एक ऐसा लड़का जिसने जब 23 साल की उम्र में कहा मां मैं देश के लिए पहली पीपल्स कार बनाना चाहता हूं तो भारत सरकार ने अपनी तिजोरिया खोल दी जब वह 28 साल का हुआ तो बोला माया मैं इस देश की सभी समस्याओं का हल निकाल दूंगा तो देश के तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री उसके सामने हाथ बांधकर खड़े हो गए और जिन्होंने उसके सामने आवाज उठाई वह सीधा सलाखों के पीछे पहुंच गए इस लड़के ने आपातकाल के 21 महीनों में देश को अपनी मनमर्जी से चलाया लाखों लोग की नसबंदी करवाई और आपातकाल के बाद अपनी मां की सत्ता में वापसी भी करवाई जी हां हम बात कर रहे हैं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लाडले बेटे संजय गांधी की जिन्हें कुछ लोग ऐसा दूरदर्शी नेता मानते थे जो भारत की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलने की ताकत रखता था जबकि कुछ लोग उन्हें ऐसा तानाशाह मानते थे जो अपनी मां की पावर और पोजीशन का गलत फायदा उठाकर हमेशा अपनी मनमानी करता था उसी संजय गांधी की मौत ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और कहा जाता है कि इंदिरा गांधी अपने बेटे के मौत के सदमे से कभी उभर नहीं पाई हमारे पिछले वीडियोस में हमने गांधी परिवार से जुड़े कई रहस्यों से पर्दा उठाया है जिन्हें आपका बहुत सारा प्यार मिला है और आज हम जानेंगे आखिर संजय गांधी की मौत कैसे हुई और इस हादसे के तुरंत बाद सबसे पहले अस्पताल पहुंचने वालों में अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर थे यह दोनों इंदिरा गांधी को शांत बना दे रहे थे तभी अचानक इंदिरा गांधी चंद्रशेखर को एक तरफ ले जाकर क्या बोली जिसे सुनकर अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर के पैरों तले जमीन खिसक गई और जहां संजय का प्लेन क्रैश हुआ था वहां इंदिरा गांधी दूसरी बार क्या खोजने गई थी और क्या वाकई में संजय गांधी का राजनीतिक कद इतना प्रभावशाली था कि हर राज्य का मुख्यमंत्री उनकी चिता के 200 मीटर के दायरे में मौजूद था तो कैसे निकली थी संजय गांधी की अंतिम यात्रा लेकिन उसके पहले प्लीज आप वीडियो को लाइक और चैनल को सब्सक्राइब कर दीजिए साल 1975 में आपातकाल लागू करने के 2 साल बाद इंदिरा गांधी ने अचानक लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी
लेकिन जनता को इमरजेंसी की इतनी गैरी चोट पहुंची थी कि कहा जाता है कि 1977 के चुनाव में अगर कांग्रेस के सामने बिजली का खंबा भी खड़ा हो जाता तो जनता उसे भी चुनाव जिता देती और हुआ भी यही 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी बुरी तरह से हार गई और देश में जनता पार्टी की सरकार बनी मगर महज ढाई साल में देश को समझ में आ गया कि जनता पार्टी के नाम पर जो लोग इकट्ठे हुए हैं वह सिर्फ अपनी ही पार्टी में राजनीतिक लड़ाइयां लड़ने में उलझे हुए हैं और फिलहाल वह देश को चलाने की काबिलियत नहीं रखते इसी बात का फायदा उठाते हुए इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की तैयारियां शुरू कर दी और जिसमें उनके बेटे संजय भी जी जान से जुट गए उन्होंने टिकट वितरण किया युवाओं को मौके दिए और 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो गई जिसके बाद संजय की सलाह पर ही उन्होंने नौ राज ों में जहां पर विरोधी दलों की सरकार थी वहां की विधानसभा भंग कर दी कहा गया कि देश में नया जनादेश हुआ है इन्हें भी नए सिरे से इसे मानना होगा चुनाव हुए और नौ में से आठ राज्यों में कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी संजय ने सभी राज्यों में अपने लोगों को सीएम की कुर्सी पर बिठाया दोस्तों संजय की सत्ता में वापसी और संगठन पर मजबूत पकड़ का यह सिलसिला चली रहा था कि इसी बीच इंदिरा गांधी ने संजय को कांग्रेस पार्टी महासचिव बना दिया साथ ही अमेठी से चुनाव जीतकर सांसद भी बन चुके थे अब पूरे देश संजय को इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में देखने लगा था इसलिए तमाम बूढ़े पुराने नेता भी घुटने मोड़कर दंडवत करने लगे थे मुख्यमंत्रियों को तो अपनी ऑक्सीजन ही यहीं से मिलती थी मगर इसी बीच आया 23 जून 1980 का वो काला दिन जिस दिन एक ऐसा भयंकर हादसा हुआ जिसने देश की राजनीति के समीकरण को हिलाकर रख दिया
यह हादसा था महज 33 वर्ष की आयु में इंदिरा गांधी के लाडले बेटे संजय गांधी की मौत का लेकिन संजय गांधी के जीवन के अंतिम 24 घंटों में क्या हुआ था चलिए जानते हैं इंदिरा गांधी के बेटे राजीव और संजय दोनों को गति और मशीनों से गहरा लगाव था दोनों पायलट थे लेकिन एक ओर जहां राजीव विमानन नियमों का पालन करते थे तो वहीं संजय हवाई जहाज को कार की तरह चलाया करते थे उन्हें हवा में काला बाजी दिखाने का बड़ा शौक था इसलिए उनके साथ जहाज की सवारी करना हर किसी के बस की बात नहीं थी और जून 1980 में उनके हाथ लगा पिट्स s2a विमान एक ऐसा टू सीटर हवाई खिलौना जिसे उड़ाकर कतब करने के लिए संजय बेताब हो गए दरअसल 1977 से ही इंदिरा परिवार के नजदीकी धीरेंद्र ब्रह्मचारी पिट्स s2a विमान इंपोर्ट करना चाहते थे जिसे खास तौर पर हवा में कला बाजियां खाने के लिए बनाया गया था लेकिन जनता पार्टी की सरकार से उन्हें अनुमति नहीं मिल रही थी मगर इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी होते ही उन्हें अनुमति दे दी गई और आनंद फानन में उसे असेंबल करर सफदर जंग हवाई अड्डे स्थित दिल्ली फ्लाइंग क्लब में पहुंचा दिया गया और 21 जून 1980 के दिन संजय उस जहाज पर हाथ आजमाने के लिए हवाई अड्डे पर पहुंचे जहां उनकी मुलाकात धरेंद्र ब्रह्मचारी से हुई जो कश्मीर से एक चार्टर्ड प्लेन से वापस लौटे थे तभी संजय बोले आइए स्वामी जी आपको हवा की सैर एक बार फिर से करवाता हूं लेकिन धीरेंद्र ने कहा संजय मैंने तुम्हारी चपलता के किस्से सुने हैं मुझे बख्श दो इस दिन संजय ने पहली बार पिट्स s2a विमान की रफ्तार का स्वाद चखा और वह इसके इतने कायल हो गए कि अगले दिन अपनी पत्नी मेनका गांधी और मां के सहायक आर के धवन को लेकर एयरपोर्ट पहुंच गए और दोनों को बारी-बारी से जहाज में बिठाकर
40 मिनट तक दिल्ली के आसमान की सैर कराते रहे उन्होंने अपने स्टंट्स से इन दोनों को इतना डरा दिया कि घर आकर मेनका ने इंदिरा गांधी को शिकायत करते हुए कहा कि मां प्लीज आप संजय को कहिए कि वह प्लेन कभी ना उड़ाए और आर के धवन ने भी इंदिरा गांधी से कहा मैडम प्राइम मिनिस्टर मैं आज के बाद कभी भी संजय के साथ सवारी नहीं करूंगा इंदिरा के लिए यह सुनना नया नहीं था क्योंकि राजनीति से जुड़े तमाम लोगों ने कभी ना कभी संजय की शिकायत करते हुए इंदिरा गांधी से कहा था कि वह सुरक्षा नियमों को भंग करते हैं कोल्हापुरी चप्पल पहनकर जहाज उड़ाते हैं वगर इसलिए अब इंदिरा गांधी अपना मन बना चुकी थी कि वह संजय से कह दें कि बेटा तुम्हें इस देश को संभालना है इसलिए एयरक्राफ्ट संभालना और उस पर भी इस तरह की हरकतें करना बंद करो लेकिन वह संजय से बात कर पाती उससे पहले ही संजय एक ऐसी उड़ान पर चले गए जहां से कभी वापस नहीं लौट पाए यह वक्त था 23 जून की सुबह 7:00 बजे का संजय ने पहले ही माधव राव सिंधिया को इस नए विमान की सैर करवाने का प्रस्ताव दे दिया था लेकिन उनसे रहा नहीं गया और वह अपनी हरे रंग की मेटाडोर कार को तेजी से भगाते हुए दिल्ली फ्लाइंग क्लब के चीफ इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के घर पहुंच गए जो सफदर जंग हवाई अड्डे के पास ही रहते थे और जैसे संजय ने उनके साथ उड़ान भरने के लिए कहा कैप्टन सखना भी संजय के साथ जहाज में सवार हो गए ठीक 758 पर उन्होंने टेक ऑफ किया हमेशा की तरह संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाकों के ऊपर ही जहाज में कतब दिखाना शुरू किया संजय और कैप्टन सक्सेना अशोका होटल के ऊपर गोल-गोल नाच रहे थे एयरक्राफ्ट अपने नाम के मुताबिक काम कर रहा था लेकिन 10 मिनट बीतने के के बाद संजय इसे खतरनाक नीचा पर लाकर गोते खिलाने लगे उन्होंने तीन लूप लगाए लेकिन चौथे लूप लगाने से पहले ही कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है ऊपर संजय ने प्लेन के नियंत्रण को खोया और फिर यह पिट्स विमान घर की आवाज करता हुआ डिप्लोमेटिक एंक्लेव में संजय के घर से कुछ ही मिनट की एरियल दूरी पर नाक के बल क्रैश हो गया कंट्रोल टावर में बैठे विमान को देख रहे लोगों के मुंह खुले के खुले रह गए इधर सख सेना का सहायक अपनी साइकिल लेकर तेजी से घटनास्थल की तरफ भागा और उसी ने सबसे पहले क्रैश हुए प्लेन को देखा उसने बताया बिल्कुल नया पिट्स टू सीटर मुड़ी हुई धातु में बदल चुका था उसमें से गहरा काला धुआं निकल रहा था लेकिन उसमें आग नहीं लगी थी करीब 15 मिनट में माको पर एंबुलेंस और एयरक्राफ्ट पहुंचे डालियां काटी गई जहाज के मलबे के बीच से संजय और कैप्टन सक्सेना की लाश निकाली गई दरअसल ब्रेन हैम्रेज के चलते दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी उन्हें वहीं स्ट्रेचर पर लाल कंबल से ढक दिया गया
इधर प्रधानमंत्री निवास मेयार के धवन को खबर मिली और वह जोर से चिल्लाते हुए बोले बहुत बड़ा हादसा हो गया है बिखरे हुए बालों में इंदिरा गांधी दफ्तर से बाहर निकली और धवन के साथ एंबेसडर कार में सवार होकर घटना स्थल पर पहुंची जहां वह अपने राजनीतिक उत्तराधिकार हों और अपने कलेजे के टुकड़े अपने दाहिने हाथ संजय गांधी की लाश को देखकर फूट फूट कर रोने लगी संजय के शव को राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया इस एंबुलेंस में इंदिरा गांधी भी सवार थी और वहां डॉक्टर ने संजय और सुभाष दोनों को मृत घोषित कर दिया इस हादसे के बाद सबसे पहले अस्पताल पहुंचने वालों में अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर थे यह दोनों इंदिरा गांधी को सांत्वना दे ही रहे थे तभी इंदिरा चंद्रशेखर को एक तरफ ले जाकर बोली मैं कई दिनों से आपसे असम के बारे में बात करना चाहती हूं वहां के हालात गंभीर हैं च शेखर ने कहा कि इस बारे में बाद में बात करेंगे इंद्रा ने जवाब दिया नहीं नहीं यह मामला बहुत महत्त्वपूर्ण है यह सुनकर चंद्रशेखर आश्चर्य चकित रह गए एक मां कैसे असम के बारे में बात कर सकती है जबकि उसके बेटे का शब बगल के कमरे में पड़ा हुआ है उसी शाम अटल बिहारी वाजपेई जीन्ने हेमवती नंदन बहुगुणा से इस बारे में बात करते हुए कहा था या तो उन्होंने दुख को आत्मसात कर लिया और या फिर वोह पत्थर बनी है वो शायद यह सिद्ध करना चाह रही थी कि इस कठिन घड़ी में भी वह असम और भारत की समस्याओं के बारे में सोच रही है इंदिरा गांधी के बारे में लिखने वाले बताते हैं कि एक तरफ डॉक्टर संजय गांधी के शव को ठीक करने की कोशिश में लगे हुए थे दूसरी तरफ इंदिरा गांधी एक बार फिर उस जगह गई जहां संजय का प्लेन क्रैश हुआ था बाद में अफवाह फैलाई गई कि उस जगह इसलिए गई थी क्योंकि शायद संजय के पास एक डायरी और कुछ लॉकर्स की चाबियां थी जो इंदिरा गांधी को चाहिए थी लेकिन इन अफवाहों में सच्चाई नहीं थी बल्कि वह अपने बेटे संजय को ढूंढ रही थी और जहाज के बिखरे हुए टुकड़े को देख उन्हें ऐसा हुआ कि अब संजय कभी वापस नहीं आएंगे वहां से वापस आकर इंदिरा गांधी ने अपनी बहू मेनका समेत कैप्टन सक्सेना की पत्नी और मां को भी
दिलासा दिलाया जिसके बाद वह उस कमरे में गई जहां संजय का शौ रखा था और डॉक्टर से बोली अब आप मुझे अपने बेटे के पास कुछ मिनटों के लिए अकेला छोड़ दीजिए डॉक्टर्स थोड़ा झज के लेकिन इंदिरा ने उन्हें शक्ति से बाहर जाने के लिए कहा ठीक चार मिनट बाद वह कमरे से बाहर निकली उस कमरे में गई जहां मेनका बैठी हुई थी और उन्हें बताया संजय अब इस दुनिया में नहीं है फिर इंदिरा गांधी अपनी देखरेख में संजय के शब को एक बार अकबर रोड ले आई जहां उसे बर्फ की सिलियो में एक प्लेटफार्म पर रखा गया उनकी एक आंख और सिर पर अभी भी पट्टी बंधी हुई थी और नाक बुरी तरह से कुचली हुई थी संजय के बड़े भाई राजीव गांधी अपनी बीवी सोनिया और बच्चे राहुल और प्रियांका के साथ छुट्टी मनाने इटली गए हुए थे जिनके लौटने का इंतजार किया गया अगले दिन संजय के अंतिम संस्कार के समय इंदिरा पूरे समय मेनका काहा अपने हाथ में लिए रही दोस्तों जब संजय का जनाजा निकला तो उसके आसपास चलने वाली भीड़ ने उनके राजनीतिक कद की गवाही दे रही थी हर राज्य का मुख्यमंत्री चेता से 200 मीटर के दायरे में मौजूद था दिल्ली में मौजूद हर देश का प्रतिनिधि कतार लगाकर खड़ा था रेडियो पर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए शोक धुन बज रही थी अगले रोज यानी 24 जून को मद्रास में पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी का भी निधन हुआ था मगर लोगों का ध्यान सिर्फ और सिर्फ संजय की मौत की तरफ था राज थापर अपनी किताब ऑल दीज इयर्स में लिखते हैं कि संजय की मौत पर लोग रोए और पूरा देश गमगीन हो गया क्योंकि यह अ दुखद घटना तो थी ही लेकिन इससे विडंबना ही कहिए कि इसके साथ ही लोगों में एक अजीब किस्म की राहत भी थी
जिसे पूरे भारत में महसूस किया गया हालांकि अपने निजी दुख का बहाना बनाकर इंदिरा गांधी ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा बल्कि संजय की मौत के चार दिन के अंदर यानी 27 जून को इंदिरा साउथ ब्लॉक के अपने दफ्तर में फाइलों पर ऐसे दस्तखत कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही ना हो लेकिन संजय की मौत का गम उन्हें जिंदगी भर सताता रहा कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि इंदिरा गांधी कभी अपने बेटे की मौत के गम से उभर नहीं पाई पुपुल जंकर अपनी किताब इंदिरा गांधी में लिखती हैं इंदिरा गांधी कई दिनों तक रात को अचानक नींद से उठ जाती और घर में संजय को ढूंढने लगती रो-रो कर उनकी तबीयत बिगड़ गई थी कुछ ही दिनों में उनका खिला-खिला चेहरा मुरझाया और दुखी दिखने लगा और उनकी आंखों के चारों तरफ काले गड्ढे बन गए वास्तव में अपने जीते जी बेटे को मरते हुए देखने का मां का दर्द इतना गहरा होता है जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते तो आज के लिए बस इतना ही अब आप हमें कमेंट्स में बताइए कि आप संजय गांधी को एक पढ़ा लिखा दूरदर्शी नेता मानते हो जो देश की नियती बदलने की ताकत रखते थे या फिर एक ताकतवर मां का बिगड़ा हुआ बेटा जिन्हें सिर्फ अपनी मनमानी करने आता था ये वीडियो अच्छी लगी हो तो इसे लाइक शेयर करें 11000 लाइक्स के लक्ष्य को हासिल करने में हमारी मदद कीजिए और ऐसे ही किस्से कहानी सुनते रहने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके पास वाली घंटी बजाना मत भूलिए जय हिंद जय भारत