जहां हम हिंदी और पंजाबी सिनेमा के उन कलाकारों की बातें करते हैं जिनका नाम आज भले ही कम लिया जाता है लेकिन जिनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता आज की कहानी एक ऐसी अभिनेत्री की है जिसने लाहौर की फिल्मी दुनिया से अपना सफर शुरू किया पंजाब में अपनी नृत्य कला और अदाकारी से पहचान बनाई फिर बंटवारे के दरस से गुजरते हुए मुंबई पहुंची और वहां राज कपूर जैसे महान कलाकार ने उन्हें एक अहम मौका मौका दिया।
इनका नाम था चांद। पंजाब की फिल्मों में उन्हें एक खूबसूरत उपनाम मिला था। डांसिंग लिली ऑफ द पंजाब यानी पंजाब की नाचती हुई कली। आज की पीढ़ी उन्हें एक और वजह से भी जानती है क्योंकि वे बॉलीवुड स्टार रणवीर सिंह की दादी हैं।
लेकिन चांदबर्ग की अपनी कहानी भी उतनी ही दिलचस्प संघर्षों से भरी और यादगार है। चांदबर्ग का जन्म 2 फरवरी सन 1932 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। वह एक पंजाबी क्रिश्चियन परिवार से संबंधित रखती थी। उनका परिवार बड़ा था। बताया जाता है कि वह 12 भाई बहनों में से एक थी। उनके परिवार में शिक्षा, साहित्य और सरकारी सेवा का अच्छा माहौल था। उनके दादा चौधरी अल्लादिता ने ईसाई धर्म अपनाया था।
उनके पिता जनाब खैरुद्दीन अपने गांव के पहले ग्रेजुएट थे और स्कूल हेड मास्टर के रूप में काम करते थे। वह उर्दू शायरी भी [संगीत] लिखते थे और उनका तखल्लुस था बुर्ख जिसका अर्थ होता है बिजली। बाद में यही नाम अंग्रेजी रूप में बर्क बन गया। यानी चांद भत्ते का नाम सिर्फ एक फिल्मी नाम नहीं था बल्कि उनके पीछे उनके परिवार [संगीत] की साहित्य और सांस्कृतिक पहचान भी जुड़ी हुई थी। उनके भाई सैमुअल मार्टिनबर्ग भी बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वह इंडियन सिविल सर्विज में रहे और बाद में पाकिस्तान के लिए राजनायक भी बने।
इस तरह चांदबर्ग का बचपन एक पढ़े लिखे और सांस्कृतिक माहौल में बिता। लेकिन उनका मन कला नृत्य और अभिनय की दुनिया में था। चांदबर्ग ने अपने फिल्मी करियर की [संगीत] शुरुआत बहुत कम उम्र में की थी। उनकी पहली फिल्म थी कहां गए? जो साल 1946 में आई थी। इस फिल्म में उन्होंने सलमा का किरदार निभाया था। उस दौर में लाहौर फिल्म इंडस्ट्री बहुत सक्रिय थी। बंटवारे से पहले लाहौर उत्तर भारत की फिल्मी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। पंजाबी और हिंदी उर्दू फिल्मों का बड़ा काम वहां होता था। चांद वर्ग ने लाहौर में बनी कई फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे वे एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में पहचानी जाने लगी जो अभिनय के साथ-साथ नृत्य में भी कमाल थी।
यही वजह थी कि उन्हें कहा जाने लगा डांसिंग लिली ऑफ पंजाब। यह उपनाम अपने आप में बताता है कि चांदबर्ग सिर्फ एक सामान्य अभिनेत्री नहीं थी बल्कि उनकी स्क्रीन [संगीत] प्रेजेंस, उनका नृत्य, उनका अंदाज लोगों को आकर्षित करता था।
साल 1947 में भारत का विभाजन हुआ। इस बंटवारे ने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी। घर, शहर, रिश्ते, कारोबार और सपने सब कुछ टूट गए। फिल्म कलाकार भी इससे अछूते नहीं रहे। लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई कलाकारों को अपना शहर छोड़कर जाना पड़ा। कुछ पाकिस्तान में रह गए और कुछ भारत में आ गए। चांदबर्ग भी किसी उथल-पुथल के दौर में मुंबई यानी उस समय के बॉम्बे आ गए। लेकिन मुंबई आना आसान नहीं था। लाहौर में जो पहचान बनी थी उसे यहां फिर से नए सिरे से बनाना था। फिल्म इंडस्ट्री में हर कलाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है नया मौका मिलना और चांदबर्ग के सामने भी यही चुनौती थी।
उनका करियर बंटवारे के कारण प्रभावित हुआ। अगर विभाजन ना हुआ होता तो शायद उनका फिल्मी सफर और भी अलग दिशा में जाता। लेकिन हालात ने उन्हें मुंबई की नई फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने के लिए मजबूर कर दिया। मुंबई में चांदबर को बड़ा मौका मिला। राज कपूर की फिल्म बूट पॉलिश से। यह फिल्म साल 1954 में आई थी। राज कपूर भारतीय सिनेमा के उन निर्माताओं और अभिनेताओं में से थे जो सामाजिक विषयों को भावनात्मक और मनोरंजन तरीके से पेश करते थे। बूट पॉलिश भी ऐसी ही फिल्म थी ।
जिसमें गरीबी, बच्चों की मजबूरी और समाज की कठोर सच्चाइयों को दिखाया गया था। इस फिल्म में चांदबर्ग ने कमला देवी का किरदार निभाया। उनका रोल बहुत महत्वपूर्ण था। वह फिल्म में बेबी नाज और रतन कुमार के किरदारों की सताने वाली आंटी के रूप में दिखाई दी। यह किरदार नकारात्मक छाया लिए हुए था। लेकिन चांद बख्त ने इसे बहुत असरदार ढंग से निभाया। उनकी स्क्रीन पर मौजूदगी ऐसी थी कि दर्शकों को उनसे चिढ़ भी होती थी और यही एक कलाकार की सफलता होती है जब दर्शक किरदार को महसूस करते हैं। गुड पॉलिश ने चांद बर्फ को हिंदी सिनेमा में पहचान दिलाई।
राज कपूर जैसे फिल्मकार का भरोसा मिलना उनके लिए बड़ी बात थी। चांदबर्ग ने सिर्फ एक दो फिल्में नहीं बल्कि कई हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम किया। उनकी फिल्मोग्राफी बताती है कि वे अलग-अलग तरह के किरदार निभातेने में सक्षम थी। 1948 में फिल्म दुखियारी में नजर आई। 1951 में उन्होंने सब बाग और पंजाबी फिल्म पोस्टी में काम किया। पोस्टी में उनका किरदार भाग भरी था। 1953 में वे आग का दरिया में दिखाई दी। हालांकि इसमें उनका रोल अनक्रेडिटेड बताया जाता है। इसी साल पंजाबी फिल्म कोडेशा में उन्होंने पूनम का किरदार निभाया। 1954 में उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण साल रहा। इसी साल उनकी फिल्म बूट पॉलिश आई। इसके अलावा वे फेरी, अमर कीर्तन, गुलबहार और बंजारा जैसी फिल्मों में भी नजर आई।
1955 में उन्होंने रफ्तार और शाही चोर में काम किया। 1956 में मशहूर फिल्म बसंत बहार में लीलाबाई के रोल में दिखाई दी। 1957 में फिल्म दुश्मन उन्होंने राम सिंह की मां का किरदार निभाया। 1958 में वे अदालत लाजवंती और सोहनी महीवाल जैसी [संगीत] फिल्मों में नजर आए। 1960 में उनकी फिल्म आई घर की लाज, रंगीला राजा और श्रवण कुमार।
1964 में वे अपने हुए पराए में राम प्यारी बनी। 1965 में उन्होंने मोहब्बत इसको कहते हैं। मैं कुंदन की मां का रोल निभाया। 1967 में वो मेरा भाई मेरा दुश्मन में दिखाई दी। 1968 में कहीं दिन कहीं रात में उन्होंने प्राण के साइंटिस्ट असिस्टेंट का रोल किया। 1969 में वे पंजाबी फिल्म प्रदेश में राखी के किरदार में नजर आई। यह सूची दिखाती है कि चांदबर्ग ने लगभग दो दशकों तक फिल्मों में लगातार काम किया।
चांदबर्ग की सबसे बड़ी खासियत थी कि उन्होंने बहुमुखी प्रतिभा व सिर्फ ग्लैमर तक सीमित अभिनेत्री नहीं की। उन्होंने मां हंटी सहायक किरदार नकारात्मक छाया रोल वाले पंजाबी फिल्मों में किरदार भी निभाए। उनका नृत्य उन्हें बाकी अभिनेत्रियों से अलग बताया गया। डांसिंग बिल्ली ऑफ द पंजाब जैसे नाम यूं ही नहीं मिला। उस समय की फिल्मों में नृत्य भाव मनचिन्ह अंदाज का बहुत महत्व था। चांदबर की कला में यह सब मौजूद था।
मुंबई आने के बाद उन्होंने शायद वैसा बड़ा स्टारडम नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। लेकिन उन्होंने जो भी किरदार निभाया उनमें अपनी छाप छोड़ी। उनका सफर हमें यह भी याद दिलाता है कि फिल्म इतिहास में कई कलाकार ऐसे हैं जिन्हें मुख्य नायक नायका जैसे लोकप्रियता नहीं मिली। लेकिन उन्होंने फिल्मों को मजबूत बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। अब आगे बात करते हैं। एक सवाल उठता है कि इतनी प्रतिभाशाली अभिनेत्री जिसने लाहौर से लेकर मुंबई तक काम किया जिसका नाम डांसिंग लेडी ऑफ पंजाब था। आज आम दर्शकों की यादों से क्यों दूर चली गई? इसका एक बहुत बड़ा कारण है इतिहास का बदलता दौर। भारत विभाजन ने कई कलाकारों के करियर को झटका दिया। लाहौर से मुंबई आने वाले कलाकारों को अपनी पहचान दोबारा बनानी पड़ी।
अब उनकी विरासत की अगर बात करें तो वे उस लाहौर फिल्म इंडस्ट्री की प्रतिनिधि से बंटवारे से पहले भारतीय उपमहाद्वीप की फिल्मों को बहुत ही कलाकार दिए थे। अब एक और आपको बात दोस्तों बताते हैं। चांदबर्ग की कहानी हमें बताती है कि सिनेमा का इतिहास सिर्फ बड़े सितारों की चमक से नहीं उन कलाकारों की मेहनत से भी बनता है जो छोटे बड़े हर किरदार में जान डाल देते हैं। चांदबर्ग का निधन 28 दिसंबर सन 2008 को हुआ। लेकिन उनका योगदान हिंदी और पंजाबी सिनेमा के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा।