मैं तो आरती उतारूंगी [संगीत] मैं [संगीत] कुछ कलाकारों की जिंदगी समय के साथ-साथ चुपचाप आगे बढ़ती है। वो ना तो किसी का ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं और ना ही खुद को किसी माइलस्टोन के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन ऐसी ही शख्सियतों से जब आप रूबरू होते हैं या फिर उनका ईमानदारी से मूल्यांकन करते हैं [संगीत] तो एहसास होता है कि कम चर्चित और अंडररेटेड दिखने वाले यह कलाकार वास्तव में बहुत बड़े होते हैं। उषा मंगेशकर भी उन्हीं खास लोगों में से एक हैं। [संगीत] दुनिया को नमस्कार प्रणाम आदाब और आभार आप देख रहे हैं बिहाइंड द कैमरा विद आरजे प्रीति कमल और बात हो रही है मंगेशकर परिवार की तीसरी गायिका बहन उषा मंगेशकर की तुमको पिया [संगीत] दिल दिया कितने से देवी की आवाज कही जाने वाली उषा मंगेशकर भारतीय संगीत की दुनिया का एक ऐसा नाम है जिन जिनकी आवाज ने दशकों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। करती हूं तुम्हारा [संगीत] व्रत में स्वीकार कर [संगीत] सात दशकों से ज्यादा समय से उनकी आवाज भारतीय सिनेमा भक्ति संगीत लोगों के घरों और ना जाने कहां-कहां तक पहुंची। उनकी आवाज में हमें समर्पण, चंचलता और प्रार्थना हर तरह के भावों से भरे गीत सुनने को मिले हैं। उन्होंने खुद को बदला, मुश्किलों का सामना किया और हमेशा प्रासंगिक बनी रही। वह भी बिना कभी लाइमलाइट में आने की कोशिश किए। सुल्ताना सुल्ताना मेरा [संगीत] नाम है सुल्ताना। एक ऐसे परिवार में जन्म लेना जहां संगीत एक विरासत का हिस्सा थी। उषा ने कम उम्र में ही सीख लिया था कि अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए तेज आवाज की जरूरत नहीं होती और अहमियत साबित करने के लिए दिखावा बेईमानी है। मैं कालों [संगीत] का चीज होवे है प्यार।
उषा मंगेशकर ने दशकों तक हिंदी फिल्मों के अलावा बंगाली, तमिल, असमिया और मराठी सिनेमा के लिए गाया। खासकर उनकी गायकी ने करोड़ों लोगों को भक्ति रस में सराबोर किया। साथ ही उन्होंने तमाम ऐसे दिलकश और लोकप्रिय गानों को भी आवाज दी जो हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गए। मैं तो आरती उतार। [संगीत] इस गायिका ने अलग-अलग भाषाओं और पीढ़ियों के कलाकारों के साथ काम किया। बेहद सदी, सुरीली और साफ उच्चारण वाली इस गायिका को लेकर अक्सर एक वाजिब सवाल उठता है कि क्या हिंदी सिनेमा में इन्हें दरकिनार किया गया? क्या लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसे सुरों के दो बड़े बरगदों के बीच इस गायिका के सुरों की पौध बड़ी होने से महरूम रह गई। संगीत जगत के तमाम विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना रहा कि लता मंगेशकर और आशा भोसले इनके करियर में सबसे बड़ी बाधा बनती रही। इसी वजह से उषा मंगेशकर का करियर ज्यादा परवान नहीं चढ़ सका। क्या वाकई उषा जी मंगेशकर परिवार की बदनामी के डर से अपनी दोनों बड़ी बहनों की साजिशों को चुपचाप सहने को मजबूर रही। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है यह सारी बातें इस पेशकश में आगे विस्तार से होंगी। ओए जली [संगीत] जली कलियों की किस्मत जली के लगती है आपको जानकर हैरानी होगी कि बेहद प्रतिभाशाली गायिका और मंगेशकर परिवार की सबसे छोटी और लाडली बेटी होने के बावजूद उषा मंगेशकर को अपनी पहचान बनाने के लिए 20 साल से ज्यादा का संघर्ष करना पड़ा। हिंदी फिल्मों में इन्होंने साल 1954 में पहला गीत गाया। जबकि इन्हें पहचान मिली साल 1975 में आई फिल्म जय संतोषी मां के गीतों के जरिए। इसकी भी एक खास वजह रही जिसे आगे जानेंगे विस्तार से। [संगीत] [संगीत] अपनी बड़ी बहन लता जी के चलते आखिर क्यों उषा मंगेशकर ने शादी नहीं की? और स्वर्ग कोकिला लता जी की वह कौन सी आखिरी इच्छा थी जिसे बहन उषा मंगेशकर ने पूरा किया? यह सारी बातें जानेंगे इस पेशकश में। लेकिन सबसे पहले उषा मंगेशकर के शुरुआती दिनों के बारे में जान लेते हैं। [संगीत] उषा मंगेशकर का जन्म 15 दिसंबर 1935 में इंदौर में हुआ था। पिता पंडित दीनाना मंगेशकर एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक और रंगमंच कलाकार थे। जबकि मां शिवा इनके पिता की पहली पत्नी की छोटी बहन थी। उषा मंगेशकर परिवार की सबसे छोटी संतान हैं। [संगीत] उनकी बड़ी बहनें लता मंगेशकर और आशा भोसले भारतीय संगीत इतिहास की दिग्गज गायिकाएं रही हैं। जबकि भाई हृदयनाथ मंगेशकर संगीतकार रहे।
मंगेशकर परिवार मूल रूप से गोवा के मंगेशी गांव से ताल्लुक रखता है। जहां से उनका उपनाम मंगेशकर आया। लता और आशा की फिल्मों में कामयाबी से पहले मंगेशकर परिवार को आर्थिक संघर्ष झेलना पड़ा और कई बार एक शहर से दूसरे शहर माइग्रेट भी होना पड़ा। बचपन से ही उषा मंगेशकर के घर में संगीतमय वातावरण रहा। पिता दीनाना मंगेशकर के रंगमंच और शास्त्रीय संगीत का प्रभाव सभी बच्चों पर रहा। उषा जब छ साल की थी तब इनके पिता का देहांत हो गया और आर्थिक संघर्ष के चलते इनका परिवार पुणे आकर शिफ्ट हो गया। उषा ने औपचारिक स्कूलिंग या कॉलेज की शिक्षा नहीं ली क्योंकि परिवार तब आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। उषा मंगेशकर ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही प्राप्त की। मंगेशकर परिवार के सभी बच्चों ने बचपन से ही सार्वजनिक मंचों और रेडियो पर प्रस्तुतियां देना शुरू कर दिया था। जिससे उषा को भी मंच का अनुभव मिला। उनका शुरुआती करियर रेडियो और स्थानीय कार्यक्रमों में गायन से शुरू हुआ। 1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक के शुरुआत में उषा ने कुछ भक्ति गीत और हल्के-फुल्के गीत गाए। पर उन्हें फिल्मों में ब्रेक तब मिला जब उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर पहले से ही फिल्म जगत में स्थापित हो चुकी थी। [संगीत] की दुनिया है उषा मंगेशकर ने अपने करियर की शुरुआत 1954 में वी शांताराम की फिल्म सुबह का तारा के गाने बड़ी धूमधाम से मेरी भाभी आई से की थी। इसके बाद अगली हिंदी फिल्म साल 1955 में आई आजाद रही जिसमें उषा ने अपनी बहन लता मंगेशकर के साथ अप्लम चपलम नाम का गीत गाया जो बहुत पॉपुलर हुआ था। बड़ी धूमधाम [संगीत] से मेरी भाभी आई भाभी आई [गाना गाने की आवाज़] उषा जी की गायकी का सफर बहुत उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 1955 के बाद एक लंबे इंतजार के बाद साल 1963 में ईगल फिल्म्स के बैनर तले बनी एफसी मेहरा की फिल्म शिकारी में उन्हें गाने का मौका मिला। इस फिल्म में भी इन्होंने लता जी के साथ तुमको पिया दिल दिया कितने नाज से गाया। अजीत और रागिनी अभिनीत इस फिल्म का यह सबसे मशहूर गीत साबित हुआ। जिसे हेललेन और रागिनी पर फिल्माया गया था।
फारुख कैसर के लिखे और जी एस कोहली के लाजवाब संगीत से सजे इस गीत का शुमार सर्वाधिक कामयाब फीमेल डुएट्स में होता है। तुमको पिया [संगीत] दिल दिया। तुमको पिया दिल दिया कितने नाज से गीत की कामयाबी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस गीत के बनने के 40 साल बाद इस गीत का रिमिक्स बना और वह भी खूब चला। लेकिन अफसोस कि इस गीत के मूल संगीतकार को ना तो इसका कोई श्रेय मिल सका और ना ही उन्हें किसी फिल्मकार ने किसी बड़ी फिल्म में मौका दिया। उषा जी को भी इस फिल्म में खास फायदा नहीं हुआ। उन्हें कामयाबी के लिए 1975 तक इंतजार करना पड़ा। दुनिया में हम आए हैं तो [संगीत] जीना ही पड़ेगा। साल 1963 में आई एक और फिल्म ब्लफ मास्टर में उषा मंगेशकर को शमशाद बेगम के साथ एक डूएट गाने को मिला। इस गाने में शमी कपूर एक फीमेल डांसर के गेटअप में नजर आए थे। साल 1963 की फिल्म फिर वही दिल लाया हूं और 1964 की फिल्म चित्रलेखा में उषा जी को अपनी बहन आशा के साथ एक-एक डूएट सॉन्ग गाने का मौका मिला था। देखो बिजली डोले बिन बादल [संगीत] के देखो 60 के शुरुआती दशक तक लता मंगेशकर और आशा भोसले हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सबसे बड़ी दो गायिकाओं के तौर पर न सिर्फ अपनी पहचान बना चुकी थी बल्कि हिंदी सिनेमा में इनका दखल बहुत अच्छा हो चुका था। इसके बावजूद उषा मंगेशकर को फिल्मों में काम पाने के लिए लगातार 20 साल तक जद्दोजहद करनी पड़ी थी। यहां तक कि सिंगल फीमेल सिंगर के तौर पर शुरुआत के लिए उन्हें 20 साल लंबा इंतजार करना पड़ा। क्योंकि 1954 से लेकर 1975 के बीच उषा ने जिन गिनी चुनी हिंदी फिल्मों में गाने गाए थे वो इन्होंने डूएट यानी किसी और फीमेल सिंगर के साथ मिलकर गाए थे। क्या उषा मंगेशकर की आवाज में कोई खोट थी या इनकी अपनी ही बहनों की नियत में खोट कथित तौर पर जो नहीं चाहती थी कि हिंदी फिल्मों में मंगेशकर परिवार की तीसरी गायिका बड़ी बन जाए। इस बात में कितनी सच्चाई है इस पर आगे बात करेंगे। [संगीत] हिंदी फिल्मों में उम्मीद के मुताबिक कामयाबी और पहचान नहीं मिल पा रही थी। तो उषा ने 1966 में आई एक नेपाली फिल्म मैती घर और 1967 में आई एक कन्नड़ फिल्म में गाना गाया। साल 1972 में उषा ने मराठी सिनेमा में अपने करियर की शुरुआत की। इसी साल आई मराठी फिल्म पिंजरा में संगीतकार राम कदम ने उषा से सात गाने गवाए। जबकि इस फिल्म के एक गाने को लता जी ने भी गाया था। [संगीत] लंबे इंतजार के बाद साल 1975 में एक बार फिर किसी हिंदी फिल्म में उषा को अपनी बहन आशा के साथ डट गाने को मिला। यह फिल्म थी खोटे सिक्के और गाने के बोल थे प्यारी-प्यारी सूरत वाले। [
संगीत] कहा यह भी जाता है कि हिंदी सिनेमा में अपनी बड़ी बहनों लता और आशा के वर्चस्व को देखते हुए [संगीत] उषा मंगेशकर ने खुद को मराठी सिनेमा तक सीमित रखा था। लेकिन उषा जी के करियर को जिस फिल्म और गाने से सबसे ज्यादा पहचान मिली वो फिल्म लता जी के कारण ही मिली थी। दरअसल संगीतकार सी अर्जुन ने एक बार लता जी से कहा कि वह जय संतोषी मां फिल्म में संगीत दे रहे हैं और उनकी इच्छा है कि लता जी इस फिल्म में गाएं। इस पर लता जी ने कहा कि उच्चारण की दृष्टि से हिंदी में सबसे मुश्किल अक्षर श है और संतोषी मां में बार-बार श आने के चलते उन्हें दिक्कत होगी। यह सुनकर सी अर्जुन ने कहा कि कोई बात नहीं। फिर मैं आशा जी से ही गवा लेता हूं। जवाब में लता जी ने कहा कि यही दिक्कत आशा के साथ भी हो सकती है। बेहतर होगा तुम उषा से गवाओ क्योंकि जिस व्यक्ति के नाम में ही श अक्षर आता है उसकी जुबान संतोषी माता गाते वक्त हरगिज़ नहीं फिसल सकती। इस तरह उषा जी को यह फिल्म मिली और इसके गानों के जरिए 20 साल से संघर्षव्रत उनके करियर को सबसे बड़ा फायदा भी हुआ। इस फिल्म में मैं तो आरती उतारू गाने ने उषा जी को देश के घर-घर में पहचान दिला दी। तो आरती उतारू संतोषी मा मैं तो आरती उतारू गीत तो इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी संतोषी मां की पूजा और व्रत के दौरान यह अनिवार्य रूप से गाया जाता है। इस गाने के लिए उनका नाम फिल्मफेयर के बेस्ट फीमेल सिंगर के कैटेगरी में नॉमिनेट भी किया गया था। साथ ही इसके लिए उषा को बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का पुरस्कार मिला। जय संतोषी मां की सफलता ने उषा मंगेशकर को केवल एक गायिका ही नहीं बल्कि भक्ति संगीत की एक प्रमुख आवाज के रूप में स्थापित तो कर दिया। लेकिन विडंबना कहें या फिर बदकिस्मती उषा जी को फिल्मों में ज्यादा काम नहीं मिला। कहा जाता है कि अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर से काफी हद तक उनकी आवाज मिलती थी। जय संतोषी मां में उषा के गाए सुपरहिट गानों को तमाम लोगों ने लता जी की आवाज समझा। इस वजह से भी एक सिंगर के तौर पर उषा का नुकसान हुआ। [संगीत] कहां तो जय संतोषी मां के गानों की बेशुमार कामयाबी के बाद उषा के लिए ऑफर्स की भरमार होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1975 में आई इस फिल्म की कामयाबी के बाद उषा जी ने सक्रिय तौर पर साल 1982 तक हिंदी फिल्मों में गाया। लेकिन इस बीच उन्हें 8 से नौ फिल्मों में इक्कादुक्का गाने ही मिले। इसमें साल 1977 में आई फिल्म प्रियत्मा के दो गाने, 1979 की फिल्म काला पत्थर का एक गीत, 1981 की फिल्म नसीब के दो गाने और साल 1982 में आई फिल्म डिस्को डांसर का एक गाना शामिल है। इसी के साथ ही हिंदी फिल्मों में उनके करियर का अंत हो गया। [संगीत] तमाम हिंदी और करीब एक दर्जन मराठी फिल्मों के अलावा उषा जी ने बंगाली, कन्नड़, नेपाली, भोजपुरी, गुजराती और असमिया समेत कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी कई सुपरहिट गाने गाए हैं। [संगीत] फूट जाए हमारी। उषा मंगेशकर को लोक संगीत से बहुत लगाव रहा है। उन्होंने 1992 में दूरदर्शन के लिए म्यूजिक ड्रामा फूलवती को प्रोड्यूस किया था। जिसकी कहानी बाबा साहेब पुरंदरे पर आधारित थी। राज एंड सिप्पी की सस्पेंस थ्रिलर फिल्म इंकार में उषा मंगेशकर ने चार्ट बस्टर सॉन्ग मुंगड़ा गाया था। मुंगड़ा गीत को फिल्म टोटल धमाल में रिकक्रिएट किया गया। लेकिन ओरिजिनल सिंगर उषा मंगेशकर इससे खुश नहीं थी। वह पुराने गीत के रिमिक्स के बिल्कुल खिलाफ हैं। [संगीत] मैं 2017 में 27 साल के लंबे वक्त के बाद उषा मंगेशकर और लता मंगेशकर ने फिल्म मैं खुद हीराम बोस हूं के गीत एक बार बधाई दे दो मन को साथ में गाया। यह फिल्म एक बंगाली फ्रीडम फाइटर की लाइफ पर बेस्ड थी। इससे पहले दोनों पिछली बार फिल्म आया मौसम दोस्ती का मैंने प्यार किया में साथ गाया था। उषा मंगेशकर केवल एक गायिका ही नहीं बल्कि एक [संगीत] सफल फिल्म निर्मात्री भी रही हैं। 1977 में उनके निर्मित मराठी फिल्म जयत रे जयत को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में मराठी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए प्रेसिडेंट सिल्वर मेडल मिला। यह कामयाबी दिखाती है कि उषा का फिल्म जगत में योगदान केवल गायन तक सीमित नहीं था।रिया [संगीत] सा अब बात करते हैं कि आखिर क्यों उषा मंगेशकर को वाजिब काम पहचान और शोहरत नसीब नहीं हो सकी। आमतौर पर कहा जाता है कि अपनी बहनों लता और आशा से तुलना के चलते इस सिंगर की प्रतिभा दब गई और वह स्टार सिंगर की छवि हासिल नहीं कर सकी। इस बात में काफी हद तक सच्चाई है।
50 से 80 के दशक को लता और आशा का युग कहा जाता है। किसी भी संगीतकार या डायरेक्टर प्रोड्यूसर की पहली पसंद के तौर पर यही दोनों गायिकाएं हुआ करती थी। फिल्म का बजट कम होने या फिर दोनों सिंगर्स के मना करने पर संगीतकार शमशाद बेगम, मुबारक बेगम, सुमन कल्याणपुरी और हेमलता जैसी सिंगर्स से गवा लिया करते थे। उषा मंगेशकर द वॉइस ऑफ गॉडेस एंड पुअर्स मैन लता [संगीत] यानी उषा मंगेशकर देवी की आवाज और गरीबों की लता मंगेशकर। इस लेख में कहा गया कि लता और आशा जैसी बहनें हो तो कोई कैसे सफल हो सकता है? भीड़ से अलग अपनी पहचान कैसे बनाई जा सकती है? जब आशा भी इतने सालों तक लता की छाया में रही और आखिरकार ओपी नयर के साथ अपनी अलग पहचान बना पाई तो उषा के पास क्या मौका था? बहुत मुश्किल था। ऐसा नहीं है कि उन्हें ट्रेनिंग नहीं मिली थी। उन्होंने उस्ताद अमानत अली खान और उस्ताद अमन अली खान से विधिवत ट्रेनिंग ली थी। लेकिन हुनर के मामले में वह लता और आशा से पीछे ही रही। उनकी आवाज कुछ-कुछ लता जैसी लगती थी। इस वजह से भी उषा का नुकसान हुआ। कि उषा मंगेशकर को साजिश के तहत लता और आशा ने आगे नहीं बढ़ने दिया। इस आरोप का ना तो कोई प्रमाण है और ना ही कोई आधार। इस आरोप पर खुद उषा अपनी बहनों को प्रेरणा मानती रही ना कि बाधा। हां, इतना जरूर है कि उषा की अपनी इंडिपेंडेंट ना कोई पीआर पॉलिसी थी और ना ही फिल्म इंडस्ट्री में संगीतकारों से सीधा संबंध। जिसके चलते अधिकतर या तो उन्हें अपनी बहनों की सिफारिश पर काम मिला या बहनों के साथ डट सॉन्ग गाने को मिले। इसके लिए लता और आशा को जिम्मेदार ठहराना गलत होगा। जाहिर तौर पर उषा मंगेशकर ने अपनी बहनों के सपोर्ट के कारण ही ए ग्रेड फिल्मों से अपने करियर की शुरुआत की थी। लेकिन वह ए ग्रेड फिल्मों में अपने खास पहचान नहीं बना पाई। उन्होंने बी ग्रेड फिल्मों के गीत गाने शुरू कर दिए और उन्हीं फिल्मों के लिए जानी जाने लगी। बहुत कम ही उन्हें ए ग्रेड फिल्मों में छोटे-मोटे गाने गाने का मौका मिलता था। हाथ [संगीत] तुझे भोलेनाथ जो उषा मंगेशकर मराठी फिल्मी और नॉन फिल्मी दोनों तरह के गानों में बहुत ज्यादा लोकप्रिय हुई। उषा जी हिंदी फिल्म संगीत के सबसे बड़े परिवार में पैदा हुई थी। जहां उनकी बहनें कई दशकों तक संगीत की दुनिया पर छाई रही। फिर भी उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। भले ही वह पहचान उतनी बड़ी ना हो। तीन बार फिल्मफेयर अवार्ड्स के लिए नॉमिनेट होना कोई छोटी बात नहीं है। उन्हें जय संतोषी मां के गाने मैं तो आरती उतारू के अलावा 1978 की इंकार के गीत मुंगड़ा और 1980 की इकरार के गाने हमसे नजर तो मिलाओ के लिए फिल्मफेयर ने नॉमिनेट किया था। 90 साल से ज्यादा की हो चुकी उषा मंगेशकर किसी खास उपलब्धि या माइलस्टोन की बात नहीं करती। वह उन पलों की बात करती हैं जो उन्होंने जिए हैं। जैसे माइक्रोफोन के सामने कैसे खड़े हो। कब किसी सुर को गाने के लिए ज्यादा सांस की जरूरत है या कम जोर लगाने की। यह सारी बारीखियां उन्होंने लता जी से ही सीखी। उषा मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उनकी बहन लता मंगेशकर ने हमेशा उन्हें सलाह दी कि अपनी शैली को बनाए रखें और अपनी आवाज को दूसरों की तरह बनाने की कोशिश ना करें। यही वजह है कि उषा मंगेशकर ने अपनी अलग पहचान बनाई। तक बॉम्बे से करोड़ा तक तुमको [संगीत] जब तक गाते हैं तब तक हम बहुत कम लोग जानते हैं कि उषा मंगेशकर एक बेहतरीन चित्रकार भी हैं। यह कला उन्होंने अपनी मां को चित्र बनाते देखकर सीखी। उन्होंने कई खूबसूरत पेंटिंग्स बनाई [संगीत] हैं।
संगीत से समय निकालकर वह अक्सर अपनी कला में डूबी रहती हैं। अब बात कि आखिर उषा मंगेशकर ने शादी क्यों नहीं की? कुछ इंटरव्यू में उन्होंने इसकी वजह साफ की है। उनका कहना था कि वे लता जी के साथ ही रहती थी। जबकि मीना मंगेशकर और आशा भोसले एक साथ रहती थी। उषा जी हमेशा लता दीदी का बहुत ध्यान रखती थी। उन्हें लगा कि अगर वह शादी कर लेंगी तो लता दीदी अकेली हो जाएंगी और उनका ध्यान रखने वाला परिवार का कोई सदस्य नहीं रहेगा। इसी वजह से उषा ने शादी नहीं करने का फैसला लिया। उषा मंगेशकर ने भले ही शादी नहीं की लेकिन वह कहती हैं कि अपने भतीजे भतीजियां और भांजे भांजियां हमेशा से मुझे अपने ही बच्चों जैसे लगे हैं। दिल डोले बिन बादल के अब चर्चा करते हैं कि दिवंगत महान गायिका लता मंगेशकर की अंतिम इच्छा की जिसे पूरा करने का सौभाग्य उनकी छोटी बहन उषा जी को प्राप्त हुआ। दरअसल लता जी ने अपनी वसीयत में तिरुमाला तिरुपति देव स्थानम को ₹1 लाख दान देने की घोषणा की थी। लता जी के निधन के बाद साल 2023 में उषा जी ने अपनी बहन की आखिरी इच्छा पूरी की। उषा मंगेशकर ने व्यक्तिगत रूप से टीटीडी के ओएसडी को दान का चेक सौंपा। दरअसल लता मंगेशकर भगवान वेंकटेश्वर की समर्पित अनुयाई थी। उन्होंने अतीत में तिरुपति ट्रस्ट के दरबारी संगीतकार के रूप में काम किया था। साल 2010 में उन्होंने लगभग 10 तलपका अन्नमाचार्य संकीर्तन प्रस्तुत किए जिन्हें रिकॉर्ड कर सुरक्षित कर लिया गया था। उषा जी को प्रतिष्ठित लता मंगेशकर अवार्ड भी दिया जा चुका है। यह सुखद संयोग ही है कि महाराष्ट्र सरकार ने जिस दिन उषा जी को लता मंगेशकर पुरस्कार देने की घोषणा की उस दिन लता जी का 91 जन्मदिन था। मुझे प्यार का तोहफा देके अपनी बाहों में लेके मेरे उषा मंगेशकर का जीवन हमें सिखाता है कि स्पष्टता, विनम्रता और अटूट लगन से बनाया गया जीवन कभी धुंधला नहीं पड़ता। उनकी सेहतमंद जिंदगी की कामना करते हुए मैं आर जे प्रीति कमल आपसे विदा लेती हूं। कार्यक्रम पसंद आया हो तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। आपसे फिर होगी मुलाकात। नमस्कार।