क्या आप जानते हैं कि मुंबई का वो कौन सा पुलिस सब इंस्पेक्टर था जिसकी एक कड़क डांट सुनकर अपराधी [संगीत] तो क्या बड़े-बड़े फिल्मी प्रोड्यूसर भी कांपने लगते थे? क्या आपको मालूम है कि हिंदी सिनेमा का वो कौन सा इकलौता सुपरस्टार था जिसने तिरस्कार में मिली अपनी ही एक हिट फिल्म के रीमेक को सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसे डायरेक्टर के बाल पसंद नहीं आए थे। और क्या आप उस रहस्यमई [संगीत] रात की हकीकत जानते हैं? जब इस महान अभिनेता ने मौत को गले लगाने से ठीक पहले अपने परिवार से कहा था कि मेरी चिता की राख ठंडी होने से पहले [संगीत] दुनिया को मेरे जाने की खबर मत देना। इन सभी अनसुने और हैरान कर देने वाले सवालों के जवाब आज [संगीत] आपको इस वीडियो में मिलेंगे। इसीलिए इस वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा क्योंकि आज हम हिंदी सिनेमा के सबसे बेबाक, सबसे रबीले और दिलदार जानी [संगीत] यानी अभिनेता राजकुमार के पूरे जीवन की उस दास्तान को खंगालने जा रहे हैं जो किसी फिल्मी कहानी से भी ज्यादा उतार-चढ़ाव भरी [संगीत] और दिलचस्प है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई अभिनेता आए और गए। कईयों ने अपनी अदाकारी से लोगों का दिल जीता। तो कई अपनी कशिश से लोगों के दिलों पर राज [संगीत] करने में कामयाब रहे।
लेकिन एक ऐसा शख्स भी आया जिसने ना तो किसी ट्रेंड की परवाह की ना कभी किसी के सामने घुटने टेके और ना ही कभी फिल्म इंडस्ट्री के तयशुदा नियमों को माना। उनका अंदाज इतना जुदा था कि जब वे स्क्रीन पर आते थे तो उनके सामने खड़ा बड़ा से बड़ा कलाकार भी फीका पड़ जाता था। उनकी आवाज में वो कड़कपन [संगीत] और खनक थी जो सीधे दर्शकों के दिलों पर चोट करती थी। उस महान शख्सियत का नाम था [संगीत] राजकुमार। हालांकि यह उनका फिल्मी नाम था। उनका असली [संगीत] नाम कुलभूषण पंडित था। दोस्तों हमारे YouTube चैनल माय मेमोरी में आप सभी का दिल से स्वागत है। कुलभूषण पंडित का जन्म 8 अक्टूबर 1926 को बलूचिस्तान के लोरलाई इलाके में हुआ था जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उनका परिवार एक कश्मीरी पंडित परिवार था जो अपनी सादगी और आत्मसम्मान के लिए जाना जाता था। बचपन से ही कुलभूषण में एक अलग तरह की ज़िद और निडरता थी। वे जो ठान लेते थे उसे पूरा करके ही दम लेते थे। उनके चेहरे पर बचपन से ही एक ऐसा तेज था जिसे देखकर लोग समझ जाते थे कि यह लड़का आम इंसानों की तरह जिंदगी नहीं जीने वाला है। भारत के विभाजन के काले दिनों से ठीक पहले उनका परिवार बलूचिस्तान छोड़कर मुंबई आ गया। मुंबई की चकाचौंध से दूर कुलभूषण ने अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया और ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी की तरफ रुख किया। उनकी कड़क कद काठी और रॉबीली आवाज को देखते हुए उन्हें मुंबई पुलिस में सब इंस्पेक्टर की नौकरी मिल गई।
उन्हें मुंबई के प्रसिद्ध माहिम पुलिस स्टेशन में तैनात किया गया था। पुलिस की वर्दी में कुलभूषण पंडित एक बेहद सख्त और ईमानदार अफसर माने जाते थे। अपराधियों के मन में उनके नाम का खौफ रहता था। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। पुलिस स्टेशन में अक्सर फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। कहा जाता है कि एक बार मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यानी बीआर। चोपड़ा किसी सिलसिले में माहिम पुलिस स्टेशन पहुंचे थे। वहां उन्होंने कुलभूषण पंडित के बात करने के अंदाज, उनके बैठने के तरीके और उनकी कड़क आवाज को नोटिस किया। चोपड़ा साहब को लगा कि इस शख्स के भीतर एक बेहतरीन अभिनेता छुपा हुआ है। उन्होंने कुलभूषण से कहा कि तुम पुलिस की वर्दी में अपनी प्रतिभा को बर्बाद कर रहे हो। तुम्हें फिल्मों में हाथ आजमाना चाहिए। हालांकि कुलभूषण ने उस समय इस बात को हल्के में लिया लेकिन धीरे-धीरे उनके मन में भी अभिनय की चिंगारी सुलगने लगी। आखिरकार उन्होंने पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और किस्मत आजमाने के लिए माया नगरी मुंबई की फिल्मी गलियों में कदम रख दिया। साल 1952 में उन्हें फिल्म रंगीली में पहला ब्रेक मिला। इस फिल्म से उन्होंने अपना नाम बदलकर राजकुमार रख लिया। शुरुआती कुछ फिल्में जैसे अनमोल सहारा और अवसर बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी। इंडस्ट्री के लोग कहने लगे थे कि पुलिस की नौकरी छोड़कर इस लड़के ने बहुत बड़ी गलती की है क्योंकि इसका अंदाज बहुत अजीब है।
लेकिन राजकुमार डिगने वाले नहीं थे। वे जानते थे कि उनका समय आएगा। साल 1957 राजकुमार के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस साल महबूब खान की ऐतिहासिक फिल्म मदर इंडिया रिलीज हुई। इस फिल्म में राजकुमार ने श्यामू का किरदार निभाया जो नरगिस के पति की भूमिका थी। एक ऐसा गरीब किसान जो परिस्थितियों [घंटी की आवाज़] के आगे बेबस होकर अपने हाथ खो बैठता है और आत्मक्लानिक में अपने परिवार को छोड़कर चला जाता है। राजकुमार ने इस किरदार में बेबसी, दर्द और गुस्से का जो मिश्रण पेश किया उसने दर्शकों को रोने पर मजबूर कर दिया। मदर इंडिया ऑस्कर तक पहुंची और इस फिल्म ने राजकुमार को रातोंरात एक संवेदनशील और बड़े अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया। मदर इंडिया की सफलता के बाद राजकुमार के पास फिल्मों की लाइन लग गई। उसी साल उनकी एक और बड़ी फिल्म नौशेरवान ए आदिल आई जिसमें सोहरा मोदी जैसे दिग्गज के सामने उन्होंने अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। अब राजकुमार इंडस्ट्री के बड़े खिलाड़ियों में शुमार हो चुके थे। वे अपनी शर्तों पर काम करते थे। साल 1959 में आई फिल्म पैगाम में उन्होंने दिलीप कुमार के साथ काम किया। दिलीप कुमार उस समय इंडस्ट्री के निर्विवाद बादशाह थे। लेकिन राजकुमार ने मिल मजदूर के किरदार में दिलीप कुमार को इतनी कड़ी टक्कर दी कि दोनों के बीच की स्क्रीन राइवलरी को आज भी याद किया जाता है। इसके बाद साल 1965 में आई बी आर। चोपड़ा की मल्टीस्टारर फिल्म वक्त ने राजकुमार को हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा स्टाइल आइकॉन बना दिया। इस फिल्म में उनका संवाद चिनोई सेठ जिनके घर शीशे के होते हैं वह दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। इस फिल्म के बाद राजकुमार का वो अंदाज निखर कर सामने आया जिसे लोग जानी स्टाइल कहते हैं। राजकुमार का फिल्मी सफर सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है बल्कि यह उनके अदम्य साहस और अनोखे मिजाज की दास्तान भी है। उन्होंने कमल अमरोही की भव्य फिल्म पाकीजा में सलीम का किरदार निभाया।
मीना कुमारी के पैरों को देखकर जब वे कहते हैं कि आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं। इन्हें जमीन पर मत रखिएगा। मैले हो जाएंगे। तो सिनेमा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था। इस एक संवाद ने उन्हें रोमांस का एक अलग और गरिमामय स्तर प्रदान किया। इसके बाद हीर रझा लाल पत्थर और मर्यादा जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि राजकुमार हर तरह के किरदार को अपनी शर्तों पर अमर बना सकते थे। वे कभी भी किसी निर्देशक के इशारों पर नाचने वाले कठपुतली अभिनेता नहीं रहे। अगर उन्हें सीन की कोई लाइन पसंद नहीं आती थी तो वे उसे अपने अंदाज में बदल देते थे। और कमाल की बात यह थी कि उनका बदला हुआ अंदाज ही इतिहास रच देता था। राजकुमार के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो वे अपनी निजी जिंदगी को लाइमलाइट से बिल्कुल दूर रखते थे। उन्होंने एक एंग्लो इंडियन एयर होस्टेस जेनफर से प्यार किया और उनसे शादी कर ली। शादी के बाद जेनिफर ने अपना नाम बदलकर गायत्री रख लिया। उनके तीन बच्चे हुए। गुरु राजकुमार, पाणिनी राजकुमार और बेटी वास्तविकता पंडित। राजकुमार एक बेहद समर्पित पारिवारिक व्यक्ति थे। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने परिवार को फिल्मी पार्टियों या गॉसिप्स का हिस्सा नहीं बनने दिया। वे मानते थे कि उनका काम सिर्फ स्क्रीन तक सीमित है। उसके बाद उनकी जिंदगी सिर्फ उनकी अपनी है। उनका पहनावा भी बेहद अनोखा था। वे अक्सर सूती कुर्ते पायजामे के साथ गले में एक अलग तरह का स्कार्फ या मफलर लपेटे नजर आते थे। और पैरों में हमेशा मोजरी या कोल्हापुरी चप्पल होती थी। वे बेहद महंगे पाइप पीने के शौकीन थे और उनके पास गाड़ियों का भी एक बेहतरीन कलेक्शन था जिसमें वे अक्सर अकेले घूमना पसंद करते थे। 80 और 90 का दशक आते-आते जब हिंदी सिनेमा का मिजाज बदल रहा था तब भी राजकुमार का रुतबा कम नहीं हुआ। साल 1991 में निर्देशक सुभाष घई ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। उन्होंने फिल्म सौदागर के लिए दिलीप कुमार और राजकुमार को एक साथ साइन किया। पूरे 32 साल बाद यह दोनों महागुरु एक बार फिर आमने-सामने थे।
इंडस्ट्री में कयास लगाए जा रहे थे कि दोनों के अहंकार [घंटी की आवाज़] के टकराव की वजह से यह फिल्म कभी पूरी नहीं हो पाएगी। लेकिन राजकुमार ने सुभाष घई से कहा था कि जानी हम दिलीप कुमार की इज्जत करते हैं। फिल्म जरूर बनेगी। और जब सौदागर रिलीज हुई तो बॉक्स ऑफिस पर तहलका मच गया। फिल्म का गाना इमली का बूटा और दोनों के बीच के कड़क डायलॉग्स ने सिनेमाघरों को हिला कर रख दिया। इसके बाद साल 1993 में आई फिल्म तिरंगा में ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह के रूप में उनका किरदार उनके करियर का आखिरी सबसे बड़ा धमाका था। दोस्तों, अभिनेता राजकुमार की वह कौन सी फिल्म है जिसे आप सबसे ज्यादा पसंद करते हैं? कमेंट में जरूर बताएं। साथ ही वह किरदार भी बताएं जिसे आप फिल्मों में सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। अगर आप उनकी फिल्मों के फैन हो तो कृपया करके आपका पसंदीदा किरदार और आपकी पसंदीदा फिल्म का नाम कमेंट में जरूर बताएं। दोस्तों नाना पाटेकर के साथ उनकी जुगलबंदी और हमारी अदालत में फैसले जल्दी होते हैं। जैसे संवादों ने साबित कर दिया कि शेर चाहे बूढ़ा हो जाए उसकी दहाड़ कभी कम नहीं होती। लेकिन इस दहाड़ते हुए शेर को अंदर ही अंदर एक ऐसी बीमारी खा रही थी जिसका कोई इलाज नहीं था। 90 के दशक के मध्य में राजकुमार को गले के कैंसर का पता चला। उन्हें खाना निगलने और बात करने में भयानक दर्द होता था। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उन्होंने कभी भी अपनी इस कमजोरी को दुनिया के सामने जाहिर नहीं होने दिया। वे दर्द में भी मुस्कुराते थे और अपने उसी रबीले अंदाज में लोगों से बात करते थे। वे नहीं चाहते थे कि लोग उनके प्रति सहानुभूति दिखाएं या उन्हें लाचार समझें। जब उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई तो उन्होंने अपने पूरे परिवार को अपने पास बुलाया और एक बेहद अजीब लेकिन गंभीर वसीयत की। उन्होंने कहा कि जब मैं मर जाऊं तो मेरे अंतिम संस्कार को कोई तमाशा मत बनाना। फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को मेरे जाने के बाद खबर देना। मुझे शांति से जाने देना। 3 जुलाई 1996 की सुबह हिंदी सिनेमा का यह देदीप्यमान सितारा हमेशा के लिए बुझ गया। उनके परिवार ने उनकी इच्छा का सम्मान किया। उनकी मृत्यु के बाद बेहद गुपचुप तरीके से उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया और जब उनकी चिता की राख पूरी तरह से ठंडी हो गई। तब जाकर पूरी दुनिया को यह दुखद खबर दी गई कि जानी अब इस दुनिया में नहीं रहे। फिल्म इंडस्ट्री स्तब्ध थी क्योंकि किसी को भी उनके इस तरह अचानक चले जाने का अंदाजा नहीं था। लोग उनकी अंतिम झलक भी नहीं देख पाए लेकिन राजकुमार यही चाहते थे।
वे अपनी मौत को भी अपनी शर्तों पर जीना चाहते थे। बिना किसी ड्रामे और बिना किसी भीड़ के। फिल्म अभिनेता राजकुमार अपनी बेबाकी के लिए जितने मशहूर थे, उतने ही अपने सन की मिजाज और कुछ ऐसे डार्क सीक्रेट्स के लिए भी जाने जाते थे। जिन्होंने कई लोगों को हैरान कर दिया। उनका सबसे बड़ा डार्क साइड था उनका अति अहंकार और दूसरों को सरेआम बेइज्जत करने की आदत। एक बार जब दिग्गज अभिनेता प्रकाश राज या कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार निर्देशक साजिद खान के पिता कामरान खान एक पार्टी में उनसे मिले तो राजकुमार ने उन्हें देखते ही कहा, जानी तुम हमारे घर के नौकर जैसे दिखते हो। सिर्फ यही नहीं जब ब्लॉकबस्टर फिल्म जंजीर के लिए निर्देशक प्रकाश मेहरा सबसे पहले राजकुमार के पास स्क्रिप्ट लेकर गए तो राजकुमार ने फिल्म सिर्फ इसलिए इति ठुकरा दी क्योंकि उन्हें प्रकाश मेहरा के बालों में से बिजनौरी तेल की बदबू आ रही थी। उनके इस अजीब और गरीब अहंकार की वजह से यह रोल अमिताभ बच्चन को मिला। जिसने बिग बी को सुपरस्टार बना दिया। जबकि राजकुमार के हाथ से एक ऐतिहासिक फिल्म निकल गई। बॉलीवुड गलियारों में यह भी चर्चा थी कि वे अपने सह कलाकारों को सेट पर जानबूझकर नीचा दिखाते थे। फिल्म आंखें की शूटिंग के दौरान उन्होंने अभिनेता गोविंदा की एक शर्त की तारीफ की। गोविंदा ने सम्मान में वह शर्त उन्हें तोहफे में दे दी। अगले दिन राजकुमार ने उस महंगी शर्त का टुकड़ा काटकर उससे अपनी कार का पोछा बना लिया। राजकुमार का यह कड़वा और सनकी रवैया कई नए कलाकारों के लिए किसी में सपने [घंटी की आवाज़] हम उनके आशियाने की बात करें तो राजकुमार मुंबई के पौश इलाके वर्ली में समुद्र के सामने बने एक बेहद खूबसूरत और आलीशान बंगले में रहते थे। इस घर को उन्होंने अपनी पसंद के अनुसार बेहद सादगी और नक्काशीदार लकड़ी के फर्नीचर से सजाया था। जहां बैठकर वे अक्सर समुद्र की लहरों को देखते हुए अपने पाइप के कश खींचा करते थे। दोस्तों, आज की यह दिलचस्प वीडियो आपको कैसी लगी? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।