कर दोकर दो मैं दिलीप कुमार का पहला घर पाकिस्तान से क्या खबर गलियां जूस में घुस रहा बचपन सब कोई शायद कहानी बचपन दिलीप कुमार की मशहूर हवेली शिव बन गई है पहेली और दिलीप कुमार एक ऐसे अभिनेता जिसमें अपनी एक्टिंग से बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाई और कई उपलब्धियां भी अपने नाम किए लेकिन दिलीप कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे दिलीप कुमार का 98 इस साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया।
उन्होंने हिंदुजा अस्पताल में अंतिम सांस ली इस खबर से भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी गम का माहौल है क्योंकि उनका जन्म पेशावर में हुआ था उनके पुश्तैनी हवेली पेशावर में है आखिर पाकिस्तान के पेशावर से जुड़े दिलीप कुमार की कहानी क्या है इससे पोस्ट पर देखिए अब कि दिलीप कुमार बॉलीवुड की कैसी मशहूर हस्ती जिनके चाहने वाले भारत में ही नहीं पाकिस्तान में भी खूब है इसकी एक वजह दिलीप साहब की शानदार एक्टिंग थी तो दूसरा उनका जन्म पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था और उनका बचपन में पेशावर के गली-मोहल्लों में घुस रहा है कि बिल कुमार का नाम यूसुफ खान था लेकिन जब करियर बनाने के लिए मुंबई आए तो नाम दिलीप कुमार रख लिया लेकिन पेशावर से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ देखिए पाकिस्तान के पेशावर में यह दिलीप कुमार सहित करीब सौ साल से ज्यादा पुरानी हवेली है वह आवेली जिसमें दिलीप कुमार का जन्म हुआ था।
वह हवेली जिसके आंगन में दिलीप कुमार पले-बढ़े हैं तो यही रहते हुए उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की है ना कि अभी हवेली करीब-करीब खंडहर में तब्दील हो चुकी है कि दिलीप कुमार के पिता ने इस हवेली को करीब एक सदी पहले 5000 रुपए में खरीदा था बंटवारे के बाद दिलीप कुमार परिवार के साथ भारत में बस गए थाना के इस हवेली को कई लोगों द्वारा बेचा और खरीदा गया लेकिन दिलीप साहब के दिल में उनका पुश्तैनी घर पर तथा एक किस्सा ख्वानी बाजार इलाके में जन्मे दिलीप कुमार और को युसूफ खान के दिल में यह पाकिस्तानी शहर बताता हूं कि मुंबई में इतनी शोहरत मिलने के बाद भी दिलीप कुमार को अपने शहर अपने पुश्तैनी घर की हमेशा याद आती थी अ कि एक बार दिलीप कुमार साहब ने कहा था कि मेरा पेशावर में बीता बचपन मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे साल से ।
साथ 1999 में दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पेशावर की गलियों से वह बहुत अच्छे से वापस है अरे भाई क्या था वह अलग मुझे मिठाई नहीं है की व्यथा नाम दूसरा रखती है उसका कि अगर इसकी थ्री बाद जो है इंसान मा जाइएगा आ गए होंगे तुम खाना कि बिना भी वही बातें भी वह हटाना मुश्किल से 1999 तक पेशावर छोड़े हुए दिलीप साहब को करीब पांच दशक हो गए थे लेकिन पाकिस्तान सिर्फ तीन बार ही है कि जब यह सवाल उनसे पूछा गया तब उन्होंने जवाब देते हुए कहा था कि कभी फुर्सत ही नहीं मिली और परिवार की जिम्मेदारियों में मुझे रहे तो पाकिस्तान सिर्फ 50 सालों में तीन बार क्योंकि मुझे फुर्सत ही नहीं थी है मेरे पास हां भाई 84 भाई 6 बहने उनकी काली वह घर मेरा काम मेरा जब मुझे बिल्कुल पता नहीं था कि एक्टिंग क्या होती है क्या नाम है उसका मैं समझता था।
शायद एक फिल्म में या दो में ही मुझे पहचान लेंगे इसको आता जाता तो कुछ है नहीं तो बोलिए भाई माफ करो हमसे गलती हो गई जो कोशिश करता था क्योंकि आमदनी की जरूरत थी वैसे मुंबई में बसने के बाद पाकिस्तान न जाने की एक नहीं कई वजह थी वह परिवार को पाकिस्तान की बंदिशों में बांधना नहीं चाहते थे जहां बहन बेटियों को बुर्के मे रहना पड़ता है जब मौलिक तक से हुआ तो कहते कि बात आपको भी थी कि आप भी पाकिस्तान चाहिए लेकिन आप पाकिस्तान नहीं और बहनों भी पाकिस्तान ने की सवारी नहीं सर इसकी वजह क्या थी सुबह ही पैदा नहीं होता पूरा माजरा उनको युद्ध था हैं उनमें से चार बहनें यहीं पैदा हुई ये दोनों भाई यहां पर पैदा हुए हैं है और यही पढ़े-लिखें फैन स्कूलों में कई कॉलेजों में गए उसका बेटा अगर वह चले जाते तो वहां के खानदान में सब बहनों को बुर्के में बिठा बदल दिया जाता पेशावर में दिलीप कुमार के पुश्तैनी हवेली 101 वर्ग मीटर में फैली हुई है।
साल 2014 में तत्कालीन नवाज शरीफ सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया था फिर से यहां से इमारत के मालिक ने कई बार से तोड़कर कमर्शल प्लाजा बनाने की कोशिश की लेकिन ऐसी सभी कोशिशों को रोक दिया गया क्योंकि पुरातत्व विभाग इन के ऐतिहासिक महत्व के कारण इन्हें संरक्षित करना चाहता था।
वे इस हवेली की पाकिस्तान सरकार ने हंसी लाख 56 हजार रुपए कीमत लगाई क्योंकि पाकिस्तान सरकार इसे म्यूजियम बनाना चाहती है हालांकि हवेली के वर्तमान मालिक कहते हैं कि उन्हें इसकी कीमत कम मिली है लेकिन वह सरकार को हवेली नहीं बेचना चाहते हैं लेकिन दिलीप कुमार के चाहने वाले इस बात से खुश है कि उनकी पहचान और धरोहर को सुरक्षित रखा जाएगा दिलीप कुमार ने अपनी पहचान बनाई और कामयाबी की बुलंद हंसुआ तो उनके प्रति पाकिस्तान का प्रेम भी ज्यादा पाकिस्तान ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से दिलीप कुमार को सम्मानित किया कि लेकिन दिलीप कुमार हमेशा दिल से हिंदुस्तानी रहे जो पाकिस्तान ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से नवाज़ा दोनों ने सम्मान को लेने से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई से सलाह भी ली थी वाजपेई की तरह के बाद 1998 में दिलीप कुमार पाकिस्तान इस अवॉर्ड को लेने गए थे।
हालांकि बुधवार की सुबह दिलीप साहब की जिंदगी की आखिरी सुबह साबित हुई और 98 साल की उम्र में उनका निधन हो गया है लेकिन अपने पीछे कई किस्से-कहानियां दिलीप कुमार छोड़ गए हैं जिन्हें हमेशा याद रखा जाएगा शीघ्र रिपोर्ट न्यूज़ 24 मैं दिलीप कुमार ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है लेकिन पांच दशक के अपने करियर में दिलीप साहब ने जो मुकाम हासिल किया वह असर छोड़ा वह हमेशा हमेशा रहेगा इस दौरान विजय कुमार के साथ फिल्मों में आपने उनकी अदाकारी देखी है उनके शानदार किरदार देखे हैं।
लेकिन सिनेमा के साथ उनका निशाना किसी गुप्त खजाने से कम नहीं है जेपी तहे आपको देते चले जाएंगे आप उनसे और जुड़ते चले जाते हैं पेशावर से लेकर मुंबई तक के उनके सफर में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जो आपके लिए अनसुना है यह साल 1947 का वक्त था युसूफ अपने अब्बा के डूबते कारोबार को नए सिरे से शुरू करना चाह रहे थे इसी सिलसिले में लाला गुलाम सरवर ने अपने बेटे यूसुफ को अपने पुराने दोस्त डॉक्टर मसानी के पास मशवरे के लिए भेजा डॉक्टर मसानी जानते थे कि यूसुफ की अंग्रेजी और उर्दू पर बड़ी मजबूत पकड़ है साथ ही लिटरेचर पर कि उनकी समझ कमाल की है सोनू ने यूसुफ को कविता रानी से मिलने की सलाह बजे डॉक्टर मसानी देविका रानी के फैमिली डॉक्टर थे ऐसे में यूसुफ को देविका रानी से मुलाकात में कोई दिक्कत पेश नहीं आनी थी।
फिर आया वह लम्हा भी जब हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े अदाकार की खोज बस पूरी होने वाली थी युसूफ देविका रानी से मिलने बॉम्बे टॉकीज पहुंचे इस मुलाकात के दौरान उन्होंने देविका रानी से अपने लिए बॉम्बे टॉकीज में बतौर राइट टाइम मांगा लेकिन देविका रानी उनमें कुछ और ही तलाश रही थी यूस उसका खूबसूरत चेहरा और बड़ा ही नफासत वाला अंदाज उनको बेहद पसंद आया और उन्होंने युसूफ खान को ₹1000 महीने की तनख्वाह पर अक्षर रख लिया यह एक बड़ी रकम थी इसलिए युसूफ इनकार नहीं कर सके लेकिन उनके मन में एक ही डर था कि अपने अब्बा को क्या कहेंगे जिन्हें इस फिल्म में बिल्कुल पसंद नहीं थी इसी बीच देविका रानी ने कहा कि उन्हें अपना नाम बदलकर कोई नया नाम रखना होगा फ्लैग में काम सुझाए गए।
लेकिन बात बनी एक नाम पर दिलीप कुमार युसूफ दिलीप बन चुके थे जो भी हो उन्हें बड़ी तसल्ली हुई कि इससे उनके अब्बा को उनके फिल्मों में काम करने की बात मालूम नहीं पड़ेगी घर पर उन्होंने अपने बॉस से कहा कि उन्हें गैलेक्सो कंपनी में नौकरी मिल गई है बस क्या था लाला साहब बेहद खुश हुए और कहा कि गैलेक्सो कंपनी के बिस्किट रोज घर आ जाने चाहिए अब अपने इसी झूठ में दिलीप बुरे फंसे थे लेकिन उन्होंने फिर एक तरकीब खोज निकाल अपने एक दोस्त से कहा कि उसे जहां कहीं भी गैलेक्सो बिस्किट मिले पार्सल बनाकर उन तक पहुंचा दिया करें वह गैलेक्सो बिस्किट लेकर अपने घर पहुंचते और सभी खुश हो जाते दिलीप का यह खेल बड़ी मस्ती से चल रहा था कि एक रोज उनका सारा भांडा फूट गया और यह भंडा फोड़ने वाला कोई और नहीं द ग्रेट पृथ्वीराज कपूर के पिता दीवान बशेश्वरनाथ अ कि दिलीप साहब के अब बशेश्वरनाथ को कंजर कहकर चिढ़ाया करते थे क्योंकि उनके बेटे पृथ्वीराज फिल्मों में काम करते थे व आपको कहीं से फिल्म ज्वार भाटा का पोस्टर मिल गया और वह यह पोस्टर लेकर लालासर के पास पहुंच गए अपने बेटे की असलियत जानकर लालाजी बेहद गुस्सा हुए उन्होंने कई दिनों तक उससे बात नहीं थी।
लेकिन बाद में उन्हें माफ कर दिया है थे प्रेसिडेंट किंग दिलीप कुमार पर्दे पर अपने किरदारों में और जिंदगी में अपनी मोहब्बत में प्रिटी के साथ जी रहे कामिनी कौशल से उनकी मोहब्बत परवान नहीं चढ़ पाए और मधुबाला के साथ उनकी यादाश्त कि मधुबाला के अब्बा की खिलाफत की भेंट चढ़ गए यह प्रेम कहानी अधूरी रहेगी लेकिन इसके चर्चे अखबारों की सुर्खियों से लेकर कोर्ट के कठघरे तक पहुंच गए दिलीप साहब की कहानी इस दास्तान के बिना अधूरी है अ कि दिलीप साहब और मधुबाला की मोहब्बत की दास्तान ही कुछ ऐसी है 40 के दशक में बला की खूबसूरत मधुबाला से पहली बार मुलाकात ज्वार-भाटा के सेट पर हुई थी।
लेकिन मारा जाता है कि दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी फिल्म हरसिंगार की शूटिंग के दौरान हालांकि यह फिल्म पूरी नहीं हो पाई लेकिन 1952 में फिल्म तराना के रिलीज होते होते दोनों की मोहब्बत के किस्से इस आम होते चले गए सुन तो बॉक्स ऑफिस पर औसत रही लेकिन मधुबाला और दिलीप कुमार की जोड़ी हिट हो गई हालांकि वह वक्त के मामले में दिलीप कुमार का तजुर्बा अब तक अच्छा नहीं रहा था मधुबाला से पहले दिलीप कुमार को तब की बेहद खूबसूरत हीरोइन सामी कौशल से मोहब्बत थी कामिनी कौशल शादी शुदा थी और इसी वजह से दिलीप साहब अपनी मोहब्बत को अंजाम नहीं दे सके कामिनी कौशल के पैर में चोट खाए दिलीप साहब को मधुबाला के साथ ही सुकून के पल मेरे कहते हैं कि 1951 में सुनहरा ना के सेट पर दिलीप कुमार को देखकर दीवानी हुई मधुबाला ने अपने हेयर ड्रेसर के हाथों प्यार का पैगाम उनके पास भेजा और उस पर लिखा था कि अगर आप मुझसे प्यार करते हैं।
तो यह गुलाब कुबूल कीजिए प्यार के नजराने का साथ मिला तो यह पैगाम दिलीप साहब के दिल में मधुबाला के लिए मोहब्बत के गुल खिला गया 1954 में रिलीज हुई फिल्म अमर तक तो दोनों कि वह अकबर के किस्से इसमें आप हो गए कि बात मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान तक पहुंच गई उन्हें यह कतई मंजूर नहीं था कि पर्दे पर जलवे बिखेरने वाली उनकी बेटी दिलीप कुमार के प्यार के चक्कर में पड़े अत्ताउल्लाह खान की मनाही के बावजूद मधुबाला को दिलीप साहब ने अपनी फिल्म इंसानियत के प्रीमियर पर बुलाया और फिर दिलीप कुमार मधुबाला का हाथ पकड़कर स्टेज तक ले गए और ज़माने को दिखा दिया कि उनकी जिंदगी में मधुबाला की अहमियत कितनी है हालांकि मधुबाला अपने पिता की खिलाफत नहीं कर पा रही थी ऐसे में दिलीप कुमार के दिल में बैठ गया कि मधुबाला उनसे उतनी मोहब्बत नहीं करती थी।
जितनी कि वह करते हैं दिलीप कुमार एक दिन सुविधा के की मलमल के सेट पर पहुंच गए और मधुबाला से कहा तुम घर चलो यहां ताजी हमारा इंतजार कर रहा है मैं तुमसे अभी निकाह करने को तैयार हूं इस पेशकश पर मधुबाला फूट-फूट कर रोने लगी लेकिन अपने पिता के खिलाफ वह फिर भी ना जा सकी सुन नया दौर में वैजयंती माला से पहले मधुबाला ही थी लेकिन अत्ताउल्लाह खान किसी भी कीमत पर मधुबाला को आउटडोर शूटिंग के लिए भेजने को राजी ही नहीं हुए मामला कोर्ट में पहुंचा तो दिलीप साहब ने गवाही दी जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया कि उन्होंने कहा मैं मधुबाला से मोहब्बत करता हूं और पूरी मृत करता रहूंगा मैं उनके खिलाफ इसलिए खड़ा हूं क्योंकि इंसाफ उनके साथ नहीं दिलीप कुमार के साथ mughal-e-azam एंड मधुबाला का झड़ना भी एक संयोग ही था क्योंकि तब तक दोनों के रिश्ते में खटास आ गई थी मुग़ल ए आज़म की शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच बातचीत तक नहीं थी इसके एक सीन में तो दिलीप कुमार ने मधुबाला को वाकई थप्पड़ जड़ दिया और वह बेहोश होकर गिर पड़ी।
दिलीप कुमार और मधुबाला के प्यार की कहानी भी मुगल-ए-आजम की तरह मायूस रह गई दोनों की राहें एक दूसरे से ऐसे जुदा हुई जो फिर कभी नहीं मिली प्यार में खाई से धोकर का दर्द असल जिंदगी में दिलीप साहब के दिल में कुछ यूं चुभा कि उसका असर उनकी अदाकारी पर हमेशा के लिए अपना असर छोड़ गया वो है और दिलीप साहब बन गए ट्रेजेडी किंग अप कि