साल 1965 कड़ाके की ठंड और चंडीगढ़ का एक सरकारी अस्पताल सफेद चादर से ढके एक छोटे से बेड पर एक वयोवृद्ध कमजोर बुजुर्ग महिला अपनी जिंदगी की आखिरी सांसे गिन रही थी। यह कोई आम महिला नहीं थी बल्कि भारत मां के उस लाडले की असली जन्मदात्री थी जिसने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। यानी शहीद एआम भगत सिंह की असली मां विद्यावती जी। तभी उस शांत कमरे का दरवाजा धीरे से खुलता है और एक 28 साल का लंबा सजीला नौजवान अंदर दाखिल होता है। जिसके चेहरे पर अजीब सी व्याकुलता थी। उस नौजवान को देखते ही मां विद्यावती की धुंधली हो चुकी आंखों में अचानक एक अजीब सी चमक आ जाती है और उनके होंठ कांपने लगते हैं। वे अपने बेहद कमजोर और कांपते हुए हाथों को आगे बढ़ाती हैं। उस नौजवान का चेहरा अपने हाथों में लेती हैं। उसे चूमती हैं और रुंधे हुए गले से कहती हैं, तुम बिल्कुल मेरे बेटे भगत सिंह जैसे दिखते हो। बिल्कुल वैसी ही आंखें वैसा ही तेज। दोस्तों, अस्पताल के उस कमरे में मां की ममता को झकझोर देने वाला वह नौजवान कोई और नहीं। बल्कि हिंदी सिनेमा का वह सदाबहार लेजेंड था जिसे आज पूरी दुनिया अदब से भरत कुमार कहती है। यानी हमारे प्यारे मनोज कुमार आज जब पूरा देश स्वतंत्रता दिवस का पावन पर्व मना रहा है। जब हर तरफ तिरंगा शान से लहरा रहा है और हवाओं में देशभक्ति के तराने गूंज रहे हैं। आज हम आपको सिनेमा के उस सबसे बड़े राष्ट्रभक्त की महागाथा सुनाने जा रहे हैं। जिसने पर्दे पर देशभक्ति को सिर्फ अभिनय नहीं बनाया बल्कि उसे हर हिंदुस्तानी का मजहब बना दिया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पूरे देश के दिलों में राष्ट्रीयता का जज्बा फूंकने वाले इस महानायक ने खुद अपनी मासूम आंखों से देश के बंटवारे का वो सबसे खौफनाक सबसे खूनी और रोंगटे खड़े कर देने वाला मंजर देखा था। यह कहानी सिर्फ एक सुपरस्टार के बनने की नहीं है बल्कि यह कहानी है एक 10 साल के उस बच्चे की जिसे आधी रात को अपनी ही मिट्टी से बेदखल कर दिया गया जिसने लाशों से पटी ट्रेनें देखी और जिसने दिल्ली के रिफ्यूजी कैंपों में दाने-दाने के लिए संघर्ष किया। 24 जुलाई 1937 को अविभाजित भारत के एदाबाद जो अब पाकिस्तान में है कि एक बेहद संभ्रांत और खुशहाल ब्राह्मण परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ था जिसका नाम रखा गया था हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी। हर कृष्ण के पिता एक बड़े बिजनेसमैन थे। आलीशान मकान था।
नौकर चाकर थे और जिंदगी की तमाम सुख सुविधाएं उनके कदमों में थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। साल 1947 आया और अपने साथ लाया सदियों का सबसे बड़ा मानवीय दर्द। भारत और पाकिस्तान का बंटवारा। रातोंरात पूरा माहौल बदल गया। जो कल तक पड़ोसी थे वे आज खून के प्यासे हो चुके थे। चारों तरफ चीख पुकार, आगजनी और कत्लेआम का माहौल था। हरे कृष्ण के परिवार को अपनी जान बचाने के लिए अपना वो आलीशान घर, वो जमा जमाया कारोबार और अपनी पुरखों की जमीन को बस एक कपड़े में लपेट कर हमेशा हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा। महज 10 साल की उम्र में उस मासूम बच्चे ने वो खौफनाक मंजर देखा जिसे बड़े से बड़े कमजोर दिल इंसान देखकर पागल हो जाए। वे लोग किसी तरह जान बचाकर एक रिफ्यूजी ट्रेन में सवार हुए। जहां चारों तरफ सिर्फ डर का साया था। भूख से बिलखते बच्चे थे और खिड़कियों के बाहर चलते हुए गांव दिखाई दे रहे थे। जब यह परिवार दिल्ली पहुंचा तो इनके पास सिर छिपाने के लिए कोई छत नहीं थी। जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी और वे दिल्ली के किंग्स वे कैंप के एक छोटे से फटे हुए तंबू के नीचे रहने को मजबूर हो गए। एक ऐसा परिवार जो कभी राजाओं की तरह रहता था। वो अब सरकारी राशन की लाइनों में लगकर दो वक्त की रोटी के लिए घंटों इंतजार करता था। यहीं से शुरू हुआ हर कृष्ण गिरी गोस्वामी के जीवन का वो कड़ा इम्तिहान जिसने उनके भीतर के इंसान को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। और उनके भीतर देश के प्रति एक अगाध प्रेम और समाज के प्रति एक गहरी संवेदना भर दी। किंग्स वे कैंप की उन तंग गलियों में धूल और कीचड़ के बीच रहते हुए भी इस लड़के की आंखों में एक अजीब सा सपना पल रहा था। वो सपना था रूह पहले पर्दे पर छा जाने का। उन दिनों दिल्ली के एक छोटे से सिनेमाघर में एक फिल्म लगी थी जिसका नाम था शबनम। और उस फिल्म के नायक थे अभिनय सम्राट दिलीप कुमार। जब हर कृष्ण ने थिएटर के अंधेरे कमरे में दिलीप कुमार को स्क्रीन पर देखा तो मानो उनके दिल और दिमाग पर बिजली सी कौद गई। उन्होंने उसी पल उसी सेकंड यह तय कर लिया कि दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए वे एक्टर ही बनेंगे। दिलीप कुमार के प्रति उनकी दीवानगी इस कदर बढ़ चुकी थी कि उन्होंने दिलीप साहब की फिल्म शबनम में उनके किरदार का नाम मनोज अपने जीवन के लिए चुन लिया। उन्होंने अपने परिवार से कह दिया कि अब से मुझे हर कृष्ण नहीं बल्कि मनोज कुमार कहा जाए और यही नाम आगे चलकर भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा पर्याय बनने वाला था। लेकिन दिल्ली से मुंबई तक का सफर इतना आसान नहीं था। जेब में सिर्फ कुछ रुपए और आंखों में करोड़ों के सपने लेकर जब मनोज कुमार माया नगरी मुंबई के सेंट्रल स्टेशन पर उतरे तो मुंबई की ऊंची-ऊंची इमारतों ने उनका स्वागत नहीं किया बल्कि उन्हें अपनी कड़वी हकीकत दिखाई। मुंबई में उनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था। वे कई दिनों तक रेलवे स्टेशनों पर सोए।
स्टूडियो के बाहर कड़कती धूप में घंटों खड़े रहते ताकि कोई डायरेक्टर उन्हें सिर्फ एक छोटा सा जूनियर आर्टिस्ट का रोल ही दे दे। लेकिन हर जगह से उन्हें सिर्फ दुत्कार और रिजेक्शन ही मिलता था। लोग उनके लंबे कद और दुबले शरीर का मजाक उड़ाते थे। इस संघर्ष के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब उनके पास खाने के पैसे नहीं थे। वे पूरे दिन सिर्फ पानी पीकर मुंबई की सड़कों पर काम की तलाश में भटकते थे। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी क्योंकि वे उस मिट्टी से आए थे जिसने विभाजन के थपेड़ों को सहा था। साल 1957 में उन्हें फिल्म फैशन में एक बेहद छोटा सा भिखारी का रोल मिला। जिसे उन्होंने इतनी शिद्दत और इतनी ईमानदारी से निभाया कि सेठ पर मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गई। इसके बाद छोटे-मोटे रोल्स करते हुए साल 1960 में उनकी पहली बड़ी फिल्म आई कांच की गुड़िया जिसने बॉक्स ऑफिस पर औसत प्रदर्शन किया। लेकिन मनोज कुमार के अभिनय को नोटिस किया गया। मनोज कुमार की किस्मत का सितारा तब चमका जब साल 1962 में फिल्म हरियाली और रास्ता आई। जिसमें उनके अपोजिट माला सिन्हा थी। इस फिल्म के रोमांटिक अंदाज और गानों ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। लोगों को एक ऐसा अभिनेता मिल गया था जिसकी आंखों में गजब की मासूमियत थी और जिसकी आवाज में एक अनोखा जादू था। इसके बाद वह कौन थी और हिमालय की गोद में जैसी सुपरहिट फिल्मों ने उन्हें बॉलीवुड के टॉप अभिनेताओं की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। वे एक सफल कमर्शियल स्टार बन चुके थे। लड़कियां उनकी दीवानी थी। लेकिन मनोज कुमार का दिल तो किसी और ही राह पर चलने के लिए बेकरार था। साल 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा तो पूरा देश संकट में था। सीमा पर जवान अपनी जान दे रहे थे और देश के भीतर अनाज की भारी कमी। उस समय देश के महान और सादगी पसंद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने देश को एक अमर नारा दिया था। जय जवान। जय किसान।
शास्त्री जी चाहते थे कि इस नारे की गूंज देश के हर नागरिक के दिल तक पहुंचे ताकि जवानों का हौसला बढ़े और किसानों का सम्मान हो। एक दिन दिल्ली में एक खास कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री शास्त्री जी की मुलाकात सुपरस्टार मनोज कुमार से हुई। शास्त्री जी मनोज कुमार की फिल्म शहीद से बेहद प्रभावित थे। जो कि भगत सिंह के जीवन पर आधारित थी और जिसे मनोज कुमार ने बड़े ही दिल से बनाया था। शास्त्री जी ने मनोज कुमार का हाथ अपने हाथों में लिया और बेहद धीमे स्वर में कहा मनोज जी आपने शहीद बनाकर देश का दिल जीत लिया है। मैंने देश को जय जवान जय किसान का नारा दिया है। क्या आप इस थीम पर एक ऐसी फिल्म बना सकते हैं जो देश के आम आदमी को हमारे किसान को और हमारे फौजी भाई को एक सूत्र में पिरो सके। प्रधानमंत्री के मूंग से यह शब्द सुनना किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान और सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी। मनोज कुमार के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने तुरंत शास्त्री जी के पैर छुए और वादा किया कि वे इस पर काम करेंगे। वे उसी रात दिल्ली से मुंबई के लिए ट्रेन में बैठे। उनके दिमाग में शास्त्री जी के शब्द गूंज रहे थे।
रिफ्यूजी कैंप का वो दौर याद आ रहा था। और देश के प्रति उनका प्यार उफान मार रहा था। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली से मुंबई के महज 24 घंटे के उस ट्रेन के सफर में बिना सोए मनोज कुमार ने कागज के टुकड़ों पर फिल्म उपकार की पूरी कहानी, स्क्रीन प्ले, और किरदारों का खाका लिख डाला। यह हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक बहुत बड़ा चमत्कार था। जब एक पूरी कल्ट फिल्म की स्क्रिप्ट सिर्फ एक ट्रेन यात्रा के दौरान लिख दी गई थी। साल 1967 में जब फिल्म उपकार सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो उसने जो इतिहास रचा उसकी मिसाल आज तक बॉलीवुड में नहीं मिलती। फिल्म का एक-एक दृश्य, एक-एक संवाद लोगों के दिलों में तीर की तरह चुभ रहा था। और जब बड़े पर्दे पर महेंद्र कपूर की आवाज में गाना गूंजा। मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, मेरे देश की धरती तो सिनेमाघरों में बैठे लोग अपनी कुर्सियों पर खड़े होकर नाचने लगे। तालियों और सिक्कों की बारिश होने लगी। इस फिल्म ने मनोज कुमार को सिर्फ एक स्टार नहीं बल्कि देश का भारत कुमार बना दिया। लोग उन्हें सचमुच देश का मसीहा मानने लगे थे। उपकार की अपार सफलता के बाद मनोज कुमार ने यह समझ लिया कि उनका जीवन सिर्फ पेड़ों के चक्कर काटकर रोमांस करने के लिए नहीं बना है। बल्कि सिनेमा के माध्यम से देश की सेवा करने के लिए हुआ है। इसके बाद उन्होंने निर्देशन की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में ले ली। और एक के बाद एक ऐसी फिल्में दी। जिन्होंने भारतीय समाज की सोच को बदल कर रख दिया। साल 1970 में उन्होंने एक और कालजई फिल्म बनाई जिसका नाम था पूरब और पश्चिम। यह फिल्म उस दौर में आई थी जब भारत के युवा पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों और अपनी मिट्टी को भूलते जा रहे थे। मनोज कुमार ने इस फिल्म के जरिए पश्चिमी देशों को यह दिखाया कि जब दुनिया में कुछ भी नहीं था तब भारत ने दुनिया को सभ्यता और विज्ञान सिखाया था। फिल्म का वह ऐतिहासिक गाना जो आज भी विदेशों में रहने वाले हर भारतीय की धड़कन है। है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं। भारत का रहने वाला हूं। भारत की बात सुनाता हूं। जब यह गाना स्क्रीन पर बजता था तो विदेशों में रहने वाले भारतीयों की आंखों से आंसू आ जाते थे। इस गाने के एक-एक शब्द में जो गर्व था, जो गौरव था, उसने दुनिया भर में भारत की छवि को एक नई ऊंचाई दी। मनोज कुमार का सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं था बल्कि वह एक तरह का सामाजिक दस्तावेज था जो देश की समस्याओं पर सीधे चोट करता था। साल 1972 में उन्होंने फिल्म बनाई शोर जो एक लाचार पिता और उसके मूक बधेर बच्चे के बीच के बेहद इमोशनल और मार्मिक रिश्ते पर आधारित थी जिसने इंसानी संवेदनाओं को झकझोड़ दिया। इसके बाद साल 1974 में उनकी एक और महा ब्लॉकबस्टर फिल्म आई जिसने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। रोटी, कपड़ा और मकान। इस फिल्म के नाम में ही देश के आम आदमी की सबसे बड़ी जरूरत छिपी थी। मनोज कुमार ने इस फिल्म के जरिए देश में बढ़ रही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी और आम इंसान के संघर्ष को इतनी बेबाकी से दिखाया कि सरकारें तक हिल गई। फिल्म का गाना महंगाई मार गई। उस दौर के सामाजिक और आर्थिक हालात पर सबसे बड़ा करारा व्यंग्य था। मनोज कुमार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे अपनी फिल्मों में सिर्फ अभिनय नहीं करते थे बल्कि वे खुद स्क्रिप्ट लिखते थे। शॉट कंपोज करते थे। गानों की ट्यून तय करते थे और एडिटिंग टेबल पर खुद बैठकर एक-एक फ्रेम को तराशते थे। उनकी फिल्मों का कैनवास इतना बड़ा होता था
कि उस दौर के बड़े से बड़े सितारे उनकी फिल्म में सिर्फ एक छोटा सा रोल पाने के लिए तरसते थे। साल 1981 में उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा और सबसेत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू किया जिसका नाम था क्रांति। यह फिल्म 19वीं सदी के भारत में अंग्रेजों के खिलाफ हुए स्वतंत्रता संग्राम की एक काल्पनिक लेकिन बेहद भव्य कहानी थी। इस फिल्म के जरिए मनोज कुमार ने वो कर दिखाया जो उस समय बॉलीवुड में कोई सोच भी नहीं सकता था। उन्होंने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार को जिन्हें वे अपना आदर्श मानते थे। सालों बाद कैमरे के सामने वापस लाकर खड़ा कर दिया। क्रांति में दिलीप कुमार, मनोज कुमार, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी और परवीन बाबी जैसे दिग्गजों की फौज थी। जब यह फिल्म सिनेमाघरों में आई तो मानो देश में देशभक्ति का एक तूफान आ गया। सिनेमाघरों के बाहर मील लंबी लाइनें लगी रहती थी। लोग ट्रैक्टरों और ट्रकों में भरकर दूर-दूर के गांवों से इस फिल्म को देखने थिएटर आते थे।
क्रांति ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए और यह साबित कर दिया कि जब बात देश प्रेम की आती है तो मनोज कुमार का कोई सानी नहीं है। मनोज कुमार का पूरा फिल्मी सफर इस बात का गवाह है कि उन्होंने कभी भी पैसों या सस्ती लोकप्रियता के लिए अपनी कला से समझौता नहीं किया। उन्होंने हमेशा ऐसी फिल्में बनाई जिन्हें पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सके। जिनमें भारतीय संस्कृति, बड़ों का सम्मान, महिलाओं की गरिमा और देश के प्रति वफादारी कूट-कूट कर भरी हो। उनके इसी अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें साल 1992 में देश के अत्यंत प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा। और इसके बाद साल 2015 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े और सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जो उनके अद्वितीय करियर पर एक सुनहरी मुर थी। समय का चक्र चलता रहा और हमारा यह प्यारा भारत कुमार उम्र के ढलते पड़ाव पर पहुंच गया। पिछले साल अप्रैल 2025 में जब 87 वर्ष की उम्र में मनोज कुमार जी ने इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए अलविदा कहा तो मानो भारतीय सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया। मनोज कुमार जी के जीवन का कौन सा किस्सा या उनकी कौन सी फिल्म सबसे ज्यादा पसंद है? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल माय मेमोरी को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें। चलिए मिलकर कमेंट बॉक्स को देशभक्ति के रंग में रंग देते हैं। अपनी पूरी ताकत से लिखिए। जय हिंद जय भारत।