80 और 90 के दशक की एक ऐसी गायिका [संगीत] जिसकी आवाज में इतनी मिठास थी, इतनी कशिश थी कि उसने बड़ी-बड़ी दिग्गज गायिकाओं के दशकों पुराने तिलिस्म को चुनौती दे डाली। एक ऐसी आवाज [संगीत] जो 90 के दशक में किसी भी फिल्म की कामयाबी की गारंटी बन गई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं [संगीत] कि इसी गायिका ने गुस्से में आकर भरे स्टूडियो से एक लड़के को बाहर निकाल दिया था। और वही लड़का [संगीत] आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा परफेक्शनिस्ट सुपरस्टार बना। क्या आप जानते [संगीत] हैं कि एक ऐसी फिल्म भी आई जिसके गाने ना गाने का इन्हें आज तक मलाल है [संगीत] और उस फिल्म को मिला था राष्ट्रीय पुरस्कार। क्या आप यकीन करेंगे कि [संगीत] दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के ठिकाने से भी इस गायिका के गानों का जखीरा मिला [संगीत] था। और सबसे बड़ी बात जिस आवाज को सुनने के लिए करोड़ों लोग बेताब रहते थे। [संगीत] आज वही गायिका खुद अपनी आवाज को सुनने के लिए तरस रही है। आखिर क्या हुआ ऐसा जिसने इस मशहूर [संगीत] गायिका की पूरी दुनिया ही बदल दी? दोस्तों आज हम बात कर रहे हैं हम सभी की पसंदीदा गायिका अलका [संगीत] याग्निक जी की और आज हम आपको उनकी जिंदगी की ऐसी कहानियां सुनाने वाले हैं जो आपको आश्चर्य [संगीत] से भी भर देंगी और साथ ही आपको बेहद कष्ट भी पहुंचाएंगी। तो चलिए बिना देर किए शुरू करते हैं इस बेमिसाल [संगीत] गायिका की अनसुनी अनकही दास्तान बिल्कुल शुरुआत से। अलका याग्निक [संगीत] का जन्म 20 मार्च 1966 को कोलकाता के एक साधारण गुजराती [संगीत] परिवार में हुआ था। उनके पिता धर्मेंद्र शंकर एक नेवी ऑफिसर थे, और उनकी मां शोभा जी एक शास्त्रीय [संगीत] संगीत गायिका थी। अलका के एक छोटे भाई भी थे, जिनका नाम समीर याग्निक था। अलका ने अपनी [संगीत] शुरुआती पढ़ाई मॉडर्न हाई स्कूल फॉर गर्ल्स से पूरी की। पढ़ाई में वे बहुत अच्छी थी, लेकिन उनका मन पढ़ाई से ज्यादा [संगीत] संगीत में लगता था। क्योंकि घर का पूरा माहौल ही संगीत में था। मां के साथ-साथ [संगीत] उनकी मौसी भी संगीत की पारंगत गायिका थी और यहां तक कि उनके पिता [संगीत] भी शौकिया तौर पर गाया करते थे। धीरे-धीरे अलका संगीत में इतना रम गई कि उन्हें अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलना तक अच्छा नहीं [संगीत] लगता था।
महज 4 साल की उम्र में वे रेडियो को अपने पास रखकर घंटों से सुना करती [संगीत] और उसमें आ रहे गानों को गाने की कोशिश करती। जब उनकी मां ने उन्हें यह सब करते देखा तो उन्होंने खुद अलका को [संगीत] संगीत की तालीम देना शुरू कर दिया। अलका में संगीत के प्रति गहरी लगन थी और इसी तालीम [संगीत] का नतीजा यह हुआ कि महज 6 साल की उम्र में अलका ने अपनी मां की मदद से ऑल इंडिया रेडियो के एक बान कार्यक्रम [संगीत] में गाना गाना शुरू कर दिया। अपनी बेटी की इस छोटी सी सफलता को देखकर मां शोभा जी ने एक दृढ़ निश्चय कर लिया। अब वे अलका को एक बड़ी गायिका बनाकर ही दम लेंगी। जब अलका [संगीत] महज 10 साल की थी, उनकी मां उन्हें लेकर मुंबई पहुंच गई। वे अपनी जान [संगीत] पहचान के कई म्यूजिक कंपोजर के पास अलका को लेकर गई ताकि उनकी आवाज को पहचान मिल सके। उन म्यूजिक कंपोजर्स को नन्ही अलका [संगीत] की यह मीठी आवाज बहुत पसंद भी आई। लेकिन हर बार एक ही रुकावट सामने आती। [संगीत] उनकी छोटी उम्र। सभी का यही कहना था कि अभी अलका बहुत छोटी [संगीत] है। इस उम्र में उनका किसी शोभा जी को यह बात कुछ अखर रही थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और सोचा चलो [संगीत] एक प्रयास और कर लेते हैं। इस बार वे शोमैन राज कपूर से मिलने पहुंची। जब राज कपूर [संगीत] साहब ने अलका की आवाज सुनी, तो उन्हें बहुत खुशी हुई। उन्होंने अलका को शाबाशी दी और साथ [संगीत] ही एक सिफारिशी पत्र भी लिख कर दिया। उन्होंने कहा इस पत्र को लेकर आप म्यूजिक कंपोजर [संगीत] लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से मिल लीजिए। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी ने भी जब अलका की आवाज सुनी तो उन्हें भी यह आवाज बहुत पसंद आई। लेकिन उन्होंने भी वही पुरानी बात दोहराई। एक बार अलका को थोड़ा बड़ा हो जाने दीजिए। [संगीत] उसकी आवाज में परिपक्वता आ जाने दीजिए। हम उसे जरूर मौका देंगे। तब जाकर अलका की मां शोभा [संगीत] को यह बात समझ में आ गई कि अभी अलका की आवाज पूरी तरह परिपक्व नहीं हो पाई है। वे सीधे कोलकाता वापस [संगीत] आ गई और अलका एक बार फिर पूरी मेहनत और पूरी लगन के साथ संगीत सीखने में जुट गई। यह 80 के [संगीत] दशक का वो दौर था जब बेटियों की पढ़ाई लिखाई हो या संगीत की शिक्षा ज्यादातर परिवार इस पर ध्यान [संगीत] ही नहीं देते थे। लेकिन अलका के पिता ने अपनी बेटी के करियर को संवारने [संगीत] के लिए समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया और पूरी तरह से तन मन से इसमें जुट गए। [संगीत] सोचिए एक पिता का अपनी इसी दौरान लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी ने 13 साल की अलका को बुलाया और फिल्म पायल की झनकार [संगीत] में एक गाने की कुछ पंक्तियां गवाई। और फिर 1981 [संगीत] में डायरेक्टर प्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म लावारिस के लिए अलका याग्निक [संगीत] से एक गाना गवाया। मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है? प्रकाश मेहरा की इस फिल्म के साथ-साथ यह गाना भी बहुत बड़ा हिट हुआ। शायद ही उन दिनों कोई ऐसा फंक्शन या पार्टी होती हो जिसमें यह गाना ना बजता हो। इस गाने के लिए अलका याग्निक [संगीत] को बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। यह उनके करियर की पहली बड़ी [संगीत] उपलब्धि थी। फिर आया साल 1982 जब अलका याग्निक को फिल्म हमारी [संगीत] बहू अलका में गाने का मौका मिला। इस फिल्म में गाय गीत से उन्हें कोई बड़ी पहचान तो नहीं मिली लेकिन अलका एक-एक कदम [संगीत] आगे बढ़ना जारी रखे हुए थे।
यह छोटी सी बच्ची अपने माता-पिता के साथ [संगीत] कोलकाता में ही रहती थी और जो भी गाने उन्हें मिलते वे मुंबई जाकर उन्हें रिकॉर्ड [संगीत] करती और फिर वापस कोलकाता लौट जाती। वैसे आपको भली-भांति पता होगा कि उन दिनों संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर और आशा भोसले जी का पूरा दबदबा था। और कोई भी नई गायिकाओं के साथ काम करने का जोखिम [संगीत] नहीं लेना चाहता था। असल में कोई भी मंगेशकर बहनों से पंगा लेने को तैयार नहीं था। इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अलका जी को [संगीत] गाने तो मिल रहे थे। वे उन गानों को गा भी रही थी। लेकिन जब फिल्म रिलीज होती तो पता चलता कि उन गानों को मंगेशकर बहनों से दोबारा गवा लिया गया है। और अलका की आवाज में गाए गए वो गाने फिल्म में [संगीत] कहीं भी नजर नहीं आते थे। सोचिए कितनी मेहनत करने के बाद भी [संगीत] अपनी मेहनत का फल किसी और के नाम चला जाना कितना दर्दनाक होता होगा। [संगीत] लेकिन अलका याग्निक अपनी मधुर आवाज के साथ-साथ स्वभाव की भी बेहद मधुर थी। [संगीत] चाहे कोई भी बड़ी गायिका उनके गीतों को हथियाले। उन्होंने कभी किसी गायिका का विरोध नहीं किया बल्कि लगातार आगे गाने पाने का प्रयास करती रही। कई बार ऐसा [संगीत] होता कि बड़ी गायिकाएं व्यस्त हो जाती। ऐसे में फिल्मों के गाने अलका को मिल जाते और जब यह गाने फिल्म में आते तो सुपर डुपर हिट हो जाते। फिर कुछ ही समय [संगीत] बाद वो साल भी आया जब लोगों ने खुलकर कहना शुरू किया कि अलका याग्निक [संगीत] की आवाज बेमिसाल है। अलका याग्निक ने मानो कछुए की चाल चलते हुए भी खरगोश को [संगीत] पछाड़ दिया था। यह वो दौर था जब मंगेशकर बहनों की लोकप्रियता में पहली सेंध लगी। फिल्म आई कयामत से कयामत तक [संगीत] जिसमें जूही चावला और आमिर खान थे। इस फिल्म में अलका याग्निक [संगीत] ने दो गीत गाए, और दोनों ही गीतों ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की। इस फिल्म के [संगीत] साथ अलका याग्निक और उनके माता-पिता, दोनों को ही उनकी सालों की मेहनत का फल मिल गया था। इसी [संगीत] फिल्म से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा भी है। दरअसल, जब अलका जी [संगीत] इस फिल्म का गाना रिकॉर्ड करने के लिए स्टूडियो पहुंची, तो वहां एक लड़का बैठा हुआ था, जो [संगीत] उन्हें देर तक घूर-घूर कर देख रहा था। अलकायाग्निक खुद को असहज महसूस कर रही थी। लेकिन वो लड़का लगातार उन्हें घरे ही [संगीत] जा रहा था। धीरे-धीरे उनकी यह असहजता गुस्से में बदलने लगी। अलका गुस्से में उठी, उस [संगीत] लड़के के पास गई और तीखे स्वर में कहा, तुम इस स्टूडियो से अभी निकल जाओ। वो लड़का चुपचाप उठा [संगीत] और स्टूडियो से बाहर निकल गया। अलका जी ने अपनी गाने की रिकॉर्डिंग [संगीत] पूरी की। तभी फिल्म के प्रोड्यूसर नासिर हुसैन अलका याग्निक के [संगीत] पास आए और उन्होंने फिल्म की स्टार कास्ट से उनकी मुलाकात करवाई। जैसे ही नासिर हुसैन जी फिल्म के हीरो को अलका याग्निक से [संगीत] मिलवाते हैं, अलका पूरी तरह चौंक जाती हैं क्योंकि वह वही लड़का था जिसे उन्होंने [संगीत] अभी-अभी स्टूडियो से बाहर निकाल दिया था। वो हीरो थे हमारे परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले [संगीत] आमिर खान साहब। अलका को बहुत शर्मिंदगीगी महसूस हुई। उन्होंने आमिर खान से तुरंत माफी मांगी [संगीत] और उसके बाद से आमिर और अलका अच्छे दोस्त बन गए। समय बीता और 1988 में माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर की फिल्म [संगीत] तेजाब आई। यह फिल्म माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर और अलका याग्निक, तीनों के करियर के लिए ही एक मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उनके गाए गाने [संगीत] ने अलका जी को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया। हर तरफ अलका याग्निक [संगीत] की आवाज की वाहवाही होने लगी। इस फिल्म के बाद हर नया पुराना म्यूजिक डायरेक्टर अपनी फिल्म के गाने अलका याग्निक [संगीत] से ही गवाना चाहता था। अब आप यह कह सकते थे कि आशा और लता का तिलिस्म [संगीत] धीरे-धीरे टूटता नजर आ रहा था। चारों तरफ बस एक ही नाम था अलका याग्निक। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि साल 1989 में अलका जी [संगीत] ने 34 फिल्मों में और साल 1990 में 45 फिल्मों में गाने [संगीत] गाए। तभी डायरेक्टर सुभाष घई साहब की फिल्म खलनायक आई। इस फिल्म की कामयाबी में काफी हद तक हाथ था इसके [संगीत] गानों का। आज भी अगर कोई खलनायक फिल्म की बात करता है तो सबसे पहले उसे इसका [संगीत] गाना ही याद आता है। लेकिन यही गाना बड़ा विवादों का विषय भी बन गया। जब यह गाना आया तो समाज और हिंदी सिनेमा के बड़े-बड़े लोगों में [संगीत] एक बड़ी बहस छिड़ गई। लोगों का कहना था कि इस तरह के विवादित और आपत्तिजनक शब्दों के साथ गाना [संगीत] क्यों गाया गया? कुछ फिल्म समीक्षकों ने तो यहां तक कह दिया कि यह गाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। [संगीत] इन्हीं सब विवादों के चलते अलका याग्निक को समाज का काफी विरोध झेलना पड़ा। कहीं इस [संगीत] गाने को फूहड़ कहा जा रहा था तो कहीं आम दर्शक भी इसकी खुलकर आलोचना कर रहे थे। सिनेमाघरों में [संगीत] इस गाने को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ रही थी। लोग सिर्फ इसे देखने के लिए बार-बार फिल्म देखने जाते। लेकिन [संगीत] जब वही लोग समाज में अपनी राय रख कोई कुछ भी कहे लेकिन यह गाना अमर हो गया और इस फिल्म के लिए अलका याग्निक को [संगीत] अपना दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड मिला। फिर आया साल 1993 इस साल अलका याग्निक को वो सम्मान मिला जिसका हर गायक ख्वाब देखता है। [संगीत] फिल्म थी हम है राही प्यार के। इस फिल्म में अलका याग्निक ने कई गाने गाए [संगीत] और उन्हीं में से एक गाने ने उन्हें उनका पहला राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया। आज उनके माता-पिता का बरसों पुराना सपना साकार हो गया था। लेकिन इस खुशी के साथ-साथ अलका बेहद दुखी भी [संगीत] थी, क्योंकि इस पल में उनके साथ उनके पिता नहीं थे। उनके पिता इस फिल्म के रिलीज होने से कुछ ही दिन पहले [संगीत] इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अलका के पिता ने पहले ही यह [संगीत] कह दिया था कि अलका को इस गाने के लिए जरूर राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा। और पिता की यह बात आगे चलकर सच साबित हुई। लेकिन अफसोस [संगीत] वही पिता इस दिन को अपनी आंखों से देखने के लिए मौजूद नहीं थे।
पुरस्कार लेते समय अलका की आंखों में आंसू थे। यह खुशी के आंसू थे या अपने [संगीत] पिता को याद करने के? शायद दोनों ही। कुछ ही देर में इस 90 के दशक में अलका उस समय की हर बड़ी [संगीत] से बड़ी अदाकारा को अपनी आवाज दे रही थी। चाहे माधुरी दीक्षित हो या काजोल। करिश्मा कपूर हो या तब्बू। उन दिनों शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनती हो जिसमें अलका याग्निक की आवाज का जादू ना हो। इस दौरान अलका याग्निक सिर्फ हिंदी ही नहीं [संगीत] बल्कि भोजपुरी, बंगाली और गुजराती भाषाओं में भी गाने रिकॉर्ड कर रही थी। भोजपुरी भाषा में गाया हुआ उनका एक गाना [संगीत] आज भी बेहद मशहूर है। अलका याग्नेक अब भारत की नंबर वन गायिका के पद पर विराजमान हो चुकी थी। हालांकि उस समय [संगीत] भी लता मंगेशकर और आशा भोसले दोनों बहनें संगीत की दुनिया में एक बार फिर अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी और साथ ही [संगीत] अनुराधा पौड़वाल कविता कृष्णमूर्ति साधना सरगम जैसी बड़ी गायिकाएं भी उन्हें टक्कर देने की होड़ में लगी हुई थी। फिर भी अलका याग्निक [संगीत] वो नाम बन चुकी थी जो सभी पर भारी पड़ रहा था। शायद उनकी सफलता की गारंटी ही यह वजह थी कि हर म्यूजिक कंपोजर सिर्फ अलका याग्निक को ही [संगीत] अपनी फिल्म के लिए चाहता था। कुल मिलाकर 90 का पूरा दशक अलका याग्निक के ही नाम रहा। लेकिन उन्हीं दिनों उनके पास एक ऐसी फिल्म की रिकॉर्डिंग का ऑफर आया जिसे वे कर नहीं पाई और जिसे ना कर पाने का उन्हें ता जिंदगी अफसोस [संगीत] रहा। बताते हैं कि एक दिन अलका याग्निक जी के पास एक अनजान नंबर से फोन आया। फोन करने वाले ने कहा कि वे उन्हें और [संगीत] कुमार सानू को लेकर एक गाना रिकॉर्ड करना चाहते हैं। लेकिन अलका को उस लड़के के बारे में कुछ भी पता [संगीत] नहीं था। इसलिए उन्होंने कहा मैं आपको थोड़ी देर में वापस फोन करती हूं। कुछ ही मिनट बाद [संगीत] अलका याग्निक ने कुमार सानू को फोन मिलाया और पूछा क्या आपके पास भी कोई फोन आया था? सानू साहब ने कहा हां एक फोन तो आया था पर मैंने मना कर दिया लेकिन क्या आपको पता है वो अनजान शख्स [संगीत] जिसने फोन किया था वो असल में कौन था वह थे म्यूजिक डायरेक्टर ए आर रहमान और वे फिल्म रोजा के लिए इन दोनों गायकों [संगीत] की आवाज में गीत गवाना चाहते थे। जब इत्तेफाक से इन दोनों सिंगरों ने गाना गाने से मना कर दिया तो ए आर रहमान साहब ने किसी [संगीत] और गायक गायिका से यह गाना गवाया। जब अलका याग्निक जी ने रोजा फिल्म रिलीज होने के बाद इस फिल्म के गाने सुने तो उन्हें बेहद अफसोस हुआ। ए आर रहमान साहब [संगीत] को इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। लेकिन इसी के तुरंत बाद [संगीत] अलका याग्निक जी के पास सुभाष घाई की फिल्म ताल के लिए गाने का ऑफर आया। और एक बार फिर इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर थे एआर रहमान साहब। इस बार अलका याग्निक जी [संगीत] यह आया हुआ मौका बिल्कुल भी नहीं छोड़ना चाहती थी और उन्होंने फिल्म ताल के गाने रिकॉर्ड किए। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट फीमेल प्लेबैक [संगीत] सिंगर का सम्मान मिला और एक बार फिर उन्हें अपना तीसरा फिल्म फेयर अवार्ड इसी फिल्म के लिए मिला। [संगीत] वैसे अलका याग्निक जी के करियर में रिकॉर्ड्स और पुरस्कारों का यह सिलसिला लगातार [संगीत] चलता ही रहा और उसी बीच उनका एक विवाद हुआ उस समय की जानीमानी गायिका अनुराधा पडवाल से। दरअसल माधुरी दीक्षित और आमिर खान की फिल्म दिल रिलीज [संगीत] हुई थी। इस मूवी में पहले अलका याग्निक जी की आवाज में गाने रिकॉर्ड करवाए गए थे। लेकिन ना [संगीत] जाने किस वजह से इनके रिकॉर्ड किए हुए दोनों गानों में उनकी आवाज नहीं रही [संगीत] और फिल्म में जो गाने आखिर में रिलीज हुए वे अनुराधा पडवाल की आवाज में थे। जब अलका जी को यह बात पता चली तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने इस [संगीत] फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर आनंद मिलन से दूरी बना ली। बताते हैं कि अलका याग्निक ने लगभग 2 सालों [संगीत] तक आनंद मिलिन के साथ कोई काम नहीं किया। अलका याग्निक का मन अंदर से इतना खिन्न हो गया था कि उन्होंने एक इंटरव्यू में खुलकर कहा कि अब इस म्यूजिक [संगीत] इंडस्ट्री में नैतिकता नहीं बची है। जब गाने मेरी आवाज में रिकॉर्ड हो चुके थे तो अनुराधा पौडवाल [संगीत] को दोबारा अपनी आवाज में वो गाने रिकॉर्ड करवाने ही नहीं चाहिए थे। यह एक बड़ा बयान था
[संगीत] जिसने उस दौर में काफी सुर्खियां बटोरी। लेकिन ऐसा नहीं था कि इस घटना के बाद अलका याग्निक जी को काम मिलना बंद हो गया था। बस उन्हें अनुराधा जी का यह तरीका बिल्कुल भी [संगीत] पसंद नहीं आया। अलका का हर साल हिट फिल्मों का सिलसिला जारी रहा। खलनायक [संगीत] के बाद बाजीगर, दामिनी, आंखें, रंग जैसी कई फिल्मों में उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। आपको [संगीत] भी अच्छी तरह याद होगा जब अनाड़ी फिल्म आई तो लोगों की जुबान पर सिर्फ अलका याग्निक का गाया [संगीत] गाना ही चढ़ा हुआ था। जब मोहरा फिल्म 1995 में सलमान खान और शाहरुख खान की फिल्म करण अर्जुन के गाने भी बेहद हिट रहे। और 1996 में [संगीत] आई राजा हिंदुस्तानी की तो बात ही क्या करनी। इस फिल्म के गाने ने लोगों को मानो पागल ही कर दिया था। हर गली हर नुक्कड़ में बस [संगीत] यही गाना बज रहा था। चाहे जुदाई फिल्म हो या जीट फिल्म हर फिल्म को सफल कराने में अलका यागने की आवाज [संगीत] का जबरदस्त साथ रहा। सुपरहिट फिल्म परदेश में गाए इनके गाने के लिए इन्हें 1998 [संगीत] में तीसरी बार बेस्ट प्लेबैक सिंगर के अवार्ड से सम्मानित किया गया। उस समय की कोई भी बड़ी हिट [संगीत] फिल्म देख लीजिए। हर फिल्म में इनके गाने जरूर होते थे। जैसे सुपरहिट फिल्म कुछ-कुछ होता है का टाइटल सॉन्ग खुद [संगीत] अलका याग्निक ने गाया था। और इसके लिए उन्हें बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर [संगीत] का नेशनल अवार्ड मिला। अब आइए अलका याग्निक जी के निजी जीवन के बारे में भी बात कर लेते हैं। अलका जी के पति का नाम नीरज [संगीत] कपूर है जो एक बिजनेसमैन है। नीरज से उनकी मुलाकात दिल्ली के एक रेलवे स्टेशन पर हुई थी। [संगीत] अलका 1986 में जब कोलकाता से दिल्ली आई, तब उनकी मां की एक सहेली का भतीजा उन्हें स्टेशन पर लेने आया था। जिसका नाम था [संगीत] नीरज कपूर। अलका और नीरज की यह पहली मुलाकात थी। नीरज उस [संगीत] दिन एक साधारण सा कुर्ता पायजामा और सिर्फ चप्पल पहने हुए थे और इसी सादगी को देखकर अलका जी [संगीत] को नीरज बहुत अच्छे लगे। भले ही यह पहली मुलाकात थी लेकिन इसी पहली मुलाकात से अलका और नीरज के बीच [संगीत] एक अच्छी दोस्ती हो गई और यह दोस्ती कब मोहब्बत में बदल गई इसका पता ही नहीं चला। करीब 2 साल तक दोनों रिलेशनशिप [संगीत] में रहे। फिर दोनों ने शादी करने का फैसला किया। अलका ने अपने घर वालों को नीरज [संगीत] से शादी करने के बारे में बताया। लेकिन उनके माता-पिता ने इस शादी से इंकार कर दिया। दरअसल नीरज मेघालय के [संगीत] शिलंग में अपना बिजनेस करते थे। इसलिए उनके माता-पिता का मानना था कि दोनों के बीच बहुत बड़ी दूरी बनी रहेगी। अलका जहां मुंबई में रहती [संगीत] थी, वहीं नीरज शिलंग में रह रहे थे। और इतनी लंबी दूरी की वजह से उनके माता-पिता को यह डर था कि दोनों का वैवाहिक जीवन शायद [संगीत] अच्छा नहीं रहेगा। लेकिन अलका याग्निक और नीरज पूरी तरह अपने फैसले पर अडिक्ट थे और उन्होंने [संगीत] आपस में सहमति बना ली। आखिरकार 1989 में दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद नीरज कुछ समय के लिए मुंबई आकर रहने लगे और यहीं पर अपना व्यापार फिर से शुरू किया। लेकिन मुंबई में व्यापार शुरू [संगीत] करना उनके लिए आसान नहीं रहा। उनका बिजनेस यहां ठप हो गया और उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ा। नतीजतन नीरज एक [संगीत] बार फिर शिलंग लौट गए और अलका यहां मुंबई में अकेली रहने लगी। पति से इस लंबी दूरी ने [संगीत] अलका को धीरे-धीरे तनाव से भरना शुरू कर दिया। इस अकेलेपन और तनाव ने हालात कुछ ऐसे बना दिए कि यह रिश्ता एक समय तलाक के दरवाजे तक पहुंच गया। अलका ने खुद यह भी माना है कि लगातार अलग रहने की वजह से कई मौके ऐसे भी आए जब वे किसी दूसरे पुरुष की तरफ आकर्षित भी हुई।
हालांकि अलका यह [संगीत] भी बखूबी जानती थी कि उन्हें कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना है और वे संभल गई। समय के साथ उनके पति ने भी आपस का मनमुटाव खत्म किया [संगीत] और दोनों ने अपने रिश्ते को ना तोड़ने का फैसला लिया। आज दोनों एक साथ खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। इस दंपति की एक बेटी भी है जिनका [संगीत] नाम साइशा कपूर है। साइशा का विवाह 2018 में उनके प्रेमी अमित देसाई [संगीत] से हुआ। दिलचस्प बात यह है कि उनकी बेटी सायशा का संगीत की दुनिया से कोई लेना देना नहीं है। अलका अब भी गाने गा रही हैं। लेकिन अब [संगीत] वे गाने बहुत कम गा रही हैं। इसके पीछे वे संगीत में आए बदलाव को मानती हैं। उनका कहना है कि आज के [संगीत] संगीत में बहुत ज्यादा कर्कशपन आ गया है और आज का संगीत तथा 90 के दशक का संगीत दोनों में जमीन आसमान [संगीत] का अंतर है। और शायद यही वजह है कि कुमार सानू, सोनू निगम, उदित नारायण, [संगीत] अलका याग्निक जैसे बड़े-बड़े गायक आज इंडस्ट्री से दूर बाहर बैठे हुए हैं। शायद आज की नई युवा पीढ़ी अलका याग्निक की आवाज [संगीत] को उतना ना पहचानती हो। लेकिन, एक वक्त था जब उनकी मधुर आवाज का जादू पूरी दुनिया पर छाया हुआ था। और [संगीत] यह बात इतनी सच है कि दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादीन तक अलका याग्निक के गानों के दीवाने थे। बताते हैं कि जब [संगीत] ओसामा बिन लादीन की मौत हुई तो उसके ठिकाने से अलका याग्निक के ना जाने कितने ही म्यूजिक रिकॉर्ड्स का जखीरा [संगीत] मिला था। सोचिए एक तरफ इतना खतरनाक आतंकवादी और दूसरी तरफ एक भारतीय गायिका [संगीत] की मासूम आवाज। यह अपने आप में कितना अजीब और हैरान करने वाला तथ्य है। लोगों के बीच अलका याग्निक [संगीत] की ऐसी लोकप्रियता यूं ही नहीं थी। उन्होंने करीब 1000 फिल्मों में लगभग 2600 गाने गाए हैं। हां, अलका याग्निक [संगीत] जी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफी और किशोर दाजी के बाद सबसे ज्यादा गाने गाने का रिकॉर्ड अपने [संगीत] नाम रखती हैं। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के मुताबिक अलका याग्निक जी का एक गाना एक दिन में करोड़ों बार सुना गया है।
शायद यह सुना [संगीत] जाना ही उनके लिए सबसे बड़ा अवार्ड है। लेकिन सिनेमा को हजारों सुपरहिट [संगीत] गीत देने वाली अलका याग्निक ने अपने चाहने वालों को एक दिन ऐसी जानकारी दी जिसे [संगीत] सुनकर पूरे सिनेमा जगत में खलबली मच गई। अलका ने एक पोस्ट में लिखा कि कुछ दिनों पहले जब वे फ्लाइट से उतरी [संगीत] तो उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें कान से कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा। तुरंत उन्होंने डॉक्टर को दिखाया और [संगीत] यह बात बिल्कुल सच निकली कि अलका को कान से सुनाई नहीं दे रहा था। इस घटना के कुछ दिनों बाद उन्होंने बड़ी हिम्मत जुटाकर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों [संगीत] को बताया कि उन्हें अब कान से बिल्कुल भी सुनाई नहीं पड़ रहा। पता चला कि उन्हें एक दुर्लभ बीमारी हुई है। रेयर सेंसरी [संगीत] नर्व हियरिंग लॉस। उन्हें एक वायरल अटैक हुआ था जिसकी वजह से उन्हें यह दुर्लभ डायग्नोसिस मिला। मशहूर सिंगर अलका याग्निक इन दिनों इसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही हैं जिसमें उन्हें [संगीत] सुनाई देना बंद हो गया है और यही वजह है कि उनकी सुनने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो गई है। [संगीत] इसका इलाज अच्छे डॉक्टरों की देखरेख में चल रहा है। लेकिन अलका याग्निक जी इस गंभीर बीमारी से निजात पाएंगी या नहीं यह तो [संगीत] अभी वक्त ही बताएगा। डॉक्टर्स ने बताया कि ज्यादा तेज आवाज और लगातार हेडफोन के इस्तेमाल से [संगीत] यह परेशानी हुई है। अलका याग्निक के साथ किस्मत ने बड़ा ही अजीब खेल खेला। [संगीत] जिस गायिका को सुनने के लिए करोड़ों लोग बेताब रहते थे। आज वही गायिका अपनी [संगीत] ही आवाज को सुनने के लिए तरस रही है। अलका याग्निक जी का इलाज निपुण डॉक्टरों की देखरेख में