वक्त था जब इस गाड़ी का सरकार से बाहर जाने का सफर शुरू हो गया। साथ ही जानेंगे उन गलतियों और ज़िद के बारे में जिसने हिंदुस्तान मोटर्स के इस सबसे सक्सेसफुल प्रोडक्ट को बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। आखिर Maruti 800 के आने से ऐसा क्या भूचाल आया कि एंबेसडर का रुतबा ही हवा हो गया। और अंत में बात करेंगे उस नए दौर की जब एंबेसडर का प्रोडक्शन हमेशा के लिए रुक गया और उसकी जगह भारत की सड़कों पर राज करने उतरी Toyota Fortuner जो आज के नेताओं का नया स्टेटस सिंबल बन चुकी है और Fortuner में आखिर वो कौन सी बात है जो स्वदेशी कंपनियों Tata और Mahindra को छोड़ यह गाड़ी नेताओं की पहली पसंद बन गई है? इस कहानी की शुरुआत होती है 1890 के दशक से। पश्चिमी देशों में कारों का ट्रेंड शुरू हो चुका था। लेकिन भारत में ट्रांसपोर्ट के नाम पर सिर्फ ट्रेन, बैलगाड़ी और साइकिल ही हुआ करते थे। सड़क पर बिना किसी जानवर के चलने वाली कोई मशीन आम आदमी के लिए किसी जादू जैसी थी। फिर साल 1897 में कोलकाता में एक अंग्रेज ने एक कार इंपोर्ट की और ठीक अगले साल 1898 में देश के सबसे बड़े उद्योगपति जमशेद जी टाटा कार खरीदने वाले पहले भारतीय बने। इसके बाद तो राजा महाराजाओं और रईसों के बीच कार खरीदने की होड़ सी मच गई। लेकिन आम हिंदुस्तानी के लिए कार खरीदना एक नामुमकिन सपना ही था। वक्त बीता 1926 में Ford और 1928 में जनरल मोटर्स जैसी विदेशी कंपनियों ने भारत में एंट्री मारी। लेकिन यह गाड़ियां इतनी महंगी थी कि आम आदमी की पहुंच से पूरी तरह बाहर थी। इस बड़े गैप को एक विज़नरी इंसान बहुत गहराई से ऑब्जर्व कर रहा था। उसका नाम था बृजमोहन बिरला।

बिरला परिवार की तीसरी पीढ़ी के बिजनेसमैन बीएम बिरला का सपना था कि भारत की अपनी कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनी हो ताकि एक आम हिंदुस्तानी भी कार में सफर कर सके। बिरला के नेहरू पटेल और गांधी के साथ बहुत करीबी रिश्ते थे। इसी बीच उनकी मुलाकात ब्रिटिश कंपनी मॉरिस मोटर्स के फाउंडर लॉर्ड नफील्ड से हुई। दोनों के बीच प्रपोजल पास हुआ और आजादी से ठीक 5 साल पहले यानी 1942 में भारत की पहली कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनी की नींव रखी गई। नाम था हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड। 1948 में बीएम बिरला ने अपना मैन्युफैक्चरिंग प्लांट पश्चिम बंगाल के हुगली उत्तरपाड़ा में शिफ्ट कर दिया। यह एशिया का दूसरा सबसे पुराना ऑटोमोबाइल प्लांट बना। शुरुआत में Hindstan Motors ने Hindustan 10, Hindstan 14 और BB हिंदुस्तान जैसी कारें बनाई। लेकिन वो आम जनता के लिए मुफीद नहीं थी। क्या आपने सोचा तब इन गाड़ियों की कीमत क्या थी? 7 से ₹100 के बीच और सोचिए यह वो वक्त था जब देश में भुखमरी के हालात थे। तो आम जनता इन गाड़ियों के बारे में सपने में भी नहीं सोचती थी। बिरला अब एक ऐसी कार चाहते थे जो भारत की उबड़ खाबड़ सड़कों, धूल मिट्टी और बड़ी फैमिलीज के हिसाब से एकदम परफेक्ट हो और सस्ती भी हो। उनकी यह तलाश ब्रिटेन की एक कार मॉरिस ऑक्सफोर्ड सीरीज 3 पर जाकर रुकी। बिरला ने इसके डिज़ राइट्स खरीद लिए और फिर आया साल 1957। उत्तरपाड़ा के उस विशाल प्लांट से एक ऐसी कार बनकर निकली जिसने अगले पांच दशकों तक देश की सड़कों पर राज किया। हिंदुस्तान एंबेसडर। यह कोई साधारण कार नहीं थी। यह मेक इन इंडिया का सबसे पहला और प्राउड सिंबल थी। वो भी तब जब किसी ने इस शब्द के बारे में सोचा तक नहीं था। जिसकी तब कीमत थी ₹11,161 एक्स प्लांट। एक्स शोरूम नहीं क्योंकि तब शोरूम नहीं हुआ करते थे। खैर एंबेसडर के लॉन्च होते ही इंडियन ऑटोमोबाइल मार्केट में जैसे एक रेवोल्यूशन आ गया। इसकी कामयाबी के पीछे इसका मजबूत डिजाइन था। मोटी स्टील थी। क्रोम ग्रिल और हैवी बोनट वाली यह कार देश के गड्ढों वाली सड़क पर भी मक्खन की तरह चलती थी। अगर किसी गाड़ी से टक्कर हो जाए तो ज्यादा नुकसान सामने वाली गाड़ी का ही होता था। अंदर इतना स्पेस था कि पांच सीटर होने के बावजूद इसमें छ से सात लोग आराम से बैठ सकते थे। ऑटोमोबाइल जर्नलिस्ट मुराद अली बेग ने एक मजेदार किस्सा शेयर किया है। एक बार ट्रैफिक पुलिस ने एक एंबेसडर टैक्सी ड्राइवर को पकड़ कर सीधा डीएम के सामने पेश कर दिया। पुलिस वाले की शिकायत थी कि इस ड्राइवर ने अपनी पांच सीटर एंबेसडर में 25 लोगों को ठूंस कर बैठा रखा था। डीएम को यकीन नहीं हुआ कि यह कैसे मुमकिन है। कलेक्टर ने वहीं पर डेमो दिखाने को कहा और उस ड्राइवर ने फिर से उन 25 लोगों को उसी एंबेसडर में फिट करके दिखा दिया। इस किस्से को सुनकर भले ही हंसी आती है, लेकिन इससे यह पता चलता है कि एंबेसडर स्पेस के मामले में कितनी तगड़ी कार थी। पत्रकार अमृत ढिलो अपनी एक रिपोर्ट में एंबेसडर के बारे में लिखती हैं कि इसे चलाना काफी सस्ता था और इसकी रिपेयरिंग तो और भी ज्यादा सस्ती थी। यह हर मौसम में हर तरह के रास्तों पर चलने वाली कार थी। इसकी पिकअप थोड़ी स्लो थी लेकिन सबसे अच्छी बात यह थी कि आप चाहे कहीं भी हो सड़क किनारे का कोई भी मैकेनिक बस एक पेचकस और पानी की मदद से इसका इंजन ठीक कर सकता था। इंजन की बात करें तो इसके फर्स्ट मॉडल यानी मार्क वन में 40 बीएपी पावर और 1476 सीc का इंजन आता था जो बाद में 1489 सीc और 1995 सीc तक अपग्रेड किया गया। लेकिन एंबेसडर की इस बेतहाशा सक्सेस के पीछे सिर्फ डिज़ और इंजन का कमाल नहीं था। गवर्नमेंट की पॉलिसीज का भी इसमें बहुत बड़ा रोल था। दरअसल आजादी के बाद भारत सरकार ने विदेशी कारों के इंपोर्ट पर इतने भारी टैक्स लगा दिए कि वो आम आदमी की पहुंच से लगभग बाहर हो गई। सरकार ने फोर्ड और जनरल मोटर्स को भी अपने ऑपरेशंस रोकने को कह दिया। नतीजा यह हुआ कि हिंदुस्तान मोटर्स के सामने से विदेशी कंपटीशन पूरी तरह खत्म हो गया। उस दौर में कोई भी बिजनेस करने के लिए हजारों लाइसेंस लेने पड़ते थे। यही वजह थी कि उस दौर को लाइसेंस राज का जमाना कहा जाता था। लेकिन बीएम बिरला और नेहरू के अच्छे रिश्तों के चलते हिंदुस्तान मोटर्स को इन दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। मार्केट में उस वक्त एंबेसडर के अलावा सिर्फ प्रीमियर पद्मिनी यानी फिएट और स्टैंडर्ड हराल्ड जैसी इक्कादुक्का कारें ही बची थी।

फिएट थोड़ी छोटी और स्टाइलिश थी जिसे बंबई के फिल्म स्टार्स पसंद करते थे। लेकिन एंबेसडर के स्पेस और रुतबे के आगेट का कोई मुकाबला नहीं था। इस मोनोपोली का कंपनी ने जमकर फायदा उठाया। 1970 के दशक में तो डिमांड इतनी ज्यादा थी कि अगर आप एंबेसडर बुक करते तो आपको डिलीवरी के लिए बरसों का इंतजार करना पड़ता था। 1980 का दशक आते-आते इंडिया के ऑटोमोबाइल मार्केट का 71% शेयर सिर्फ एंबेसडर के पास था। पर यहां से कहानी एक नया मोड़ लेने वाली थी। 71% मार्केट शेयर तो सिर्फ आम जनता का प्यार था। एंबेसडर का असली जलवा तो अभी बाकी था। आखिर आम आदमी की सवारी ने सत्ता के गलियारों में कैसे एंट्री मारी? सफेद एंबेसडर पर लगी एक लाल बत्ती कैसे पूरे हिंदुस्तान में पावर, ब्यूरोक्रेसी और रुतबे का सबसे बड़ा सिंबल बन गई। देश के प्रधानंत्रियों की जान बचाने के लिए कैसे यह कार एक बुलेट प्रूफ किले में तब्दील हुई? और फिर कैसे एक छोटी सी Maruti 800 ने इस विशाल साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी। इसकी कहानी और भी दिलचस्प है। आम लोगों की चहेती होने के साथ-साथ एंबेसडर पॉलिटिशियंस और गवर्नमेंट ऑफिशियल्स की भी पहली पसंद थी। ऑटोमोबाइल हिस्टोरियन गौतम सेन अपनी किताब द ऑटोमोबाइल में इसके बारे में लिखते हैं कि एंबेसडर सिर्फ एक मशीन नहीं थी। वो भारत के बाबू कल्चर और ब्यूरोक्रेसी का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई थी। सफेद रंग की एंबेसडर जिस पर लाल बत्ती लगी हो और खिड़कियों पर सफेद पर्दे हो जब वो सड़क से गुजरती थी तो ट्रैफिक अपने आप रुक जाया करता था। जज हो या कमिश्नर हो या फिर मंत्री हर किसी का स्टेटस इसी कार से तय होता था। एंबेसडर के बारे में देश के पहले प्राइम मिनिस्टर पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री का भी एक बहुत ही इंटरेस्टिंग किस्सा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक हिंदुस्तान मोटर्स ने अक्टूबर 1963 में नेहरू को एंबेसडर कार ब्लैक मार्क 2 गिफ्ट की थी। पंडित नेहरू अपनी रोजमर्रा की ट्रेवलिंग के लिए हमेशा एंबेसडर का ही इस्तेमाल करते थे। लेकिन जब भी कोई विदेशी मेहमान या कोई फॉरेन मिनिस्टर इंडिया आता था तो नेहरू जी उसे रिसीव करने एयरपोर्ट अपनी कैडले कार में ही जाते थे। एक दिन लाल बहादुर शास्त्री ने नेहरू से पूछ ही लिया कि वो फॉरेन मिनिस्टर के लिए कैडलेक का इस्तेमाल क्यों करते हैं? इस पर नेहरू ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया कि वह बाहर के लोगों को यह दिखा देना चाहते हैं कि इंडिया का प्राइम मिनिस्टर भी कैडलेक जैसी महंगी गाड़ी में घूम सकता है। लेकिन इस कहानी में मोड़ तब आता है जब 1964 में लाल बहादुर शास्त्री खुद देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया। चाहे विदेशी मेहमान आए या कोई और शास्त्री जी ने अपनी वही पुरानी सफेद एंबेसडर कार नहीं छोड़ी। और जब उनसे पूछा गया कि आप नेहरू की तरह कैडलक का इस्तेमाल क्यों नहीं करते? तो शास्त्री जी का जवाब था कि पंडित नेहरू एक महान इंसान थे। उन्हें कॉपी करना मेरे लिए मुश्किल है। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि फॉरेन मिनिस्टर्स मेरे बारे में क्या सोचते हैं। उन्हें यह दिखना चाहिए कि इंडियन प्राइम मिनिस्टर एक ऐसी कार में ट्रैवल करता है जो पूरी तरह से मेड इन इंडिया है। शास्त्री से जुड़ा एक और बहुत इमोशनल किस्सा है जो उनके बेटे अनिल शास्त्री अक्सर सुनाते हैं। बात तब की है जब शास्त्री जी नेहरू सरकार में गृह मंत्री हुआ करते थे। उनके पास सरकारी एंबेसडर थी। लेकिन अनिल और उनके छोटे भाई स्कूल जाने के लिए तांगे का इस्तेमाल करते थे। जबकि उनके दोस्तों के पिता जो शास्त्री के अंडर ही काम करते थे वो लोग सरकारी एंबेसडर में बच्चों को स्कूल छोड़ते थे। एक दिन अनिल ने शास्त्री जी से पूछा कि हम गृह मंत्री के बेटे होकर भी तांगे से क्यों जाते हैं? इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि तुम सरकारी गाड़ी से जा सकते हो। लेकिन याद रखना यह गाड़ी सिर्फ तब तक है जब तक मैं मंत्री हूं। जिस दिन पद नहीं रहेगा तुम्हें फिर तांगे से ही जाना पड़ेगा। कुल मिलाकर बात इतनी है कि एंबेसडर सिर्फ एक कार नहीं यह सादगी, पब्लिक इमोशन और पावर का सिंबल थी। पीवी नरसिम्हा राव से लेकर एचडी देवगोड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेई तक इंडिया के तमाम प्राइम मिनिस्टर्स ने एंबेसडर का ही इस्तेमाल किया। आज भी अटल बिहारी वाजपेई द्वारा यूज की गई एंबेसडर तीन मूर्ति भवन की शान बढ़ा रही है।

लेकिन यह कार सिर्फ सादगी का ही प्रतीक नहीं थी। यह देश की सबसे बड़ी सिक्योरिटी फोट्रेस यानी सुरक्षा का किला भी थी। लेकिन यह कहानी जानने से पहले यह जान लीजिए कि इंदिरा गांधी कौन सी एंबेसडर चलाती थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक इंदिरा गांधी के पास एंबेसडर का मार्क 3 मॉडल हुआ करता था जो उन्होंने साल 1977 में खरीदा था। इस गाड़ी का नंबर था डीएई 447 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारतीय वीवीआईपी सुरक्षा की पूरी नीति बदल दी गई। मंत्रियों और मुख्यंत्रियों को सुरक्षित रखने के लिए सरकारी स्तर पर एंबेसडर कारों को बुलेट प्रूफ करने का सिलसिला इसी दौर में आधिकारिक रूप से शुरू हुआ। इन खास गाड़ियों में मोटे बैलेस्टिक ग्लास की लेयर्स लगाई गई। इसके अंदर हाई हार्डन बैलस्टिक स्टील और बैलस्टिक नायलॉन की लेयरिंग भी की गई थी जो इसे किसी मिलिट्री टैंक जैसा मजबूत बना देती थी। इसमें रन फ्लैट टायर्स लगाए गए जो हमले में पंचर होने के बाद भी 80 कि.मी. की स्पीड से लगातार भाग सकते थे। यही नहीं इस गाड़ी में सेल्फ सीलिंग फ्यूल टैंक और बाहर की दुनिया से बात करने के लिए इंटरकॉम सिस्टम भी लगाया गया ताकि हमले के वक्त दरवाजा या खिड़की खोलने की नौबत ही ना आए। यह गाड़ी AK-47 की गोलियों से लेकर कुछ हद तक ग्रेनेड अटैक का भी सीधा वार झेल सकती थी। हालांकि इतने भारी कवच और लोहे की वजह से एंबेसडर काफी सुस्त और स्लो हो जाती थी। इसका पिकअप गिर जाता था। लेकिन कैबिनेट मंत्रियों और मुख्यंत्रियों की जान बचाने के लिए इसे मजबूत बनाना भी जरूरी था। यानी कुल मिलाकर बात यह है कि लाल बहादुर शास्त्री से लेकर वाजपेई तक देश के प्रधानमंत्री एंबेसडर में ही चला करते थे। लेकिन देश के सबसे सुरक्षित वीवीआईपी यानी प्रधानमंत्री के काफिले से एंबेसडर के हटने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। इस ट्रेंड की शुरुआत हुई पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के समय से। एक बार वाजपेयी किसी मीटिंग के लिए एंबेसडर से पहुंचे। जब वह बाहर निकलने लगे तो कार के दोनों पिछले दरवाजे पूरी तरह जाम हो गए। सुरक्षाकर्मियों द्वारा काफी मशक्कत के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो प्रधानमंत्री वाजपेई को आगे की दोनों बकेट सीट्स के बीच के संकरे गैप यानी गियर लीवर के ऊपर से रेंगते हुए आगे के दरवाजे से बाहर निकलना पड़ा। इस घटना के बाद वीवीआईपी सुरक्षा में भारी फेरबदल किया गया। 2002 में एसपीजी ने एंबेसडर के धीमे पिकअप और दरवाजे जाम होने जैसी खामियों को देखते हुए हिंदुस्तान मोटर्स से प्रधानमंत्री की सवारी का कॉन्ट्रैक्ट वापस ले लिया। इसके बाद पहली बार सरकार ने विदेशी कंपनियों का रुख किया और BMW 7 सीरीज को प्रधानमंत्री की आधिकारिक सवारी बना दिया गया। अब आप कहेंगे कि पहली बार कैसे? क्योंकि अपने वक्त में तो नेहरू Rolls Ryce और CEL जैसी कई लग्जरी गाड़ियों से चला करते थे। तो यहां आपका यह जानना जरूरी है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर जो कड़े नियम बने वो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बनाए गए थे। जैसे एसपीजी का गठन जिसके जिम्मे प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिवार की सुरक्षा होती है और इसी के चलते बाद में एसपीजी द्वारा तय किया जाने लगा कि प्रधानमंत्री किस गाड़ी से चलेंगे। यहीं से वो सफर शुरू हुआ जिसने पीएम के काफिले को एकदम नेक्स्ट लेवल पर पहुंचा दिया। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने पूरे कार्यकाल में BMW 7 सीरीज का इस्तेमाल किया। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए तो उन्होंने भी शुरुआत BMW से ही की। फिर उसे अपग्रेड करके Rang Rover Stinal में आए और आज उनकी आधिकारिक सवारी है Mercedes Mibag S650 गार्ड। यह मेबग किसी चलते फिरते अभेद किले जैसी है। इसमें VR10 लेवल की सुरक्षा है जो किसी सिविलियन कार को मिलने वाली सबसे ऊंची सेफ्टी रेटिंग है। इस कार को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह 2 मीटर की दूरी से 15 किलो टीएटी का धमाका सह सकती है।

AK-47 तो छोड़िए यह स्नाइपर राइफल की गोलियां भी झेल सकती हैं। इसका फ्यूल टैंक सेल्फ- सीलिंग है और अगर कोई गैस या केमिकल अटैक हो जाए तो कार के अंदर ऑक्सीजन की सप्लाई देने वाला अपना खुद का फ्रेश एयर सिस्टम भी लगा है। कहां 1964 में शास्त्री जी की वो मेड इन इंडिया एंबेसडर और कहां आज की यह Mercedes मेक? सत्ता की सुरक्षा और रुतबे के मायने अब मीलों आगे निकल चुके हैं। लेकिन अगर बात आम जनता की करें तो एंबेसडर का रुतबा तोड़ने का असली काम किसी विदेशी कार ने नहीं बल्कि Maruti 800 ने किया। और इस Maruti के जन्म की कहानी भी सीधे सत्ता के शीर्ष गलियारों से ही जुड़ी थी। दरअसल Maruti कोई अचानक से आई विदेशी कंपनी नहीं थी बल्कि यह इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का ड्रीम प्रोजेक्ट था। 70 के दशक में संजय गांधी एक सस्ती और स्वदेशी पीपल्स कार बनाना चाहते थे। लेकिन 1980 में एक विमान हादसे में उनके निधन के बाद उनका यह प्रोजेक्ट खटाई में पड़ गया। अपने बेटे के इस आखिरी सपने को पूरा करने के लिए ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस कंपनी का नेशनलाइजेशन कर दिया और जापान की कंपनी Suzuki के साथ हाथ मिलाया। फिर आया 14 दिसंबर 1983 का वो दिन जिसने इंडियन ऑटोमोबाइल मार्केट की पूरी कहानी पलट कर रख दी। Maruti ने अपनी पहली कार Maruti 800 ल्च कर दी। यह कार एंबेसडर की एकदम उलट थी। जहां एंबेसडर एक भारीभरकम स्लो और पुरानी डिज़ाइन वाली गाड़ी थी। वहीं Maruti 800 बेहद हल्की, फुर्तीली और स्टाइलिश थी। साथ में यह कार आम जनता के बजट में भी थी। यही कारण है कि इस कार की पहली यूनिट किसी मंत्री या ब्यूरोक्रेट को नहीं मिली थी। पहली Maruti के मालिक थे हरपाल सिंह जो इंडियन एयरलाइंस के एंप्लई थे और उनको इस कार की चाबी खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सौंपी थी।

लॉन्च के वक्त Maruti की कीमत रखी गई सिर्फ ₹52,500 जबकि उस वक्त एक एंबेसडर की कीमत ₹70,000 का आंकड़ा पार कर चुकी थी। जब पहली बार लोगों ने Maruti 800 को सड़कों पर मक्खन की तरह दौड़ते देखा तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गई। इस नई कार के स्टीयरिंग को घुमाने के लिए एंबेसडर की तरह किसी पहलवान जैसी ताकत नहीं लगानी पड़ती थी। इसका गियर बॉक्स बिल्कुल स्मूथ था और सबसे बड़ी बात पेट्रोल पीने के मामले में यह एंबेसडर के सामने बहुत ज्यादा किफायती थी। लॉन्च होते ही Maruti को लेकर लोगों में ऐसा गजब का क्रेज बना कि महज 2 महीने के भीतर ₹1,35,000 लोगों ने 10 ₹100 देकर इसे प्रीबुक कर लिया। 80 के दशक में जहां पूरे साल में मुश्किल से 30 से 400 कारें बिकती थी, वहां 1987 तक आते-आते Maruti 800 ने मार्केट के सारे रिकॉर्ड्स ध्वस्त कर दिए। मिडिल क्लास फैमिलीज ने अपनी एंबेसडर की बुकिंग कैंसिल करानी शुरू कर दी और वह Maruti की लाइन में जा खड़े हुए। जनता का टेस्ट अब बदल रहा था। अब उन्हें सिर्फ एक बड़ा लोहे का डिब्बा नहीं चाहिए था। एंबेसडर अब आम आदमी के लिए सबसे अफोर्डेबल ऑप्शन भी नहीं बची थी। दरअसल Maruti 800 का आना एंबेसडर के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। Maruti 800 ने फैमिली कार की जगह पूरी तरह हथिया ली और एंबेसडर अब सिर्फ नेताओं की गाड़ी या काली पीली टैक्सी बनकर रह गई। फिर एक वक्त वह भी आया जब एंबेसडर कार की बिक्री 5000 यूनिट से नीचे चली गई।

यह साल था 2014 का। उस वक्त एंबेसडर की महंगी से महंगी कार थी एंबेसडर Grand 05 जिसका रेट था ₹6,20,392। हालांकि साल 2013 में BBC के टॉप गियर नाम के टेलीविज़ शो ने दुनिया भर की टैक्सियों का एक टेस्ट किया था और एंबेसडर को बेस्ट टैक्सी इन द वर्ल्ड का खिताब दिया गया था। लेकिन यह खिताब तो महज पल भर का सुकून था। अगले ही साल मई 2014 में हिंदुस्तान मोटर्स ने भारी घाटे, कम बिक्री और तकनीकी रूप से पिछड़ जाने के कारण एंबेसडर का प्रोडक्शन हमेशा के लिए बंद कर दिया और इसके साथ ही यह कंपनी भी बंद हो गई। पर यहां सोचने वाली बात यह है कि जो कार कंपनी कभी सत्ता और रुतबे का सबसे बड़ा प्रतीक थी वो आखिर कौड़ियों के भाव कैसे बिक गई? विदेशी कंपनियों की आंधी में हिंदुस्तान मोटर्स ने कैसे खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और सबसे बड़ा सवाल एंबेसडर के हमेशा के लिए विदा होने के बाद भारत की सियासत में Toyota Fortuner नेताओं का नया स्टेटस सिंबल बनकर कैसे उभरी? चलिए जानते हैं। जिस दौर में हिंदुस्तान मोटर्स शुरू हुई लगभग उसी दौर में Tata और Mahindra भी ऑटोमोबाइल सेक्टर में एंट्री कर चुके थे।

लेकिन शुरू में यह एक दूसरे के कॉम्पिटिटर्स नहीं थे। Mahindra उस वक्त अमेरिकी कंपनी विलज़ के साथ पार्टनरशिप में आईकनिक Gep और Mahindra MM 540 बना रही थी। जिसका फोकस आम आदमी पर नहीं बल्कि सेना, पुलिस और सरकारी विभागों पर था। वहीं टाटा देश की रीड मानी जाने वाली कमर्शियल गाड़ियां यानी ट्रक और बसें बना रहा था। लाइसेंस राज के चलते किसी और कंपटीशन का पनप पाना मुश्किल था और इसी का सबसे ज्यादा फायदा हुआ एंबेसडर को। लगभग तीन दशकों तक मार्केट में एंबेसडर की मोनोपोली रही। इस बीच इसके नए मॉडल्स ल्च हुए। 1958 से 1962 तक मार्क वन और फिर 1975 तक मार्क टू और उसके बाद मार्क 3 और 1979 में मार्क 4 आया। अब एक बात यह भी समझ लीजिए कि Maruti और एंबेसडर की गाड़ियों में सबसे बड़ा फर्क क्या था। दरअसल अपने लॉन्च के अगले ही साल यानी 1984 से Maruti ने अपने एक मॉडल Maruti 800 AC TTG में फैक्ट्री फिटेड AC का ऑप्शन देना शुरू कर दिया। हालांकि एंबेसडर ने साल 1977 में मार्क 3 मॉडल में एसी देना शुरू किया था। उस वक्त मार्क 3 मॉडल में एक वर्जन 1760 सीc का आता था जिसमें एसी का ऑप्शन दिया जाता था। लेकिन तब एसी वाली गाड़ियां इतनी नहीं बिकी। हालांकि मार्क 4 में भी एसी का विकल्प रखा गया। लेकिन जल्द ही 1979 में इसे डिस्कंटिन्यू कर दिया गया। एंबेसडर के डाउनफॉल की एक वजह यह भी रही कि दशकों में इस कार के मॉडल्स में कोई खास बदलाव नहीं किया गया। बदलाव के नाम पर सि

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