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एक ह- त्या!रा एक्टर जिससे कांपता था पूरा बॉलीवुड।

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भारतीय सिनेमा में कभी एक ऐसा सुपरस्टार था जिसकी फिल्में फ्लॉप भी हो जाया करती थी। तब भी वह अपनी फीस जरूर बढ़ाते थे। जिसकी शेर जैसी आवाज सुनकर बड़े से बड़ा खलनायक भीगी बिल्ली बन जाया करता था। पीछे चले चले मैं फेल नहीं हुआ इसलिए 1 लाख बढ़ेगा। असली बता रहा हूं आपसे। पर एक दिन ऐसा भी आया जब वह अपनी इसी गरस्ती आवाज को सुनने के लिए तरस गए। उसे हमारी जिंदगी का नाटक पसंद नहीं आया और उसने हम पर पर्दा गिरा दिया।

जो कलाकार अपने आगे बड़े से बड़े सुपरस्टार को भी कुछ नहीं समझा करते थे। फिर चाहे वो ही धर्मेंद्र हो या एंग्री मैन अमिताभ बच्चन हो। आप बाहर जाइए और फिर हमारी इजाजत लेकर अंदर आइए। चाहे वो बॉलीवुड का कितना बड़ा डायरेक्टर हो या सुपर डांसर गोविंदा हो। यहां तक कि हमारे भाईजान सलमान खान तक को भी उन्होंने नहीं छोड़ा। ठीक है। बोटिया नोचने वाला गीदड़ गला फाड़ने से शेर नहीं बन जाता।

जी हां दोस्तों, हम राजकुमार जी की बात कर रहे हैं। यह सिर्फ नाम के ही राजकुमार नहीं थे बल्कि सच के राजकुमार थे। हम उन बादशाहों में से हैं जिन पर किसी भी दौर का असर नहीं होता। भारतीय सिनेमा को जब उन्होंने अलविदा कहा तो दर्शकों के मुंह से सिर्फ यही निकला कि आज सिनेमा जगत का राजकुमार चला गया। इनमें वह रवाब था कि पर्दे पर सिर्फ इनके जूते ही दिखाई दे जाते। दर्शक उठकर तालियां बजाने लगते। तो आज हम इस वीडियो में राजकुमार जी के जीवन से जुड़े कुछ ऐसे आश्चर्यजनक और मनोरंजक किस्सों को आपको बताएंगे जिसको आपने अभी तक किसी भी एक वीडियो में नहीं देखा होगा।

बाजार के किसी साक्षात दर्जी को बुलाकर अपने कफ़न का माप दे दो। डीके 24 घंटे के अंदर-अंदर हम तुम दोनों की अर्थी देखकर ही अपने मुंह में पानी डालेंगे। जी हां दोस्तों, आपको पता है बॉम्बे का एक खूंखार पुलिस ऑफिसर कैसे बन गया भारतीय सिनेमा का सुपरस्टार? पर क्या आपको पता है कि दिलीप कुमार और राजकुमार ने एक फिल्म में काम करने के बाद आखिर क्यों 32 सालों तक किसी फिल्म में एक साथ काम नहीं किया? भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन को इन्होंने ऐसी क्या बात कह दी थी कि अमिताभ बच्चन सर झुका कर चुपचाप चले गए।

सिनेमा जगत के महान डायरेक्टर की जब इन्होंने जोरदार बेज्जती की तब उस डायरेक्टर ने अपनी बेज्जती का बदला कैसे लिया? हमसे जमाना खुद है। जमाने से हम नहीं। आपको पता है कि जिसे हम सिनेमा जगत के जानी यानी कि राजकुमार नाम से जानते हैं। उन्होंने असल में एक आदमी को क्या जान से मार दिया था? सब इंस्पेक्टर रानी जलकर राख हो गया। क्या है सोमैन राज कपूर के राजकुमार को कहने की पूरी कहानी?

सिनेमा जगत के किसी भी शख्स को उनकी मौत की खबर ना दी जाए। राणा की शतरंज का घोड़ा अड़ाई घर नहीं चलता। सीधे राजा को मारता है। राजकुमार का जन्म 8 अक्टूबर 1926 को बलूचिस्तान के लोरालाई इलाके में एक साधारण कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ। जहां सुविधाएं तो कम थी मगर सपने तो अनगिनत थे। इनकी माता का नाम धनराज रानी पंडित और पिता का नाम जगदीश्वर नाथ पंडित था और इनका बचपन का नाम कुलभूषण नाथ पंडित था। पढ़ाई के सिलसिले में इनका परिवार सीधे मुंबई आ गया।

राजकुमार भी पढ़ने में बेहद अव्वल थे और इसी के चलते इन्हें मुंबई में सब इंस्पेक्टर की नौकरी मिल गई। पहचाना हमें जेलर जेलर राणा प्रताप सिंह। अब इनकी कद काठी तो लंबी चौड़ी थी ही। तो अक्सर थाने में सारे मित्र कहते यार तुम्हें तो फिल्मों में होना चाहिए। तुम बिल्कुल हीरो लगते हो। हवाओं के टकराने से पहाड़ में सुराख नहीं हुआ करते। पर राजकुमार तो इसे हमेशा हंसी में ही टाल देते। वैसे थाने में अक्सर फिल्म से जुड़े लोगों का आना जाना बना रहता। और ऐसे में एक दिन डायरेक्टर बलदेव दुबे थाने में आए और जब वो राजकुमार से मिले तो राजकुमार के बोलने के अंदाज से बहुत प्रभावित हुए। वो राजकुमार से बोले तुम फिल्मों में काम करोगे?

हमें मालूम है ये तो जूते तुम्हारे मुंह के सामने रखे हैं। तुम जैसे गद्दारों से हम नहीं हमारे जूते ही मुंह लगाते हैं। पर राजकुमार साहब का तो एक अपना ही अंदाज था। उन्होंने इस बात को सुना और मुस्कुरा कर चल दिए। पर डायरेक्टर बलदेव दुबे की आंखों में राजकुमार तो बस गए थे। और जब वो थाने से जाने लगे तो थाने के कर्मचारियों से बोले राजकुमार से बोल देना मैं एक फिल्म बना रहा हूं। जिसमें उन्हें मैं बतौर हीरो लेना चाहता हूं। फिर क्या था? राजकुमार दोस्तों के बहुत समझाने पर उस फिल्म शाही बाजार में काम करने के लिए तैयार हो गए। राजकुमार साहब ने सब इंस्पेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया था। और कानून की हिफाजत करने वाला सब इंस्पेक्टर रानी जलकर राख हो गया। अब वो शाही बाजार फिल्म के हीरो बन गए थे।

पर इस फिल्म के बनने में काफी समय लग रहा था। और उसी बीच उन्होंने 1952 में रंगीली फिल्म में एक छोटी सी भूमिका निभाई। तो कहा जाए तो राजकुमार की पहली फिल्म रंगीली ही होगी। पर यह फिल्म कब आई और कब चली गई पता ही नहीं लगा। उसके बाद जब इनकी शाही बाजार फिल्म आई तो यह फिल्म भी औंधे मुंह गिरी। अब वही परिचित लोग जो राजकुमार को हीरो बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे वो कहने लगे थे यार तुम्हारा चेहरा तो खलनायक की तरह लगता है। तुम किसी फिल्म में खलनायक का रोल करो। इसी कसमकश में राजकुमार को एक के बाद एक जो फिल्म मिली वो करते चले गए जैसे अनमोल, सहारा, घमंड, अवसर, नीलमणि और यह सभी की सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हुई। पर कहते हैं ना मुंबई जादुई माया नगरी है। किसे पता था कि यह कलाकार भारत की तरफ से पहली बार ऑस्कर में नॉमिनेट होने वाली फिल्म का एक किरदार होगा। लाला से पैसे मांगूं? कोई जरूरत नहीं सुखी लाला से पैसे मांगने की। जैसे बहन मर गया सारे घर को मर जाने देना।

किसे पता था कि भारत की तरफ से पहली बार ऑस्कर के लिए नॉमिनेट होने वाली फिल्म में यह लीड रोल करेंगे। जब 1957 में इन्हें मौका मिला महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया में राधा के पति का किरदार निभाने का। वैसे पहले इस किरदार के लिए दिलीप कुमार साहब को लिया गया था।

उन्होंने इस फिल्म में काम करने से मना कर दिया और फिर यह रोल मिला राजकुमार साहब को। करना है तो कर प्यार ना डर बीती उम्र आएगी ना कल अरे पागल अरे पागल और इस किरदार को राजकुमार साहब ने मानो अमर कर दिया था शायद राजकुमार के अब अच्छे दिन शुरू हो गए थे कितना नमक है तेरे हाथ में किधर है नमक देखो अरे बाप रे भर का नमक सब तुझ में ही आ गया राधा और कमाल तो तब हुआ जब इन्होंने 1959 में दिलीप कुमार साहब के साथ पैगाम फिल्म में काम किया। आपको पता है कि इस फिल्म में दोनों कलाकारों के बीच में ऐसी टकरार हुई कि 35 सालों तक इन दोनों ने किसी फिल्म में एक साथ काम ही नहीं किया। जी हां दोस्तों, यह कोई फिल्मी टकरार नहीं थी।

।यह दोनों की जिंदगी में निजी टकरार थी। क्या किया है मैंने? जो कुछ तूने किया है रतन, उस पर आज सारा गांव हंस रहा है। बोलता क्यों नहीं? क्या यह सच है कि तू उस आरा लड़की को अपने साथ घूमता फिरता? दरअसल यह किस्सा कुछ यूं है कि राजकुमार दिलीप कुमार के बड़े भाई का रोल कर रहे थे। एक सीन में राजकुमार को दिलीप कुमार के गाल पर थप्पड़ मारना था। पर शायद राजकुमार साहब एक्टिंग करने में इतना मशगूल हो गए कि उन्हें पता ही नहीं लगा कि वो इस समय एक्टिंग कर रहे हैं। उन्होंने थप्पड़ बहुत तेज मार दिया।

इजाजत मांगता हूं। मैं उसी लड़की से शादी करना। शादी दिलीप साहब को लगा कि राजकुमार ने जानबूझकर यह सब किया है। इसके बाद दोनों में खूब बहस हुई। धीरे-धीरे यह बहस, टकरार और फिर समय के साथ-साथ दुश्मनी में बदल गई। आज इसी भाई ने जरा गुस्से में हाथ उठा लिया तो तेरा इतना बड़ा अपमान हो गया। दोनों एक दूसरे की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करते। पर यह चैप्टर 35 साल बाद फिर खुला।

उसकी बात हम आगे करेंगे। 1959 में इनकी एक और फिल्म आई दिले मंदिर। इसमें यह कैंसर के मरीज बने थे। इस फिल्म में इनकी अदाकारी को लोग देखते ही रह गए और इस मूवी के लिए इन्हें अपना पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला। लेकिन डॉक्टर ये ये दर्द आजकल कुछ अक्सर होता है। में ऐसा दर्द होना कोई नई बात नहीं राम। और फिर वो फिल्म आई जिसने इनका वक्त ही बदल दिया। फिल्म का नाम था वक्त।

इसमें इनकी अदाकारी, डायलॉग, डिलीवरी और स्टाइल सभी को लोगों ने खूब पसंद किया। एंड आई सेड जिनके अपने घर शीशे के हो वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। अगर आज की पीढ़ी से राजकुमार की बात करें तो उन्होंने हमेशा राजकुमार के एक सख्त किरदार को ही पर्दे पर देखा। पर शायद थोड़ा पीछे चलें तो राजकुमार ने न जाने कितनी रोमांटिक फिल्मों में अपनी अदाकारी का जलवा दिखाया। हीर रांडा जैसी फिल्में आज भी भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर हैं। जो ताले आग लगाए उन्हीं से आग बुझाए हमें क्या हो गया। और आज राजकुमार साहब फिल्मों में ब्रांड बन गए थे। फिल्में राजकुमार के नाम से चलती थी। हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे। लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा। तभी 1971 में फिल्म लाल पत्थर बनाए जाने की बात चली। डायरेक्टर एफ सी मेहरा ने इस फिल्म में वैजंती माला और राजकुमार को कास्ट किया था। पर राजकुमार साहब चाहते थे कि इस फिल्म में वैजंती माला की जगह हेमा मालिनी हो। उन्होंने आखिरकार खुलकर डायरेक्टर से कह भी दिया कि आप इस फिल्म में हेमा मालिनी को ले लीजिए और यह शर्त भी रख दी कि अगर आप हेमा मालिनी को नहीं लेंगे तो फिर इस फिल्म में मैं भी काम नहीं करूंगा। अब उनकी जििद की वजह से फिल्म में हेमा मालिनी को अप्रोच कर लिया गया। फिर क्या था? शूटिंग के साथ-साथ दोनों एक साथ काफी वक्त भी बिताने लगे। धीरे-धीरे फिल्म की शूटिंग खत्म ही हो रही थी। फिल्म लगभग पूरी हो गई थी। ऐसे में एक दिन राजकुमार ने हेमा मालिनी को प्रपोज कर दिया।

पर हेमा मालिनी ने तुरंत मना कर दिया। उन्होंने कहा कि हम अच्छे दोस्त हैं क्योंकि तब हेमा मालिनी धर्मेंद्र के साथ रिश्ते में थी। राजकुमार साहब के रोमांस के किस्से अभी थमे नहीं थे। यही वाकया तब हुआ जब राजकुमार ने पाकीजा फिल्म में लीजेंड्री एक्ट्रेस मीना कुमारी के साथ काम किया। कहा जाता है इस फिल्म के दौरान राजकुमार मीना कुमारी को पसंद करने लगे थे। आपके पांव देखे बहुत हसीन है। इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा। मैदे हो जाएंगे। राजकुमार साहब मीना कुमारी की खूबसूरती के इस कदर कायल थे कि उनके सामने अपने डायलॉग भूल जाया करते थे। हालांकि मीना कुमारी पहले से शादीशुदा थी। जहां भी तुम्हें होश आएगा मेरी आंखें तुम्हें देख रही होंगी। और राजकुमार साहब भी इसी वजह से अपने प्यार का इजहार नहीं कर पा रहे थे। और पाकीजा फिल्म को डायरेक्ट कर रहे थे मीणा कुमारी के ही पति कमाल अमरोही। और जब यह बात उनके पति कमाल अमरोही को पता लगी, तो उन्होंने राजकुमार के जितने ज्यादा बड़े लंबे सीन थे उन्हें काट दिए।

पाकीजा फिल्म में राजकुमार के चंद ही सीन थे और तो और उन्होंने राजकुमार साहब के साथ फिर कोई भी फिल्म नहीं बनाई। राजकुमार साहब भी समझ गए थे कि यह सिनेमा है साहब। यहां सच्चा प्यार सिर्फ पर्दे पर दिखता है। हकीकत में नहीं। भाई आपने खत लिखा और फिर कभी आपने मुझे चैन से सोने नहीं दी। तभी उनकी मुलाकात एंग्लो इंडियन एयर होस्टेस जेनिफर से हुई। यह मुलाकात कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं लगा और प्यार परवान चढ़ा दोनों ने शादी कर ली। जेनिफर ने हिंदू धर्म अपना लिया और राजकुमार साहब ने इनका नाम गायत्री रख दिया। राजकुमार साहब ने अभी तक जो भी फिल्में की थी, वह सुपरडुपर हिट थी।

फिर चाहे वो हमराज हो, पाकीजा हो, मेरे हुजूर हो, हीर राजा या नीलकमल हो, सभी की सभी रोमांटिक सीन सुपरहिट। खुदा की कसम हमने यह कभी नहीं सोचा कि हमारी दी हुई दौलत से एक ऐसा मकबरा बनाया जाए जिसमें सिर्फ हमारे दिल की ठंडक के लिए आपका सुहाग आपसे छीन कर दफन कर दिया जाए। धीरे-धीरे समय गुजरा और राजकुमार साहब अब जो रोमांटिक सीन कर रहे थे, वो उतनी सफलता नहीं पा रहे थे। ये दुनिया, ये महफिल मेरे नहीं राजकुमार ने भी यह समझ लिया था कि कुछ तो बदलाव करना पड़ेगा।

उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट चुनने का तरीका बदल दिया था। तुम हम गलत अल्फाज़ पसंद नहीं करते। हम तुम नहीं आप हैं। शायद इनका यह तरीका ही था कि 1981 के बाद इन्होंने जिन फिल्मों में भी काम किया उसमें यह एक सख्त किरदार में ही दिखे। इनको मिटा सके ये जमाने में दम नहीं। हमसे जमाना खुद है जमाने से हम नहीं जैसे कि कुदरत एक नई पहेली मरते दम तक मुकद्दर का फैसला जंगबाद इन सभी फिल्मों में एक अलग राजकुमार दिखे दुश्मनी और दोस्ती अगर गाड़ी ना हो तो उसमें कोई रंग नहीं आता।

तभी डायरेक्टर सुभाष घई ने सौदागर फिल्म बनाने की सोची पर समस्या तो थी फिल्म की स्टार कास्ट की। उन्होंने फिल्म में लिया था दिलीप कुमार साहब को और उनके 32 साल पुराने दुश्मन राजकुमार जी को। अब सुभाष घई साहब ने अपनी स्क्रिप्ट में इन दोनों को कास्ट करने का तो सोच लिया था। पर इन दोनों महानायकों से बात कैसे करें? तो सुभाष घई साहब सबसे पहले दिलीप कुमार के पास गए। उन्हें स्टोरी सुनाई। यूसुफ साहब को स्टोरी बहुत पसंद आई। पर दिलीप साहब का अगला सवाल वही था जिसके लिए सुभाष घ गई साहब डर रहे थे। दिलीप साहब बोले भाई सुभाष इस फिल्म में हमारे दोस्त का किरदार कौन निभा रहा है? सुभाष घ गई तुरंत कार की तरफ बढ़े और कार में बैठते हुए बोले दूसरा किरदार कौन कर रहा है? दोनों को मैंने कहा कि आपका दुश्मन है। और तुरंत कार में बैठकर निकल गए।

जब तक दिलीप साहब कुछ कहते घई साहब वहां से जा चुके थे। बस यही सब उन्होंने राजकुमार साहब के साथ भी किया। शेर की गुफा है। यहां अगर तुमने करवट भी ली तो समझो मौत को बुलावा दिया। पर राजकुमार साहब ने जब पूछा कि इस फिल्म में मेरा दोस्त कौन बन रहा है? भाई दूसरे दोस्त का रोल कौन-कौन कर रहे हैं? मैंने साहब दूसरे रोल जो है वह दिलीप कुमार साहब का है। देखो भाई सुभाष हम अपने बाद किसी को एक्टर मानते हैं तो उसका नाम दिलीप कुमार है।

अब फिल्म में जब इन दोनों ने राजू और राजेश्वर का किरदार निभाया चल बिरू तो मानो भारतीय सिनेमा में एक फिल्म नहीं एक इतिहास लिखा जा रहा हो। इस जंगल में हम दोशे चल घर जल्दी हो गई।

कहते हैं राजकुमार साहब फिल्म की शूटिंग के दौरान ज्यादा किसी से बात नहीं करते। उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। खुली वादियां और पहाड़ मिल जाएं तो उन्हें निहारा करते। तो नैनीताल में सौदागर फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। और एक दिन जब शूटिंग रुकी तो राजकुमार साहब पहाड़ी के किनारे कुर्सी डालकर बैठ गए। शायद वादियों को निहारते-निहारते वह इतना खो गए कि उन्हें भी याद नहीं रहा कि वह बेहद किनारे हैं। तभी सौदागर फिल्म की पूरी टीम शूटिंग पर वापस आई। कुमार साहब को भी पुकारा जाने लगा। पर राजकुमार तो वहां पर थे ही नहीं। सभी लोगों ने राजकुमार साहब की खोज शुरू कर दी।

तभी दिलीप साहब की नजर पड़ी उस पहाड़ी पर जहां पर राजकुमार किनारे बैठे हैं। वह चुपचाप वहां पहुंचे और राजकुमार साहब को कुर्सी के साथ पीछे खींच लिया। दिलीप साहब बोले ना भाई ना अभी थोड़ा सा किनारे और होते तो मर जाते यहां से। तब राजकुमार साहब ने अपने ही अंदाज में जवाब दिया और रानी हमारा नाम राजकुमार है और राजकुमार कुत्ते की मौत नहीं मरा करते। तो राजकुमार साहब ने जिंदगी को हमेशा अपने ही अंदाज में जिया। उनकी डायलॉग डिलीवरी ऐसी होती कि लोग सिर्फ उन्हें सुनने कई कई बार थिएटर जाते। ताना साहब इंटरव्यू हमारे फोन के बाद इंटरव्यू नहीं होता। लेटर ऑफ अपॉइंटमेंट सीधा मिलता है। वो इनलॉजिकल बात भी बोल देते तो लोग सिनेमा हॉल में तालियां बजाने लगते थे। दादा तो इस दुनिया में सिर्फ दो हैं। एक ऊपर वाला और दूसरे हम।

सच तो यह है कि राजकुमार साहब को अगर कोई बात भी बुरी लगती तो झट से उसी के सामने कह देते। यानी कि उनमें फिल्टर नाम की कोई चीज थी ही नहीं। हम उन बादशाहों में से हैं जिन पर किसी भी दौर का असर नहीं होता। शायद या तो यह कह लें कि उनका सेंस ऑफ ह्यूमर ही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। बात जंजीर फिल्म बनने की है। रौबदार शख्सियत के नाते डायरेक्टर प्रकाश मेहरा ने उन्हें लीड रोल देना चाहा। जब स्क्रिप्ट लेकर वो राजकुमार साहब के घर पहुंचे और फिल्म में लीड रोल करने को कहा। तो राजकुमार साहब बोले जानी तुम्हारे पास से अजीब बिजनोरी तेल की बदबू आ रही है और जेब से रुमाल निकाला और नाक में लगा दिया और बोले फिल्म में काम करना तो अलग बात है।

हम तुम्हारे साथ आधा मिनट भी खड़े नहीं हो सकते। प्रकाश मेरा चुपचाप लौट गए और चांस दिया अमिताभ बच्चन को। शायद यहीं से एक सुपरस्टार महानायक का जन्म हुआ। जब तक बैठने को ना कहा जाए शराफत से खड़े रहो। यह पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का। एक पार्टी के दौरान राजकुमार साहब बप्पी लहरी से मिले जो अपने खूब सारे गहनों के लिए चर्चित थे। पर राजकुमार साहब ने जब उन्हें देखा तो मुस्कुराते हुए बोले जानी एक से बढ़कर एक गहने पहने हो। बस एक मंगलसूत्र की कमी है। बप्पी दा ने इस बात को मजाक में ही लिया और खुद भी हंसने लगे। डायरेक्टर प्रकाश मेहरा की तरह जानेमाने डायरेक्टर रामानंद सागर भी एक बार फिल्म आंखें की स्क्रिप्ट लेकर राजकुमार साहब को सुनाने पहुंचे। वैसे आपको बता दें कि रामानंद सागर और राजकुमार साहब एक समय बहुत अच्छे दोस्त थे। उस दिन राजकुमार साहब न जाने किस मूड में बैठे थे।

राजकुमार साहब ने स्क्रिप्ट पढ़ी और उन्हें वह स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई। तभी राजकुमार साहब ने अपने कुत्ते को बुलाया और उससे पूछा जानी तुम इसमें रोल करना पसंद करोगे? अब कुत्ते ने गर्दन हिला दी। तब राजकुमार साहब बोले इस फिल्म में तो मेरा कुत्ता भी रोल करना पसंद नहीं करेगा। और इसके बाद रामानंद सागर चुपचाप वहां से उठे और बगैर कुछ कहे वहां से चले गए। और राजकुमार साहब और रामानंद सागर जिनकी बड़ी अच्छी दोस्ती हुआ करती थी। शायद यह दोस्ती वहीं से टूट गई। ना तलवार की धार से ना गोलियों की बौछार से। बंदा डरता है तो सिर्फ परवरदिगार से। एक बार एक पार्टी के दौरान उनकी मुलाकात सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से हुई। अमिताभ बच्चन ने राजकुमार साहब से हैंडशक किया। राजकुमार बोले जानी सूट कहां से सिलवाया है? तभी अमित जी बड़ी उत्सुकता से बोले क्या आपको भी वहीं से सिलवाना है? मैं आपको बता देता हूं। राजकुमार बोले, नहीं जानी, हमें तुम्हारे सूट का कपड़ा बहुत पसंद आया।

मैं अपने घर के पर्दे इसी कपड़े के सिलवाना चाहता हूं। के कपड़े पहनने से और टोपी लगा लेने से कोई महात्मा गांधी नहीं बन जाता। ऐसे ही एक फिल्म के सिलसिले में जब राजकुमार साहब एक डायरेक्टर से मिलने पहुंचे। वहां धर्मेंद्र और जितन भी मिल गए। राजकुमार साहब उन्हें देखकर बोले काफी जूनियर कलाकार इकट्ठा कर रखे हैं तुमने। घर के दालान में चंदन का झाड़ होगा। वहां तो सांपों का आना जाना लगा ही रहेगा। राजकुमार साहब हमेशा जितेंद्र को धर्मेंद्र और धर्मेंद्र को जितेंद्र कहकर पुकारते। ऐसे में धर्मेंद्र ने एक दिन उन्हें टोक ही दिया। आप मेरा सही नाम क्यों नहीं लेते? तब राजकुमार साहब अपने ही अंदाज में बोले जानी राजेंद्र हो या जितेंद्र धर्मेंद्र हो या बंदर मेरे लिए तो सब के सब बराबर है। एक बात यह भी याद रखिए हमसे बगैर अपॉइंटमेंट के कोई नहीं मिल सकता और जहां तक हमारा ताल्लुक है किसी से भी किसी वक्त भी कहीं भी मिल सकते। राजकुमार साहब के किस्से इतने हैं कि इस फिल्म का वीडियो खत्म हो जाएगा। पर किस्से नहीं खत्म होंगे। जैसे कि जांबाज फिल्म की शूटिंग के दौरान गोविंदा ने बड़ी प्यारी रंगीन शर्ट पहनी थी।

उन्होंने गोविंदा से कहा बड़ी बढ़िया शर्ट पहने हो जानी। गोविंदा राजकुमार साहब से बोले आपको अच्छी लगी तो आप रख लीजिए। और गोविंदा ने वो शर्ट राजकुमार साहब को दे दी। अगले दिन शूटिंग पर जब राजकुमार गोविंदा को मिले तो उन्होंने देखा कि वह उसी शर्ट के कपड़े का रुमाल बनाकर अपनी नाक पोछ रहे थे। बताते हैं जब सलमान खान की मैंने प्यार किया फिल्म बहुत बड़ी हिट हुई। उन्होंने अपने घर पर सक्सेस पार्टी रखी। सभी बड़े-बड़े कलाकारों को बुलाया गया।

सभी से सलमान खान खुद मिल रहे थे। वो राजकुमार साहब को पहचान नहीं पाए और सलमान ने जब राजकुमार से कहा, “सर, आप कौन?” तब राजकुमार बोले, जाओ हमारे बारे में अपने अब्बू से जाकर पूछो। बॉलीवुड की बड़ी से बड़ी हस्ती हो। वह राजकुमार से उचित स्पेस बनाती। पर दर्शक तो उनके इसी अंदाज के दीवाने थे। हां, राजकुमार साहब बिल्कुल मूफट थे। उन्हें जो बोलना होता जिसके सामने बोलना होता बिना डरे वही बोल देते। फिर भी डायरेक्टर उनकी इस आदत के बावजूद उनके लिए लाइन लगाए खड़े थे। राज पिक्चर तो चली नहीं। आप 1 लाख बढ़ा रहे हैं। मैंने कहा पिक्चर चले चले मैं फेल नहीं हुआ। इसलिए 1 लाख बढ़ेगा। बॉलीवुड की शानदार फिल्म तिरंगा की ही बात ले लीजिए।

राजकुमार के लिए इस फिल्म को हमेशा याद किया जाएगा। इसमें नाना पाटेकर वाले रोल के किरदार के लिए पहली पसंद रजनीकांत थे। पर उन्होंने डायरेक्टर मेहुल कुमार को यह कहकर मना कर दिया कि मैं राजकुमार साहब के साथ काम नहीं कर सकता। फिर यह रोल नसरुद्दीन शाह के पास गया और वह भी बोले मुझे स्टोरी तो खूब पसंद है पर मुझे राजकुमार के साथ काम नहीं करना। बड़ी मिन्नतों के बाद इस फिल्म में नाना पाटेकर काम करने को तैयार हुए। हां उन्होंने भी शर्त रख दी थी कि राजकुमार साहब फिल्म की शूटिंग में कुछ भी इंटरफेयर नहीं करेंगे और मुझे जरा भी इंटरफेयर किया तो मैं तुरंत फिल्म छोड़कर चल दूंगा। कौन सा कानून? कैसा कानून? ये कानून तो चंद मुजरिमों की रखेल बन बैठा है। इसलिए लोग अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय गुंडों की चौखट चूमते हैं। हां, जब दोनों ने एक साथ शूटिंग की, तो कुछ ही दिनों बाद यह दोनों एक दूसरे के बड़े अच्छे दोस्त बन गए थे। भारतीय सिनेमा का एक अलग व्यक्तित्व। जो जीवन जीता तो अपनी शर्तों पर। अगर आपको वीडियो थोड़ा सा भी अच्छा लग रहा है तो प्लीज वीडियो को पॉज़ करके यह जरूर बताइए कि राजकुमार साहब की आपकी फेवरेट फिल्म कौन सी है। अकेला ही चला था बे मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवा बनता गया। चलिए एक नए किस्से की बात कर लेते हैं। ऐसा ही एक किस्सा है जानीमानी अदाकारा जीनत अमान के साथ का। उन दिनों जीना तमाम अपने दम मारो दम गाने की वजह से खूब सुर्खियों में थी। जब एक पार्टी में उनकी मुलाकात राजकुमार साहब से हुई। वो राजकुमार साहब को देखकर तुरंत उनसे मिलने चली गई। उन्हें लगा कि राजकुमार साहब उनकी तारीफ करेंगे।

राजकुमार साहब बोले तुम बेहद खूबसूरत हो। किसी फिल्म में ट्राई क्यों नहीं करती? आपको यह भी याद दिला दें कि वो पार्टी हरे कृष्णा हरे रामा की सक्सेस पार्टी थी। राजकुमार साहब ने अभी थोड़ी देर पहले ही इस फिल्म को देखा था और जीनत अमान राजकुमार के मुंह से यह सब सुनकर दंग रह गई। राजकुमार साहब का हमेशा मानना था कि वह गलत प्रोफेशन में आ गए। उन्हें सिनेमा में तो आना ही नहीं चाहिए था। कारण था कि वह एक अनुशासन प्रिय पुलिस ऑफिसर थे। उन्हें अन एजुकेटेड लोगों के साथ काम करना अच्छा ही नहीं लगता था। कमजोर और हम कमजोर ना हम कभी थे और ना कभी हो सकेंगे।

इन चंद मजाकिया किस्सों को तो आपने खूब सुना। पर राजकुमार साहब की किससे कट्टर दुश्मनी थी। ये ठाकुर राजेश्वर सिंह इतिहास बताता नहीं। इतिहास लिखता है। इतिहास बनाता है। कहानी कुछ यूं है। जानेमाने कलाकार प्रेम चोपड़ा की शादी की पार्टी चल रही थी। उस पार्टी के दौरान राज कपूर और राजकुमार दोनों की मुलाकात होती है। उस दिन राज कपूर साहब खूब शराब पिए थे और ज्यादा नशे में होने के कारण उनके मन में जो था उन्होंने सब बाहर निकाल दिया।

वो राजकुमार पर चिल्लाते हुए बोले तुम हत्यारे हो और बार-बार यही चिल्लाने लगे। राजकुमार ने जवाब दिया जानी मेरी छोड़ो। मैं तुम्हारे पास कभी काम मांगने नहीं आया। हां तुम मेरे आगे पीछे जरूर आया करते थे। राज कपूर साहब बार-बार यही चिल्ला रहे थे कि तुम हत्यारे हो। तुम हो। राज कपूर साहब जिस बात की चिल्हन उस दिन निकाल रहे थे वो बात कुछ यूं है।

राजकुमार एक समय सभी के पसंदीदा हीरो थे। राज कपूर इन्हें अपनी फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए कास्ट करना चाहते थे। और राज कपूर उन दिनों बड़े डायरेक्टर थे। राज कपूर साहब की फिल्म में काम करना लोग अपना सौभाग्य समझते थे। पर राजकुमार साहब ने फिल्म में काम करने से मना कर दिया। राजकुमार साहब बोले जानी हम हम हैं। हम सिर्फ सोलो फिल्में बनाना पसंद करते हैं। तुम हमारी बराबरी मनोज कुमार और धर्मेंद्र जैसे हीरो से करते हो। यही वजह थी कि पार्टी में राज कपूर साहब ने अपनी उस दिन की भड़ास निकाल दी थी। पर आखिर वो राजकुमार को हत्यारा क्यों कह रहे? दरअसल राजकुमार साहब ने जब मदर इंडिया फिल्म में काम किया।

यह फिल्म बहुत बड़ी सक्सेस रही। यह फिल्म ऑस्कर के लिए भारत की तरफ से पहली फिल्म बनी जिसे नॉमिनेशन मिला। राजकुमार रातोंरात स्टार बन गए थे और एक शाम जब मदर इंडिया की सक्सेस पार्टी से राजकुमार लौट रहे थे तो उन्होंने एक पान की दुकान में अपनी गाली रोकी। वहीं पर राजकुमार साहब से कुछ लोग बहस करने लगे। कुछ ने तो उन्हें गलतसलत कमेंट भी कर दिए। राजकुमार जी को यह सब सहन नहीं हुआ। उनकी उन लोगों से मारपीट होने लगी और यह लड़ाई इतनी बढ़ी कि उनके हाथों एक आदमी की हो जाती है।

राजकुमार को अरेस्ट कर लिया जाता है। फिर एक साल की सजा के बाद वो सारे चार्ज से बरी हो जाते हैं। इसी बात को राज कपूर साहब अपनी जलजलाहट में बार-बार कह रहे थे। अगर राजकुमार साहब की दोस्ती की बात करें तो उन्होंने बहुत कम दोस्त बनाए। वो बेहद सिलेक्टिव नेचर के थे। वह कहते थे कि मैं सभी से प्यार करता हूं। पर दोस्ती की बात कुछ अलग है। मैं सबसे हाथ मिलाने में विश्वास नहीं करता। हाथ मिलाना मेरी नजर में बड़ी बात होती है। जिसका मतलब बगैर किसी मतलब के किसी को धन्यवाद कहना और ऐसा मेरा मन सभी के साथ गवारा नहीं करता। उनके अच्छे दोस्तों में चेतन आनंद बी आर चोपड़ा थे। बी आर चोपड़ा साहब कहते हैं कि वह बिल्कुल अलग इंसान थे। कि

सी की चाटुकारिता करना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था। और तो और वह बेहद सनकी इंसान थे। जब मैं सो जाता तो रात को 2:00 बजे घर आते। गार्ड से कहते हैं कि चोपड़ा जब उठे तो उससे कह देना उनका सबसे बड़ा प्रशंसक आया था और उन्हें शुभकामनाएं देकर गया है। एक बार तो स्ट्रीट सिंगर को लेकर आ गए और रात को 2:00 बजे चोपड़ा साहब की बालकनी के नीचे कई गीत गवाए। राजकुमार साहब लोगों से अपने ही अंदाज में निराले मजाक करते। एक बार गोविंदा साहब से मिले तो बोले गोविंदा तुम बहुत अच्छे आर्टिस्ट हो। गोविंदा जब तक समझ पाते हैं तो उन्होंने अगली बात कही कभी कदार हीरोइन को भी तो अपनी फिल्म में नाचने का मौका दे दिया करो तुम ही नाचते रहते हो जिंदगी को जीने का बेहद निराला अंदाज राजकुमार साहब जब मरते दम तक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तब एक सीन में मरने का सीन फिलवाना था उसके लिए एक बड़ी सी गाड़ी तैयार की गई उसको फूलों से सजाया गया राजकुमार साहब उसमें लेटे गाड़ी को ऐसा सजाया गया कि मानो अंतिम यात्रा निकल रही हो तब राजकुमार साहब डायरेक्टर मेहुल कुमार को बुलाते हैं और कहते हैं आओ जानी तुम भी हार पहना लो क्योंकि जब हम सच में जाएंगे तो किसी को पता भी नहीं लगेगा कि हम कब अलविदा कह गए। बहरहाल शूटिंग खत्म हुई।

डायरेक्टर मेहुल कुमार ने पूछा सर आपने ऐसा क्यों कहा? तब राजकुमार साहब बोले जानी आजकल श्मशान यात्रा को तमाशा बना दिया गया है। सभी लोग एक कलर की सफेद ड्रेस पहन कर आते हैं। मीडिया का हुजूम पहुंच जाता है। मरे हुए व्यक्ति को सम्मान देना तो दूर की बात है। लोग उस व्यक्ति की मौत को मजाक बना देते हैं और मुझे अपनी निजी जिंदगी में तमाशा बिल्कुल पसंद नहीं। और फिर राजकुमार साहब ने जैसा कहा था वैसा ही हुआ। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो राजकुमार साहब अपने अंतिम दिनों में बीमारी से पीड़ित थे। उन्हें फेफड़ों का कैंसर था।

हालात इतनी बुरी हो गई थी कि उनकी आवाज भी निकलना बंद हो गई थी। लेकिन डॉक्टर ये ये दर्द आजकल कुछ अक्सर होता है। कैंसर में ऐसा दर्द होना कोई नई बात नहीं रहा। उन्होंने सिनेमा से दूरी बना ली थी। और जब सिनेमा जगत के कई करीबी लोगों ने उनसे पूछा कि राजकुमार साहब आपको क्या हो गया है? तब राजकुमार साहब अपने उसी बेबाक अंदाज में बोले हम बड़े लोग हैं साहब हमें बीमारी भी बड़ी ही होती है। जिस बात का फैसला हो चुका हमेशा के लिए उस बात से घबराना और अपनी इस कैंसर बीमारी के बारे में उन्होंने कभी भी किसी को कुछ नहीं बताया। हुआ अपने पर वह अपने लिए किसी से भी कोई सहानुभूत नहीं चाहते थे। इसलिए खुद को उन्होंने बिल्कुल अलग कर लिया था। कीमो और रेडिएशन के बाद भी उनमें कोई फायदा नहीं हुआ। आवाज निकलना मानो बंद ही हो गई थी।

अपने अंतिम समय में उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को बुलाकर साफ-साफ कह दिया था। मैं नहीं चाहता कि मेरी मौत के बाद कोई शोर, शराबा और तमाशा हो। बस परिवार के लोग ही शामिल हो। मेरे अंतिम संस्कार के बाद दुनिया को खबर तक ना दी जाए और 3 जुलाई 1996 को भारतीय सिनेमा का यह दबंग शेर हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह गया। हमारा इस दुनिया से रिश्ता खत्म हुआ। जिसने कभी भी किसी के ऊपर बोझ बनकर जिंदगी जीना नहीं सीखा। जीवन के हर पल को अपने ही अंदाज में जिया। फिर चाहे वह जिंदगी जीने का तरीका हो या उनके मरने का तरीका। से उठा था जनाजा बहार का। भले ही राजकुमार साहब आज हमारे बीच में ना हो पर उनके डायलॉग आज भी हमें याद है। वैसे आप बताइएगा कि राजकुमार साहब का फेवरेट डायलॉग आपका कौन सा है? वो कौन सी फिल्म है जो राजकुमार साहब का नाम लेते ही आपकी आंखों के सामने धुंधलीधुंधली आने लगती है। ताकत पर तमीज की लगाम जरूरी है लेकिन इतनी नहीं कि बुजदिली बन जाए। हां, अगर आपने हमारे इस वीडियो को पूरा देखा है तो यह जरूर बताइएगा कि सौदागर फिल्म में इनके दोस्त का किरदार किस हीरो ने निभाया है। आपको राजकुमार साहब के बारे में बहुत कुछ पता होगा। तो आप यह जरूर बताइएगा कि इनके उस बेटे का क्या नाम है जिन्होंने फिल्मों में भी काम किया। लगता है आपका खून खानदानी नहीं है और अगर खानदानी है तो उसमें कुछ मिलावट है।

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