दिसंबर 10,900 98 दिल्ली के पास गुरुग्राम के एक बड़े उद्योगपति की आलीशान कोठी में घर की बहू गायब हो गई। अनन्या शर्मा उम्र 29 साल। सिर्फ 3 साल पहले तक वह भारत की सबसे मशहूर अभिनेत्रियों में से एक थी। एक बड़े कारोबारी घराने के वारिस से शादी करने के बाद उसने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी थी और लोग सोचते थे कि वह हर तरह की सुख सुविधाओं के साथ जी रही होगी। वही अनन्या अपने 2 साल के बेटे को छोड़कर एक रात अचानक गायब हो गई।
उसकी सास ने कहा कि बहू किसी गैर मर्द के साथ भाग गई है। पति ने अपनी पत्नी के बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। केस के इंचार्ज इंस्पेक्टर ने अमीर घराने की बात पर भरोसा किया। जांच की फाइल में एक लाइन लिखी और उसे बंद कर दिया। अनन्या की बड़ी बहन अपनी बहन की चिट्ठी को कैन यूप पुलिस से यूप पुलिस स्टेशन के गेट से ही वापस लौटना पड़ा। यह वह दौर था जब मोबाइल फोन और सीसीटीवी आम नहीं थे। उस अमीर घराने की ऊंची दीवारों के पीछे क्या हुआ? यह बाहर की दुनिया के लिए एक राज ही था। 10 साल तक कुछ नहीं हुआ। कम से कम ऊपर से तो ऐसा ही लग रहा था। लेकिन 2008 की पतझड़ में उस कोठी के बगीचे के बीचों बीच लगा संगमरमर का एक विशाल फव्वारा एक तरफ झुकने लगा।
मरम्मत के लिए जब उसकी नीम खोदी गई तो कंक्रीट के नीचे करीब 1 मीटर की गहराई पर एक मजदूर का फावड़ा किसी चीज से टकराया। फावड़े से जो चीज बाहर आई वह ना तो मिट्टी थी और ना ही पत्थर। 10 साल पहले गायब हुई औरत ठीक उसी के नीचे दफन थी। जिस बगीचे में उसका बेटा हर रोज खेलता था, उसी में वह दफन थी। आखिर उसे वहां किसने दफनाया था और किसने उसके ऊपर कई टन का संगमरमर का फवारा लगाकर 10 साल तक इस राज को पूरी तरह से छुपाए रखा। 14 अक्टूबर 2008 की दोपहर गुरुग्राम के सेक्टर 26 में सिंह टेक्सटाइल्स के संस्थापक ठाकुर महेंद्र सिंह की विशाल कोठी में पतझड़ की ढलती धूप के साथ बगीचे के बीचों बीच लगे विशाल संगमरमर के फव्वारे पर एक लंबी परछाई पड़ रही थी।
उद्योगपति का पोता 12 साल का रोहन सिंह फुटबॉल को अपने पैर पर उछालते हुए अचानक रुक गया। फव्वारे के दाई ओर की घास किसी के पैर के निशान की तरह धंस गई थी और फव्वारे का पानी संगमरमर के जोड़ों से रिसकर नीचे कीचड़ बना रहा था। रोहन ने फुटबॉल नीचे रखी और धंसी हुई घास की तरफ बढ़ा। उसके जूते का तला चिपचिपी मिट्टी में आधा धंस गया। पापा फव्वारे का फर्श धंस गया है। पानी भी लगातार बह रहा है। स्टडी रूम की खिड़की से विक्रम सिंह ने अपना सिर बाहर निकाला। उसने अपना चश्मा ठीक किया। बगीचे की ओर देखा और फिर बिना किसी खास दिलचस्पी के कहा रामलाल काका से कहो किसी मैकेनिक को बुलाकर ठीक करवा लेंगे।
रोहन ने सिर हिलाया और लॉन के कोने में बने सर्वेंट क्वार्टर की ओर दौड़ गया। घर का पुराना मैनेजर रामलाल स्टोर रूम से बाहर निकला। काका पापा कह रहे हैं कि फव्वारे की मरम्मत के लिए मैकेनिक को बुला लीजिए। पानी बहुत बह रहा है। फव्वारे से ठीक है। छोटे साहब मैं अभी किसी कंपनी से संपर्क करता हूं। रामलाल ने अपनी जेब से एक छोटी डायरी निकाली और नंबर ढूंढने लगा। उस घराने की मालकिन विक्रम सिंह की मां गायत्री देवी 10 दिन पहले से यूरोप की यात्रा पर थी और उनके पति ठाकुर महेंद्र सिंह 2006 में ही गुजर चुके थे। आमतौर पर गायत्री देवी ही बगीचे के सारे काम देखती थी। लेकिन उनकी गैर मौजूदगी में कोठी के सारे काम रामलाल की जिम्मेदारी थे।
रामलाल ने तुरंत चांद स्टोन वक्स को फोन किया। दो दिन बाद सुबह एक ट्रक कोठी के मेन गेट से अंदर आया। ट्रक में एक ड्रिल मशीन फावड़े और बाल्टियां रखी थी और तीन मजदूर अपनी यूनिफार्म में नीचे उतरे। मजदूरों का ठेकेदार चंदन अपने एक दस्ताने पहनते हुए फव्वारे के चारों ओर धीरे-धीरे एक चक्कर लगाने लगा। संगमरमर के बेस के नीचे पानी के रिसाव के काले धब्बे फैले हुए थे और फव्वारे की पूर्वी तरफ की जमीन साफ तौर पर झुकी हुई थी। अगर जमीन इतनी धंस गई है तो निम में ही कोई दिक्कत है। ऊपर से ही खोल कर देखना पड़ेगा। चंदन ने दो युवा मजदूरों को इशारा किया।
ड्रिल मशीन उतारो कंक्रीट तोड़कर अंदर घुसते हैं। जैसे ही ड्रिल मशीन ने कंक्रीट को काटना शुरू किया, एक तीखी आवाज पूरे बगीचे में गूंजने लगी। सफेद धूल का गुबार उठा और मजदूर फावड़े से कंक्रीट के टुकड़े और मिट्टी बारी-बारी से बाहर निकालने लगे।
जब गहराई करीब 2 मीटर तक पहुंची तो फावड़े से टकराने का एहसास बदल गया। वह कोई सख्त पत्थर नहीं था बल्कि कोई लचीली और नरम चीज फावड़े को पीछे धकेल रही थी। चंदन ने अपना हाथ ऊपर उठाया। रुको रुको नीचे। कुछ है। चंदन ने घुटनों के बल बैठकर हाथ से मिट्टी हटाई। एक काले रंग की प्लास्टिक की बड़ी चादर दिखाई दी। चंदन ने जब सावधानी से चादर का एक कोना उठाया तो एक बड़े रंग उड़े हुए प्लास्टिक के ड्रम का ढक्कन नजर आया। ड्रम की सतह पर एक लंबी दरार थी और उस दरार से एक सफेद चीज बाहर छौंक रही थी। चंदन का हाथ हवा में ही रुक गया। यह पास खड़ा एक मजदूर पीछे हटते हुए फावड़ा गिरा बैठा। उस्ताद वो वो हड्डी नहीं है क्या? चंदन धीरे-धीरे अपनी जगह से उठा। उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला लेकिन उसकी उंगलियां कांप रही थी और उसने दो बार गलत नंबर डायल कर दिया। हेलो क्या यह गुरुग्राम पुलिस स्टेशन है? मैं सेक्टर 26 से सिंह टेक्सटाइल्स के मालिक की कोठी से बोल रहा हूं। यहां फव्वारे की नीव की खुदाई करते हुए इंसान की हड्डी जैसी कोई चीज मिली है।
खबर मिलने के 40 मिनट बाद एक काले रंग की पुलिस की गाड़ी कोठी के सामने आकर रुकी। गुरुग्राम पुलिस की ब्रांच के इंस्पेक्टर अर्जुन चौधरी गाड़ी से उतरे। 37 साल के मजबूत कद, काठी और पैनी नजरों वाले शख्स थे। अर्जुन बगीचे में दाखिल हुए और चारों ओर नजर दौड़ाई। मजदूर फव्वारे से काफी दूर खड़े थे और खोदे हुए गड्ढे में एक काला प्लास्टिक का ड्रम आधा दिख रहा था। अर्जुन गड्ढे के पास उकड़ू बैठे और टॉर्च जलाई। रोशनी जब ड्रम की दरार पर पड़ी तो सफेद चीज का आकार और साफ हो गया। वह इंसान की हड्डी थी।
उसके बगल में 10,990 के दशक की स्टाइल की एक महिलाओं की चमड़े की सैंडल पड़ी थी और एक बुरी तरह से खराब हो चुका धातु का ब्रेसलेट सैंडल के पास चिपका हुआ था। अर्जुन ने उठते हुए मजदूरों की ओर देखा। कोई भी इसे हाथ नहीं लगाएगा। अब से यह पूरा बगीचा एक क्राइम सीन है। उसने अपना वॉकी टॉकी उठाया। कंट्रोल यह गुरुग्राम सेक्टर 26 सिंह कोठी है। बगीचे में फव्वारे की नींव से मानव कंकाल होने का संदेह है। सीएफएल की फॉरेंसिक टीम को तुरंत भेजो। सीएफएल की टीम पहुंची और पूरे ड्रम को अपने साथ ले गई। अंदर से लगभग पूरी तरह से सुरक्षित एक कंकाल बरामद हुआ और उन्होंने ड्रम की सीलिंग और कंक्रीट के जमने की स्थिति की जांच की। टीम के लीडर ने अर्जुन के पास आकर कहा, जिस तरह से इसे सील किया गया है उसे देखते हुए इसे दफनाए हुए कम से कम 8 से 12 साल हो गए होंगे। अर्जुन ने सिर हिलाया और अपनी डायरी में कुछ नोट किया। जब उसने कोठी के इतिहास की जांच शुरू की तो एक बात खटकी। यह फवारा साल 2000 में सास गायत्री देवी के कहने पर लगाया गया था और उससे 2 साल पहले दिसंबर 1098 में इसी कोठी से बहू अनन्या शर्मा के लापता होने का एक अनसुलझा मामला दर्ज हुआ था।
उस समय वह 29 साल की एक पूर्व मशहूर अभिनेत्री थी। अर्जुन गुरुग्राम पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड रूम में गया। टिमाटिमाती ट्यूबलाइटों वाले एक तंग गलियारे से गुजर कर वह धूल भरी लोहे की अलमारियों के सामने खड़ा हुआ। उसने 10998 लिखी हुई एक फाइल निकाली। कवर पलटते ही उसने देखा कि अंदर कुछ ही पन्ने थे। एक जांच रिपोर्ट के हिसाब से यह बहुत कम था। उस समय के इंचार्ज इंस्पेक्टर रतन लाल की रिपोर्ट के निष्कर्ष कॉलम में सिर्फ एक लाइन लिखी थी। घरेलू झगड़े के बाद घर छोड़कर जाने का अनुमान जांच का कोई लाभ नहीं। अर्जुन ने धीरे-धीरे फाइल बंद की और एक पल के लिए अपनी आंखें मूंद ली।
सीएफएसएल ने कंकाल के दांतों का मिलान 10,998 में अनन्या शर्मा के डेंटिस्ट के रिकॉर्ड से किया। 48 घंटे से भी कम समय में नतीजा आ गया। कंकाल अनन्या शर्मा का ही था। उस शाम हर टीवी चैनल पर एक ही हेडलाइन थी। 10 साल पहले गायब हुई मशहूर अभिनेत्री का कंकाल ससुराल के फव्वारे के नीचे मिला। सिंह टेक्सटाइल्स के शेयर बाजार में गोता खा गए और फिल्म इंडस्ट्री से लेकर बिजनेस की दुनिया तक में हलचल मच गई। विक्रम सिंह अपनी स्टडी में टीवी के सामने बैठा। था। स्क्रीन पर जब उसकी पत्नी की जवानी की तस्वीर आई, तो उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। उसकी पीठ झुक गई और वह काफी देर तक बिना हिले डुले बैठा रहा। उसी समय रोहन स्कूल से घर लौटा। मेन गेट के पास कई अनजान जूते, चप्पलें रखी थी और बगीचे की तरफ पीली पुलिस टेप लगी हुई थी।
रोहन ने अपने बैग का पट्टा कसकर पकड़ा और रुक गया। काका यह सब क्या है? क्या हुआ है? रामलाल ने रोहन के कंधे पर हाथ रखा और उसे चुपचाप अंदर ले गया। छोटे साहब आप अभी अपने कमरे में जाइए। सब ठीक है। रोहन ने मुड़कर एक बार और बगीचे की तरफ देखा। जहां फवारा था, वहां अब एक नीला तंबू लगा हुआ था और सफेद दस्ताने पहने लोग तेजी से काम कर रहे थे। रोहन अभी तक यह नहीं जानता था कि कुछ दिन पहले उसने जो दरार देखी थी, जहां से पानी रिस रहा था, वही इस सब की शुरुआत थी। 16 अक्टूबर 28 की सुबह इंस्पेक्टर अर्जुन चौधरी नोएडा के एक रिहााइशी इलाके की गली में चल रहा था।
पुरानी दीवारों के बीच एक छोटा सा गेट दिखा और घंटी बजाने के काफी देर बाद अंदर से कोई आहट आई। दरवाजा खुला और सफेद बालों को पीछे किए हुए एक बुजुर्ग आदमी सामने आया। रतन लाल 10,98 में अनन्या शर्मा के लापता होने के मामले का इंचार्ज इंस्पेक्टर अब 70 साल का हो चुका था। रिटायर हुए काफी समय हो गया था और चेहरे पर गहरी झुर्रियां थी। अर्जुन ने अपना पुलिस आईडी कार्ड दिखाया। गुरुग्राम पुलिस क्राइम ब्रांच से इंस्पेक्टर अर्जुन चौधरी मैं 10,900 98 के अनन्या शर्मा लापता मामले के बारे में कुछ पूछने आया हूं।
रतन लाल ने आईडी कार्ड पर एक नजर डाली और फिर दरवाजे के सहारे टिक गया। अब उस केस का क्या काम पड़ गया? फव्वारे के नीचे से एक कंकाल मिला है। पुष्टि हो गई है कि वह अनन्या शर्मा का ही है। रतन लाल की पलकें एक बार झपकी। उसने अपने होठ बंद किए और कुछ देर गली के आखिर तक देखा। फिर सिर हिलाया। उस घर का मामला बहू के भाग जाने पर खत्म हो गया था। मेरे पास और कुछ कहने को नहीं है। सर आपने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ एक लाइन लिखकर केस बंद कर दिया था। घर छोड़कर जाने का अनुमान जांच का कोई लाभ नहीं। एक 29 साल की औरत अपने 2 साल के बच्चे को छोड़कर गायब हो गई और आपके लिए बस एक लाइन काफी थी।
रतन लाल ने दरवाजे को कसकर पकड़ा। तुम उस समय के हालात नहीं जानते। मैं कुछ नहीं कर सकता था। मैं वही उस समय के हालात जानने ही आया हूं। रतन लाल चुप तो है परकर मेले। हो गया। उसने नजरें चुराते हुए दरवाजा बंद कर लिया और कुंडी लगने की आवाज गली में गूंज उठी। अर्जुन कुछ देर बंद दरवाजे को देखता रहा। फिर अपनी डायरी निकालकर कुछ लिखा। वापस गाड़ी में आते हुए अर्जुन ने 10,998 के रिकॉर्ड फिर से खंगाले। अनन्या शर्मा के गायब होने से 1 महीने पहले नवंबर 10,998 में उसके क्रेडिट कार्ड रिकॉर्ड में दिल्ली के कनोट प्लेस में सक्सेना एंड एसोसिएट्स लॉ फर्म में तीन बार जाने का जिक्र के प्रॉस्ट अपसेट डायरेक्ट कार्ड रिकॉर्ड में था अर्जुन सीधा दिल्ली के लिए निकल पड़ा। सक्सेना एंड एसोसिएट्स लॉ फर्म कनॉट प्लेस की एक ऑफिस बिल्डिंग की सातवीं मंजिल पर थी। रिसेप्शन से गुजर कर जब उसे अंदर के ऑफिस में ले जाया गया तो एक 54 साल की महिला वकील अपनी कुर्सी से उठी।
मीरा देसाई उस समय अनन्या शर्मा के तलाक के मामले को देख रही थी। आप अनन्या शर्मा के मामले में आए हैं। मैंने खबर देखी थी। मुझे लगा ही था कि मुझसे संपर्क किया जाएगा। अर्जुन ने सामने की कुर्सी पर बैठते हुए पूछा। क्या यह सच है कि अनन्या शर्मा नवंबर 10,98 में आपके पास आई थी? हां सच है। वह तीन बार आई थी। मीरा देसाई ने अपना चश्मा उतारते हुए मेज से एक फाइल निकाली। वह तलाक और अपने बेटे की कस्टडी के लिए तैयारी कर रही थी।
अपने पति विक्रम सिंह की संपत्ति का ब्यौरा भी निकलवा रही थी और पति के विवाहतर संबंधों के सबूत भी अलग से इकट्ठा कर रही थी। विवाहतर संबंधों के सबूत मतलब होटल में आने, जाने के रिकॉर्ड या किसी गवाह के बयान जैसी चीजें अनन्या जी खुद लेकर आई थी। वह ठान चुकी थी कि अगर बेटे को लेकर निकलना है तो कोई ठोस सबूत होना चाहिए।
अर्जुन ने अपनी डायरी में लिखते हुए सिर एक सबूत होना हिलाया। दिल्ली से गुरुग्राम लौटते समय अर्जुन ने अपना अगला ठिकाना तय कर लिया था। 10,900 98 में सिंह कोठी की नौकरानी कमलाबाई अब 57 साल की हो चुकी कमलाबाई गुरुग्राम शहर के एक छोटे से फ्लैट में रहती थी। दरवाजा खोलने के बाद कमलाबाई ने पुलिस का आईडी कार्ड देखा और उसकी आंखें बड़ी हो गई। आप अनन्या मैडम के मामले में आए हैं। हैना मैंने खबर में देखा था। फवारे के नीचे से मिली है। हैना अर्जुन ने सिर हिलाया और लिविंग रूम में दाखिल हुआ।
आपको 4 दिसंबर 10,998 की रात के बारे में कुछ याद है? कमलाबाई सोफे के किनारे पर बैठी और अपने दोनों हाथ घुटनों पर रख लिए। उसकी उंगलियां हल्की-हल्की कांप रही थी। उस शाम मेन बंगले से बड़ी मालकिन और छोटी मालकिन की आवाजें आ रही थी। वैसे तो उनमें बनती नहीं थी, लेकिन उस दिन बात कुछ और थी। वह सिर्फ बहस नहीं थी चीखने चिल्लाने जैसा था। क्या आपने सुना कि वे क्या कह रही थी? दीवारें मोटी थी इसलिए ठीक से तो नहीं सुन पाई लेकिन यह पक्का था कि बड़ी मालकिन चिल्ला रही थी। छोटी मालकिन की भी आवाज आ रही थी। करीब एक घंटे तक ऐसा ही चलता रहा। कमलाबाई ने सिर झुकाकर अपनी बात जारी रखी। अगली सुबह बड़ी मालकिन ने मुझसे कहा कि बहू अपना सामान पैक करके चली गई है।
उन्होंने कहा कि वह इस घर में आने के लायक ही नहीं थी। क्या आपने उनकी बात पर यकीन कर लिया? उस समय तो कर लिया। जब बड़ी मालकिन ने ऐसा कहा तो मैंने सोचा कि ऐसा ही होगा। कमलाबाई एक पल के लिए रुकी। उसने खिड़की से बाहर देखते हुए अपने होंठ भी और फिर धीरे से बोली। लेकिन एक बात हमेशा मेरे दिल में खटकती रही। छोटी मालकिन अपने बेटे रोहन से बहुत प्यार करती थी। वह अपने 2 साल के बच्चे को छोड़कर जाने वाली नहीं थी। यह बात मुझे 10 साल से अजीब लग रही थी। अर्जुन ने अपनी डायरी बंद की और उठ खड़ा हुआ। 10,998 में गायत्री देवी ने पुलिस को बताया था कि उसकी बहू एक गैर मर्द के साथ घर छोड़कर चली गई है।
पति विक्रम सिंह ने भी यही कहा था। उसने कहा था कि पत्नी से उसके रिश्ते पहले ही खराब हो चुके हैं। इसलिए उसे ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। इंचार्ज इंस्पेक्टर रतन लाल ने उनकी बात को जस का तस मान लिया और जांच वहीं रुक गई। अर्जुन ने रतन लाल के सर्विस रिकॉर्ड को फिर से निकाला। 10,999 की शुरुआत में रिटायरमेंट से कुछ साल पहले ही उसने वीआरएस ले लिया था। अर्जुन की नजरें उस अनसो जांच वहीं रुका में तारीख पर काफी देर तक टिकी रही।
उसी समय यूरोप में गायत्री देवी तक फव्वारे में कंकाल मिलने की खबर पहुंच गई। विक्रम के फोन पर गायत्री देवी की आवाज रिसीवर के पार से तेज हो गई। यह क्या बकवास है? वह फव्वारा तो तुम्हारे दिवंगत पिताजी की याद में बनवाया था। फालतू की अफवाहें मत फैलाओ और फौरन इस मामले को खत्म करो। विक्रम ने रिसीवर नीचे रखते हुए कुछ नहीं कहा। अर्जुन ने 10,998 की गुमशुदगी की रिपोर्ट फिर से खोली। उसमें एक चीज गायब थी। अनन्या के मायके वालों का कोई भी बयान उसमें शामिल नहीं था। सिर्फ पति और सास के बयान थे और मायके वालों से संपर्क करने का कोई सबूत तक नहीं था। अर्जुन ने अनन्या के परिवार के रिकॉर्ड की जांच की और उसकी बड़ी बहन सुनीता वर्मा का पता निकाला। वह नोएडा में रहती थी।
अगले दिन दोपहर अर्जुन नोएडा के एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स के सामने खड़ा था। घंटी बजाने पर दरवाजा खुला और 43 साल की एक महिला बाहर आई। सुनीता वर्मा के नैन नक्श अपनी बहन से मिलते जुलते थे और उसके होठों के किनारे गहरी लकीरें थी। अर्जुन ने अपना आईडी कार्ड दिखाते हुए कुछ कहने से पहले ही सुनीता ने खुद कहा आप अनन्या के मामले में आए हैं। है ना जी? मुझे कुछ बातें पूछनी थी। लिविंग रूम की मेज पर आमने सामने बैठने के बाद सुनीता ने चाय का कप रखते हुए बोलना शुरू किया। 10 साल पहले मेरी बहन के गायब होने के तुरंत बाद मैं उनकी ससुराल गई थी। क्या आप जानते हैं गायत्री देवी ने मुझसे क्या कहा? तुम्हारी बहन एक आदमी के साथ जापान भाग गई है। इसीलिए उसे ढूंढने की कोशिश मत करना। सुनीता के हाथ चाय के कप को कसकर पकड़े हुए थे। उसकी कलाई की नसें तन गई थी। जापान अनन्या के पास तो पासपोर्ट भी नहीं था। वह कहां चली जाएगी?
यह बात बिल्कुल बेतुकी थी। इसलिए मैं पुलिस स्टेशन गई। अपनी बहन से मिली एक चिट्ठी लेकर। आप चिट्ठी लेकर गई थी। हां, रतन लाल नाम के एक इंस्पेक्टर को दिखाई थी। जानते हैं उसने चिट्ठी पर एक नजर डालने के बाद क्या कहा? सुनीता ने कब से हाथ हटाया और सीधे अर्जुन की ओर देखा। यह तो पति पत्नी के झगड़े का रोना धोना है। इससे कुछ नहीं होगा। बस इतना कहकर उसने मुझे वापस भेज दिया। सुनीता अपनी जगह से उठी और बेडरूम में चली गई। थोड़ी देर बाद वह एक पुराना लिफाफा लेकर लौटी। लिफाफे के कोने पीले पड़ चुके थे और उस पर कई बार मोड़ने के निशान थे। यह 10 साल तक बार निकालने और बेडरूम में चली गई। मोड़ने का सबूत था। सुनीता ने लिफाफे से चिट्ठी निकालकर मेज पर रख दी। यह नवंबर 10,98 में अनन्या की भेजी हुई आखिरी चिट्ठी है। मैं इसे 10 साल तक फेंक नहीं पाई। अर्जुन ने दस्ताने पहनकर सावधानी से चिट्ठी खोली। पतले और कांपते हुए अक्षरों में बहुत कुछ लिखा हुआ था।
दीदी, मैं यहां से निकलना चाहती हूं। रोहन को लेकर एक नई शुरुआत करना चाहती हूं। लेकिन मुझे नहीं पता कि यह घर मुझे जाने देगा या नहीं। अर्जुन की नजर आखिरी लाइन पर आकर रुक गई। उसने चिट्ठी नीचे रखी और सुनीता की ओर देखा। सुनीता की आंखें लाल हो रही थी। उसने अपने होंठ भी और काफी देर तक खुद को रोके रखा। फिर दबी हुई आवाज में बोली। उस वक्त अगर उस इंस्पेक्टर ने यह चिट्ठी ठीक से पढ़ ली होती तो शायद मेरी बहन मिल जाती। 10 साल 10 साल तक मैं अकेले इस बोझ के साथ जीती रही। अर्जुन ने चिट्ठी को सबूत के लिफाफे में डालते हुए सिर झुकाया। मैं इस चिट्ठी को जांच के लिए ले जा रहा हूं। मैं वादा करता हूं कि इस मामले को अंत तक पहुंचाऊंगा। सुनीता ने अपना मुंह खिड़की की ओर फेर लिया। वह बिना कुछ कहे काफी देर तक बैठी रही।
22 अक्टूबर 2008 को सीएफए सेल की टीम की रिपोर्ट गुरुग्राम पुलिस की ब्रांच में पहुंची। इंस्पेक्टर अर्जुन चौधरी ने लिफाफा फाड़ा और रिपोर्ट खोली। की के पिछले हिस्से में किसी भारी गोल चीज से मारने के साफ निशान थे। हड्डी अंदर की तरफ धंस गई थी और यह किसी सामान्य गिरने या दुर्घटना से नहीं हो सकता था।
अर्जुन ने रिपोर्ट मेज पर रखते हुए अपनी टीम के कांस्टेबल प्रवीण कुमार को बुलाया। मौत का कारण पता चल गया है। सिर के पीछे किसी भारी गोल चीज से मारा गया है। यह गुमशुदगी नहीं बल्कि हत्या थी। प्रवीण ने रिपोर्ट देखते हुए हंठ भी तो अब जांच की दिशा पूरी तरह बदल जाएगी सर। हां, अब हमें संदिग्धों का दायरा छोटा करना होगा। अर्जुन वाइट बोर्ड के सामने खड़ा हुआ। उसने मार्कर उठाकर तीन नाम लिखे। पहला गायत्री देवी सास 10,998 में 55 साल की आखिरी रात की तीखी बहस में शामिल दूसरा विक्रम सिंह पति उस समय 30 साल का पत्नी के लापता होने पर उदासीन रहने का कारण साफ नहीं। तीसरा दिवंगत ठाकुर महेंद्र सिंह ससुर उस समय 60 साल के परिवार की इज्जत के नाम पर बहू पर अत्याचार करने के कई लोगों के बयान।
अर्जुन ने मार्कर का ढक्कन बंद करते हुए कहा, इन तीन लोगों में ही जवाब है। विक्रम सिंह को पहले बुलाओ। विक्रम सिंह उसी हफ्ते शुक्रवार को एक गवाह के तौर पर गुरुग्राम पुलिस स्टेशन आया। उसने अपने सूट का बटन खोला हुआ था और पूछताछ कक्ष की कुर्सी पर बैठा था। उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। अर्जुन ने सामने बैठकर रिकॉर्डर चालू किया। 4 दिसंबर 10,998 की शाम। आप कहां थे? मैं दिल्ली में एक बिजनेस ट्रिप पर था। आप कहां रुके थे? विक्रम ने अपनी नजरें मेज पर टिका दी। यह 10 साल पुरानी बात है। मुझे ठीक से याद नहीं। आपके साथ कोई था याद नहीं? अर्जुन विक्रम के चेहरे को चुपचाप देखता रहा। विक्रम की उंगलियां मेज पर बेचैनी से चल रही थी। ।
आपको याद नहीं है आपकी पत्नी के गायब होने की रात थी। विक्रम ने सिर नहीं उठाया। उस समय मुझे लगा था कि मेरी पत्नी घर छोड़कर चली गई है। इसलिए उस दिन को खासतौर पर याद रखने का कोई कारण नहीं था। अर्जुन ने और कुछ नहीं पूछा और रिकॉर्डर बंद कर दिया। पूछताछ कक्ष से बाहर आने के बाद अर्जुन ने प्रवीण को सिर हिलाया। उसकी स्टडी से जो ब्रीफ केस लाए थे, उसकी तलाशी ही लीजिए सर। लेकिन उसमें से एक चीज मिली है। प्रवीण ने सबूत के लिफाफे से एक कागज निकाला। एक पीला पड़ चुका कार्ड का बिल। 4 दिसंबर 10,998 ग्रैंड प्लाजा होटल कनोट प्लेस दिल्ली। अर्जुन ने बिल हाथ में लिया और तारीख देखी। जिस रात उसकी पत्नी गायब हुई, उसी रात वह दिल्ली के एक होटल में था और कहता है कि उसे याद नहीं। अर्जुन ने बिल वापस सबूत में रखते हुए कहा, “इस होटल के उस समय के किसी कर्मचारी को ढूंढो।” कोई भी जो रिसेप्शन पर काम करता हो। प्रवीण ने खोजबीन शुरू की और 3 दिन बाद उसे एक व्यक्ति मिल गया।
मीना 49 साल की 1098 में ग्रैंड प्लाजा होटल की रिसेप्शनिस्ट मीना गुरुग्राम पुलिस स्टेशन आई और पूछताछ कक्ष की कुर्सी पर बैठी क्या आपको विक्रम सिंह नाम का कोई व्यक्ति याद है? मीना ने छत की ओर देखकर याद करने की कोशिश की। विक्रम सिंह सिंह टेक्सटाइल्स वाले हां याद है। 10,998 के आखिरी महीनों में वह एक ही महिला के साथ कई बार आए थे। एक ही महिला के साथ हां मैंने उन्हें उस समय टीवी पर देखा था। कोई अभिनेत्री थी लेकिन नाम याद नहीं। जवान और खूबसूरत थी। अर्जुन ने अपनी डायरी में लिखते हुए पूछा। कितनी बार आए होंगे तीन? चार। बाहर तो आए ही होंगे। वे हमेशा एक ही फ्लोर पर एक ही कमरा लेते थे। इसलिए मुझे याद है पूछताछ कक्ष से बाहर आकर अर्जुन गलियारे की खिड़की के पास खड़ा हो गया। उसने सिगरेट निकाली लेकिन फिर वापस जेब में रख ली। यह साफ हो गया था कि विक्रम सिंह 10,998 के अंत से अपनी ही एजेंसी की एक अभिनेत्री रिया कपूर के साथ मिल रहा था। जिस रात उसकी पत्नी गायब हुई, वह भी होटल में था और पत्नी के लापता होने पर सवाल उठाने के बजाय उसने कहा कि उसे ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि पत्नी के गायब हो जाने से उसका काम आसान हो जाता।
अर्जुन ने मुड़कर वाइट बोर्ड पर एक नया नाम देखा। उसने विक्रम सिंह के नाम के आगे लिखा। अनैतिक संबंध मकसद मौजूद घटना स्थल पर अनुपस्थित उसकी नजरें तीसरे नाम पर गई। दिवंगत ठाकुर महेंद्र सिंह अर्जुन ने प्रवीण को बुलाया ससुर ठाकुर महेंद्र सिंह 4 दिसंबर 19998 को कहां थे यह बताने वाला कोई ना कोई जरूर होगा मैनेजर रामलाल रामलाल पुलिस स्टेशन आया और कुर्सी पर बैठकर अपने हाथ घुटनों पर रख लिए 4 दिसंबर 10998 उस दिन मालिक साहब कोठी पर ही थे रात के खाने के बाद वह अपनी स्टडी में आयुर्वेदिक काढ़ा पीकर जल्दी सोने चले चले गए थे। मतलब वह कोठी के अंदर ही थे। जी बिल्कुल। अर्जुन ने डायरी पलटते हुए पूछा, मालिक साहब का बहू अनन्या जी के प्रति कैसा रवैया था? रामलाल की नजरें एक पल के लिए फर्श पर गई। मालिक साहब छोटी मालकिन के फिल्मों में वापस जाने के सख्त खिलाफ थे।
वह इसे सिंह खानदान की इज्जत पर धब्बा कहते थे। एक बार तो उनकी बहुत बड़ी लड़ाई भी हुई थी। बहुत बड़ी लड़ाई का क्या मतलब है? रामलाल चुप हो गया। फिर धीमी आवाज में बोला, छोटी मालकिन को चोट लगी थी। अर्जुन और प्रवीण ने एक दूसरे को देखा। पूछताछ खत्म होने के बाद प्रवीण ने गुरुग्राम शहर के ऑर्थोपेडिक क्लनिकों में छानबीन शुरू कर दी। तीसरे क्लीनिक में 10,997 का एक मेडिकल रिकॉर्ड मिला। अनन्या शर्मा पसली में फ्रैक्चर के साथ आई थी। उसने खुद बताया था कि वह सीढ़ियों से गिर गई थी। लेकिन डॉक्टर के नोट में लिखा था बाहरी चोट के कारण होने की संभावना। प्रवीण रिकॉर्ड की कॉपी लेकर क्राइम ब्रांच में भागा। सर ससुर ठाकुर महेंद्र सिंह ने 10,997 में अनन्या जी को था।
इसका रिकॉर्ड मिला है। उनकी पसली टूट गई थी। अर्जुन ने रिकॉर्ड हाथ में लिया और काफी देर तक उसे देखता रहा। वह वाइट बोर्ड के पास गया और ठाकुर महेंद्र सिंह के नाम के आगे लिखा 10,97 में मारपीट का रिकॉर्ड। तीनों के पास मकसद था। गायत्री देवी आखिरी रात की बहस में शामिल थी। विक्रम सिंह के लिए पत्नी का गायब होना फायदेमंद था और ठाकुर महेंद्र सिंह का बहू पर हाथ उठाने का रिकॉर्ड था। अर्जुन ने मार्कर का ढक्कन बंद किया और कुर्सी पर बैठ गया।
उसने हाथ बांधकर काफी देर तक वाइट बोर्ड को देखा। फिर बोला हमें लोगों को नहीं चीजों को देखना होगा। प्रवीण ने हैरानी से पूछा चीजें सर फव्वारा आखिर फवारे के नीचे ही क्यों अगर यह गुत्थी सुलझ गई तो यह भी सुलझ जाएगा कि यह किसने किया? अर्जुन अपनी जगह से उठा और जांच फाइलों में से फव्वारे के निर्माण का रिकॉर्ड निकाला। साल 2000 चांद स्टोन वक्स इस कंपनी को ढूंढो और पता करो कि उस समय इस काम में कौन-कौन शामिल था। अर्जुन ने सुनीता से मिली चिट्ठी की एक कॉपी फिर से निकाली और मेज पर रखी। यह घर मुझे जाने देगा या नहीं? उसने अपनी नजरें उस वाक्य पर टिका दी और डायरी खोली। वकील मीरा देसाई द्वारा पुष्टि की गई तलाक की तैयारी नौकरानी कमलाबाई द्वारा बताई गई आखिरी रात की लड़ाई और यह चिट्ठी। अनन्या गायब होने से ठीक पहले तक इस घर से बाहर निकलने की पूरी कोशिश कर रही थी। और उसकी यह कोशिश किसी के लिए बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं थी। अर्जुन ने जांच डायरी खोली और पेन उठाया। इस केस का सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि किसने किया बल्कि यह है कि फव्वारे के नीचे ही क्यों?
उसने पेन नीचे रखा और खिड़की से बाहर देखा। सूरज ढल रहा था और क्राइम ब्रांच के दफ्तर में सिर्फ ट्यूबलाइट की रोशनी बाकी थी। 3 नवंबर 2008 की सुबह गुरुग्राम पुलिस की क्राइम ब्रांच का फोन बजा। कांस्टेबल प्रवीण ने रिसीवर उठाया। गुरुग्राम पुलिस क्राइम ब्रांच। सामने वाले की आवाज धीमी और खुरदरी। थे खांसी की आवाज भी आ रही थी। मैं वह आदमी हूं जिसने साल 2000 में सिंह कोठी का फव्वारा बनाया था। वह काम सामान्य नहीं था। प्रवीण ने हाथ से रिसीवर को ढकते हुए अर्जुन को इशारा किया। अर्जुन अपनी जगह से उठकर पास आया। आपका नाम क्या है? में फोन कट गया। प्रवीण ने तुरंत कॉलर आईडी से नंबर ट्रेस किया।
यह हरियाणा के सोनीपत का एक नर्सिंग होम था। अर्जुन और प्रवीण उसी दोपहर सोनीपत के लिए निकले। नर्सिंग होम की तीसरी मंजिल के गलियारे से गुजर कर जब उन्होंने कमरे का दरवाजा खोला तो एक आदमी खिड़की के पास वाले बिस्तर पर लेटा हुआ था। मंगल सिंह 60 साल का। उसका चेहरा पीला पड़ गया था और नाक में ऑक्सीजन की नली लगी हुई थी। फेफड़ों की हालत बहुत खराब थी और हर सांस के साथ उसका सीना जोर से ऊपर नीचे हो रहा था। अर्जुन बिस्तर के पास कुर्सी पर बैठा और अपना आईडी कार्ड दिखाया। क्या आज सुबह आपने ही हमारे पुलिस स्टेशन फोन किया था? मंगल सिंह ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया। उसकी आंखें लाल थी और हंठ सूखे हुए थे। हां, मैंने खबर में देखा था।
फव्वारे के नीचे से इंसान की हड्डी मिली है। वह देखकर मुझे लगा कि अब और चुप नहीं रहना चाहिए। अर्जुन ने डायरी निकालते हुए पूछा आपने साल 2000 में सिंह कोठी में फव्वारे का काम किया था। हां मैं चांद स्टोन वक्स के लिए काम करता था। मैंने फव्वारे की निम की खुदाई की थी। मंगल सिंह ने एक बार खांसा और ऑक्सीजन की नली ठीक की। आमतौर पर फवारे की निम 80 सेंटीमीटर ही खोदी जाती है। लेकिन गायत्री देवी खुद वहां आई थी। उन्होंने फव्वारे की जगह बगीचे के पीछे बने स्टोर रूम के ठीक ऊपर चुनी। स्टोर रूम हां एक तरह का तहखाना था। पहले वे लोग वहां अचार के मर्तबान और पुराना सामान रखते थे। जब हमने वहां की जमीन खोदी तो मंगल सिंह चुप हो गया और छत की ओर देखने लगा। उसने एक बार आंखें बंद की और फिर खोली। एक काले प्लास्टिक में लिपटा हुआ एक बड़ा सा ड्रम दफन था। अर्जुन का पेन रुक गया। आपने ड्रम देखा था। हां, देखा था। मुझे अजीब लगा। तो मैंने गायत्री देवी से पूछा कि यह क्या है?
मंगल सिंह ने अपने सूखे होंठ चबाते हुए आगे कहा। जानते हैं उस औरत ने क्या कहा? यह मेरे ससुर जी की निशानियां हैं जिन्हें टाइम कैप्सूल की तरह दफनाया है। इसे बिल्कुल मत खोलना और इसके ऊपर ही कंक्रीट डाल दो। अर्जुन ने सिर उठाकर मंगल सिंह की ओर देखा। आपने उनके आदेश का पालन किया। मंगल सिंह की नजरें चादर पर चली गई। उसने अपने हाथ पर लगी सुई के आसपास दूसरे हाथ की उंगलियों से सहलाया। हां किया। उस समय गायत्री देवी ने काम की मजदूरी का तीन गुना कैश पाद में दिया था। लिफाफा इतना मोटा था। मंगल सिंह ने अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच का फासला दिखाया और साथ में कहा कि इस काम के बारे में किसी से भी बात मत करना। मुझे कुछ गड़बड़ तो लगी। लेकिन उस समय मुझे पैसों की जरूरत थी और यह किसी दूसरे के घर का मामला था।
मंगल सिंह की बात अधूरी रह गई और उसने अपना मुंह फेर लिया। खिड़की से पतझड़ की ढलती धूप तिरछी होकर अंदर आ रही थी। मैं 8 साल तक यह सब भूलकर जीता रहा। लेकिन इस साल की शुरुआत में जब मैं यहां भर्ती हुआ तो खाली समय में मुझे बार-बार वही बात याद आने लगी। फिर मैंने वह खबर देखी। मंगल सिंह ने फिर से अर्जुन की ओर देखा। उसकी लाल आंखों में नमी आ गई थी। अगर मैंने उस वक्त खबर कर दी होती तो शायद ऐसा ना होता। मैं मरने से पहले यह बोझ उतारना चाहता था। अर्जुन ने डायरी बंद की और कुछ देर चुप रहा। उसने एक बार सिर झुकाया और फिर बोला, “आपकी वजह से हमें बहुत बड़ी मदद मिली है। हमें आपका आधिकारिक बयान दर्ज करना होगा। क्या आप ठीक रहेंगे? मंगल सिंह ने सिर हिला दिया। बयान दर्ज करने के बाद अस्पताल से बाहर आकर अर्जुन पार्किंग में रुक गया। प्रवीण उसके बगल में खड़ा इंतजार कर रहा था।
सर इसका मतलब तो यह है कि गायत्री देवी ने खुद लाश के ऊपर फवारा बनवाया था। यह सबूत के तौर पर अभी भी कमजोर है। गवाह सिर्फ एक है। हमें और कुछ चाहिए। अर्जुन ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा। फव्वारे की नीम के नीचे जो तहखाना था उसे फिर से खोलना होगा। गुरुग्राम वापस आकर पुलिस टीम सिंह कोठी की ओर गई। फव्वारे को पूरी भास खाता साधकर में डाले। तरह से हटाने के बाद पुराने तहखाने की संरचना की सीएफएसएल टीम ने फिर से जांच की। तहखाने में जाने का ढलान वाला रास्ता मेन बंगले के पिछले दरवाजे से सिर्फ 7 8 मीटर की दूरी पर था और यह जमीन से लगभग 30 डिग्री के कोण पर नीचे जाता था। तहखाने के फर्श से मिट्टी के नमूने लेकर उनकी विस्तृत जांच की गई। कुछ दिनों बाद सेल से रिपोर्ट आई। तहखाने की मिट्टी में मानव शरीर के गलने पर बनने वाले कुछ विशेष तत्व बहुत कम मात्रा में पाए गए थे। यह इस बात का सबूत था कि काफी समय तक एक प्लास्टिक के ड्रम में बंद करके यहां रखी गई थी। अर्जुन ब्रांच के वाइट बोर्ड के सामने खड़ा हुआ और घटनाओं का क्रम लिखा।
10,998 दिसंबर हत्या के तुरंत बाद गायत्री देवी ने लाश को ड्रम में बंद करके तहखाने में छुपा दिया। 10,999 ठाकुर महेंद्र सिंह बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए गायत्री देवी ने कोठी का पूरा नियंत्रण ले लिया। 2000 वसंत अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना के नाम पर बगीचे की सजावट का बहाना बनाकर तहखाने के ठीक ऊपर फव्वारा बनाने का आदेश दिया। तहखाने में रखा। ड्रम कंक्रीट के नीचे हमेशा के लिए दफन हो गया। अर्जुन ने मार्कर नीचे रखते हुए पीछे मुड़कर देखा। प्रवीण वाइट बोर्ड को देख रहा था। को कहीं और नहीं ले जाया गया। बल्कि जहां लाश थी उसी के ऊपर एक ढांचा बना दिया गया। हां। और ठाकुर महेंद्र सिंह की मौत के बाद हर साल उसी जगह पर उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती थी। परिवार दोस्त सब उस फव्वारे के सामने इकट्ठा होकर फूल चढ़ाते और सिर झुकाते। कौन सोचता कि उसके नीचे खुदाई करनी है? अर्जुन ने कुर्सी पर बैठकर हाथ बांध लिए। कामना और श्रद्धांजलि का नाम देकर उसने 10 साल तक किसी को शक नहीं होने दिया।
वह फव्वारा सिर्फ पत्थर का ढेर नहीं था बल्कि एक ढक्कन था। उसी समय विक्रम सिंह ने अपने वकील के माध्यम से एक बयान जारी किया। उसने कहा कि उसका अपनी पत्नी की मौत में कोई हाथ नहीं है और उसे अपनी मां की हरकतों के बारे में भी कुछ नहीं पता था। पुलिस टीम ने गायत्री देवी के यूरोप से लौटने की तारीख पता की। 12 नवंबर इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आगमन अर्जुन ने अपनी जांच डायरी खोली और पेन उठाया। एयरपोर्ट पर ही पकड़ेंगे।
12 नवंबर 2008 दोपहर 3:00 बजे इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा आगमन हॉल इंस्पेक्टर अर्जुन चौधरी एक खंभे से टिक कर खड़ा था। कांस्टेबल प्रवीण दूसरे खंभे के पीछे से आगमन सूचना बोर्ड को देख रहा था। पेरिस से एयर इंडिया की फ्लाइट 20 मिनट पहले उतर चुकी थी और इमीग्रेशन से गुजरकर यात्री एक-एक करके गेट से बाहर आ रहे थे। गायत्री देवी 3:28 पर दिखाई दी। 65 साल की करीने से बंधे सफेद बाल और काले रंग का कोट पहने हुए। ट्रॉली बैग खींचते हुए उसके कदमों में कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। अर्जुन खंभे से हटकर आगे बढ़ा। क्या आप श्रीमती गायत्री देवी हैं? मैं गुरुग्राम पुलिस ब्रांच से इंस्पेक्टर अर्जुन चौधरी हूं। आपको हमारे साथ चलना होगा। गायत्री देवी रुक गई और अर्जुन की ओर देखा।
उसकी आंखें सिकुड़ गई। मैंने ऐसा क्या किया है? मैं अपने वकील को बुलाऊंगी। यह एक अनुरोध है। हम आपको मजबूर नहीं कर रहे बल्कि सहयोग करने के लिए कह रहे हैं। गायत्री देवी ने ट्रॉली बैग का हैंडल कसकर पकड़ा। उसने चारों ओर देखा और हंठ भी लिए मैं पहले अपने वकील को बुलाऊंगी। गुरुग्राम पुलिस स्टेशन पूछताछ कक्ष। वकील के आने के बाद ही गायत्री देवी कुर्सी पर बैठी। उसकी पीठ सीधी थी और दोनों हाथ घुटनों पर रखे हुए थे। उसके बैठने का तरीका बिल्कुल सधा हुआ था। अर्जुन ने सामने बैठकर रिकॉर्डर चालू किया। फव्वारे की नीम से आपकी बहू अनन्या शर्मा का कंकाल मिला है।
यह फव्वारा साल 2000 में लगाया गया था। है ना गायत्री देवी ने बिना सिर हिलाए जवाब दिया। हां, वह मैंने अपने पति के लिए बनवाया था। उसका मेरी बहू के मामले से कोई लेना देना नहीं है। उसकी निंव एक सामान्य फव्वारे के हिसाब से काफी गहरी थी। अगर संगमरमर भारी हो तो निम गहरी ही होनी चाहिए है ना। कंपनी वालों ने ही ऐसा किया होगा। अर्जुन ने एक फाइल से मंगल सिंह के बयान की कॉपी निकाली। साल 2000 में इस काम को करने वाले मिस्त्री मंगल सिंह ने गवाही दी है। उन्होंने कहा है कि आप खुद मौके पर आई थी और फव्वारे की जगह बगीचे के पीछे वाले तहखाने के ठीक ऊपर तय की थी। उन्होंने यह भी कहा कि तहखाने के फर्श पर एक प्लास्टिक में लिपटा ड्रम मिला था और आपने उसे छुए बिना उसके ऊपर कंक्रीट डालने का आदेश दिया था। आपने काम की मजदूरी भी तीन गुना कैश में दी थी और इस बात को राज रखने के लिए कहा था। गायत्री देवी की पलकें एक बार झपकी। लेकिन उसकी आवाज में कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। क्या आप जानते हैं कि वह आदमी अब कहां है?
एक नर्सिंग होम में। उसके फेफड़े खराब हैं और उसका दिमाग ठीक से काम नहीं करता। क्या आप ऐसे आदमी की बात पर यकीन करेंगे? अर्जुन ने बयान वापस फाइल में रखते हुए चुपचाप गायत्री देवी को देखा। गायत्री देवी ने नजरें नहीं चुराई। मेरी बहू 10,98 में एक गैर मर्द के साथ भाग गई थी। मैंने उस समय भी पुलिस को यही बताया था। जब पूछताछ आगे नहीं बढ़ी तो अर्जुन ने रिकॉर्डर बंद कर दिया और कमरे से बाहर आ गया। गलियारे में प्रवीण फाइलों का एक बंडल लेकर इंतजार कर रहा था। उसका चेहरा थोड़ा उत्तेजित था। सर ससुर ठाकुर महेंद्र सिंह के मामले में कुछ और जांच करने पर एक और बात सामने आई है। क्या यह तो हम पहले ही जानते हैं कि ठाकुर महेंद्र सिंह ने 10,97 में अनन्या जी को पीटा था। लेकिन उस क्लीनिक के मेडिकल रिकॉर्ड में डॉक्टर की एक और टिप्पणी लिखी हुई थी।
प्रवीण ने फाइल खोलकर अर्जुन के सामने कर दी। मरीज की पीठ और बाजुओं पर भी पुराने चोट के कई निशान मिले। यह एक बार की चोट नहीं बल्कि बार-बार की गई मारपीट का संदेह है। इसका मतलब है कि उन्हें एक बार नहीं बल्कि कई बार पीटा गया था। अर्जुन ने फाइल हाथ में ली और काफी देर तक उसे पढ़ता रहा। इसका मतलब है कि ठाकुर महेंद्र सिंह अपनी बहू को नियमित रूप से पीटता था। जी और 4 दिसंबर 10,998 के दिन ठाकुर महेंद्र सिंह कोठी के अंदर ही था। यह मैनेजर रामलाल के बयान से भी साबित हो चुका है। प्रवीण ने अपनी आवाज धीमी करते हुए कहा, “सर, कहीं ऐसा तो नहीं कि असली कातिल ससुर ठाकुर महेंद्र सिंह हो और गायत्री देवी ने अपने पति के किए को छुपाने के लिए लाश को ठिकाने लगाया हो। अर्जुन ने फाइल नीचे रखी और गलियारे की खिड़की से बाहर देखा। सूरज थल रहा था और पार्किंग में लंबी परछाइयां पड़ रही थी। वह अपनी उंगलियों से खिड़की का फ्रेम थपथपाते हुए काफी देर तक खड़ा रहा।
ठाकुर महेंद्र सिंह का 10,997 में अनन्या को बार-बार पीटने का रिकॉर्ड था। घटना के दिन वह कोठी में मौजूद था और बहू के फिल्मों में वापस जाने को सिंह खानदान की इज्जत पर धब्बा कहकर उसका पुरजोर विरोध किया था। पुलिस टीम के अंदर अब राय बदलने लगी थी। अर्जुन ने खिड़की से हाथ हटाया और प्रवीण की ओर मुड़ा। पता करो कि दिसंबर 10,998 में ठाकुर महेंद्र सिंह की हालत कैसी थी। उसके सारे मेडिकल रिकॉर्ड निकालो। प्रवीण ने सिर हिलाया और चला गया। दो दिन बाद ठाकुर महेंद्र सिंह के डॉक्टर के रिकॉर्ड आ गए। अर्जुन ने रिकॉर्ड खोले। अक्टूबर 10,98 से ठाकुर महेंद्र सिंह को जोड़ों की गंभीर समस्या और दिमाग की नसों में शुरुआती बीमारी के कारण बिना छड़ी के ठीक से चलना मुश्किल हो गया था। डॉक्टर की रिपोर्ट में लिखा था चलने के लिए सहारे की सख्त जरूरत ऊपरी शरीर की मांसपेशियों में भारी कमजोरी। अर्जुन ने रिकॉर्ड मेज पर रखते हुए सिर हिलाया।
एक 64 साल का बुजुर्ग जो बिना छड़ी के चल नहीं सकता। वह एक 29 साल की औरत के सिर के पीछे इतनी जोर से मारे कि हड्डी धंस जाए नामुमकिन है। प्रवीण चुप हो गया। तो इसका मतलब है कि ठाकुर महेंद्र सिंह कातिल नहीं है। मेडिकल रिकॉर्ड यही बता रहे हैं। शारीरिक रूप से यह संभव नहीं है। अर्जुन वाइट बोर्ड के पास गया। और ठाकुर महेंद्र सिंह के नाम पर एक लकीर खींच दी। उसकी नजरें फिर से गायत्री देवी के नाम पर रुक गई। उसने गायत्री देवी की गतिविधियों को फिर से जांचा। 4 दिसंबर 10998 को गायत्री देवी के कोठी से बाहर होने का कोई रिकॉर्ड या गवाह नहीं था। इसके विपरीत नौकरानी कमलाबाई का बयान इस ओर इशारा कर रहा था कि उस श्याम गायत्री देवी और अनन्या एक ही जगह यानी मेन बंगले में मौजूद थी।
अर्जुन कुर्सी पर बैठकर हाथ बांधने ही वाला था कि प्रवीण क्राइम ब्रांच का दरवाजा खोलकर अंदर आया। उसके हाथ में एक अखबार था। सर आपको यह देखना होगा। नीचे एक बड़ी हेडलाइन छपी थी। अनन्या शर्मा के पूर्व मैनेजर ने 10 साल बाद तोड़ी चुप्पी। समीर खान नाम पहली लाइन में लिखा था। अर्जुन ने खबर पढ़ना शुरू किया। अनन्या के पूर्व मैनेजर समीर खान ने एक मीडिया इंटरव्यू में दावा किया था कि वह और अनन्या एक दूसरे से प्यार करते थे और दिसंबर 10,998 की शुरुआत में उसने अनन्या को साथ भाग चलने का प्रस्ताव दिया था। अर्जुन ने अखबार मोड़ते हुए अपनी आंखें शुरू से क्या दावा कर रही थी कि वह एक गैर मर्द के साथ भाग गई थी। अर्जुन ने अखबार मेज पर रखा। इस आदमी को बुलाओ। समीर खान अगले दिन दोपहर को गुरुग्राम पुलिस स्टेशन आया। 45 साल का सिर पर सनग्लासेस रखे हुए वह पूछताछ कक्ष की कुर्सी पर बैठ गया। क्या यह सच है कि आप और अनन्या जी एक दूसरे से प्यार करते थे? समीर खान ने पैर पर पैर चढ़ाते हुए जवाब दिया। हां, सच है। मैनेजर के तौर पर साथ काम करते। करते हम करीब आ गए थे। अनन्या के दिल में भी मेरे लिए जगह थी। आपने दिसंबर 10,998 में उसे सात भाग चलने का प्रस्ताव दिया था। हां, मैंने कहा था कि उस घर से निकलकर एक नई शुरुआत करते हैं। अर्जुन समीर खान की आंखों में चुपचाप देखता रहा। समीर की नजरें एक पल के लिए दीवार की ओर भटकी। अनन्या जी ने क्या कहा? उसने शुक्रिया कहा। बोली कि वह सोचेगी। अर्जुन ने सिर हिलाया और फिर एक फाइल से एक कागज निकाला। यह वकील मीरा देसाई से मिला एक और बयान था। यह अनन्या जी की तलाक की वकील का बयान है। इसमें वह बात लिखी है जो अनन्या जी ने खुद वकील को बताई थी।
पूर्व मैनेजर समीर खान बार संपर्क करने की कोशिश कर रहा है जिससे मुझे असहज महसूस हो रहा है और उसने आपके साथ भाग चलने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। समीर के पैर नीचे आ गए। उसके हाथ घुटनों पर आ गए। हो सकता है उसने वकील से ऐसा कहा हो। यह एक तरफा प्यार था। है ना? समीर चुप हो गया। अर्जुन ने और कुछ नहीं पूछा और बयान वापस फाइल में रख दिया। पूछताछ कक्ष से बाहर आकर अर्जुन ने गलियारे में प्रवीण से कहा। गैर मर्द के साथ भाग जाने की कहानी गायत्री देवी ने शुरू से ही गढ़ रखी थी। उसने समीर खान के एक तरफा प्यार का फायदा उठाकर यह दिखाया कि बहू किसी आदमी के साथ भाग गई है। प्रवीण ने सिर हिलाया तो अब शक सिर्फ गायत्री देवी पर ही है सर।
अर्जुन क्राइम ब्रांच के दफ्तर की ओर चलते हुए वाइट बोर्ड को देखने लगा। तीन नामों में से ठाकुर महेंद्र सिंह पर लकीर खींची हुई थी और विक्रम सिंह के आगे घटनास्थल पर अनुपस्थित लिखा था। सिर्फ गायत्री देवी के नाम पर कोई निशान नहीं था। अर्जुन ने मार्कर उठाया और गायत्री देवी के नाम पर एक गोला बना दिया। 20 नवंबर 2008 को सीएफएसएल की फॉरेंसिक टीम की अंतिम रिपोर्ट क्राइम ब्रांच में पहुंची। अर्जुन ने लिफाफा फाड़ा और 20 नवंबर 2008 को सीएफएसएल की फॉरेंसिक टीम की अंतिम रिपोर्ट क्राइम ब्रांच में पहुंची। रिपोर्ट खोली। कंकाल की खोपड़ी के पिछले हिस्से में धनसाव का आकार किसी भारी गोल वस्तु से मारने के निशान से मेल खाता था। यह एक ही जोरदार वार था और ताकत ऊपर से नीचे और पीछे से आगे की ओर लगाई गई थी। रिपोर्ट के नीचे एक लाइन और लिखी थी। हमलावर का कद पीड़ित के बराबर या उससे थोड़ा कम होने का अनुमान है। अर्जुन ने रिपोर्ट नीचे रखी और डायरी खोली। गायत्री देवी का कद सेमी। अनन्या शर्मा का कद 165 सेमी। अगर गायत्री देवी ने अनन्या के पीछे से वार किया होता तो वार की दिशा बिल्कुल सटीक बैठती थी। अर्जुन ने प्रवीण को बुलाया। गायत्री देवी को अब संदिग्ध से आरोपी बनाया जाएगा। औपचारिक समन जारी करवाओ। प्रवीण ने सिर हिलाया और उठ गया और सिंह कोठी की फिर से तलाशी लो और 1098 में लिविंग रूम में रखे। सामान की सूची पता करो। पुलिस टीम सिंह कोठी के मेन बंगले में दाखिल हुई। लिविंग रूम के एक कोने में रखी एक अलमारी पर संगमरमर के तीन फूलदान रखे हुए थे। प्रवीण ने फूलदानों के बीच की खाली जगह को देखा। जहां चार फूलदान होने चाहिए थे। वहां सिर्फ तीन थे और खाली जगह पर धूल का एक गोल निशान बना हुआ था। मैनेजर रामलाल पुलिस टीम के सामने खड़ा होकर फूलदानों की ओर इशारा कर रहा था। यह मूल रूप से चार का सेट था। एक गायब है यह मुझे पता था। यह कब से गायब है?
रामलाल ने आंखें सिकोड़ कर याद करने की कोशिश की। 10,998 के अंत के आसपास मैंने बड़ी मालकिन से पूछा था तो उन्होंने कहा कि वह टूट गया था। इसलिए फेंक दिया। अर्जुन ने बचे हुए फूलदानों में से एक को दस्ताने पहने हाथ से उठाया। यह काफी भारी था। संगमरमर का होने के कारण इसका वजन काफी था और इसका निचला हिस्सा गोल और बेलनाकार था। यह सीएफ सेल की रिपोर्ट में बताए गए भारी गोल वस्तु के आकार से मेल खाता था। अर्जुन ने फूलदान नीचे रखते हुए प्रवीण की ओर देखा। चार में से एक गायब है और गायब होने का समय 10,998 का अंत है। प्रवीण ने सिर हिलाया और सबूत के तौर पर तस्वीरें खींची। 25 नवंबर 2000 8 सुबह 10:00 बजे गायत्री देवी अपने वकील के साथ गुरुग्राम पुलिस स्टेशन आई। उसने काले रंग का सूट और मोतियों के झुमके पहने हुए थे। पूछताछ कक्ष की कुर्सी पर बैठते हुए उसने अपना बैग घुटनों पर रख लिया और उसकी पीठ अभी भी सीधी थी। अर्जुन सामने बैठ गया। रिकॉर्डर और वीडियो कैमरा चालू करने के बाद उसने कोई फाइल नहीं खोली। इसके बजाय उसने अपने दोनों हाथ मेज पर रखे और गायत्री देवी को देखने लगा। मैडम आज हम थोड़ी आराम से बात करेंगे। मैं यह सुनना चाहता हूं कि आपने इस खानदान को कैसे संभाला है। गायत्री देवी ने एक पल के लिए अर्जुन की आंखों में देखा। उसके चेहरे पर सतर्कता का भाव आया। लेकिन फिर उसने बोलना शुरू कर दिया। आप क्या सुनना चाहते हैं? आप इस सिंह खानदान में बहू बनकर किस साल आई थी?
10,965 में। 22 साल की थी तब आपको 40 साल से ज्यादा हो गए। गायत्री देवी ने एक बार सिर हिलाया। आपके ससुर जी के रहते हुए आपको काफी मुश्किलें आई होंगी। गायत्री देवी की उंगलियां बैग के हैंडल पर हल्की सी हिली। कौन सी बहू को मुश्किलें नहीं आती। फिर भी मैंने अपनी जगह बनाए रखी। मैंने सुना है कि आपने अपने पति की देखभाल भी अकेले ही की। उनके बीमार पड़ने के बाद जब वह अस्पताल से लौटे तो मैंने 7 साल तक उनकी देखभाल की। रोहन को भी मैंने ही पाला है। अर्जुन धीरे-धीरे सिर हिलाते हुए सुनता रहा। गायत्री देवी की बातें जारी रही। पति के अफेयर को सहना, ससुर के ताने खानदान के सारे छोटे, बड़े काम अकेले संभालना। 1 घंटे से ज्यादा समय तक गायत्री देवी ने अपने 30 साल की कहानी सुनाई और उसकी आवाज में धीरे-धीरे एक ताकत आ रही थी। यह खानदान आज तक सिर्फ मेरी वजह से टिका हुआ है। अगर मैं ना होती तो सिंह खानदान कब का बिखर गया होता। अर्जुन ने चुपचाप एक घूंट पानी पिया। कप नीचे रखते हुए उसने बातचीत का रुख बदल दिया। मैडम अब हमें 4 दिसंबर 10,998 की बात करनी होगी। गायत्री देवी के कंधे हल्के से अकड़ गए। जब आपकी बहू अनन्या शर्मा तलाक के कागज लेकर आई थी तो आपके मन में क्या चल रहा था? गायत्री देवी की सांस रुक गई। उसके होठ आधे खुले और फिर बंद हो। गए। पूछताछ कक्ष में खामोशी छा गई। सिर्फ वीडियो कैमरे की लाल बत्ती टिमाटिमा रही थी। एक दो 3 सेकंड गायत्री देवी की नजरें मेज पर एक बिंदु पर टिकी हुई थी। चार पांच 6 सेकंड बगल में बैठा वकील गायत्री देवी को देखने लगा। 7 सेकंड गायत्री देवी ने मुंह खोला। तलाक के कागज। यह आप क्या कह रहे हैं? अर्जुन ने एक फाइल से एक कागज निकाला और मेज पर रख दिया।
28 नवंबर 10,998 का तलाक की याचिका की एक कॉपी। यह सक्सेना एंड एसोसिएट्स लॉ फर्म से मिली थी। यह अनन्या जी द्वारा तैयार की गई तलाक की याचिका है। अर्जुन ने अपनी उंगली से कागज के निचले हिस्से की ओर इशारा किया। यहां देखिए भेजे जाने वाला पता सिंह कोठी मेन बंगला लिखा है। यह आपका पता है गायत्री देवी की आंखें कागज पर टिक गई। उसकी नजरें पते वाले कॉलम से नहीं हट रही थी। अर्जुन ने फाइल से एक-एक करके कागज निकालना शुरू किया। यह मंगल सिंह का बयान है। इसमें लिखा है कि साल 2000 में आपने खुद मौके पर आकर फव्वारे की जगह तहखाने के ऊपर तय की थी और ड्रम को छुए बिना काम करने का आदेश दिया था। मेज पर एक और कागज रखा गया। यह तहखाने की मिट्टी की जांच रिपोर्ट है। इसमें वे तत्व पाए गए हैं जो मानव शरीर के लंबे समय तक रखे जाने पर बनते हैं। गायत्री देवी के चेहरे का रंग उड़ने लगा। यह कंकाल पर वार की दिशा की विश्लेषण रिपोर्ट है। पीड़ित से छोटे कद के व्यक्ति ने पीछे से किसी भारी गोल वस्तु से वार किया था। अर्जुन ने आखिरी कागज निकाला। मेन बंगले के लिविंग रूम में रखे। संगमरमर के फूलदान के सेट में से 10,998 के अंत में गायब हो गया था। और उस रात आपके और अनन्या जी के बीच तीखी बहस हुई थी। यह नौकरानी कमलाबाई का बयान है। मेज पर पांच कागज रखे हुए थे। गायत्री देवी की नजरें उन कागजों पर भटक रही थी। उसके होंठ हल्के-हल्के कांप रहे थे। पूछताछ को 3 घंटे से ज्यादा हो चुके थे। गायत्री देवी की सांसे तेज हो गई। बैग पकड़े हुए उसकी उंगलियों के जोड़ सफेद पड़ गए थे। गायत्री देवी ने अचानक बैग को अपने घुटनों से धकेल दिया। वह इस खानदान को बर्बाद करना चाहती थी। उसकी आवाज तेज हो गई। मैंने 30 साल से ज्यादा इस सिंह खानदान को संभाला है। और वह कहती है कि वह तलाक लेगी बच्चे की। कस्टडी लेगी, गुजारा भत्ता लेगी तो इस खानदान का क्या होता? वकील ने गायत्री देवी का हाथ पकड़कर उसके कान में कुछ कहा। गायत्री देवी ने वकील का हाथ झटक दिया। अर्जुन ने अपनी मुद्रा नहीं बदली। उसने दोनों हाथ मेज पर रखे हुए ही धीमी और शांत आवाज में पूछा। मैडम तो 4 दिसंबर की रात को क्या हुआ था?
गायत्री देवी का मुंह खुला और फिर बंद हो गया। वकील ने एक बार फिर गायत्री देवी का कंधा पकड़ा। पूछताछ कक्ष में लंबी खामोशी छा गई। गायत्री देवी ने सिर झुकाते हुए कहा, उसने कहा कि वह रोहन को लेकर चली जाएगी। यह नहीं हो सकता था। अर्जुन की आंखों में हल्की सी हलचल हुई। उसने नजरें घुमाकर वीडियो कैमरे की लाल बत्ती देखी। वह ठीक से काम कर रहा था। अर्जुन अपनी जगह से उठा। मैडम क्या आप थोड़ी देर आराम करना चाहेंगी? मैं आपको आपके वकील से बात करने का समय भी दूंगा। गायत्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह सिर झुकाए मेज पर फैले कागजों को देख रही थी। उसके दोनों हाथ घुटनों पर हल्के-हल्के कांप रहे थे। अर्जुन पूछताछ कक्ष का दरवाजा खोलकर बाहर आया और गलियारे में प्रवीण से आंखें मिलाई। प्रवीण ने धीमी आवाज में पूछा। अब आगे क्या करेंगे सर? अर्जुन ने गलियारे के अंत में बनी खिड़की को देखते हुए जवाब दिया। इंतजार करो। वह टूटना शुरू हो चुकी है। 26 नवंबर 2000 8 सुबह 9:00 बजे पूछताछ कक्ष का दरवाजा खुला। गायत्री देवी कल रात से बिल्कुल अलग चेहरे के साथ अंदर आई। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे थे और होठों पर कोई रंगत नहीं थी। वकील से रात भर बात करने के बाद उसने अपना रुख बदल लिया था। वकील ने पहले बोलना शुरू किया।
मेरी मुवकिल 4 दिसंबर 10,998 की रात जो कुछ भी हुआ उसके बारे में बयान देंगी। लेकिन मैं पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी मुवकिल का मानना है कि यह जानबूझकर नहीं बल्कि एक हादसा था। अर्जुन ने सिर हिलाया और रिकॉर्ड और वीडियो कैमरा चालू किया। मैडम उस रात की कहानी बताइए। गायत्री देवी ने मेज पर रखे अपने हाथों को देखा। हाथों पर उम्र के धब्बे थे और उंगलियों के जोड़ मोटे थे। काफी देर तक उन्हें देखने के बाद उसने बोलना शुरू किया। यह 4 दिसंबर की शाम थी। विक्रम के दिल्ली जाने के बाद वह मेन बंगले में आई। 10 साल पहले 4 दिसंबर 10,998 की रात गुरुग्राम में सिंह कोठी के मेन बंगले में बत्तियां जली हुई थी। सर्दियों की हवा खिड़की की दरारों से अंदर आ रही थी और लिविंग रूम की अलमारी पर संगमरमर के चार फूलदान रखे हुए थे। अनन्या शर्मा ने लिविंग रूम का दरवाजा खोला और अंदर आई। एक समय में छोटे पर्दे पर राज करने वाला उसका चेहरा अब गालों की हड्डियां उभर आने से दुबला लग रहा था। उसके हाथ में एक फाइल थी। गायत्री देवी सोफे पर बैठकर टीवी देख रही थी। उसने अनन्या की ओर देखकर रिमोट नीचे रख दिया। इस समय क्या काम है? मां जी मुझे आपसे कुछ बात करनी है। अनन्या ने फाइल से कुछ कागज निकाले और मेज पर रख दिए। मैं तलाक लेना चाहती हूं। मैंने वकील के जरिए सब तैयार कर लिया है।
गायत्री देवी का हाथ रिमोट पर ही रुक गया। उसने कागजों को देखा और फिर धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। क्या कहा तुमने? तलाक। रोहन को मैं अपने साथ ले जाऊंगी। गायत्री देवी सोफे से उठी। उसने कागज उठाए और पहला पन्ना देखा। तलाक की याचिका शब्द उसकी आंखों में चुभे और बच्चे की कस्टडी वाले कॉलम में रोहन सिंह का नाम लिखा था। गायत्री देवी के हाथ में कागज मुड़ गए। तुम रोहन को ले जाओगी। तुम रोहन मेरा बेटा है। मेरा बेटा होने से पहले वह सिंह खानदान का पोता है। यह नहीं हो सकता। अनन्या एक कदम पीछे हटी और बोली, मां जी, मैं फैसला कर चुकी हूं। मैं अब इस घर में और नहीं रह सकती। गायत्री देवी का चेहरा सख्त हो गया। उसने मुड़े हुए कागज मेज पर फेंक दिए। नहीं रह सकती जानती। हो मैंने इस घर में 30 साल कैसे सहे हैं। ससुर से मार खाते हुए भी पति के बाहर औरतें रखने पर भी मैंने मुंह बंद करके यह जगह संभाली है। और तुम कहती हो कि तलाक लोगी गुजारा भत्ता लोगी। तो मेरे उन 30 सालों का क्या होगा मां जी? मैं आपकी हालत समझती हूं।
लेकिन मेरी भी अपनी जिंदगी है। अनन्या ने मेज पर पड़े मुड़े हुए कागजों को उठाने के लिए झुकी। यह कागज मैं ले जाती हूं। मैंने वकील से कहा है कि वह फिर से भेज देंगे। गायत्री देवी ने अनन्या की कलाई पकड़ ली। इस घर से जाना है तो जाओ। लेकिन रोह पुरहन नहीं जाएगा। रोहन इस घर का बच्चा है। अनन्या ने गायत्री देवी का हाथ झटक दिया। उसने कागज फाइल में रखते हुए पीठ फेर ली। मैं रोहन के बिना नहीं जाऊंगी। हम साथ जाएंगे। अनन्या लिविंग रूम के दरवाजे की ओर बढ़ने लगी। गायत्री देवी उसकी पीठ को देखती रही। उसकी नजरें अलमारी पर रखे संगमरमर के फूलदान पर गई। उसका हाथ फूलदान की ओर बढ़ा और उसे उठा लिया। भारी संगमरमर उसकी मुट्ठी में आ गया। गायत्री देवी अनन्या के पीछे एक कदम बढ़ी और फूलदान से वार कर दिया। एक भारी आवाज मेन बंगले के लिविंग रूम में गूंज उठी। अनन्या वहीं आगे की ओर गिर पड़ी। फाइल के कागज फर्श पर बिखर गए और अनन्या ने कोई हरकत नहीं की। गायत्री देवी फूलदान हाथ में लिए खड़ी रही। सिर्फ उसकी तेज सांसों की आवाज गूंज रही थी। उसने फूलदान नीचे रखा और अनन्या के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने कलाई पकड़ी लेकिन नब्ज नहीं चल रही थी। 2008 पूछताछ कक्ष गायत्री देवी ने बोलना बंद कर दिया और दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
काफी देर बाद उसने मुंह खोला। मैं उसे सिर्फ बेहोश करना चाहती थी। मारना नहीं चाहती थी। अर्जुन ने एक कागज निकाला और मेज पर रख दिया। सीएफ सेल की रिपोर्ट है। खोपड़ी की हड्डी 2.5 सेंटीमीटर अंदर ढंस गई थी। यह सिर्फ बेहोश करने जितनी ताकत नहीं थी। गायत्री देवी ने हाथ नीचे किए और रिपोर्ट को देखा। उसने कुछ नहीं कहा। अर्जुन ने पूछा। उसके बाद आपने क्या किया? गायत्री देवी ने सिर झुकाए हुए फिर से बोलना शुरू किया। मैं डर गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। उसी रात मैंने अकेले ही उसे एक कंबल में लपेटा और रसोई में रखे। अचार वाले बड़े ड्रम में डाल दिया। 4 दिसंबर 10,998 की आधी रात मेन बंगले के लिविंग रूम में गायत्री देवी अकेली थी। उसने अनन्या के शरीर को एक कंबल में लपेटा। रसोई के कोने में रखे अचार के बड़े ड्रम को खींचकर वह लिविंग रूम के फर्श पर ले आई। उसने कंबल में लिपटी अनन्या को ड्रम के अंदर धकेला और ढक्कन बंद करके उसे सील कर दिया। उसने ड्रम को खड़ा किया और फिर उसे झुकाकर फर्श पर लुढ़काने लगी। मेन बंगले का पिछला दरवाजा खोलने पर बाहर की ठंडी हवा अंदर आई। पिछले दरवाजे से तहखाने के मुंह तक साथ 8 मीटर की ढलान थी। उसने ड्रम को झुका कर धकेला और वह ढलान पर लुढ़कता हुआ तहखाने के फर्श तक पहुंच गया। 2008 पूछताछ कक्ष अर्जुन ने पूछा लाश से भरे ड्रम को आप अकेले कैसे ले गई? ड्रम गोल था इसलिए झुकाने पर वह लुढ़क सकता था। तहखाने का मुंह ढलान पर था। इसलिए उसे अंदर धकेलना मुश्किल नहीं था। अर्जुन ने अपनी डायरी पलटी। यह पुलिस टीम द्वारा की गई घटनास्थल की जांच और तहखाने के मुंह की संरचना से मेल खाता था। अगले दिन सुबह मैंने कमलाबाई से कहा कि बहू अपना सामान पैक करके चली गई है। उस शाम मैंने अनन्या के कमरे से उसके कुछ कपड़े और सूटकेस चुपके से जला दिए। आपके पति से जब विक्रम वापस आया और पूछा कि अनन्या कहां है? तो मैंने वही बात दोहराई कि वह घर छोड़कर चली गई है। विक्रम ने दोबारा नहीं पूछा। गायत्री देवी ने अपने होंठ का एक कोना ऊपर उठाया।
यह ना तो हौसी थी और ना ही रोना। उसने एक बार भी नहीं पूछा कि वह कहां गई? एक बार भी नहीं। अर्जुन ने एक पल के लिए पेन रोका और गायत्री देवी को देखा। लाश तहखाने में कितने समय तक रही? लगभग डेढ़ साल। 1000 999 के अंत में मेरे ससुर जी बीमार होकर अस्पताल चले गए और घर के सारे काम मेरे हाथ में आ गए। तभी मैंने बगीचे को नया रूप देने की बात कही। ससुर जी की याद में हां अगर तहखाने के ऊपर फव्वारा बना दिया जाता तो कोई उसे नहीं छूता। श्रद्धांजलि के नाम पर कौन वहां खुदाई करने की सोचता। गायत्री देवी ने सिर उठाकर अर्जुन को देखा। हरंगना हर साल हम उस फमना को खरे कमतीखार कम करते थे। परिवार धार संग परिवार रिश्तेदार सब इकट्ठा होकर फूल गायत्री देवी की ठुडी कांपने लगी। उसने अपने दोनों हाथ घुटनों पर कसकर भीच लिए। मैं इस घर में बहू बनकर आई 30 साल हो गए। पति ने धोखा दिया तो भी सहा। ससुर ने ताने दिए तो भी सहा। सिर्फ इस खानदान को बचाने के लिए सब कुछ। और वह लड़की कहती है कि वह तलाक लेकर पोते को भी ले जाएगी तो मेरे उन 30 सालों का क्या होता? यह तो मेरी पूरी जिंदगी को नकारने जैसा था। गायत्री देवी की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने उन्हें पछा नहीं। अर्जुन ने रिकॉर्डर बंद कर दिया। उसने कागज समेटे और उठ खड़ा हुआ। पुलिस टीम ने गायत्री देवी के कबूलनामे और सबूतों को एक साथ जोड़ा। सीएफएसएल की रिपोर्ट मंगल सिंह की गवाही तहखाने की मिट्टी की जांच तलाक के कागज कमलाबाई का बयान गायब हुआ।
संगमरमर का फूलदान ड्रम के अवशेष सब कुछ एक कड़ी में जुड़ गया। अर्जुन ने गिरफ्तारी वारंट के लिए आवेदन किया और जज ने वारंट जारी कर दिया। 27 नवंबर 2008 को गायत्री देवी को गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ कक्ष से बाहर निकलते समय पहली बार उसकी पीठ झुकी हुई थी। गलियारे की ट्यूबलाइट में उसकी छोटी सी परछाई लंबी होकर फैल गई। दिसंबर 2008 में नोएडा की जिला अदालत ने गायत्री देवी पर आरोप तय किए। 10,998 की उस त्रासदी और उसके बाद 10 साल तक लाश को छुपाए रखने का पूरा ब्यरा चार्ज शीट में लिखा हुआ था। 10,998 की घटना की 15 साल की समय सीमा में से अभी भी 5 साल बाकी थे। इसलिए मुकदमा सामान्य रूप से चला। नोएडा जिला न्यायालय कोर्ट रूम नंबर चार। गायत्री देवी आरोपी के कटघरे में बैठी थी। काले कपड़ों में बिना मेकअप के और एक महीने में उसके गाल और भी ढंस गए थे। बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि उस रात जो कुछ भी हुआ वह अचानक गुस्से में हुआ था। गायत्री देवी का अनन्या को मारने का कोई इरादा नहीं था और यह एक पल के आवेग में हुई एक त्रासदी थी।
अभियोजन पक्ष का नजरिया अलग था। सरकारी वकील ने अदालत में एक-एक करके सबूत पेश किए। आरोपी ने हत्या के तुरंत बाद लाश को एक ड्रम में बंद करके तहखाने में छुपा दिया। डेढ़ साल बाद उसने उसके ऊपर एक फव्वारा बनाकर उसे कंक्रीट से सील कर दिया। क्या यह एक आकस्मिक दुर्घटना के बाद का व्यवहार है? गायत्री देवी सिर झुकाए बिना कुछ कहे बैठी रही। आरोपी ने पीड़ित के परिवार से 10 साल तक यह झूठ बोला कि बहू एक गैर मर्द के साथ भाग गई है। और जब पीड़ित की बड़ी बहन ने पुलिस से गुहार लगाई तब भी यही झूठ जांच में बाधा बना रहा। दर्शकों की पहली पंक्ति में सुनीता वर्मा बैठी थी। उसने अपनी गोद में अपनी बहन का एक पुराना बटुआ रखा हुआ था। मुकदमे के दौरान विक्रम सिंह का नाम भी सामने आया। 4 दिसंबर 10,998 की रात को दिल्ली के एक होटल में दूसरी औरत के साथ होने की बात और पत्नी के लापता होने पर कोई सवाल ना उठाने की बात अदालत में सार्वजनिक हुई। लेकिन विक्रम सिंह गवाह के तौर पर पेश नहीं हुआ। उसने वकील के माध्यम से केवल एक लिखित बयान प्रस्तुत किया और उसके बाद सिंह टेक्सटाइल्स के प्रबंधन से खुद को अलग कर लिया। मंगल सिंह जनवरी 2009 में गवाह के कटघरे में आया। वह वहील चेयर पर बैठा था और उसके बगल में एक ऑक्सीजन सिलेंडर लगा हुआ था। उसका चेहरा पीला पड़ गया था और बोलते समय उसकी सांसे फूल रही थी। साल 2000 में गायत्री देवी ने खुद मौके पर आकर फव्वारे की जगह तहखाने के ऊपर तय की थी। उन्होंने कहा था कि ड्रम को छुए बिना उसके ऊपर कंक्रीट डाल दो। सरकारी वकील ने पूछा क्या आपको उस समय कुछ अजीब लगा था? मंगल सिंह ने ऑक्सीजन की नली ठीक करते हुए सिर हिलाया।
अजीब तो लगा था लेकिन जब वह तीन गुना पैसा देकर मुंह बंद रखने को कह रही थी तो मैं उस समय चुप रह गया। मंगल सिंह की आवाज धीमी हो गई। मुझे अफसोस है। मुझे उसी समय पुलिस को बता देना चाहिए था। मार्च 2009 फैसले के दिन गायत्री देवी कटघरे में सामने देख रही थी। जज ने फैसला पढ़ा। यह माना जा सकता है कि आरोपी ने दशकों तक अपने परिवार के लिए त्याग किया। लेकिन एक बहू की जान लेना और 10 साल तक परिवार को सच्चाई से दूर रखना किसी भी तर्क से जायज नहीं ठहराया जा सकता। 17 साल की जेल की सजा सुनाई गई। जब गायत्री देवी अपनी जगह से उठी तो उसके पैर लड़खड़ा गए। एक कोर्ट कांस्टेबल ने उसे सहारा दिया। जब गायत्री देवी ने दर्शकों की ओर एक बार देखा तो उसकी नजरें सुनीता से मिली। सुनीता अपनी बहन का पुराना बटुआ सीने से लगाए गायत्री देवी को देख रही थी।
गायत्री देवी ने पहले नजरें घुमा ली। अदालत से बाहर निकलते समय सुनीता को मीडिया ने घेर लिया। सुनीता रुक गई और सिर्फ एक बात कही। मेरी बहन बस अपने बच्चे के साथ एक सामान्य जीवन जीना चाहती थी। वह मुड़ी और अदालत की सीढ़ियों से नीचे उतर गई। कोई भी उसके पीछे नहीं गया। पूर्व इंस्पेक्टर रतन लाल पर पुलिस की आंतरिक जांच हुई। 10,98 में सुनीता के चिट्ठी लेकर आने के बावजूद मामले को नजरअंदाज करने की बात सामने आई। अपने कर्तव्य का ठीक से पालन न करने की जिम्मेदारी तय हुई और उसकी पेंशन का एक हिस्सा रोक दिया गया। कहा जाता है कि रतन लाल पूरी जांच के दौरान सिर झुकाए बैठा रहा। मंगल सिंह गवाही देने के 10 दिन बाद सोनीपत के नर्सिंग होम में चल बसा। उसकी अंतिम यात्रा में इंस्पेक्टर अर्जुन आया। उसने तस्वीर के सामने खड़े होकर काफी देर तक देखा। फिर सिर झुकाया। आपकी वजह से 10 साल पुराना झूठ तोड़ा जा सका। अर्जुन ने अगरबत्ती जलाई और वापस लौट गया। साल बदला 2009 की वसंत आई। अब एक किशोर हो चुका। रोहन सिंह स्कूल में मुश्किल समय से गुजर रहा था।
जब भी गलियारे में फुसफुसाहट की आवाजें आती, वह सिर झुकाकर चलता। दोपहर के भोजन के समय वह अक्सर खेल के मैदान के एक कोने में अकेला बैठा रहता। विक्रम सिंह रोहन की देखभाल करने की स्थिति में नहीं था। बिजनेस से हटने के बाद वह घर में ही बंद रहता और किसी से नहीं मिलता। सुनीता वर्मा गुरुग्राम आई। उसने रोहन के स्कूल के बाहर इंतजार किया और जब रोहन गेट से बाहर निकला तो उसे बुलाया। रोहन रोहन ने सिर उठाया। यह एक अनजान महिला थी। आप कौन है? मैं सुनीता हूं। तुम्हारी मां की बड़ी बहन। रोहन की आंखें बड़ी हो गई। वह अपने बैग का पट्टा पकड़े कुछ देर खड़ा रहा। रोहन सुनीता के साथ चला गया। नोएडा में एक छोटा सा अपार्टमेंट। सुनीता ने रोहन को एक कमरा दिया और एक नई मेज और बिस्तर का इंतजाम किया। एक शाम सुनीता ने एक पुरानी फोटो एल्बम मेज पर रखी। मुझे लगता है कि अब तुम्हें यह देखना चाहिए। रोहन ने एल्बम खोली। पहले पन्ने से ही एक अनजान महिला की तस्वीरें थी। एक जवान हंसमुख चेहरे वाली महिला कैमरे की ओर मुस्कुरा रही थी। पन्ना पलटने पर एक सालगिरह की तस्वीर थी। वह महिला एक बच्चे को गोद में लिए हुए थी। मोटे गालों वाले बच्चे से अपना चेहरा रगड़ते हुए वह मुस्कुरा रही थी। रोहन का हाथ रुक गया। यह यह मां है। हां, यह तुम्हारी पहली सालगिरह की तस्वीर है। मां ने तुम्हें गोद में लिया हुआ है। रोहन ने तस्वीर पर अपनी उंगली रखी। उसने मां के चेहरे पर धीरे-धीरे हाथ फेरा। उसे कुछ याद नहीं था। 2 साल की उम्र में गायब हुई मां का चेहरा वह 13 साल की उम्र में पहली बार देख रहा था। सुनीता ने रोहन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। रोहन वह जो फव्वारे का फर्श धंस गया था वह तुमने ही देखा था है ना रोहन ने तस्वीर से नजरें हटाए बिना सिर हिलाया अगर तुमने वह ना देखा होता तो मां आज भी उसी के नीचे होती रोहन की उंगली तस्वीर पर रुक गई उसने सिर उठाकर सुनीता को देखा उसके होंठ कांप रहे थे लेकिन मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी उसने फोटो एल्बम को अपने सीने से लगा लिया 2009 की वसंत में सिंह कोठी के बगीचे से फव्वारा पूरी तरह से हटा हटा दिया गया। कंक्रीट के फर्श तक उखाड़ने के बाद उस जगह पर कुछ भी नहीं बनाया गया। वह एक खाली जमीन थी।
कुछ दिनों बाद फटी हुई मिट्टी के बीच से एक-एक करके जंगली घास उगने लगी। अर्जुन ने मामले की अंतिम रिपोर्ट लिखते हुए आखिरी बार उस जगह का दौरा किया। उसने बगीचे के बीचों बीच उस खाली जमीन को काफी देर तक देखा। उसने अपनी जेब से डायरी निकाली और रिपोर्ट की आखिरी लाइन लिखी। यह मामला कोई बड़ी साजिश या संगठित अपराध नहीं था बल्कि एक खानदान द्वारा अपनी इज्जत बचाने की जिद का नतीजा था। जिसने एक महिला की जान और एक बच्चे के 10 साल निगल लिए। उसने डायरी बंद की और बगीचे से बाहर निकल आया। गेट बंद हो गया और खाली जमीन पर वसंत की हवा गुजर