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क्यों सगे बेटों ने मार कर आवारा कुत्तों के सामने फेंक दी निरूपा रॉय की ला!श ?वजह जानकर रूह कांप जाएगी।

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आज यह दास्तान और सच्ची कहानी हिंदी सिनेमा के गुजरे हुए जमाने की एक ऐसी बेहद मशहूर अदाकारा की जिसके दमदार अभिनय की वजह से इस अभिनेत्री को हिंदुस्तान के घर-घर में भगवान रूपी देवी समझकर पूजा जाता था। और लोग इस अभिनेत्री के एक आशीर्वाद को पाने के लिए लगाते थे इनके घर के बाहर एक लंबी लाइन।

हिंदी सिनेमा की एक ऐसी बेहद आकर्षित खूबसूरत और दिग्गज अभिनेत्री जिसकी फिल्म ने जीता था पहला हिंदी सिनेमा का पहला फिल्मफेयर अवार्ड। तो वहीं इस अदाकारा की फिल्म 50 के दशक में बनी थी सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्म। लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत भूल। लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि ये अदाकारा हिंदी सिनेमा की वो अभिनेत्री थी जिसके घर में फिल्म देखना किसी संगीन जुर्म से कम नहीं था लेकिन फिर भी इतनी निगरानी और सख्ती के बावजूद ये अदाकारा कैसे बन गई हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर अभिनेत्री तूने अपनी मां के माथे पर कैसे लिख दिया कि उसका बेटा एक चोर है दोस्तों ये नायिका हिंदी सिनेमा की एक ऐसी अभिनेत्री थी, जिसे कहा जाता था बॉलीवुड की मां।

लेकिन दोस्तों फिल्मी पर्दे पर बड़े-बड़े अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की मां के रूप में अभिनय करने वाली इस अदाकारा की असल जिंदगी में इनके सगे बेटे ने किया था ऐसा जुल्मो सितम कि यह अदाकारा दर-दर की ठोकरें खाते हुए मरते दम तक जलती रही नर्क की आग में। इससे तो अच्छा होता मुझे आ जाती। अब मैं यहां एक पल भी नहीं रहूंगी। एक पल भी नहीं रहूंगी। ये हीरोइन वो अभागगन और बदनसीब अदाकारा थी।

जिसे फिल्मों में काम करने की मिली ऐसी सजा कि मरते दम तक इनके पिता ने नहीं देखा इनका चेहरा। तुम्हारी इतनी किरत? अगर मैं बदला लेना चाहूं तो अपने एक इशारे से तुम्हें ख्वाब में मिला सकता हूं। क्यों इस अभिनेत्री के पिता ने अपनी ही सगी बेटी को दिया वो दुख जिससे यह अभिनेत्री अपनी जिंदगी से नहीं निकल पाई। सिर्फ दौलत ही तो नहीं देखी जाती। आदमी की शराफत, खानदान और उसकी तालीम तो देखी जाती है।

और फिर आपकी एक ही तो बच्ची है दोस्तों और क्या आपको पता है कि यह हिंदी सिनेमा की ऐसी लाचार बेबस और दुखियारी मां थी जिसे फिल्मों में तो खूब इज्जत मिली लेकिन असल जिंदगी में सगे बेटे और बहू ने इस अभिनेत्री का कर दिया था वो हार कि 70 साल की उम्र में मिली इन्हें जेल की सजा। हे भगवान ये तूने क्या किया? जिस औलाद ने हमें ठुकराया है।

आज उसी के द्वार पर पहुंचा दिया। तो वहीं बहू के अत्याचारों की आग ने जीते जी भेज दिया उस नर्क की आग में जहां जलकर तबाह हो गया था इस अभिनेत्री का सब कुछ। जिम्मेदार तो मैं हूं जो तुझ जैसे श्रवण कुमार को जन्म दिया। ना तू पैदा होता ना मुझे यह दिन देखना पड़ता। दोस्तों इस बदकिस्मत और लाचार अभिनेत्री ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी धन दौलत और शोहरत कमाने में और कैसे आगे चलकर इसी धन दौलत ने इस अभिनेत्री को फेंक दिया मौ के उस कूड़े में जहां इनकी लाश को खा गए थे आवारा कुत्ते।

। बताएंगे और भी बहुत कुछ। ऐसा हैरान कर देने वाला वो सच जिसे जानकर शर्मसार हो जाएगा एक मां और बेटे का रिश्ता। तो पूरा कड़वा सच जानने के लिए आप बने रहिए हमारे साथ इस वीडियो के अंतिम पल तक। ये तुम क्या कह रहे हो? मैं ठीक कह रहा हूं। कुस्ती तूने इंसान को नहीं एक सांप को जन्म दिया है। ऐसी औलाद से तो जानवर अच्छे हैं जो घास खाते हैं मगर दूध देते हैं। हमारी औलाद की तरह दूध पीकर जहर तो नहीं बनते।

आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसी अभिनेत्री की जिसने फिल्मी पर्दे पर देवानंद, अमिताभ बच्चन, शशि कपूर और जितेंद्र जैसे दिग्गज कलाकारों की मां का रोल निभाया। ऐसी अभिनेत्री जिसे देवी समझकर पूजा गया। लेकिन उनके अपने बेटे ने जायदाद के लिए इनकी जिंदगी को नर्क बना दिया। वो अभिनेत्री जो प्यार के मामले में बनकर रह गई बेहद बेबस और अभागगन बदकिस्मत और यह कोई और नहीं।

जी हां, हम बात कर रहे हैं दिग्गज अभिनेत्री और बॉलीवुड की मां निरूपा रॉय की। मेरा छोटा सा देखो ये संसार है मेरा छोटा कौन थी निरोपा रॉय कहां से आई थी और कैसे अपने पिता के विरोध के बावजूद वो बन गई थी फिल्मी दुनिया की ऐसी दिग्गज अदाकारा जिसकी वजह से उनका नाम बेहद अदब से लिया जाने लगा और किस बात पर उनके बेटे बहू ने उन्हें खूब टॉर्चर किया जानेंगे सब कुछ आइए लेकिन उससे पहले जानते हैं इनके शुरुआती जीवन और पढ़ाई लिखाई के बारे में। चाहे साथ हो चाहे दूर हो मेरे सपनों

जरा सामने तो आओ चले छुप छुप छल। निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के वलसाड़ में हुआ था। उनके पिता किशोर चंद्र चौहान बुलसारा रेलवे में कर्मचारी थे। फिल्मों में आने से पहले निरूपा का नाम कांता चौहान था। उनके माता-पिता उन्हें प्यार से छीबे कहकर बुलाते थे। निरूपा महज चौथी क्लास तक पढ़ी थी और 15 साल की उम्र में ही उनकी शादी सरकारी मुलाजिम कमल रॉय से कर दी गई थी। शादी के बाद कांता का नाम बदलकर कोकिला रख दिया गया।

1945 में कोकिला अपने पति के साथ मुंबई आ गई। एक रोज कोकिला अपने पति के साथ अखबार देख रही थी। तभी उन्हें एक ऐट नजर आया जिसने उनका ध्यान आकर्षित किया। खासकर उनके पति कमल रॉय का। दरअसल कमल रॉय को एक्टिंग करने का बहुत शौक था और वह राशन इंस्पेक्टर की नौकरी छोड़कर फिल्मों में किस्मत आजमाना चाहते थे। यही वजह है कि वह ऑडिशंस देते रहते थे। वह रोज अखबार पढ़ते थे। उसमें एक फिल्म के लिए अभिनेता और अभिनेत्री की जरूरत थी। जिसमें लिखा था कि गुजराती फिल्मों में नए सितारों की तलाश है। फिर क्या था?

ऐड पढ़ते ही कमल रॉय पहुंच गए ऑडिशन देने। कमल रॉय ने पूरे जोश के साथ ऑडिशन तो दिया लेकिन उनका सिलेक्शन नहीं हुआ। इत्तेफाक से कमल रॉय अपने साथ पत्नी कोकिला को भी लेकर गए थे। वहां मौजूद एक डायरेक्टर की नजर इन पर पड़ी और उन्होंने सुझाव दिया कि इनको भी ऑडिशन देना चाहिए। पति की रजामंदी पर कोकिला ने न सिर्फ ऑडिशन दिया बल्कि वह सेलेक्ट भी हो गई।

ऑडिशन में सेलेक्ट होने के बाद ही कोकिला ने अपना नाम बदलकर निरूपा रॉय रख लिया। साल 1946 में उनकी पहली फिल्म रिलीज हुई, जिसका नाम था रनक देवी, यह गुजराती भाषा में थी। इस गुजराती फिल्म के बाद इसी साल उनकी हिंदी फिल्म अमर राज भी रिलीज हुई, और फिर उनकी फिल्मी सफर का कारवा चल निकला। ढलती जाए रात, कह ले दिल की बात, शमा। निरूपा रॉय एक ऐसी अभिनेत्री थी जिन्हें दर्शकों से बहुत प्यार और सम्मान मिला। उनका नाम बेहद अदब के साथ लिया जाता था और इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि उन्होंने तकरीबन 16 फिल्मों में देवी का किरदार भी निभाया था।

अपनी शानदार एक्टिंग से उन्होंने लोगों के दिलों में जगह बना ली। 1940 और 1950 के दशक में निरूपा रॉय ने 40 धार्मिक फिल्में की जिसकी वजह से लोग उन्हें भगवान रूपी रूप और सम्मान की दृष्टि से देखते थे। 1951 में रिलीज हुई फिल्म हर हर महादेव में उन्होंने देवी पार्वती का किरदार इतनी गहराई से निभाया कि लोग उन्हें सच में देवी मानने लगे। रामायण में राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल की तरह निरूपा के घर के सामने भी लोगों की लंबी कतारें लगी रहती। यह वो लोग थे जो उनसे आशीर्वाद लेने आते थे। लोग इनकी फोटो छपवा कर अपने घरों में मंदिरों में लगाते और इनकी पूजा करते। निरूपा रॉय की फिल्मी गाड़ी भले ही तड़प दौड़ने लगी थी।

लेकिन फिल्मों में आने की वजह से उन्होंने बहुत दुख झेले। फिल्मों में अभिनय करने की वजह से ही इनके पिता ने इनसे सारे संबंध खत्म कर दिए और मिलना-जुलना तक छोड़ दिया। यहां तक कि उन्होंने कसम खा ली थी कि वो अब मरते दम तक अपनी बेटी का चेहरा नहीं देखेंगे, क्योंकि निरूपा के पिता फिल्मों को अच्छी नजर से नहीं देखते थे। वह फिल्मों के कलाकारों को घृणा की नजर से देखते थे। लेकिन शादी के बाद उनके पति फिल्मों में रुचि रखते थे। लिहाजा अपने पति का सपना पूरा करने के लिए निरूपा ने फिल्मों को चुन लिया था। तो ऐसे मुश्किल समय में निरूपा रॉय बेचारी दो नाव पर सवार थी। जिसमें से उन्हें किसी एक को चुनना था और उन्होंने अपने पति की सुनी।

लेकिन इस फैसले ने उन्हें अपने पिता से इतना दूर कर दिया कि असल में मरने के बाद तक उन्हें अपने पिता का चेहरा देखना नसीब नहीं हुआ और फिल्मों की वजह से निरूपा रॉय हमेशा अपने पिता और परिवार से बेदखल रही और इस वजह से निरूपा इस दुख को मरते समय तक अपने सीने में लेकर जीती रही। मगर लड़की के दिल का भी तो ख्याल रखना चाहिए। नहीं। हमारा फर्ज है कि उसे गलत रास्ते पर चलने से रोका जाए। नाज़ो नियामत में पली हुई फूल सी लड़की को उस ब्यावाहान में भेज दूं जहां भूख की रत के सिवा कुछ भी ना हो। भले ही निरूपा के फिल्मों में काम करने को लेकर खूब विरोध हुआ हो। लेकिन एक बार जब उन्होंने काम शुरू कर दिया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा।

निरूपा रॉय तीन फिल्मों में सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड जीतने वाली पहली एक्ट्रेस थी। यह अवार्ड उन्हें मुनीम जी छाया और शहनाई के लिए मिला था। या कह दे हम इंसान निरूपा रॉय इतनी जबरदस्त एक्टर थी कि वो जो भी किरदार निभाती वो दर्शकों के दिलो दिमाग में बस जाता। लेकिन दर्शकों ने उनके जिस अभिनय को सबसे ज्यादा सराहा और जिससे उनका खूब नाम हुआ वो था मां का रोल। मां फिर एक बार कहो। फिर एक बार मां कहो बेटे। आज 18 साल से यही सुनने के लिए मैं तरस रही थी। निरूपा रॉय को साल 1970 के बाद फिल्मों में मां का रोल मिलने लगा था और उन्होंने इतनी दमदार एक्टिंग की कि उन्हें सिनेमा की मां कहा जाने लगा। नहीं मां तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती। तुम मुझे बहुत चाहती हो मां मैं जानता हूं तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती।

निरूपा रॉय ने देवानंद, अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, धर्मेंद्र, मिथुन और जितेंद्र जैसे अभिनेताओं की मां का रोल निभाया, जिसे लोग आज भी याद करते हैं। निरूपा रॉय ने मां की भूमिका को निभाकर एक अलग अध्याय रच दिया था। वो एक वक्त तो पर्दे पर अमिताभ बच्चन की मां के रूप में ही जाने जाने लगी। दीवार, रोटी, अनजाना, गिरफ्तार, गंगा, जमुना, सरस्वती, खून पसीना, सुहाग, इंकलाब, मुकद्दर का सिकंदर और मर्द जैसी फिल्मों में मां का रोल निभाकर निरूपा को लोग असलियत में ही अमिताभ की मां समझने लगे थे।

[संगीत] खासकर 1975 में रिलीज हुई फिल्म दीवार निरूपा की खास फिल्मों में से एक है। यश चोपड़ा के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म में उन्होंने शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की मां का किरदार निभाया जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। कोई नहीं। वो आदमी जिसने तेरे हाथ पर लिख दिया कि तेरा बाप चोर है। वो तेरा कौन था? 90 के दशक में रिलीज हुई फिल्म लाल बादशाह में वो आखिरी बार अमिताभ बच्चन की मां के किरदार में नजर आई थी। ऐसा नहीं है कि निरूपा रॉय ने फिल्मी पर्दे पर सिर्फ मां का रोल ही निभाया था। भले ही दर्शकों का एक बड़ा वर्ग उन्हें मां के रूप में पसंद करता था। लेकिन उससे पहले निरूपा रॉय ने लीड रोल भी किए हैं। यहां तक उन्होंने कुछ बोल्ड सीनंस भी दिए हैं।

शुरुआती दिनों में निरूपा कई फिल्मों में लीड हीरोइन रही थी। साल 1953 में रिलीज हुई विमल रॉय की दो बीघा जमीन उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई। क्या जाने मन जैसे बार-बार कर उठता कि मैं फिर तुम्हें कभी नहीं देख सकती। वो तो मुझे भी रुला दे। त्रिलोक कपूर के साथ तो उन्होंने 18 फिल्में की थी। भारत भूषण, बलराज साहनी और अशोक कुमार के साथ भी निरूपा ने ढेर सारी फिल्में की थी। जिनमें वो मुख्य किरदारों में थी। हालांकि शुरुआती दिनों में निरूपा को एक रूढ़िवादी भारतीय महिलाओं के रोल दिए गए। जिसमें कभी वो अपने पति के जूते खोलते दिखती थी तो कभी गांव में घर का काम करते हुए नजर आती थी।

लेकिन इन सब का उनकी एक्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ा। आज के दौर में भी बिकनी, पूल और किसिंग सींस पर इतनी हाई तौबा होती है। लेकिन निरूपा ने उस वक्त भी ऐसे सीन बड़े स्वाभाविक तरीके से किए। बतौर लीड रोल तांगेवाली दो बीघा जमीन गुणसुंदरी रानी रूपमती और गरमक कोट उनकी यादगार फिल्में हैं। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि जिसे उन्होंने फिल्मों में दुखियारी मां या एक प्यारी सांस के रूप में देखा है। इस महिला ने सुपरमैन का किरदार भी निभाया था। उन्होंने साल 1960 में आई फिल्म सुपरमैन में सुपरमैन का किरदार निभाया था।

यह फिल्म भारत की पहली सुपर हीरो फिल्म थी और इसमें निरूपा रॉय ने एक सुपर हीरो के रूप में काम किया था जो उस समय एक असामान्य भूमिका थी। फिल्म में उन्होंने एक सुपर डॉग और सुपर घोड़े के साथ एक फैंटम जैसा मुखौटा पहना था। यह फिल्म मोहम्मद हुसैन और अनंत ठाकुर द्वारा निर्देशित थी और इसमें हेलन, नीता तिवारी और पैदी जयराज भी थे। हालांकि लीड रोल में दमदार एक्टिंग करने के बावजूद जब उन्होंने मां का रोल निभाया तो उनके यह सारे रोल भुला दिए गए। जो लोगों को याद रहा वो चेहरा रहा एक दुखियारी मां का। फिल्मों में सफेद फटी साड़ी बच्चे की वजह से परेशान और दर-दर भटकती एक मां को देखते ही लोग पहचान जाते थे कि यह निरूपा रॉय ही है।

लेकिन दोस्तों, यह कितनी बड़ी विडंबना या दुख भरी बात है कि जिस मां के रोल के लिए उन्हें पूरे देश से प्यार और सम्मान मिला और दैय रूप मिला। उन्हीं निरूपा रॉय को असल जिंदगी में उनके बेटों ने ऐसे ऐसे जुल्म ढाए जितने शायद हिंदी फिल्मों में भी किसी बेटे ने नहीं किए होंगे। अपने बेटों की वजह से निरूपा नरक की आग में जलती रही। निरूपा रॉय को फिल्मों की सबसे अच्छी सासू मां माना जाता है। उन्हीं निरूपा रॉय की असली बहू ने उनको इतने दुख दिए जितने शायद फिल्मों में किसी बहू ने भी अपनी सास को नहीं दिए होंगे। दरअसल निरूपा रॉय के दो बेटे थे।

योगेश और किरण हुआ यह कि साल 2001 में उनके छोटे बेटे किरण की पत्नी ऊना रॉय जो कि एनआरआई थी और ब्रिटिश एयरलाइन में काम करती थी। उनकी ऊना रॉय ने पंचकूला पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई अपनी सास निरूपा रॉय के खिलाफ। उनके मुताबिक निरूपा ने उनको दहेज के लिए मानसिक शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया और घर से निकाल दिया। यहां तक कि यह भी आरोप लगे निरूपा रॉय पर कि निरूपा रॉय और उनके पति कमल ने उनके बंद अकाउंट में काला धन भी मंगवाया था। इस शिकायत के बाद चारों तरफ हल्ला मच गया। मीडिया इस केस की धज्जियां उड़ाने लगी और इस सब में निरूपा रॉय के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट भी जारी हो गया।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि निरूपा रॉय को जेल हो गई थी और उनको कुछ वक्त जेल में काटना पड़ा था। तो वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स यह कहती है कि कोर्ट में पुलिस पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी जिसके तहत निरूपा रॉय के खिलाफ गिरफ्तारी का फैसला रद्द कर दिया गया था। निरूपा रॉय उम्र के उस पड़ाव पर थी जहां उनको जिंदगी का आराम मिलना चाहिए था। लेकिन निरूपा रॉय अपनी बहू की वजह से कोर्ट कचहरी और जेल की बदनामी की आग में झुलस रही थी। लेकिन यह तो शायद निरूपा की जिंदगी में अभी शुरुआत थी दुखों की और इन्हीं दुखों और दर्द से कमजोर हो चली निरूपा की जिंदगी ने वो झटका दे दिया जिससे हिंदी सिनेमा दुखों के सागर में डूब गया।

दरअसल 13 अक्टूबर 2004 को निरूपा रॉय के दिल ने काम करना बंद कर दिया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसकी वजह से निरूपा रॉय की दर्दनाक मौत हो गई और हमेशा के लिए इस दुनिया से वो अलविदा हो गई। जहां निरूपा रॉय की से बड़े-बड़े अभिनेता, अभिनेत्री, राजनेता दुखी थे। लेकिन इस परिवार में उनके बहू और बेटों में कोई दुख नहीं था। बल्कि निरूपा रॉय की मौत के बाद तो शुरू हुई इस घर में महाभारत छल और कपट की। भगवान भी पूछेंगे तो यही कहूंगी। तुम्हारी मां हूं। मैं तुम्हारी मां नहीं। दोनों बेटे योगेश और किरण अपनी मां निरूपा रॉय की धन दौलत और जमीन जायदाद के लिए एक दूसरे के सामने खड़े थे।

एक दूसरे को मारने के लिए। मैं तेरा खून मिलाऊंगा। [संगीत] निरूपा की के बाद उनके पति कमल सारी चीजों के मालिक हो गए थे। लेकिन कमल की मौत के बाद दोनों बेटों में इसके लिए लड़ाई होती चली आ रही है। दरअसल यह पूरा झगड़ा ₹1 लाख के एक बंगले का था। जिसे निरूपा रॉय ने साल 1963 में मुंबई के नेपियन सी रोड पर खरीदा था। जिसकी मौजूदा कीमत 100 करोड़ से ऊपर आंकी गई है और इसी बंगले के लिए योगेश और किरण एक दूसरे पर हमले करने लगे कोर्ट में। योगेश ने किरण पर यह इल्जाम लगाया कि उनका छोटा भाई किरण उनकी मां को तंग करता था।

तरह-तरह से परेशान करता था। बहुत ज्यादा टॉर्चर करता था मानसिक और शारीरिक तौर पर। योगेश के मुताबिक उनकी मां निरूपा रॉय पर दबाव डालने के लिए ही किरण ने अपनी पत्नी से उन पर झूठे, गंदे और गलीच आरोप लगवाए थे। इन सब से त्रस्त होकर इनकी मां ने सारी संपत्ति उनके नाम कर दी। इसके जवाब में किरण ने अदालत में यह दावा किया कि असल में उनके बड़े भाई योगेश उनकी मां निरूपा रॉय को बहुत ज्यादा मारते थे। बुरी तरह जानवरों की तरह घर के अंदर पीटते थे। तो वहीं उनकी पत्नी यानी योगेश की धर्मपत्नी भी अपनी सास निरूपा रॉय को बहुत ज्यादा सताती थी।

और इसी सब से परेशान होकर निरूपा रॉय ने अपनी सारी जायदाद उनके बेटे किरण के नाम कर दी। जब इन दोनों भाइयों की लड़ाई उस प्रॉपर्टी के लिए इतनी आगे बढ़ गई कि तब न्यूज़ नेटवर्क बॉलीवुड शादीज ने इस पूरे केस पर एक खुफिया स्टोरी की जिसमें पता चला कि निरोपा रॉय के दोनों बेटे अपनी मां को बहुत ज्यादा दुख देते थे। उनके ऊपर तरह-तरह के जुल्म उठाते थे। यह जुल्म इतने ज्यादा होते चले गए थे कि इन दोनों बेटों के कारण ही निरूपा रॉय की हो गई थी और यह दोनों बेटे ही अपनी मां निरूपा रॉय के कातिल हैं। निरूपा रॉय की मौत से जहां सब दुखी थे और पूरा देश हैरान था। निरूपा रॉय के जाने के बाद उनके बेटों के बीच प्रॉपर्टी को लेकर हो रहे तांडव से।

कोर्ट में चल रहे इस मुकदमे में जब तक कोई फैसला नहीं आ पाया तब तक अदालत ने निरूपा रॉय के इस 100 करोड़ के बंगले को दोनों भाइयों में आधा-आधा बांट दिया। लोगों को लगा कि चलो अब दोनों भाइयों की लड़ाई बंद हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन दोनों बेटों में लड़ाई फिर शुरू हुई निरूपा रॉय के एक खास कमरे को लेकर और यह दोनों भाई अपनी मां की जायदाद के लिए अदालत में एक दूसरे को बेइज्जत कर रहे थे और अपनी मां के नाम को बदनाम कर रहे थे। सालों पहले शुरू हुई इस मुकदमे को आज भी कोर्ट में देखा जा रहा है और यह लड़ाई आज भी बदस्तूर जारी है। दोनों भाई आज भी अदालत के चक्कर काट रहे हैं। निरूपा रॉय के यह दोनों जालिम कलयुगी बेटे हैं और अपनी मां को ही यह खा गए और मां के मरने के बाद कुत्तों की तरह उनकी जायदाद के लिए एक दूसरे से लड़ रहे हैं और एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।

दोस्तों निरूपा रॉय की अपने आप में एक सवाल है। निरूपा रॉय की मौत तो हुई यह हम सब जानते हैं लेकिन उनके अंतिम संस्कार को लेकर आज तक कहीं कोई खबर नहीं है ना कहीं भी कोई जिक्र हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बताया जाता है कि निरूपा रॉय की मौत के जिम्मेदार या कातिल उनके बेटे हैं।

दोनों बेटों ने निरूपा रॉय के ऊपर इतना जुल्म और सितम किया था कि उनकी मौत हो गई थी और उनके मरने के बाद उनकी लाश को एक बोरे में बांधकर मुंबई के ही एक कचरा मैदान में जाकर फेंक आए थे। उस कूड़े से भरे मैदान में बहुत सारे आवारा कुत्ते थे जो निरूपा रॉय के शरीर को बोरे से बाहर निकालकर खा गए। जी हां, यह बड़ी हैरान और दिल दहला देने वाली बात है कि उनकी का यह दर्दनाक अंजाम हुआ।

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