फिल्म डायरेक्टर रमेश सिप्पी अपनी पत्नी गीता के साथ लंदन के कंसर्ट में थे। जहां यह धुन बज रही थी। दिखाया था। बात साल 197475 की है जब रमेश शिप्पी के डायरेक्शन में बन रही फिल्म शोले लगभग पूरी हो चुकी थी। कुछ एक गानों की रिकॉर्डिंग और पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा था। इसी सिलसिले में वह लंदन आए थे। उन्हें यह गाना इतना भाया कि इसी धुन पर कुछ देसी तड़का वो शोले में भी लगाने की सोचने लगे। [गाना गाने की आवाज़] सेशन में जब [संगीत] से मिलते हैं और दोस्तों अगर आपने उस गाने का अंदाजा लगा लिया है और इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि उसका ओरिजिनल वर्जन तो यह है तो अभी जल्दबाजी में है। खुद रूसोस का यह गाना ओरिजिनल नहीं था
बल्कि एक और ग्रीक सिंगर मैकेलिस बलरिस के इस गाने से इंस्पायर्ड था। [संगीत] से लेकिन अभी तो इसमें हिंदुस्तानी ट्यून और टशन का रिमिक्स डलना था। रमेश शिप्पी मुंबई लौटते ही शोले के म्यूजिक डायरेक्टर आर डी बर्मन से मिले और कहा कि इन दोनों गानों की ट्यून से मेल खाती एक ऐसी ट्यून बनाओ जो कहानी की धार ही नहीं दर्शकों का मूड भी बदल दे। महबूबा [संगीत] महबूबा महबूबा और दोस्तों यही वो गाना था जो शोले के ड्राइंग टेबल पर सबसे बाद में बना था और यह सीन भी स्टोरी की डिमांड से ज्यादा इस गाने के लिए अलग से क्रिएट किया गया था। लेकिन तब ना सिप्पी और ना ही बर्मन को पता था कि हड़बड़ी में डाला जा रहा यह गाना कुछ इस कदर पॉपुलर होगा कि म्यूजिक ट्रैक ही नहीं बल्कि पूरी फिल्म को ही एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। गुल खिलते [संगीत] हैं
जब सेहरा [गाना गाने की आवाज़] में मिलते हैं मैं और तुम और जो चीज किसी को नहीं पता थी वो इस गाने के बनने बिगड़ने और फिर कुछ उम्दा बन जाने का संयोग और उसी से जुड़ा है आज का हमारा किस्सा लेकिन उससे पहले अगर आपने चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो तो करिए ही बेल बटन भी दबाते चलिए और हम बात शुरू करते हैं उसी लंदन शहर से जहां 51 52 साल पहले सिप्पी को इस गाने का इंस्पिरेशन मिला था और पिछले ही साल ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट में शोले के 50 साल पूरे होने पर आयोजित एक फिल्म फेस्टिवल के दौरान जब शोले द फाइनल कट यानी शोले के रिस्टोर्ड वर्जन की स्क्रीनिंग हुई तब देसी विदेशी दर्शक इस गाने पर वैसे ही झूम रहे थे मानो वहां की फिजा में डेमिस रूसोस और मैकेलिस वाला वाइफ तय रहा हो [संगीत] खैरडी बर्मन तो रिमिक्स के उस्ताद थे। उन्होंने धुन तैयार कर दी और उसमें गीतकार आनंद बख्शी से शब्द पिरोने को कहा गया। गाना किशोर कुमार को गाना था जो पहले ही इस फिल्म के चार गाने गा चुके थे। ये दोस्ती अब नहीं हसीना जब टूट जाती है तो
बहाने से लिए और दिए दिल [संगीत] जाते हैं। हम नहीं तोड़ेंगे। सीन सीक्वेंस यह था कि हथियार सप्लायर हीरा गब्बर को नई [संगीत] खेप देने आ रहा था। इसकी जानकारी ठाकुर को मिल जाती है और वह जयवी को वहां धावा बोलने को कहता है। लोहा गरम है। मार दो हथोड़ा। स्क्रिप्ट राइटर सलीम जावेद ने तो कागज पर सीन क्रिएट कर दिया। यानी यहां एक जश्न वाला आइटम डांस हुआ। आमतौर पर तब तक फिल्मों में ऐसे मौकों पर मुजरा होता था जो आगे चलकर आइटम नंबर में बदल गया। और अक्सर यहां डांसर गेस्ट अपीयरेंस में हुआ करती थी। क्योंकि लोकेशन डाकू के अड्डे का था और वह भी वीरान। ऐसे में निर्देशक शिप्पी और कोरियोग्राफर पीएल राज ने इसे एक बंजारा सॉन्ग के रूप में डेवलप करने का आईडिया दिया। लेकिन सात समंदर पार से आई धुनों का जब आरडी बर्मन के इनोवेटिव ट्यून से मेल हुआ तो गाने की एक्जोटिक तासीर बन गई जिसमें विदेशी जिप्सी ट्रेडिशन से लेकर अरबी फारसी फोकस सुरों की सुगंध आ रही थी। ऐसे में डांसर चुनी गई उस दौर की मशहूर कैमवरेज डांसर हेललेन और उनके को डांसर थे जलाल आगा। और दोस्तों, आर डी बर्मन पर लिखी गई इन किताबों में जिक्र मिलता है कि आर डी बर्मन के मामा निर्मल कुमार दास गुप्ता अपनी बहन यानी पंचम की मां मीरा से मिलने मुंबई आए थे।
पंचम इस गाने की धुन बना चुके थे और इसका स्केच अपनी ही आवाज में रिकॉर्ड करके घर ले आए थे। स्केच सॉन्ग वो है जो संगीतकार धुन बनाने के बाद छोटे-मोटे गायकों से गवाकर रिकॉर्ड कराते थे और उसके बाद मेन सिंगर उसे गाते थे क्योंकि इसे आरडी ने खुद ही गाया था। सो उन्होंने मामा को इसे सुनाया और वो उछल पड़े। बोले अरे यह तो तुम्हारी आवाज में बहुत अच्छा लग रहा है। इसे किशोर से गवाने की क्या जरूरत? पंचम मुस्कुरा कर रह गए। लेकिन कहा जाता है कि जिस दिन इस गाने की फाइनल रिकॉर्डिंग होनी थी, किशोर कुमार स्टूडियो नहीं आ सके। आर डी बर्मन ने फिर से अपनी ही आवाज में इसे रिकॉर्ड करना शुरू किया। वहीं निर्देशक रमेश शिपी बैठे थे। वह इस वॉइस से इतने एक्साइटेड हो गए कि बोले पंचम सीन सिचुएशन में तो तुम्हारी आवाज ही परफेक्ट लग रही है। इसे [नाक से की जाने वाली आवाज़] ही फाइनल करो। महबूबाबूबा। कहा यह भी जाता है कि जब किशोर कुमार ने खुद यह रिकॉर्डिंग सुनी तो खुश हुए और आरडी बर्मन का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि ऐसा तो मैं भी नहीं गाता यार। और दोस्तों यह भी बताते चल कि केवल गाने की ध्वनि देसी विदेशी रिमिक्स नहीं थी।
साजबाज भी मल्टीकल्चरल बैकग्राउंड के थे। ईरानी संतूर पर फ्री उंगलियां मशहूर संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा की थी। इसी तरह कुछ वेस्टर्न ऑर्केस्ट्रा इंस्ट्रूमेंटलिस्ट भी बुलाए गए थे। खैर गाना तो तैयार हो गया और जल्दी से शूट भी कर लिया गया और सेट पर ही इसने तमाम किरदारों के मूड बदल दिए थे। एक क्रिटिक ने तो मजाकिया लहजे में यहां तक लिखा था कि गब्बर सिंह को नाच गाना देखने की लत शायद यहीं लगी थी जो क्लाइमेक्स तक जारी रही। बहुत कटीली नचनिया होगी। जरा हमको भी दिखाओ दो चार ठुमके। [संगीत] खैर अब जब दुनिया शोले को ओरिजिनल रिस्टोर्ड साउंड के साथ सुन और देख रही है। यह गाना आज भी बड़े-बड़े आधुनिक आइटम नंबर से कहीं आगे नजर आता है। [संगीत] थिंग्स मी [संगीत] तो महबूबा महबूबा महबूबा महबूबा तो स्काल्ट सॉन्ग और कालजई फिल्म की यादों के साथ आज बस इतना ही। चलते-चलते वीडियो लाइक और शेयर तो करें ही अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वह भी करते चलें। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे और भी हसीन [संगीत] हो जाती है। उचले जमाने से ऐसे ही बहाने से लिए और दिए दिल जात [संगीत]