Cli

क्यों राजेंद्र कुमार को ‘पाकिस्तान का भगोड़ा मुसलमान’ मानने लगे थे लोग!

Uncategorized

बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया यह कहानी है एक ऐसे अभिनेता की जिसके प्यार में पड़कर कभी हेमा मालिंग कहती थी धीरे-धीरे वो कोई सुन ले सुन ले कोई सुन ले जिसकी फिल्म अगर थिएटर में लग गई तो 25 हफ्ते से पहले वो फिल्म थिएटर से हटती ही नहीं थी और वह फिल्मों के हिट होने की गारंटी बन गई थी मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले। तो हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के जुबली कुमार कहे जाने वाले एक्टर राजेंद्र कुमार की। कौन है जो सपनों में आया? कौन है जो दिल में समाया? क्यों उनके परिवार को अपना सब कुछ छोड़कर जान बचाकर रातोंरात दिल्ली भागना पड़ा? आखिर क्यों लोग उन्हें पाकिस्तान का भगोड़ा मुसलमान समझने लगे थे? क्या सच में उनके हीरो बनने के पीछे शैतानी शक्तियां थी? याद ना जाए। क्यों मरते दम तक वह एक भूतिया हवेली में रहे। क्यों उन्होंने अपनी भोलीभाली पत्नी और बच्चों को धोखा देकर एक मुसलमान हीरोइन से संबंध बनाए। राजेंद्र कुमार की मौत के रहस्य पर लोग क्यों भरोसा नहीं कर पाए? अमन का फरिश्ता कहां जा रहा? जानेंगे और भी बहुत कुछ। तो चलिए शुरू करते हैं। आ मेरी रानी ले जा छल्ला निशानी। राजेंद्र कुमार का जन्म 20 जुलाई 1929 को पंजाब के सियालकोट में हुआ था जो अब पाकिस्तान में हैं। उनके दादा ब्रिटिश मिलिट्री में कॉन्ट्रक्टर थे और उनके पिता लुभाया रामतुली का टेक्सटाइल का बिजनेस था। राजेंद्र कुमार का बचपन एक अच्छे खासे संपन्न परिवार में बीता। उन्होंने अपनी पढ़ाई लिखाई भी अच्छे से की और डॉक्टर की डिग्री हासिल की। उनका परिवार पंजाब में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा निभाते हुए बड़े प्यार से रह रहा था। क्या बात कर रहे हैं कि एक सुबह उन्हें अचानक से पता चला कि जहां वह रहते हैं वह इलाका अब मुस्लिम देश पाकिस्तान बन चुका है और उनकी भलाई इसी में है कि वह सब कुछ छोड़कर भारत भाग जाएं। उनका परिवार का घर छीन लिया गया। उनके घर, जमीन और पिता के बिजनेस पर भी कब्जा कर लिया गया और उनके परिवार को अपनी जान बचाकर रातों-रात भारत भागना पड़ा। दिल्ली में आकर उनका परिवार रिफ्यूजी कैंप में रहने लगा था, जहां खाने के भी लाले पड़ते थे। धीरे-धीरे उनके परिवार ने रहने का ठिकाना ढूंढा और पूरा परिवार एक किराए के कमरे में रहने लग गया। पूरे परिवार का एक साथ पेट भरना भी मुश्किल था। तो राजेंद्र कुमार ने कोई छोटी-मोटी नौकरी ढूंढना शुरू किया। उनकी किस्मत अच्छी रही कि उन्हें पुलिस में सब इंस्पेक्टर की सरकारी नौकरी मिल गई। चार दिनों की छुट्टी है और उनसे जाकर मिलना है।

परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था। सब ने सोचा कि बेटा सरकारी नौकर हो गया है तो अच्छे दिन भी आ ही जाएंगे। लेकिन राजेंद्र कुमार नौकरी नहीं करना चाहते थे। उनका मन तो फिल्मों में काम करने का था। उन्हें नौकरी करते हुए एक महीना भी नहीं हुआ था कि तभी एक दिन उनका एक दोस्त मुंबई से दिल्ली आया। राजेंद्र कुमार ने उससे कहा कि मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूं और यह नौकरी नहीं करना चाहता। दोस्त ने कहा, बस इतनी सी बात तुम बंबई आ जाओ। आज तुम मुंबई आओ और समझो कल तुम हीरो बन गए। अरे बड़े-बड़े एक्टर मुझे सलाम करते हैं और हर डायरेक्टर से मेरी जान पहचान है। हालांकि वह दोस्त ही क्या जो फेंकू ना हो। बात तो सही है। और फिर यह तो बंबई की हवा खा के आया था। तो उसने इतनी लंबीलंबी फेंकी कि राजेंद्र कुमार उसे समेट भी नहीं पाए। राजेंद्र कुमार सपना देखने लगे कि मानो वो एक्टर बन ही गए हैं और उन्होंने तय कर लिया कि वह नौकरी छोड़कर तुरंत बंबई जाएंगे। लेकिन राजेंद्र कुमार के पास बंबई जाने का किराया भी नहीं था तो उन्होंने अपने पिता की दी हुई घड़ी बेच दी और अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर वह बंबई पहुंच गए। लेकिन जब बंबई पहुंचकर उन्होंने अपने दोस्त की हालत देखी तो उनके मुंह से बस यही निकला। मेरे साथ अन्याय हुआ है। उनका दोस्त खुद कंगाली की जिंदगी जी रहा था और फिल्मों में काम करने वाले किसी स्पॉट बॉय तक को नहीं जानता था। राजेंद्र कुमार को बहुत दुख हुआ। उन्हें लगा कि जैसे एक झटके में किसी ने उनका सब कुछ लूट लिया हो। मुझे तो लगता है कि आज बचाने वाले के सब हाथ कट चुके हैं। वह खुद मर गया है। लेकिन अब उन्होंने ठान लिया कि जब बंबई आ ही गए हैं तो खाली हाथ तो नहीं लौटेंगे। इसके बाद वह छोटा-मोटा काम करके अपने दिन बंबई में काटने लगे। उन्होंने होटल में वेटर का भी काम किया। एक दिन उनकी मुलाकात रमेश बहल से हुई। रमेश बहल ने राजेंद्र कुमार की पढ़ाई लिखाई देखकर उन्हें कोई काम दिलाने का वादा कर दिया। कुछ दिनों के बाद रमेश बहल ने राजेंद्र कुमार की सिफारिश एचएल रवेल से की जो फिल्म डायरेक्टर थे और एच एस रवेल ने राजेंद्र कुमार को ₹150 महीने की सैलरी पर काम दे दिया था। के मौसम भीगा भीगा है, हवा भी ज्यादा ज्यादा है। क्यों ना मचलेगा? राजेंद्र कुमार फिल्मी दुनिया में तो आ गए थे, लेकिन फिल्मों से कोसों दूर थे। वह डायरेक्टर रवेल के छोटे-मोटे काम करते थे और फिर उनके असिस्टेंट बन गए। ऐसा करते हुए 5 साल बीत गए। राजेंद्र कुमार अपने परिवार को छोड़कर जिस सफलता की तलाश में मुंबई आए थे, ना तो वह सफलता उन्हें मिल रही थी और ना ही उनके परिवार से अब उनका कोई कनेक्शन बचा था। उन्होंने कई बार एच एस रवेल से उन्हें फिल्मों में कोई छोटा-मोटा रोल देने के लिए कहा। लेकिन डायरेक्टर हर बार उनका मजाक बनाकर बात को टाल देता था। और अब राजेंद्र कुमार को भी समझ में आ गया कि अगर इनके साथ रहा तो पूरी जिंदगी असिस्टेंट बनकर ही निकल जाएगी। तो उन्होंने चोरी छिपे फिल्मों में छोटे-मोटे रोल ढूंढना भी शुरू कर दिया। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें पहली ही फिल्म में दिलीप कुमार और नरगिस के साथ एक छोटा सा किरदार मिला। यहां तो उल्टी गंगा बहती है। फूल तो तुम्हारे कदमों में विजय बाबू को रखने चाहिए।

फिल्म का नाम था जोगन। इस फिल्म में उनके काम को इतना पसंद किया गया कि 1955 में उन्हें हीरो के तौर पर अपनी पहली फिल्म भी मिल गई। फिल्म का नाम था वचन। जब लिया हाथ में हाथ निभाना साथ मेरे सजनों। और जब राजेंद्र कुमार ने यह बात अपने मालिक रवेल को बताई कि मुझे मेन लीड में फिल्म मिली है तो उसने एक बार फिर से राजेंद्र कुमार का मजाक बना दिया और कहा कि तुम एक्टिंग नहीं कर सकते। फिल्म फ्लॉप हो जाए तो वापस अपने काम पर लग जाना। लेकिन जब यह फिल्म रिलीज हुई तो इसने इतिहास रच दिया। हसीनों को आते हैं क्या क्या बहाने। फिल्म लोगों को इतनी पसंद आई कि यह 25 हफ्तों तक थिएटर में चलती रही। चंदा मामा दूर के हुए पकाएं भूर के राजेंद्र कुमार रातोंरात स्टार बन गए और हर कोई राजेंद्र कुमार का दीवाना हो गया। उनका मालिक बड़ा शर्मिंदा हुआ। उसने राजेंद्र कुमार से माफी मांगी कि मैंने तुम्हारे टैलेंट की कदर नहीं की। इसके बाद 1956 में राजेंद्र कुमार की फिल्म आई तूफान और दिया। यह कहानी है दिए की और तूफान की। और यह फिल्म भी कई हफ्तों तक थिएटर में चलती रही और एक बेहतरीन क्लासिकल फिल्म बनी। मेरी छोटी सी बहन देखो बहन बहन ससुराल चली रे बन थन के। इसके बाद आई आवाज जो कुछ खास नहीं चली। फिर 1957 में राजेंद्र कुमार उस फिल्म का हिस्सा बने जिसने भारत में इतिहास रचा और दुनिया भर से तारीफें बटोरी। फिल्म का नाम था मदर इंडिया। दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा। और मदर इंडिया फिल्म को कौन नहीं जानता? यह भारत की पहली फिल्म बनी जिसे ऑस्कर में नॉमिनेशन मिला था। राजेंद्र कुमार ने नरगिस के बेटे का किरदार निभाया। मैं तुम्हारी पाई-पाई चुका दूंगा। बिरजू तो पागल है लाला। मां दे दे कम। लाला मेरी मां के कंगन वापस कर दे। इसके बाद तो मानो राजेंद्र कुमार के सामने फिल्मों की लाइन लग गई और फिर एक झलक दुनिया रंग रंगीली जैसी फिल्में भी आई। इसके बाद आई फिल्म तलाक। झुक गई देखो गर्दन उनकी जलते थे जोन से और राजेंद्र कुमार की इस फिल्म ने भी सिनेमाघरों में जुबली मनाई। कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से। फिल्म का हर गाना बेहतरीन था और यह फिल्म सबसे बेहतरीन क्लासिकल फिल्म बनी। संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से। इसके बाद 1958 में आई खजांची और यह फिल्म भी बड़ी हिट हुई। राजेंद्र कुमार की फिल्म देखकर लोग उनके दीवाने होते चले गए और मानो दो-चार फिल्मों से ही उन्होंने बड़े-बड़े एक्टरों का सिंहासन हिला दिया था। तुम हाथ पकड़ कर मेरा जब प्यार जता जाते हो। इसके बाद घर संसार देवर भाभी जैसी फिल्में आईं। इसके बाद एक और ऐसी फिल्म आई जिसने सिल्वर जुबली बनाई। फिल्म का नाम था धूल के फूल। अपनी खातिर जीना है, अपनी खातिर मरना है, होने दो जो होता है। यह फिल्म भी इतनी बड़ी हिट हुई कि लगभग 35 हफ्तों तक यह सिनेमाघरों में चलती रही। के अहले वफा चाहते हो और इस फिल्म के गाने ऐसे थे कि आज भी ये रिलेटेबल लगते हैं। बड़े ना समझ हो यह क्या चाहते हो फिल्म के हर गाने में दर्द था सच्चाई थी और खासकर फिल्म का यह गाना तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इतना बड़ा हिट हुआ था कि आज भी लोग इसे क्लासिकल गानों की लिस्ट में सबसे ऊपर रखते हैं। इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। 1959 में आई फिल्म गूंज उठी शहनाई और अगर राजेंद्र कुमार की किसी ने यह फिल्म नहीं देखी तो समझो आप क्लासिकल फिल्मों से कोसों दूर हैं। शहनाई वाले तेरी शहनाई रे करजुआ को चीर गई चीर गई चीर गई। और यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे देखकर हर किसी ने राजेंद्र कुमार को एक मल्टीटलेंटेड एक्टर मान लिया था। मैंने पीना सीख लिया। मैंने पीना सीख लिया। और गूंज उठी शहनाई के लिए राजेंद्र कुमार को आज भी याद किया जाता है। इसके बाद संतान और दो बहनें जैसी फिल्में कुछ खास नहीं चली और फिर आई चिराग कहां रोशनी कहां और इस फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए। अब तो आंख लग चुकी बात भर चुकी। अब तो पास आइए। इसी फिल्म ने वो गाना भी दिया जिसे गा कर मां-बाप ने अपने बच्चों के बचपन को जिया। चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक चार दिन की चांदनी है फिर अंधेरी रात है। इसके बाद मां-बाप पतंग अमर रहे यह प्यार जैसी बेहतरीन फिल्में आई। इसके बाद आई फिल्म आस का पंछी और इस फिल्म की भी जितनी तारीफ की जाए वह कम है। इस फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए। तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूं के इन अदाओं पे और प्यार और फिल्म की कहानी ने लोगों का दिल जीत लिया। इसके बाद आई घराना और यह फिल्म भी सिल्वर जुबली मनाकर ही थिएटर से निकली। दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ। दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ। इस समय तक राजेंद्र कुमार वह सुपरस्टार बन चुके थे कि लोग सिर्फ उनका नाम सुनकर फिल्म देखने पहुंच जाते थे। उनकी लगभग हर फिल्म 25 से 50 हफ्तों तक सिनेमाघरों में लगी रहती थी और हर फिल्म सिल्वर या गोल्डन जुबली मनाती थी। इसलिए लोगों ने उनका नाम ही जुबली कुमार रख दिया था। जब से तुम्हें देखा है

आंखों में तुम ही तुम हो। इसके बाद जिंदगी और ख्वाब आई और यह फिल्म भी बेहतरीन थी। इसके बाद ससुराल आई और जब भी राजेंद्र कुमार पर्दे पर आते तो लोग बस उन्हें देखते ही रह जाते। उनकी एक झलक इतनी प्यारी लगती थी कि लोग टिकट के लिए मरने मारने पर भी उतारू हो जाते थे। पहले मिले थे सपनों में और आज सामने पाया राजेंद्र कुमार का एक अलग ही क्रेज लोगों में देखने को मिलने लगा था। इसके बाद प्यार का सागर आई और यह फिल्म भी लोगों के दिलों में उतरती चली गई। वफा जिंदगी बेवफा हो गए। इसके बाद मेरे महबूब हमराही गहरा दाग जैसी फिल्में आई। 1963 में एक ऐसी फिल्म आई जिसने गोल्डन जुबली बनाई। फिल्म का नाम था दिल एक मंदिर। तुम सबको छोड़कर आ जाओ आ जाओ। और यह फिल्म आज भी लोगों को भावुक कर देती है। याद ना जाए। फिल्म में वो एक्टर भी था जो किसी को भी देखकर यह कह देता है हम कुत्तों से बात नहीं करते। वो अलग बात है कि इस फिल्म में वह एक प्रेमी के किरदार में था और वह भी एक दुखी प्रेमी। रुक जा शहर [संगीत] दर्शन मिलन। राजेंद्र कुमार और राजकुमार की यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनी थी। इसके बाद राजेंद्र कुमार ने मीना कुमारी से कहा अकेली मत जाइयो और यह फिल्म भी बड़ी हिट हुई। 1964 में राजेंद्र कुमार राज कपूर के साथ आए। फिल्म का नाम था संगम और सच में अगर किसी ने यह फिल्म नहीं देखी तो समझो कुछ नहीं देखा। मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया। ओए होए बुड्ढा मिल गया। फिल्म को देखकर पता चलता है कि राज कपूर सच में लीजेंड थे। मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का बोल राधा बोल फिल्म के गाने ऐसे थे कि आज भी लोगों के फेवरेट हैं। अरे बोल राधा बोल संगम होगा के नहीं नहीं कभी नहीं। फिर चाहे दोस्त दोस्त ना रहा गाना हो दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना या फिर हर दिल जो प्यार करेगा हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा या फिर राजेंद्र कुमार का यह गाना हो ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर के तुम नाराज ना हो दिल में ऐसे बसे कि फिर निकले मिले ही नहीं। इसके बाद जिंदगी फिल्म आई और इसने भी दिल टूटे आशिकों को कोने में बैठकर रोने वाला गाना दिया। हमने जफा ना सीखी उनको वफा ना आई। इसके बाद आई मिलन की बेला और यह फिल्म भी गजब की छाई। फिर आरजू आई और इसने भी खूब धमाल मचाया और खासकर इसके गाने। अजी रूठ अब कहां जाएगा?

1966 में राजेंद्र कुमार सूरज बने और यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। फिल्म के गाने भी बेहतरीन थे और फिल्म का यह गाना बहारों फूल बरसाओ। इतना बड़ा हिट हुआ कि जन्मजात सिंगर लड़के भी यह गाते हुए घूमने लगे थे। मेरा महबूब आया है मेरा महबूब इसके बाद पाल की अमन जैसी फिल्में आई। 1967 में राजेंद्र कुमार की फिल्म आई झुक गया आसमान और जब राजेंद्र कुमार ने यह कहा कौन है जो सपनों में आया कौन है जो दिल में समाया तो लोग उनके लिए पागल हो गए। फिल्म में सायरा बानो हीरोइन थी और उनका यह गाना उनसे मिली नजर के मेरे होश उड़ गए। आज भी सुनकर भरोसा नहीं होता कि यह गाना 50 साल से भी ज्यादा पुराना है। झुक गया आसमान फिल्म भी मनोज कुमार की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक थी। इसके बाद आई साथी और यह फिल्म भी इतनी लाजवाब थी कि इसे जिसने भी देखा वह राजेंद्र कुमार का डाई हार्ट फैन हो गया। मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है। जाने तमन्ना और अब मानो राजेंद्र कुमार का दौर ही चल रहा था। वह जो भी फिल्म करते थे, वह सुपरहिट हो जाती थी और राजेंद्र कुमार को फिल्मों की सफलता की गारंटी माना जाने लगा था। बैजंती माला के साथ भी राजेंद्र कुमार की जोड़ी खूब जमी और बैजंती माला भी ऐसी हीरोइन थी जिस पर से लोगों की नजर ही नहीं हटती थी। इसके बाद तलाश, शतरंज और अनजाना जैसी फिल्में भी आई जिनके गानों ने खूब धमाल मचाया। रिमझिम के गीत सावन गाए आए। उस समय पर राजेंद्र कुमार, मोहम्मद रफी साहब की आवाज बन चुके थे। रफी साहब के गाने राजेंद्र कुमार की हर फिल्म में होते थे और यह कहना भी गलत नहीं होगा कि राजेंद्र कुमार की सुपरहिट फिल्मों में रफी साहब के गानों का भी बड़ा हाथ रहा मतलब गला रहा। मैं राही अनजान राहों का। 1970 में राजेंद्र कुमार की फिल्म आई थी धरती और इस फिल्म की भी जितनी तारीफ की जाए वो कम लगती है। खुदा भी आसमान से जब जमीन पर देखता हो फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए। ये मौसम भीगा भीगा है। हवा भी ज्यादा ज्यादा है। फिल्म की हीरोइन थी वाहिदा रहमान और उनके साथ राजेंद्र कुमार की जोड़ी ने गजब कर दिया था। क्यों ना मचलेगा दिल मेरा तुमको पाने का इरादा है यह मौसम भीगा इसके बाद एक और ब्लॉकबस्टर फिल्म आई आप आए बाहर आए और इस फिल्म में भी राजेंद्र कुमार ने कमाल कर दिया आप आए बाहर आई फिल्म के चाहे सदाबहार गाने हो या फिर सैड सॉन्ग हो हर गाना बेहतरीन था और यह फिल्म भी लोगों की ओल्ड इज गोल्ड वाली लिस्ट में शामिल हो गई। 1972 में राजेंद्र कुमार धर्मेंद्र के साथ दिखाई दिए। फिल्म आई लकार और इस फिल्म में उन्होंने एक फौजी का किरदार निभाया और यह फिल्म भी बेहतरीन थी। लो मुस्कुरा लो महफिलें सजा लो। इसके बाद राजेंद्र कुमार तांगेवाला बने। लेकिन इस फिल्म के सिर्फ गाने ही लोगों को पसंद आए और फिल्म कुछ खास नहीं चली। इसके बाद हेमा मालिनी के साथ उनकी फिल्म आई गोरा और काला और जब हेमा मालिनी ने यह कहा धीरे-धीरे बोल कोई सुन जाने, सूचा लेने। तो राजेंद्र कुमार ने भी सीना तान कर कहा। हमको किसी का डर नहीं, कोई जोर जवानी पर नहीं। और यह गाना इतना बड़ा हिट हुआ कि पूरी फिल्म एक तरफ, और यह गाना एक तरफ। इसके बाद गांव हमारा शहर तुम्हारा आन बान सुनहरा संसार रानी और लाल परी दो जासूस मजदूर जिंदाबाद शिरडी के साईं बाबा दो शोले जैसी कई फिल्में आई।

अब धीरे-धीरे समय बदल रहा था। राजेंद्र कुमार की उम्र भी ढलने लगी थी और अब वो फिल्म के मेन हीरो से हटकर सपोर्टिंग किरदार निभाने लगे थे। मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा। इसके बाद भी राजेंद्र कुमार ने कई फिल्मों में साइड किरदार निभाए और वह लगातार फिल्मों में काम करते रहे। जिनमें डाकू और महात्मा साजन बिन सुहागन बिन फेरे हम तेरे आहुति बदला और बलिदान ओ बेवफा गुनहगार साजन की सहेली रुस्तम जैसी कई फिल्मों में राजेंद्र कुमार छोटे-मोटे किरदार निभाते हुए नजर आए। मधुबन खुशबू देता है। इसके बाद एक लंबे समय के लिए राजेंद्र कुमार ने फिल्मों से दूरी बना ली और कई सालों बाद 1989 में राजेंद्र कुमार ने एक बार फिर से मैं तेरे लिए फिल्म से वापसी की। इसके बाद क्लर्क और इंसाफ का खून जैसी फिल्मों में भी बहुत ही छोटे किरदारों में राजेंद्र कुमार दिखाई दिए। लेकिन अब उन्हें कोई नोटिस तक नहीं कर रहा था। राजेंद्र कुमार आखिरी बार 1993 में आई फिल्म फूल में दिखाई दिए थे। बलराम राजू और गुड्डी का रिश्ता नहीं हो सकता और ना ही होना चाहिए। और फिर उन्होंने फिल्मों से हमेशा के लिए दूरी बना ली। राजेंद्र कुमार जितना अपनी सुपरहिट फिल्मों और जुबली कुमार बनकर चर्चित हुए उससे कहीं ज्यादा वो अपनी पर्सनल लाइफ में भी चर्चित रहे। और अब हम बात करेंगे राजेंद्र कुमार की पर्सनल लाइफ की और साथ ही जानेंगे उनसे जुड़े हुए कुछ ऐसे किस्से जिन्हें जानकर आप हैरान रह जाएंगे। राजेंद्र कुमार की शादी शुक्ल बहल से हुई थी। बात उस समय की है जब राजेंद्र कुमार एक्टर नहीं थे बल्कि एच एस रवेल के यहां असिस्टेंट का काम करते थे। यहीं उनके प्यार में पड़ गई थी शुक्ल बहल। राजेंद्र कुमार ने कहा कि देखो मैं कोई बहुत बड़ा काम नहीं करता और करियर का भी कुछ ठिकाना नहीं है। लेकिन शुक्ल ने कहा कि मुझे बस तुम चाहिए। इसके बाद दोनों ने शादी कर ली। दोनों के घर पर तीन बच्चों का जन्म हुआ। बेटा मनोज जो आगे चलकर गौरव कुमार के नाम से जाना गया और दो बेटियां। राजेंद्र कुमार अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने लगे। लेकिन फिल्म में जैसे-जैसे उन्हें सफलता मिलती गई तो दूसरी कई हीरोइन के साथ भी राजेंद्र कुमार का नाम जुड़ने लगा। मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता हो उस समय सायरा बानो के साथ राजेंद्र कुमार सबसे ज्यादा फिल्मों में काम कर रहे थे। फिल्म अमन की शूटिंग के लिए राजेंद्र कुमार और सायरा बानो को जापान में रहना पड़ा और इस दौरान ही दोनों की नजदीकियां भी बढ़ गई। अब आ मिलो सजना। राजेंद्र कुमार सायरा बानो की खूबसूरती पर मर मिटे। वहीं सायरा बानो भी खुद को रोक नहीं पाई और तीन बच्चों के बाप के साथ प्यार के गुल खिलाने लगी। जब वो मिले मुझे पहली बार उनसे हो गई आंखें प्यार। जब दोनों भारत लौटे तो दोनों के अफेयर की चर्चा जोर शोर से उड़ने लगी। जब राजेंद्र कुमार की पत्नी को यह पता चला तो उसने खूब हंगामा किया। कुछ समय के लिए राजेंद्र कुमार ने सायरा बानो से दूरी बना ली। लेकिन सायरा बानो को इसका इतना बड़ा सदमा लगा कि वह राजेंद्र कुमार की रुवाई बर्दाश्त नहीं कर पाई और बुरी तरह से बीमार हो गई। करने के लिए भी तैयार हो गए। लेकिन सायरा बानो की मां को यह बिल्कुल भी मंजूर नहीं था कि उनकी बेटी एक हिंदू एक्टर से शादी करे। उसने सायरा को खूब धमकाया। इधर राजेंद्र कुमार की पत्नी ने भी राजेंद्र कुमार को अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने को कहा। सायरा बानो की बर्थडे पार्टी रखी गई थी। तुमको हमारी उम्र लग जाए।

सायरा बानो ने सोचा कि जब राजेंद्र कुमार इस पार्टी में आएंगे तो वह उनसे शादी की बात करेगी और दोनों यहीं पर सगाई कर लेंगी। लेकिन जब राजेंद्र कुमार आए तो वह अपनी पत्नी को साथ लेकर आए और यह देखकर सायरा बानो का दिल टूट गया। राजेंद्र कुमार ने भी सोच लिया था कि वह अपनी पत्नी और बच्चों की जिंदगी बर्बाद नहीं करेंगे। सायरा बानो दिलीप कुमार की बहुत बड़ी फैन थी और दिलीप कुमार असल में एक मुसलमान थे जिनका असली नाम था यूसुफ खान। तो सायरा बानो की मां ने दिलीप कुमार से सायरा को समझाने के लिए कहा। दिलीप कुमार ने सायरा बानो को समझाया कि तुम खूबसूरत हो। तुम्हें कोई भी परफेक्ट मैन मिल सकता है। तुम अपने धर्म में शादी करो। तो सायरा बानो ने भी तुरंत कहा तो आप बन जाइए वह परफेक्ट मैन और आप मुझसे शादी कर लीजिए। दिलीप कुमार ने भी हां कर दिया और सायरा बानो ने अपने से 22 साल बड़े दिलीप कुमार से शादी कर ली। इस तरह सायरा बानो और राजेंद्र कुमार की लव स्टोरी खत्म हो गई। अगर तूफान नहीं आता। राजेंद्र कुमार से जुड़े कुछ ऐसे किस्से भी रहे जो कमाल के थे। राजेंद्र कुमार की जब फिल्म गूंज उठी शहनाई रिलीज हुई थी तो उसे देखने भारत के पहले शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान साहब गए थे। जब वो फिल्म देखकर बाहर निकले तो राजेंद्र कुमार ने उनसे पूछा खान साहब फिल्म कैसी लगी? बिस्मिल्लाह खान ने कहा कि बहुत अच्छी। राजेंद्र कुमार ने फिर पूछा मेरी एक्टिंग फिल्म में कैसी लगी? तो बिस्मिल्लाह खान साहब ने कहा तुम फिल्म में कहां थे? मैंने तुम्हें कहीं नहीं देखा। मैं तो अपने आप को ही फिल्म में देख रहा था। तुमने ऐसी एक्टिंग की है कि मुझे लगा कि वो मैं ही हूं और मेरी ही कहानी पर्दे पर चल रही है। भोले भोले ज़हद काहे गोले नैनवा बेददी। और इसके बाद राजेंद्र कुमार रात भर खुशी के मारे सो नहीं पाए थे। जब राजेंद्र कुमार की फिल्म मेरे महबूब रिलीज हुई थी तो उसमें राजेंद्र कुमार ने एक मुस्लिम लड़के अनवर का किरदार निभाया था और उन्होंने इस किरदार को ऐसे निभाया कि लोगों को भरोसा हो गया कि यह सच में मुसलमान हैं। लोग उन्हें चिट्ठियां लिखने लगे कि राजेंद्र कुमार तो आपका फिल्मी नाम है। आप असलियत में मुसलमान ही हैं और पाकिस्तान से भागकर भारत आए हैं। और यहां आकर आप अपना नाम बदलकर और पहचान छिपाकर फिल्मों में काम कर रहे हैं। जैसा कि यूसुफ खान ने किया है और अपना असली नाम दुनिया को बताओ। तुम तो एक मुसलमान हो हिंदू नहीं हो और यह सिर्फ उनकी एक्टिंग का ही कमाल था। उन्होंने बताया कि उनका असली नाम राजेंद्र कुमार तुली ही है और वह मुसलमान नहीं है।

ओ यारों मेरा नाम अनजाना। राजेंद्र कुमार की सफलता के साथ एक अजीबोगरीब अफवाह भी उड़ने लगी थी। कहते हैं कि राजेंद्र कुमार जैसे ही थोड़े पैसे कमाने लगे तो उन्होंने सोचा कि एक बड़ा सा घर ले लिया जाए और परिवार के साथ उसमें रहा जाए। उन्होंने मुंबई में कार्टर रोड पर एक बड़ा सा बंगला पसंद किया। हालांकि कई लोगों ने उन्हें बंगला खरीदने से मना किया। लोगों का मानना था कि वह बंगला भूतिया है। उसमें तरह-तरह की आवाजें आती हैं। वह आपके लिए सही नहीं है। आप उसमें जाकर बर्बाद हो जाएंगे। लेकिन राजेंद्र कुमार ने किसी की नहीं सुनी और वह घर खरीद लिया। घर खरीदने के बाद तो मानो उनकी किस्मत ही बदल गई। उनकी फिल्में सुपरहिट होने लगी। फिल्म थिएटर में लगती तो 25 से 30 हफ्तों तक वह थिएटर से हटती ही नहीं। वह एकमात्र ऐसे एक्टर बन गए जिसकी एक साथ सात-सात फिल्में अलग-अलग थिएटर में चलती थी। पूरे देश में सिर्फ एक एक्टर पर्दे पर था और वह था राजेंद्र कुमार। उनकी फिल्म रिलीज होती तो सिल्वर या गोल्डन जुबली बनाकर ही पर्दे से निकलती थी और देखते ही देखते वह जुबली कुमार बन गई। हवाओ रागनी गाओ मेरा महबूब आया। लोगों को भरोसा नहीं हुआ कि कोई एक्टर इतना अच्छा और इतना लकी कैसे हो सकता है और तब लोगों ने यह अनुमान निकाला कि राजेंद्र कुमार जिस भूतिया बंगले में रहते हैं, उसकी काली शक्तियां उनकी मदद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *