iPhone से लेकर इंडियास गॉट लेटेंट और केबीसी जैसे शो के फॉर्मेट तक हम अमेरिका से बहुत कुछ इंपोर्ट करते हैं और हमेशा एक शिकायत रहती है कि हमारे पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो हम अमेरिका को दे सके। तो ट्रेड डेफिसिट से दुखी रहने वाले सुधी जन अब खुश हो सकते हैं कि हमने भी अमेरिका को एक तकनीक दे दी है और वह भी पॉलिटिकल। सबसे पुरानी डेमोक्रेसी को हमने यह सिखा दिया है कि चुनाव जीतना है तो वोटर्स को डायरेक्ट पैसे देने का वादा करो। अब आपको अंदाजा तो हो ही गया होगा कि यहां किस बारे में बात हो रही है। भारत में चुनाव से पहले अगर कोई नेता कहता है कि जीतने के बाद वह लोगों को पैसे बांटेगा तो अब यह एक साधारण सी बात मानी जाती है। बल्कि यह तो इलेक्शन कैंपेन का एक जरूरी हिस्सा बन गया है। पार्टियों में होड़ मची रहती है। कोई ₹2500 का वादा करता है तो कोई 3000 का, कोई 5000 का। अमेरिका को लेकिन ऐसे वादों की आदत नहीं है। पर अभी अमेरिका की बागडोर एक ऐसे शख्स के हाथ में है जो परंपराओं की देहरी लांघने के लिए ही बना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर वह मिड टर्म इलेक्शन जीतते हैं तो हर अमेरिकी व्यस्क को $5000 देंगे। इंडियन करेंसी में लगभग $76,000 यानी $5 लाख के आसपास। इस वादे के बाद ट्रंप पर घूसखोरी के और वोट खरीदने के आरोप लग रहे हैं। खुद उनके उपराष्ट्रपति जे डी वेंस इस वादे को लेकर असहज हो गए हैं। अपने बॉस की बातों का वह डायरेक्ट खंडन तो कर नहीं सकते लेकिन न्यूज़ एजेंसी एपी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ट्रंप के वादे के 1 घंटे के भीतर ही जेडी वेंस ने इसे आंशिक रूप से वापस लेने की कोशिश की। लेकिन कैसे? और ट्रंप मी टर्म को लेकर इतने डेस्पिरेट क्यों है जो उनको फ्री बीज का वादा करना पड़ रहा है। यही समझेंगे इस वीडियो में। ट्रंप ने क्या कहा है उससे ज्यादा जरूरी यह जानना है कि क्यों कहा है? देखिए अमेरिका का मिड टर्म इलेक्शन राष्ट्रपति का चुनाव नहीं होता। कोई जीते, कोई हारे, ट्रंप अपने कार्यकाल तक राष्ट्रपति बने रहेंगे।
यानी 2028 तक। फिर उनके लिए या किसी भी अमेरिकी प्रेसिडेंट के लिए मिड टर्म जरूरी क्यों है? इसका जवाब है पावर और कंट्रोल। मिड टर्म किसी यूएस प्रेसिडेंट के लिए उसका 2 साल का वर्क रिपोर्ट होता है। इस चुनाव से जनता के मूड का पता चलता है कि प्रेसिडेंशियल इलेक्शन में जनता किस पार्टी की ओर जा सकती है। हालांकि बात इतनी नहीं है जैसा पहले बताया। यह पावर और कंट्रोल का भी खेल है। इसको समझते हैं। अमेरिका में कानून बनाने, बजट पास करने और प्रेसिडेंट की नीतियों पर नजर रखने का काम यूएस कांग्रेस का होता है। जैसे हमारे यहां संसद है। जैसे संसद के दो सदन हैं। लोकसभा और राज्यसभा वैसे ही यूएस कांग्रेस के भी दो सदन हैं। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 435 सीटें हैं। यह छोटे-छोटे जिलों को रिप्रेजेंट करते हैं और इनका कार्यकाल 2 साल का होता है। सीनेट में 100 मेंबर होते हैं। यूएस के 50 स्टेट्स में से हर एक से दो सीनेट चुने जाते हैं। इनका कार्यकाल छ साल का होता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का काम होता है यह तय करना कि किन कानूनों पर वोटिंग होगी। यानी कानून पास होते हैं हाउस से। जबकि सीनेट के पास उस कानून को अप्रूव करने या ब्लॉक करने का अधिकार होता है। इसके अलावा सीनेट प्रेसिडेंट की ओर से की गई नियुक्तियों को भी कंफर्म करती है और राष्ट्रपति के खिलाफ जांच भी बैठा सकती है। अब पैटर्न कुछ इस तरह से है। राष्ट्रपति ने कानून पेश किया। हाउस ने वोटिंग कराई। सीनेट उसको रोक सकती है। इसलिए जरूरी है कि हाउस और सीनेट दोनों में प्रेसिडेंट के अपने लोग बैठे हो। वरना मिड टर्म के बाद राष्ट्रपति बस नाम का राष्ट्रपति रह जाएगा। उसके एजेंडे धरे के धरे रह जाएंगे। कोई नया कानून पास ही नहीं हो पाएगा। कोई बड़ी नियुक्ति नहीं हो पाएगी। प्रेसिडेंट के खिलाफ जांच की संभावना बनी रहेगी। वो अलग। मिड टर्म इलेक्शन में हाउस की सभी सीटों पर वोटिंग होती है। क्योंकि उनका कार्यकाल ही दो सालों का होता है। लेकिन सीनेट का कार्यकाल छ साल का होता है। इसलिए मिड टर्म में सीनेट के सभी 100 सीटों पर वोटिंग नहीं होती। बल्कि हर मिड टर्म में लगभग 1/3 यानी लगभग 33 सीनेट का कार्यकाल पूरा होता है। तो इतनी ही सीटों पर वोटिंग होती है। लगभग 3 नवंबर को मिड टर्म होना है और इस बार सीनेट की 35 सीटों पर वोटिंग होनी है। तो अब यह समझ लेते हैं कि दोनों सदनों में ट्रंप की क्या स्थिति है। पहले हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का मामला देखिए। हाउस में अभी रिपब्लिकनंस यानी ट्रंप की पार्टी का कंट्रोल है।
जाहिर है डेमोक्रेट्स यानी विपक्षी पार्टी इसे अपने कंट्रोल में लेना चाहती हैं। न्यूज़ एजेंसी रॉर्टस की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाउस की 435 सीटों में से लगभग 50 सीटों पर ही कड़ी टक्कर होती हुई दिख रही है। और इन्हीं सीटों के नतीजे यह तय करेंगे कि हाउस पर किसका कंट्रोल रहेगा। फिलहाल 218 सीटें ट्रंप की पार्टी के पास हैं और 213 डेमोक्रेट्स के पास एक इंडिपेंडेंट कैंडिडेट भी है। यानी अगर स्थिति ऐसी ही रही तो डेमोक्रेट्स को बस तीन और सीटों की बढ़त चाहिए। फिर ट्रंप के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। इसको आंकड़े से समझना होगा। जेनरिक कांग्रेस बैलेट एक तरह का सर्वे होता है जिसमें यह पूछा जाता है कि अगर आज चुनाव हुए तो लोग किसको वोट करेंगे। 2026 के लिए हाउस में ट्रंप को छह पॉइंट से पीछे बताया गया है। ऐसा ही सर्वे डिसीजन डेस्क एचक्यू नाम की एजेंसी और कॉर्नल यूनिवर्सिटी भी करती है। इन दोनों ने भी अनुमान लगाया है कि डेमोक्रेट्स रिपब्लिकनंस से आगे निकल सकते हैं। अब सीनेट का हिसाब किताब देखिए। ट्रंप की पार्टी के पास फिलहाल 53 सीनेट की सीटें हैं और डेमोक्रेट्स के पास 47 यानी सिर्फ चार सीटों का खेल यहां भी है। जैसा पहले बताया इस बार इनमें से 35 पर चुनाव होने हैं। वेटर्स ने एक्सपर्ट्स के हवाले से लिखा है कि इन 35 सीटों में से सिर्फ नौ सीटों पर ही कड़ा मुकाबला दिख रहा है। और यही नौ सीटें ये तय कर सकती हैं कि सीनेट पर किसका कंट्रोल रहेगा। यह सीटें जिन स्टेट्स में हैं 2024 के प्रेसिडेंशियल इलेक्शन में उनमें से सात में ट्रंप की जीत हुई थी। अलास्का, जॉर्जिया, लोआ, मिगन, नॉर्थ केोलना, ओहायो औरस। रोटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2026 मिड टर्म के लिए इन नौ सीटों में से चार पर ट्रंप की पार्टी के पक्ष में लोगों का मूड दिख रहा है और चार पर डेमोक्रेट्स का। जबकि एक सीट लोआ की एक सीट पर करीबी मुकाबले का अनुमान लगाया गया है। अब यहां इ्सोस पोल की रिपोर्ट एक और दिलचस्प एंगल की ओर इशारा करती है। इसके मुताबिक अमेरिका में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग सिर्फ 33% है। यानी सिर्फ 33% अमेरिकी लोग अपने प्रेसिडेंट के काम से खुश हैं। कुल मिलाकर हाउस और सीनेट दोनों ही जगहों पर ट्रंप की लड़ाई तगड़ी है। लेकिन उनके लिए सीनेट पर कंट्रोल रखना ज्यादा जरूरी हो जाता है। इसमें अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट का भी एक एंगल है। यूएस में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति कैंडिडेट नॉमिनेट करते हैं और सीनेट उस पर विचार करती है और फिर उसे कंफर्म करती है। बिना सीनेट की मंजूरी के यह संभव नहीं है। तो भले ही ट्रंप राष्ट्रपति रहे लेकिन अगर सीनेट में डेमोक्रेट्स का कंट्रोल होगा तो ऐसी नियुक्तियां बिना डेमोक्रेट्स की सहमति के हो नहीं पाएगी। और कोर्ट में अगर जज अपना हो तो उसके अलग फायदे होते ही हैं। टेरिफ और सेंशंस लगाने में कोई खास दिक्कत नहीं आती। हालांकि जिन रिपोर्ट्स और पोल्स की हमने बात की है उनमें इस बात से इंकार नहीं किया गया है कि रिपब्लिकनंस के पास अभी भी बढ़त बनाने के मौके हैं। अगर वह अपनी नीतियों पर काम करें और लोगों तक सही मैसेज पहुंचाने में कामयाब हो गए तो वह वापस अपनी बढ़त बना सकते हैं।
तो इस $5000 को भी इसी मौके के रूप में देखा जा रहा है। यानी साम, दाम, दंड भेद किसी भी तरह ट्रंप को मिड टर्म जीतना है। क्योंकि यह अपने आप में एक अनोखा मामला है। ऐसा नहीं कि अमेरिका में सरकार ने आज तक डायरेक्ट कैश पेमेंट किया ही नहीं। कुछ मौकों पर किया है। उदाहरण देखिए। 1975 में $200 के टैक्स रिबेट दिए गए थे। जॉर्ज बुश के समय भी दो बार टैक्स रिबेट चेकक्स दिए गए। कोविड के दौरान ट्रंप प्रशासन और कांग्रेस ने 2020 में $2000 तक के डायरेक्ट पेमेंट्स दिए। बाद में $600 की एक और पेमेंट की गई। 2021 के अमेरिकन रेस्क्यू प्लान में बाइडन ने भी लोगों को $00 के डायरेक्ट पेमेंट किए थे। लेकिन इनमें से किसी का भी चुनाव से सीधा कनेक्शन नहीं था। यानी किसी नेता ने यह नहीं कहा था कि चुनाव जितवाओ तो पैसे दूंगा। फिर ट्रंप इसको कैसे जस्टिफाई कर रहे हैं वो समझिए। ट्रंप ने लगभग 2 घंटे के अपने भाषण के दौरान कहा कि आमतौर पर सिंगिंग प्रेसिडेंट की पार्टी मी टर्म इलेक्शन हार जाती है। लेकिन ट्रंप इसको बदल देंगे। यानी ट्रंप भी यह मान रहे हैं कि यह मटन उनके लिए मुश्किल है। उन्होंने ईरान, युद्ध और टेरिफ जैसे अपने फैसलों को जस्टिफाई करने की कोशिश की और इसके बाद कहा कि अब जब अमेरिका बहुत ज्यादा पैसे कमा रहा है तो मैं आपसे एक वादा करता हूं। अगर रिपब्लिकनंस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों में जीत जाते हैं तो हर एक एडल्ट अमेरिकन को $5000 का डिविडेंड यानी मुनाफे का एक हिस्सा दिया जाएगा और इसको ट्रंप डिविडेंड कहा जाएगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि इन पैसों को अमेरिका के भीतर ही खर्च करना होगा। लेकिन इस योजना के बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया। यानी कोई रोड मैप नहीं। एपी ने अपनी एक रिपोर्ट में इसे एक संदिग्ध वादा बताते हुए लिखा कि यह अमेरिका के लिए एक ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा महंगा पड़ सकता है। इसे लागू करने के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी। अमेरिका जो पहले से 1.8 ट्रिलियन डॉलर के एनुअल बजट डेफिसिट यानी घाटे में है वह और बढ़ सकता है। महंगाई बढ़ेगी वह अलग। पिछले महीने अमेरिका का नेशनल डे 40 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी कानून भी ऐसे किसी भी खर्च पर रोक लगाते हैं जो वोटिंग पर असर डाल सकते हैं। हालांकि इससे बचने के लिए ट्रंप ने कहा है कि यह रिजल्ट के बाद दिया जाएगा और यह एक इकोनॉमिक इंसेंटिव होगा। 2024 के प्रेसिडेंशियल इलेक्शन के पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ था। तब टेस्ला वाले एलन मस्क ने ट्रंप के लिए एक कैंपेन शुरू किया था। चुनाव के पहले स्विंग स्टेट्स के वोटर्स से उन्होंने कहा कि एक पिटीशन साइन करो जो फ्री स्पीच और गन राइट से जुड़ा हुआ था। उन्होंने वादा किया था कि साइन करने वाले $1 मिलियन का इनाम जीत सकते हैं।
यह मामला अभी कोर्ट में है। इसमें कानूनी चुनौती यही है कि क्या पैसों का यह वादा चुनाव को प्रभावित करने के लिए था? तो कानूनी तौर पर भी ट्रंप के लिए यह रास्ता आसान नहीं होने जा रहा है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि पब्लिक में इस वादे को लेकर कैसी चर्चा चल रही है। सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की बाढ़ सी आ गई है। कुछ इसको मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं तो कुछ भारी खर्च का हवाला देते हुए इसको डम आईडिया बता रहे हैं। कई आलोचकों ने लिखा है कि ट्रंप सीधे-सीधे वोट के लिए घस दे रहे हैं। स्क्रीनशॉट्स आप देख सकते हैं। कुछ पोस्ट में ट्रंप को उनका एक पुराना वादा भी याद दिलाया गया है। कुछ महीनों पहले ट्रंप ने अपने टेररिफ वाले फैसले को सही ठहराते हुए अमेरिकियों से एक वादा किया था। उन्होंने कहा था कि वो एक प्लान बनाएंगे और हर एक वर्किंग क्लास अमेरिकन फैमिली को ₹2000 यानी लगभग $2 लाख का टेरिफ डिविडेंड देंगे। लेकिन यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। ना कोई योजना सामने आई और ना ही पैसे मिले। ऐसे में आलोचक कह रहे हैं कि पहले $2000 वाला डिविडेंड तो दिया नहीं और अब वोट चाहिए तो $5000 के नए डिविडेंड का वादा कर दिया। कमेटी फॉर अ रिस्पांसिबल फेडरल बजट के सीनियर पॉलिसी डायरेक्टर मार्क गोल्डविन ने एपी से बातचीत में कहा है कि ट्रंप जिस आर्थिक सफलता में लोगों को हिस्सा देने का वादा कर रहे हैं वैसी कोई सफलता अमेरिका को मिली ही नहीं है। यानी ट्रंप जो कह रहे हैं कि अमेरिका ने बहुत ज्यादा पैसा कमा लिया है उसको इन्होंने हास्यास्पद बताया है।
उन्होंने हर साल के बजट घाटे और 40 ट्रिलियन डॉलर के डेट का हवाला दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि ट्रंप को बिना कांग्रेस की मंजूरी के इस तरह किसी को पैसे देने का अधिकार नहीं है। हालांकि ट्रंप के समर्थकों का इस पर अलग मत है। जाहिर है। न्यू मेक्सिको के वकील जॉन डे का कहना है कि ट्रंप का वादा कानूनी है क्योंकि यह पैसे हर किसी को मिलेंगे। चाहे उसने किसी को भी वोट दिया हो या वोट ना भी दिया हो। यह बस एक चुनावी वादा है। किसी खास व्यक्ति को वोट करने के लिए प्रेरित करना नहीं है। अब देखिए ट्रंप के इस वादे को लेकर दो दिक्कतें सामने दिख रही हैं। एक तो कानूनी दिक्कत है और दूसरी यह कि अमेरिका का बजट हिल जाएगा। अब ट्रंप तो बोल गए हैं। वो बोल ही देते हैं जो उनके मन में आता है। लेकिन दिक्कत आती है उनकी टीम को जिनको यह जमीन पर उतारना पड़ता है। तो जब ट्रंप ने यह भाषण दिया उसके एक घंटे के भीतर ही उनके उपराष्ट्रपति जे डी बेंच इससे पीछे हटते हुए दिखे। आंशिक रूप से ही सही सफाई देते तो कम से कम दिखे ही। वेंस ने कहा कि यह डिविडेंड अमीर लोगों को नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि टेरिफ से हुए रेवेन्यू से अमेरिकियों को $5000 दिए जा सकते हैं। हालांकि एपी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अमेरिकी सरकार ने टेरिफ यानी अपने ही नागरिकों पर टैक्स लगाकर जितने पैसे बनाए हैं उतने पैसे इस वादे को पूरा करने के लिए काफी नहीं है। हालांकि इसे पूरा करने की नौबत भी तभी आएगी जब मिड टर्म में हाउस और सीनेट दोनों में ट्रंप की पार्टी की जीत होगी। और जैसा कि ट्रंप ने खुद कहा है कि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है कि सिंग प्रेसिडेंट की पार्टी को मिड टर्म में जीत मिले। इस वीडियो में इतना ही। इस मामले पर जो भी अपडेट्स होंगे वह हम आपको खबरगांव पर दिखाते रहेंगे। तो इसलिए आप चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए। मेरा नाम है रवि सुमन। आप देखते रहिए खबरगांव। इस वीडियो को कैमरे पर रिकॉर्ड किया है हमारे साथी तौफीक ने।