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जब राजेश खन्ना नहीं बोल पाते थे एक भी डायलॉग,फिर कैसे बने बड़े एक्टर?

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राजेश खन्ना के बहुत शुरुआती दिनों का है। यह तब का किस्सा है जब पहली बार राजेश खन्ना एक्टिंग की दुनिया में कदम रख रहे थे। हम बात थिएटर के दिनों की कर रहे हैं। लेकिन एक्टिंग की शुरुआत कैसे हो, कहां से हो? जतिन के पास इसके जवाब नहीं थे। जतिन यानी कि राजेश खन्ना और राजेश खन्ना बनने से पहले वह जतिन खन्ना ही थे। कॉलेज का एक दोस्त उन दिनों मुंबई की आईएटी ड्रामा कंपनी से जुड़ा हुआ था। और इस कंपनी के डायरेक्टर वी के शर्मा नाम के एक शख्स हुआ करते थे। वी के शर्मा के दोस्त थे मशहूर लेखक निर्देशक सागर सरहदी। सागर सरहदी वही जिन्होंने बाद में कभी-कभी और सिलसिला चांदनी जैसी मशहूर फिल्में लिखी और बाजार जैसी फिल्म को डायरेक्ट किया।

मुंबई के अंधेरी के अपने पुराने ऑफिस में चाय की चुस्कियों के साथ उन सुनहरे दिनों को याद करते हुए सागर सरहदी ने बाद के दिनों में एक इंटरव्यू में बताया था कि हमारे ग्रुप के सबसे ज्यादा अहम सदस्य वी के शर्मा ही थे। वह उत्तर प्रदेश से थे और उनका कद छोटा था लेकिन टैलेंट जबरदस्त था। दरअसल वह मल्टीटलेंटेड थे। नाटक लिखते थे, निर्देशित करते थे और उसमें अभिनय भी करते थे। जतिन उनको अपना गुरु मानता था। सागर सरहदी मुस्कुराते हुए बताते हैं कि उस दौर में वो इस नए लड़के जतिन को बहुत सीरियसली नहीं लेते थे। राजेश खन्ना को हर शाम आईएटी ड्रामा कंपनी के रिहर्सल के वक्त जतिन वहां पहुंच जाता और एक कोने में बैठकर नाटक की तैयारी कर रहे एक्टर्स को घूरता रहता। उसे यह उम्मीद रहती कि शायद किसी दिन वीके शर्मा की नजर उस पर पड़े और उसे पहला ब्रेक मिल जाए और इस इंतजार में कई महीने बीत गए। एक दिन मंडली का एक एक्टर बीमार पड़ गया और कुछ दिन तक रिहर्सल नहीं आया। जब शो का वक्त नजदीक आया तो वीके शर्मा को फिक्र होने लगी और उन्हें इस छोटे से रोल के लिए कोई एक्टर चाहिए था क्योंकि वह शख्स आ नहीं रहा था जो इस एक्टर में तय किया गया था। इसी दौरान वीके शर्मा की निगाह जतिन पर गई जो रोज की तरह एक कोने में खड़ा बड़े ध्यान से रिहर्सल को देख रहा था। उन्होंने जतिन को बुलाया और पूछा क्या तुम यह छोटा सा रोल करोगे?

जतिन ने फौरन हामी भर दी। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। इतने दिन से वह बस इसी मौके की तलाश में तो था और आज उसे उसका पहला रोल मिल रहा था। कुछ पलों के अंदर यह सब हो गया। उन पलों में मैंने जैसे एक सरहद को पार कर लिया और उस दुनिया का हिस्सा बन गया जिसके सपने मैं अब तक देखा करता था। लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि यह सब इतना मुश्किल है। यह बातें राजेश खन्ना ने बाद के दिनों में एक इंटरव्यू के दौरान कही थी। इस नाटक का नाम था मेरे देश के गांव। कुछ दिन बाद ही इसका मंचन नागपुर में होने वाला था और वहां पर राज्य स्तर की एक थिएटर प्रतियोगिता भी थी। उन दिनों जतिन के एक करीबी दोस्त हुआ करते थे हरिदत्त। पंजाब के रहने वाले हरिदत्त भी उन दिनों आईएटी ड्रामा कंपनी में बतौर एक्टर काम करते थे। नाटक में हरिदत्त की अहम भूमिका थी और हरिदत्त बताते हैं कि वह 3 मई 1961 का दिन था।

तारीख मुझे इसलिए याद है क्योंकि इस नाटक के लिए मुझे बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था। मैंने दिमागी रूप से एक कमजोर आदमी का किरदार निभाया था। जतिन का रोल बहुत ही छोटा था और उन्होंने एक दरबान का रोल किया था। मुझे याद है कि वह इतने नर्वस थे कि डर के मारे कांप रहे थे। हरिदत्त बताते हैं कि पूरे नाटक में जतिन को सिर्फ एक लाइन बोलनी थी। सिर्फ एक लाइन। और वो लाइन क्या थी? लाइन थी जी हुजूर साहब घर में हैं। और इस छोटे से डायलॉग के लिए भी जतिन ने जमकर रिहर्सल की। लेकिन जैसे-जैसे शो शुरू होने का समय नजदीक आ रहा था। जतिन का पसीना छूट रहा था। पहली बार स्टेज पर इतने लोगों के सामने डायलॉग बोलने का ख्याल ही उसे अंदर से बहुत नर्वस कर रहा था। आखिरकार शो शुरू हुआ और जल्द ही वह घड़ी आ गई जब जतिन को आगे बढ़कर अपना डायलॉग बोलना था। पहला डायलॉग सैकड़ों लोगों की आंखें अपने ऊपर जमी होने का डर और यह डरा देने वाला एहसास दिल की धड़कनें और उस धड़कनों की आवाज अब जतिन को अपने कानों तक आती हुई महसूस हो रही थी। वो आगे आया और फिर ठीक उसी पल उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

सालों बाद एक इंटरव्यू में उन पलों को याद करते हुए राजेश खन्ना ने कहा मेरी सारी मेहनत के बावजूद शो के दौरान मैं घबरा गया और अपनी लाइनें ही भूल गया। मैं शो में एक दरबान का रोल कर रहा था और मुझे बस एक लाइन बोलनी थी। जी हुजूर साहब घर में हैं। लेकिन घबराहट में मैंने कह दिया जी साहब हुजूर घर पर हैं। शो के डायरेक्टर मेरी गलती पर बहुत नाराज हुए और शो के बाद मैं किसी से मिले बिना ही वहां से भाग गया। यह बात सालों बाद राजेश खन्ना ने यह बात एक इंटरव्यू के दौरान कही थी। हरिदत्त जो राजेश खन्ना के करीबी थे वह याद करते हुए बताते हैं कि स्टेज से जाते वक्त जतिन की आंखों से आंसू गिर रहे थे। एक इंटरव्यू में उस वाक्य का जिक्र करते हुए जतिन ने माना कि उस रात उन्होंने बेहद अपमानित महसूस किया। घर पहुंचकर जतिन किसी से नजरें नहीं मिला पा रहा था। वो सीधा अपने घर में गया। लेकिन वहां सामने दीवार पर जैसे ही शीशे में खुद से नजरें मिली वो फौरन झुक गई। आज पहली बार पहली कोशिश में ही वो हारा हुआ महसूस कर रहा था। वो फूट-फूट कर रो पड़ा।

फिर उसने एक के बाद एक विस्की के कई पैग कुेल लिए ताकि जल्दी ही होश खोकर उसे नींद आ जाए। लेकिन उस रात नींद कोसों दूर थी। शराब के सुरूर में भी हार बेतहाशा चुभती रही। सालों बाद अपने एक इंटरव्यू में जतिन ने कबूल किया कि इस वाक्य ने उसके आत्मविश्वास को हिला कर रख दिया था और अगले दिन जतिन के दोस्तों ने उसकी हिम्मत बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन वह अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। उसे अपने आप पर इतनी शर्म आ रही थी कि उसने रिहर्सल पर जाना तक छोड़ दिया। हरिदत्त बताते हैं कि वह बहुत सेंसिटिव था और हर बात को दिल से लगा लेता था। मैं उससे कहता था कि यह सब तो होता रहता है। तू इतना रोता क्यों है? लेकिन वो सबसे ज्यादा परेशान इस बात से था कि उसके पिता उस पर बिजनेस को जॉइ करने का दबाव डाल रहे थे। जतिन अब अपने पिता से आंख मिलाने की हिम्मत भी उसके अंदर नहीं बची थी। वह क्या सोचेंगे इसी सपने के लिए तो उसने उनके काम को ठुकराया था और अब वो एक लाइन अगर ठीक से नहीं बोल पाया तो वह आगे क्या करेगा? खैर कुछ दिन बाद मुंह छिपाने के बाद आखिरकार जतिन रिहर्सल पर वापस लौटा। उसी थिएटर की दुनिया में अपने अहम को ताक पर रखकर और बाद में यही नाटक मेरे देश के गांव कंपनी के सबसे कामयाब नाटकों में से एक रहा। जतिन का आत्मविश्वास अब धीरे-धीरे वापस लौटने लगा। सागर सरहदी याद करते हुए बताते हैं कि हम उसे एक सीधे साधे लड़के के रूप में जानते थे जिसे एक्टिंग का बहुत शौक है। उसने मेरे लिखे दो नाटकों में भी काम किया। पहला था मेरे देश के गांव और दूसरा था और शाम गुजर गई। लेकिन एक एक्टर के तौर पर ना वीके शर्मा उसे गंभीरता से लेते थे और ना मैं। मगर इसके बावजूद जतिन का हर दिन बस इसी कोशिश में गुजर रहा था कि थिएटर की दुनिया के लोग उसे एक गंभीर एक्टर के रूप में पहचाने। देर रात तक वह थिएटर की मंडली के साथ वक्त बिताता था और यहां के माहौल में वह एक अजीब सी कोशिश करता हुआ अजीब सी कशिश महसूस करता था। हर शाम थिएटर से जुड़े जानेमाने नाम यहां बैठक जमाते।

इस महफिल में नई कहानियों, खबरों और किरदारों पर चर्चा होती। सिगरेट के धुएं से भरे कमरों में न जाने कितने नए विचार, रचनाएं और सपने जन्म लेते। रचनात्मकता जगाने वाली ऐसी महफिलों से वह एक जुड़ाव सा महसूस करने लगा था। और इन शामों को फिर वह कभी भूल नहीं पाया। उसकी मेहनत भी अब रंग लाने लगी थी। उसने इंटर कॉलेज थिएटर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। फिल्म निर्देशक रमेश तलवार बताते हैं कि हालांकि नाटकों में उन्हें बड़े रोल तो नहीं मिल रहे थे मगर वह किसी रोल के लिए ना नहीं करते थे। वो कहते हैं कि मेरे चाचा सागर सरहदी के लिखे नाटक और दिए बुझ गए में उन्होंने बड़े भाई का किरदार निभाया।

इस नाटक को वी के शर्मा ने निर्देशित किया था। यह पहला रोल था जिसमें उनके अभिनय की तारीफ हुई और एक कॉलेज फेस्टिवल में उन्हें अवार्ड भी मिला। अवार्ड लेते समय उनके चेहरे पर खुशी देखने लायक थी। इसके अलावा जतिन ने धर्मवीर भारती के मशहूर नाटक अंधा युग में भी एक छोटा सा रोल किया और इस नाटक को बाद में थिएटर जगत की मशहूर शख्सियत सत्यदेव दुबे ने निर्देशित किया था। संघर्ष के उन दिनों में जतिन को बहुत करीब से जानने वाले लोग उनकी जादुई मुस्कान को कभी नहीं भूले। सागर सरहदी अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उस लड़के में एक अजीब सा चार्म था। मुझे याद है कि हमारे ग्रुप में एक खूबसूरत लड़की थी गौरी। हम सब उस पर लाइन मारते थे। हमें तो खैर उसने कभी भाव नहीं दिया लेकिन राजेश खन्ना बस मुस्कुरा देता था। तो वह उसी के साथ बात करने लगती थी। उसकी जो मुस्कान थी उसमें बड़ी मासूमियत थी। थिएटर के मंच पर तो हमें उसका चार नजर नहीं आया मगर सिनेमा के पर्दे पर वो मुस्कान उभर कर सामने आई और उसने कमाल कर दिया। थिएटर ग्रुप में जतिन की पहचान बनने लगी थी और उसका आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा था। सपनों को पंख लग गए और अब वह थिएटर से आगे बढ़कर फिल्मों के आसमान में उड़ना चाहता था। और इस उड़ान की तैयारी में उसने अपनी तस्वीरों के साथ फिल्म निर्माताओं के दफ्तरों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। अब शाम थिएटर के रिहर्सल में और दिन फिल्मों में काम पाने की कोशिश में बीतने लगा। तकरीबन इसी समय जतिन के पास थिएटर डायरेक्टर बी एस थापा का बुलावा आया। थापा जतिन को लीड रोल में लेकर एक नाटक निर्देशित करना चाहते थे। जतिन की खुशी का ठिकाना नहीं था।

अगले ही दिन बीएस थापा ने जतिन को गैलोट्स रेस्टोरेंट में मिलने के लिए बुलाया। मुंबई के चर्च गेट के पास बना यह गैलोट्स रेस्टोरेंट उन दिनों काफी मशहूर था। यह एक महंगा रेस्टोरेंट था और यहां फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े जानेमाने नाम अक्सर नेटवर्किंग या मीटिंग करते नजर आते थे। इनमें कई निर्माता निर्देशक भी होते थे और यही वजह थी कि फिल्मों में काम पाने का अरमान लिए बहुत से स्ट्रगलर गैलट्स के आसपास फुटपाथ पर चक्कर लगाते पाए जाते। एक स्ट्रगल के तौर पर जतिन भी यहां अक्सर आता था और वह अक्सर अभिनेता सुनील दत्त, निर्माता निर्देशक जे ओम प्रकाश जैसी शख्सियतों को उम्मीद भरी नजरों से देखता। मगर कभी इन लोगों से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उस दिन जब जतिन बीएस थापा से मिलने गैलोट्स पहुंचने ही वाला था कि उसकी नजर रेस्टोरेंट के बाहर खड़ी एक बेहद खूबसूरत लड़की पर पड़ी। जतिन ने उस लड़की खासतौर पर उसके घने लहरदार बालों को बड़े ध्यान से देखा। फिर यह लड़की रेस्टोरेंट के अंदर चली गई और कुछ देर के बाद जब वह खुद गैलॉट्स रेस्टोरेंट के अंदर दाखिल हुआ तो उसने देखा कि बीएस थापा के साथ वही लड़की बैठी है। थापा ने उसे देखकर कहा आओ जतिन आओ इनसे मिलो।

यह है इस नाटक में तुम्हारी हीरोइन अंजू महेंद्रू। जतिन शर्मा कर अपने खास अंदाज में मुस्कुरा दिए। नया नाटक था। नई कहानी थी नई शुरुआत और अंजू महेंद्र अंजू महेंद्रू वही शख्सियत जो आगे चलकर राजेश खन्ना की जिंदगी का अहम हिस्सा बनी और तकरीबन 7 साल तक उनकी

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