विमान दुर्घटना को एक साल हो गया है। और इस एक साल के अंदर बहुत कुछ बदल गया। कितने ही परिवारों ने अपने स्वजन खो दिए और आज उसी स्वजन में से एक स्वजन हमारे साथ जुड़े हैं – विजयभाई रूपाणी, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री, भाजपा के वरिष्ठ नेता और एक उम्दा व्यक्तित्व वाले व्यक्ति, जिन्होंने हमेशा जनसेवा को प्राथमिकता दी। लोगों के बीच रहे, लोगों से प्रेम करते रहे और उतना ही प्रेम विजयभाई रूपाणी को भी मिला। लेकिन आज हमारे बीच विजय रूपाणी नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनकी बातें, उनके स्मरण और उनके परिवार के सदस्य हमारे साथ हैं।
और इसी कारण जब इस दर्दनाक दुर्घटना को एक साल हुआ है, तब उनके बेटे ऋषभाई रूपाणी हमारे साथ जुड़ेंगे। हम उनसे बातचीत करेंगे – उस समय के दौरान कैसी बातें थीं, कैसी यादें थीं, उन सभी चीजों को याद करेंगे। उनके साथ चर्चा करेंगे।
स्वागत है सर, आपका।मेरा सबसे पहला सवाल – विजयभाई रूपाणी के बिना ये एक साल रूपाणी परिवार के लिए कैसा रहा? सर्वप्रथम तो प्रथम वार्षिक पुण्यतिथि के अवसर पर मैं ऋषभ विजयभाई रूपाणी, सभी मृतकों, शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और अंतःकरणपूर्वक उन्हें नमन करता हूं। साथ ही साथ जिन कंसर्न परिवारों हैं, उनके प्रति भी हमारा प्रेम और संवेदना मैं प्रस्तुत करता हूं। तो जैसे आपने पूछा, एक साल स्वाभाविक है कि पीड़ादायक होता है जब हमारे सिर से पिता की छत्रछाया चली जाती है। तो उसे शब्दों में वर्णन करना मुश्किल है। परंतु पापा के आदर्श, उनके विचार, मूल्य ही हमारी शक्ति हैं और मुझे पूर्ण आस्था है कि पापा स्वर्ग से भी हमारे ऊपर अपना प्रेम और आशीर्वाद बरसा रहे हैं।
तो इतना जरूर कहूंगा कि कठिन है, नो डाउट, लेकिन उनकी अच्छी स्मृतियों को, उनके अच्छे विचारों को अपनाए रखने में ही हमें शांति मिलती है।बिल्कुल, परिवार बहुत बड़ा है ऋषभाई और जिम्मेदारी अब आप पर है। मम्मी हैं, वो अपने तरीके से काम करती हैं, लेकिन परिवार की जब आप कहें कि पिता की छत्रछाया जब चली जाती है तब पीड़ा जरूर होती है, तकलीफें भी आती हैं। लेकिन इन सबके बीच अब ऋषभ रूपाणी कैसे आगे बढ़े और अब उनके जितने अधूरे सपने थे विजयभाई के, वो ऋषभ रूपाणी कैसे पूरे करना चाहेंगे?
मैं सिर्फ मैं ही नहीं, परंतु हमारा पूरा परिवार आज वी आर वेरी प्राउड ऑफ माय फादर विजयभाई रूपाणी। उन्होंने अपने 50 साल के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में जितने असंख्य कार्यकर्ताओं और सामान्य लोगों के साथ रहकर समाजसेवा के भागरूप और पार्टी में संगठन के भागरूप जो कार्य किए हैं, उसकी महक आज भी फैल रही है।
हम परिवार के सभी सदस्य आज यही सोचते हैं कि पापा के विचारों का संवर्धन और कैसे अगली पीढ़ियों तक, जन-जन तक उनके विचारों को पहुंचाना है। इसके लिए हमने एक “विजय रूपाणी मेमोरियल फाउंडेशन” की स्थापना की है। राजकोट में “पूजित रूपाणी मेमोरियल ट्रस्ट” से तो सब वाकिफ हैं, लेकिन विजय रूपाणी मेमोरियल फाउंडेशन युवा-लक्षी, महिला-लक्षी, बाल-वृद्ध-लक्षी सेवा क्षेत्र, शिक्षा क्षेत्र, स्वास्थ्य क्षेत्र – इन सभी नए-नए प्रकल्पों द्वारा, जैसे पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी का कांसेप्ट था।
अंत्योदय का और पापा को भी ये कांसेप्ट बहुत प्रिय था, उसी तरह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है। और इस तरह एक महाभगीरथ कार्य हमने शुरू किया है और आगे करते रहेंगे।बिल्कुल, सेवा के कार्य हमेशा से विजयभाई करते आए हैं और मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हमेशा आप देखो कि लोगों के बीच रहने वाले, हमेशा हंसते रहते और लोगों की पीड़ा उन्हें देखकर आधी ऋषभाई कम हो जाती थी।
और वही चीज बहुत सारे लोग मिस करते हैं। 12 तारीख, 2025 की थी, जून महीना था। विजयभाई लंदन जाने निकले थे और जब ये समाचार आपको मिला, उस समय के क्षण कैसे थे? सबसे पहला मैसेज किसका आया? कैसे आपको पूरी जानकारी हुई?अह… कह सकते हैं कि मेरे 30 साल के जीवन का सबसे-सबसे खराब समय। मैं उस समय अमेरिका में था और वहां दोपहर 1:39 का समय था जब घटना बनी।
और उस समय हमारे यहां वो समय 1:15-1:19 रात का था। तो स्वाभाविक है कि ये समाचार कोई रात को आधी रात फोन करे तो कोई खास बात होगी तभी फोन करे। तो मेरे एक मित्र, एयर इंडिया में हैं, उनका मुझे फोन आया। और आज भी वो जो शब्दों की स्मृति है मेरे मन में गूंजती रहती है: “There is an incident, aircraft… your father was flying… met with an accident”। उन्होंने सावधानी से ‘एक्सीडेंट’ शब्द इस्तेमाल किया, ” शब्द नहीं इस्तेमाल किया। और फिर बोलने में थोड़े संकोच में थे। तो ऑफकोर्स, क्या हुआ, दूसरी बात करो। ऐसे ही फिर आपने देखा सोशल मीडिया में भी वीडियोस चलने लगे और फिर बहुत बड़ी घटना थी, ऑफकोर्स। फिर तो सब भगवान से प्रार्थना ही करें और फिर धीरे-धीरे कन्फर्मेशन आने लगे और ऑफकोर्स लोगों के फोन आने लगे। तो थोड़ा मतलब… आज मैं उस रात को याद करता हूं तो मतलब पैरों के नीचे से जमीन सरक गई थी, वैसी फीलिंग आज भी मैं महसूस कर सकता हूं। और मैं परमकृपालु परमेश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि ऐसा समय किसी को ना दिखाए।घटना घट गई ऋषभाई और फिर जब पहचान की बात आई, पता नहीं था क्योंकि इतने सारे यात्री थे, सभी के शरीर छितराए पड़े थे।
कैसे आपको पता चला, परिवार को कि ये विजयभाई के अंश हैं? कैसे आपको जानकारी मिली?तो इस प्रक्रिया में तो हमें गुजरात सरकार की सराहना करनी पड़ेगी। पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी हर्षभाई, जगदीशभाई और ऋषिकेशभाई के सिर थी। और बहुत त्वरित कदम लेकर उन्होंने DNA मैचिंग के लिए एडिशनल मशीनरी भी मंगाई। तो पूरा बहुत बढ़िया, दो दिन के अंदर DNA के मैच शुरू हो गए। और ये कठिन कार्य है, technically it’s very challenging। और परिवार के… मेरे कजिन भाई ही वहां हॉस्पिटल में उस समय उपस्थित थे, तो उनका DNA लिया गया और उससे मैच मिला।
लेकिन ये बात सच है कि ऐसे समय में जो पूरी प्रक्रिया हुई सरकार द्वारा, उसमें केंद्र सरकार की एजेंसियां भी साथ थीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक, NDRF, SDRF की टीम, स्वास्थ्य स्टाफ, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी, सभी ब्रिगेड के कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, सिविल डिफेंस के लोग भी काम पर लग गए थे। सभी ने जबरदस्त मेहनत की।
तो एक तरफ हमें दुख है कि हमने स्वजन खोया, लेकिन दूसरी तरफ रैशनली सोचो तो इतनी बड़ी दुर्घटना गुजरात में 1986 के बाद पहली बार हुई – अहमदाबाद में 1986-87 में प्लेन । फिर भी जिस रेजोल्यूशन से ये काम किया गया, उसके लिए भारत सरकार और गुजरात सरकार का आभार मानना चाहिए।बिल्कुल, लेकिन इस पूरी घटना में आप देखो कि परिवार ने एक मुखिया खोया, क्योंकि वो आसरा होते हैं। और आसरा जब छिन जाए तो स्वाभाविक दुख होता है।
लेकिन लोगों के लिए विजय रूपाणी क्या थे? विजय रूपाणी लोगों के ही थे। मैं आपको सच बात कह रहा हूं – विजयभाई संगठन के आदमी, विजयभाई पार्टी के आदमी। आज आप किसी से भी कहो कि विजयभाई के लिए एक शब्द, तो “अपने विजयभाई” ही निकलेगा, खासकर राजकोट में, सौराष्ट्र में। तो वो जो प्रेम था ना, आज कह सकते हैं कि हमें बहुत गर्व है कि लोग आज कहते हैं कि भाई तुम्हारे पापा की ऐसी यादें हैं, ऐसे प्रसंग हैं हमारे पास।
और कई बार तो हमें भी पता नहीं होते, ऐसे-ऐसे लोग आपको प्रसंग सुनाते हैं। तो आज लोगों के विजयभाई हैं और मैं आपको कहूं, हमने लोगों से पापा के स्मरण मांगे थे – पापा की यादें, उनके साथ प्रसंग। हमें overwhelming response मिला है और जल्दी ही हम एक पुस्तक निकाल रहे हैं। उसमें सामान्य आदमी से लेकर कार्यकर्ता, अग्रणी, राजनेता, उद्योगपति, समाज के अग्रणी नेता, यहां तक कि संत-महात्मा, साधु – सभी के विचार पापा के लिए हम उसमें संजोएंगे।
ये एक बड़ा task है लेकिन हम determined हैं।एक सवाल ये उठता है – हमने बात की कि लोगों के विजयभाई, अपने विजयभाई। एक बेटे के रूप में आपको ऐसा कोई समय आया होगा जब आपको गर्व हुआ हो कि “मैं विजयभाई रूपाणी का बेटा हूं”?
कोई ऐसी घटना, कोई अनुभव अगर आप शेयर करना चाहें?हां, हर अनुभव मेरा ऐसा ही है कि मुझे विजयभाई के बेटे होने पर गर्व होता है। और मैं तो भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि अगले सैकड़ों जन्मों तक मुझे ऐसे पिता मिलें। पहली बात, ही वाज सुपर पॉलाइट और उन्होंने हमें भी सिखाया कि कैसे humble रहना है, polite रहना है। मैंने उन्हें कभी सफलता में इतराते नहीं देखा, ना कभी राग-द्वेष, ईर्ष्या, अभिमान में देखा, अहंकार में नहीं देखा। और आज के समय में इन दुर्गुणों से अलग रहना बहुत कठिन है। कोई व्यभिचार नहीं, right? और ये मैं नहीं कह रहा, आप किसी से भी पूछो, सब यही कहेंगे कि विजयभाई जैसे नेता… और सच कहूं तो उनके कई गुणों में से दो गुण हम लाइटहाउस की तरह देख रहे हैं, जो हमें guiding path देते हैं।
पहला है कर्तव्यपरायणता – कि तुम कर्तव्य करो, मेहनत करो, परिणाम जो आएगा वो आएगा। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही कहा है ना। पापा भी वही follow करते थे – मेहनत करते जाओ, आजू-बाजू कुछ मत देखो।दूसरा जो सबसे important है वो है स्थितप्रज्ञता। स्थितप्रज्ञ कौन होता है? जो किसी भी परिस्थिति में विचलित ना हो। उनके पुराने इंटरव्यू देखो, उसमें वो वर्णन करते हैं कि जब पूजित, मेरे बड़े भाई, 3 साल की उम्र में उनका निधन हुआ – 3 साल के बच्चे को खोना कितना बड़ा दुख है। फिर भी वो विचलित नहीं हुए और उन्होंने और मम्मी ने और हमारे ट्रस्ट के सैकड़ों वालंटियर्स के परिश्रम से “पूजित रूपाणी ट्रस्ट” की नींव रखी। 1994 नवंबर में ये घटना हुई, 1995 जनवरी में दो महीने के अंदर ट्रस्ट की नींव रख दी। तो पापा का resolution देखो – दुख की energy को channelize करके सकारात्मक में ले गए।
“एक पूजित हमने खोया है तो उसके बदले हजारों पूजित की जिंदगी बनाएंगे।” आज ये सीखने लायक है। वो घाटे में थे तब भी निराश नहीं हुए। जब मुख्यमंत्री बने तब हमेशा कहते थे “मैं कुर्सी पर बैठा हूं, कुर्सी मेरे सिर पर नहीं बैठी”। तो जब शिखर पर हो तब भी अभिमान नहीं करना – ये भी उन्होंने सिखाया।ये दो चीजें बताती हैं – एक extreme है जब तुम घाटे में हो, तब देखो कैसे ऊपर जाना है। और एक extreme है जब तुम शिखर पर हो, तब humble और grounded रहना है। ये हमने उनसे सीखा है।बिल्कुल, दो बातें आपने कहीं – दो अच्छे गुणों की बात की।
आपको कब विजयभाई सबसे ज्यादा खुश दिखे और सबसे ज्यादा निराश कब देखे?मैं आपको यही कहूंगा कि वो सबसे ज्यादा खुश या सबसे ज्यादा निराश होते ही नहीं थे। उनके जीवन का कोई भी प्रसंग बताओ – जब मुख्यमंत्री का मैसेज आया कि “अब विजय रूपाणी गुजरात के मुख्यमंत्री होंगे”, तब परिवार को स्वाभाविक है शेयर किया होगा कि “ऋषभ, मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिली है”। वो क्षण, वो समय कैसा था? आज मैं पहली बार आपको बता रहा हूं, बहुत frankly। परिवार में उन्होंने किसी को बताया ही नहीं था। जब घोषणा हुई यहां से, तब हमें पता चला, जैसे पूरे गुजरात को पता चला। और उसके बाद भी उनके चेहरे पर वही भाव थे। आप तो मीडिया जगत से जुड़े हैं, सभी मीडिया वालों से पूछो – क्या विजयभाई ने कभी अभिमान किया हो कि “मैं मुख्यमंत्री बन गया”?
वही विवक्षण राजपुरुष की निशानी है – भाव कभी नहीं दिखाने चाहिए, और वो भाव भी नहीं होना चाहिए कि “मैंने कुछ हासिल कर लिया”।और जब पूजित का मैंने कहा, वो जीवन का सबसे low point था।दूसरी एक अच्छी बात – पिता और पुत्र दोनों एक-दूसरे के मित्र हों। आपकी और विजय रूपाणी की कोई ऐसी क्षण जो आज भी आंख बंद करो तो लगे कि “पापा, मजा आ गया”?ओके, बहुत सारी क्षण हैं लेकिन जो सबसे ज्यादा मुझे याद है – मैंने यहां बैचलर्स Nirma से किया, Mechanical Engineering में। फिर एक साल HAL, Hindustan Aeronautics, Bangalore में काम किया। फिर Masters करने US गया। HAL में मैं apprentice के रूप में काम करता था, तो salary नहीं मिलती थी, सिर्फ सीखने का था।
मेरा पहला salary कौन सा था? मैं यूनिवर्सिटी में US में पेट्रोल पंप पर काम करता था। यूनिवर्सिटी की गाड़ियां, बसें – उनमें मैं काम करता था। वहां लोग खुद पेट्रोल भरते हैं, लेकिन उनकी ऑफिस में मेरा data logging का काम था, क्योंकि पढ़ते-पढ़ते खर्च निकालने के लिए क्या करे इंसान। तो मेरा पहला salary आया और US के standard से तो minimum wage का salary होता है यूनिवर्सिटी में काम करते-करते। और उस समय पापा के चेहरे पर जो खुशी देखी थी ना, क्योंकि मैंने उन्हें चेक का फोटो भेजा था। आज भी मुझे याद है और वो चेक मैंने संभाल कर रखा है। क्योंकि उस समय मैंने देखा था कि पापा संतुष्ट थे – “ओके, ऋषभ का पहला salary आया”। तो पिता हैं, स्वाभाविक है डांटते भी हैं।ऋषभाई को कब ये एहसास हुआ कि पापा आज खतरनाक गुस्से में हैं, मम्मी ने कहा “ऋषभ आज शांति रख, तेरे पापा का मूड नहीं है” – ऐसी कोई क्षण?Usually पापा क्रोधित होते ही नहीं थे। और सी, आज parents सीख देते हैं, तुम गलती करो तो रोकते-टोकते हैं, वो चलता रहता है। लेकिन ऐसे भयंकर गुस्से में कभी मैंने नहीं देखा। और सी, आप किसी से भी पूछो – समाजसेवा के क्षेत्र में, राजनीतिक क्षेत्र में – कि विजयभाई गुस्से में किसी को कुछ कह दिया हो, ऐसा एक भी instance नहीं मिलेगा।
टोका जरूर करते थे कार्यकर्ताओं को, कड़े शब्दों में, और कार्यकर्ता भी याद करते हैं कि “हां, लेकिन साहेब की टोक में प्रेम था”। ऐसा कभी याद नहीं कि बापा गुस्से में बात ना करें तुम्हारे साथ।बिल्कुल, आपके भाई थे जो नहीं रहे, और फिर आप और आपकी बहन दोनों थे। स्वाभाविक है पिता हों तो थोड़ी जिद भी होती है। आपने कोई जिद की कि “मुझे ये चीज चाहिए” और विजयभाई ने “आंख बंद कर, चिंता मत कर, मैं बैठा हूं” – ये याद है?आपने आखिरी वाक्य बोला ना – “मैं बैठा हूं” – ये आज सभी कार्यकर्ता याद करते होंगे। हमारे परिवार के भी सभी लोग। जब “मैं बैठा हूं” आ जाए तो सब चिंतामुक्त हो जाते हैं। पार्टी में हो, ट्रस्ट में हो, राजकोट में कहीं भी किसी का सवाल हो, परिवार का सवाल हो, पापा एक ही बोलते थे – “अरे चिंता मत कर, मैं बैठा हूं ना”।
ये उनकी विशेषता थी।अब आपने प्रसंग की बात की तो एक मेरे ध्यान में है। मैं छोटा था तब मुझे पौराणिक प्रसंग, वेद, महाभारत, रामायण की कहानियां सुनने का शौक था। मुझे बचपन से राम भगवान के प्रति बहुत प्रेम था और मुझे ऐसा था कि मैं जहां जाऊं धनुष-बाण लेकर घूमूं। मैं बहुत छोटा था तब की बात है। एक बार हम नाथद्वारा गए थे, श्रीनाथजी दर्शन करने। मैं लगभग 5-6 साल का था, मुझे याद है। मैंने जिद की कि “मुझे धनुष-बाण लेना ही है”। पापा एक घंटा नाथद्वारा की बाजार में मेरे लिए धनुष-बाण लेने घूमे और लेकर आए। मुझे याद है कि मैंने जिद की थी क्योंकि एक बच्चे की इच्छा थी कि “मुझे राम भगवान बनना है” – पापा ने वो पूरी की।
बिल्कुल, उनके स्वभाव में, भाव में ये चीज हमेशा दिखती थी। आज बचपन की बात निकली, उनके साथ की यादों की, तो कभी ऐसा हुआ कि ऋषभ और दीदी और पापा, कोई मनपसंद चीज खाने बाजार निकले हों और कहा हो “ऋषभ चल, आज मूड आ गया है, आज बाहर जाकर कुछ नाश्ता करते हैं”? ऐसी कोई और उन्हें सबसे ज्यादा पसंद की चीज?और पसंद की चीज – सादगीपूर्ण जीवन था उनका, एकदम। उन्हें जो प्रिय था वो था दाल-चावल। आप विजयभाई रूपाणी को दाल-चावल दो ना, तो वो दाल-चावल ही पूरे साल खा लेंगे। तो दाल-चावल मिल जाए तो उन्हें दूसरा कुछ नहीं चाहिए था। simple। और बाहर की चीज पूछो तो उन्हें डोसा बहुत पसंद था।
South Indian food पसंद था। तो कभी जाना हो या बाहर से मंगाना हो तो डोसा। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वाभाविक है बाहर जाकर खाना संभव नहीं था, क्योंकि protocol होता है, security होती है। वो टालते थे कि “मेरे कारण लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए”।मानो example के लिए, हम सब माणेकचौक जाएं – कौन नहीं जाता माणेकचौक? उन्हें भी मन होता था, लेकिन फिर सोचते “छोड़ो, क्योंकि मेरे कारण टेबल खाली रखनी पड़ेंगी, security रखनी पड़ेगी, लोग शांति से खा नहीं पाएंगे, दुकानदारों का वकारा नहीं होगा” – ऐसे विचार थे उनके।आपकी नजर के सामने विजयभाई ने किसी की ऐसी मदद की हो कि सामने वाला व्यक्ति इतना अभिभूत हो जाए या आंखों में आंसू आ जाएं और आशीर्वाद के शब्द मुंह से निकल पड़ें – “विजयभाई आपने मेरे लिए ये किया, मैं जिंदगीभर आपका एहसान नहीं भूलूंगा”?
ऐसी कोई क्षण याद है?बहुत सारी क्षण हैं। वो किसी की मदद करते तो प्रचार नहीं करते थे। आज “पूजित रूपाणी मेमोरियल ट्रस्ट” द्वारा कितने बच्चे – हम क्या करते हैं? जो होशियार विद्यार्थी हों लेकिन सुविधा ना हो, उन्हें ट्रस्ट में पढ़ाते हैं। राजकोट की अग्रणी स्कूलों में admission दिलाते हैं, 10-11-12 पढ़कर अच्छे marks से पास होते हैं और करियर बनता है। School संचालकों का भी आभार मानते हैं। उनमें से कई बच्चे आज engineer बने, doctor बने, dentist बने, CA बने, UPSC clear किया। विद्या दान से बड़ा क्या दान होगा। ये विद्यार्थी आकर पापा-मम्मी के पैर छूते हैं, तब वो बोलते नहीं तो भी हमें गर्व होता है कि विद्या दान दिया और करियर बना। पापा हमेशा पढ़ाई, पढ़ाने और करियर बनाने पर focus करते थे।बिल्कुल, एक सवाल – 12 तारीख और 12 नंबर उनके जीवन में आता था। आपकी गाड़ी भी पड़ी है, उसमें भी 12 नंबर था। ये चीज उनके जीवन में कैसे आई और फिर सिलसिला आखिर तक यथावत रहा?
जी, पहली गाड़ी जो पापा ने ली थी Maruti 800, उसका नंबर था। तब से ये चला। स्कूटर का भी 126 नंबर है, दूसरी गाड़ी का भी 126 नंबर है। क्योंकि उसका जोड़ करो तो 9 आता है – पापा का lucky number 9 था। इसलिए 126 से लगाव था शुरू से। और संयोग देखो कि 12 जून को ही ये घटना हुई। पहले 5 जून की ticket थी, फिर 10 जून की, आखिर में 12 जून की ticket हुई। तो ये तो बनना था और जब कुदरत चाहती है उसके विपरीत कुछ नहीं होता। लेकिन ये just link है 126 और इसके बीच।दूसरी बात करें – बातें करते बैठें तो समय कम पड़ जाएगा ऋषभाई, इतनी बातें विजयभाई से जुड़ी हैं। परिवार में जब चार लोग dining table पर बैठे हों तब माहौल कैसा रहता था? कभी इच्छा जताई विजयभाई ने कि “चलो आज सब movie देखने जाते हैं”? खाने की बात तो हुई, protocol है। उन्हें पसंद की कोई movie जो बार-बार देखते हों और कहते हों “बेटा ये movie देखो, इसमें बहुत कुछ सीखने लायक है”? या पसंद का कोई गीत या भजन?उन्हें पुराने गीतों और देशभक्ति के गीतों का बहुत शौक था। बहुत सारे social media में वीडियो भी देखे होंगे – देशभक्ति के गीत गाते हुए भी। “मेरा रंग दे बसंती चोला”, “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की” – ऐसे देशभक्ति के गीत, संघ के गीतों का शौक। गीतों द्वारा वो कुटुंब के छोटे बच्चों को और जहां भी जाते, सबको एक जज्बा, देशप्रेम का, कर्तव्य का जन्माते थे।Dining table पर बैठे हों तब भी कई बार गीत गाते। पुराने गीतों का इतना शौक – मम्मी और पापा दोनों पुराने गीत बहुत बढ़िया गाते थे। उनके कारण आज मुझे भी… मैं borderline Gen Z हूं, 1996 में जन्म हुआ है, तो इतने पुराने गीत – हेमंत कुमार, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार – वो मुझे भी आते हैं और मैं गा सकता हूं। क्योंकि उन्होंने बताया कि ये अच्छा music है। और हमारे पूरे परिवार में, यहां तक कि मेरी पत्नी को भी music का शौक है, मेरी बहन को भी, मेरी बेटी को भी – because of him। उन्होंने सबमें प्रेम जन्माया।बिल्कुल, ऐसी कौन सी बात विजयभाई की जो ऋषभ रूपाणी अपनी जिंदगी में हमेशा रखना चाहेंगे, जिससे बहुत कुछ सीखेंगे और उसी पथ पर आगे बढ़ना चाहेंगे?बहुत बातें हैं।
उनका जीवन ही उनका उपदेश है। मैंने दो गुण तो बताए – कर्तव्यपरायणता और स्थितप्रज्ञता। इसके साथ-साथ life में balance रहना, minimalist रहना। कोई ढोंग नहीं, कोई दिखावा नहीं – ये उनसे सीख रहे हैं। और मुझे पूर्ण आस्था है – मैं आपको एक बात कहूं, कभी ऐसा आए कि “इस समय क्या करना है”, पिछले साल में ऐसी कई मौके आए जब लगे “यार यहां stuck हो गए हैं, क्या decision लें” – तब हम सब, सिर्फ मैं नहीं, परिवार के सभी, यही decide करते हैं कि आंख बंद करके शांति से पापा का स्मरण करो और सोचो कि “हमारी जगह पापा होते तो क्या करते”। और मैं कहूं – it works, it’s very effective। पापा के विचारों से आज जब तीन राहों पर खड़े हो, choice के समय, तब कौन सा रास्ता लेना है – पापा रास्ता दिखाते हैं।बिल्कुल, राजनीति के रास्ते विजयभाई रूपाणी हमेशा सफल रहे हैं। ऋषभ रूपाणी इस विरासत को आगे कैसे कायम रखेंगे?देखो, विजयभाई रूपाणी की राजनीतिक विरासत कोई व्यक्ति-लक्षी है ही नहीं।
उनके विचार हमेशा संगठन को समर्पित रहे हैं। संगठन का हर आदमी, भारतीय जनता पार्टी का हर कार्यकर्ता ही विजयभाई की विरासत है। आज लोग “अपने विजयभाई, मेरे विजयभाई” कह सकते हैं। विजयभाई सबके हैं, मैं स्पष्ट हूं इस बात पर। और ऐसी कोई अपेक्षा भी मुझे नहीं है, किसी को भी नहीं होनी चाहिए, right? और भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शुरू से सिखाया जाता है – “व्यक्ति से बड़ा दल, दल से बड़ा देश”। बस उसी मार्ग पर चलना है।बिल्कुल, इन सबके बीच विजयभाई इतने बड़े थे कि जिन्हें लोग आज भी नहीं, हमेशा याद करेंगे। और इसी कारण उनकी बातें करना जरूरी था – वो बातें जो शायद हम जानते नहीं थे। और एक बेटे के रूप में ऋषभाई ने दिल खोलकर बात की – पिता की ऐसी बातें, ऐसी यादें जो जीवनभर उन्हें याद रहेंगी।
परिवार ने घर के मुखिया को खोया है, लेकिन उनकी अखंड यादें जीवनभर रहेंगी, परिवार के लिए प्रेरणा बनेंगी। और उन्होंने एक अच्छी बात कही कि जब मुश्किल की तिराहे पर खड़े हो तब आंख बंद करो और सोचो कि क्या करना है – रास्ता अपने आप मिल जाएगा। और आज वही रास्ते पर रूपाणी परिवार आगे बढ़ रहा है।