Cli

विजय माल्या की आखरी रात:9000 करोड़ के कर्ज के बाद क्या हुआ?

Uncategorized

एक ऐसा भारतीय आदमी जिसे कभी पूरी दुनिया किंग ऑफ गुड टाइम्स के नाम से जानती थी। वो इंसान जिसकी जिंदगी किसी फिल्मी महाराजा से कम नहीं लगती थी। करोड़ों की पार्टियां उसके लिए बस एक आम रात की बात थी। जहां बड़े-बड़े अरबपति अपने प्राइवेट जेट पर गर्व करते हैं।

वहीं विजय माल्या के पास अपना निजी बोइंग 727 था। ऐशो आराम का ऐसा साम्राज्य जिसे देखकर लोग कहते थे यार जिंदगी हो तो ऐसी लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली कि वही आदमी भारत के सबसे चर्चित बैंक फ्रॉड मामलों में गिना जाने लगा। आज उसका नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में शानो शौकत नहीं बल्कि कर्ज और विवादों की तस्वीर उभरती है।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि किंग फिशर नाम का साम्राज्य बनाने वाला इंसान उसी नाम के बोझ तले दब गया? 1955 में विजय माल्या का जन्म एक बेहद अमीर और रसूखदार परिवार में हुआ था। बचपन से ही उसने वह जिंदगी देखी थी जिसकी कल्पना भी आम लोग नहीं कर सकते। उसके पिता विट्ठल माल्या देश के सबसे बड़े बिजनेसमैनों में गिने जाते थे। के कारोबार में उनका ऐसा दबदबा था कि भारत की बड़ी लकर इंडस्ट्री पर उनका असर साफ दिखाई देता था।

यूनाइटेड ब्रूअरीज में उनका बड़ा हिस्सा था और बिजनेस की दुनिया में उनका नाम किसी बादशाह की तरह लिया जाता था। हालांकि उनकी छवि हमेशा साफ सुथरी नहीं मानी जाती थी। वह मीडिया से दूरी बनाकर रखते थे और लोगों के बीच यह चर्चा भी रहती थी कि अगर उनके खिलाफ कोई खबर चलने वाली होती तो वह उसे पहले ही दबवा देते थे। विजय माल्या उनका इकलौता बेटा था और बचपन से ही उसने राजाओं जैसी जिंदगी जी। लेकिन उसके शौक बाकी अमीर बच्चों से भी अलग थे।

उसे छोटी उम्र से ही गाड़ियों का जुनून था। जिस द्वार में भारत के बच्चे गिल्ली डंडा, कंचे और लट्टू में मस्त रहते थे, उस समय विजय रिमोट कंट्रोल वाली महंगी कारों से खेला करता था। पैसों की कभी कोई कमी नहीं रही और शायद इसी वजह से उसके अंदर कभी ना सुनने की आदत बनी ही नहीं। विट्ठल माल्या ने भी बेटे को सख्ती से रोकने-टोकने की कोशिश कम ही की।

नतीजा यह हुआ कि जैसे-जैसे विजय बड़ा हुआ, उसके शौक भी और बड़े होते चले गए। अब उसे खिलौनों वाली कारों में मजा नहीं आता था। उसे असली रफ्तार चाहिए थी। महंगी स्पोर्ट्स कारें, विंटेज मॉडल और रेसिंग उसकी दीवानगी बन चुकी थी। उसके पास करीब 250 विंटेज कारों का शानदार कलेक्शन था।

इतना ही नहीं उसने सिर्फ अपने शौक के लिए 200 से ज्यादा घोड़े पाल रखे थे। लोग कहते थे कि विजय मालिया को जिंदगी सिर्फ जीनी नहीं थी। उसे दिखाकर जीना था। लेकिन उसके पिता को यह सब पसंद नहीं आता था। उनका मानना था कि जिस आदमी का ध्यान सिर्फ शौक और दिखावे में हो वो बिजनेस में ज्यादा दूर नहीं जा सकता। लेकिन विजय अपनी ही दुनिया में खोया रहता था। उसे रफ्तार से प्यार था।

यही वजह थी कि 1982 में उसने इंडियन ग्रामप्री अवार्ड जीतकर सबको चौंका दिया। उस जीत के बाद वह नेशनल चैंपियन बन गया। उस वक्त ऐसा लगने लगा था कि शायद वह बिजनेस से ज्यादा रेसिंग की दुनिया में नाम कमाएगा। लेकिन जिंदगी ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था। फिर अचानक एक ऐसा हादसा हुआ जिसने उसकी पूरी दुनिया बदल दी। विट्ठल माल्या को हार्ट अटैक आया और उनकी हो गई।

विजय उस समय सिर्फ 28 साल का था। एक झटके में उसके सिर से पिता का साया उठ गया। जिस उम्र में वह बिना किसी जिम्मेदारी के अपनी लग्जरी लाइफ एंजॉय करना चाहता था, उसी उम्र में उसके कंधों पर अरबों के बिजनेस साम्राज्य का बोझ आ गिरा। उस द्वार में कई लोग फुसफुसाकर कहते थे, “यह लड़का बिजनेस नहीं संभाल पाएगा। इसे सिर्फ पार्टियां करना आता है। लेकिन विजय मालिया ने शुरुआत में सबकी सोच गलत साबित कर दी। उसने बिजनेस को सिर्फ संभाला नहीं बल्कि उसे और बड़ा बनाने की ठानी।

यूनाइटेड ब्रूअरीज के तमाम ब्रांड्स में उसकी नजर सबसे ज्यादा किंग फिशर पर थी। दरअसल पिता की मौत से कुछ साल पहले इसी ब्रांड को लॉन्च करने में विजय की बड़ी भूमिका रही थी। वह खुद युवा था। इसलिए उसे अच्छी तरह पता था कि युवाओं को क्या पसंद आता है। उसने समझ लिया था कि अगर किंग फिशर को सिर्फ शराब नहीं बल्कि एक लाइफस्टाइल बनाकर पेश किया जाए तो यह ब्रांड लोगों के सिर चढ़कर बोलेगा और फिर उसने वही किया। विज्ञापनों में ग्लैमर, मॉडल्स, चमक-दमक, बड़ी पार्टियां।

किंग फिशर सिर्फ एक बीियर नहीं रही। बल्कि गुड टाइम्स की पहचान बन गई। विजय माल्या खुद भी उस ब्रांड का चेहरा बन गया। जहां भी कैमरे होते वहां विजय माल्या मौजूद होता। कभी यॉर्ड पार्टी में, कभी विदेशी बीच पर तो कभी बॉलीवुड सितारों के बीच। लोग उसे देखकर कहते, यह आदमी जिंदगी नहीं जी रहा।

यह तो जिंदगी का जश्न मना रहा है। धीरे-धीरे उसका नाम भारत के सबसे चर्चित बिजनेसमैनों में शामिल हो गया। लेकिन शायद यहीं से वो कहानी शुरू हुई। जहां सफलता और घमंड के बीच की लाइन धुंधली पड़ने लगी। विजय मालिया बहुत जल्दी समझ चुका था कि अगर किंगफिशर को सिर्फ एक की बनाकर रखा गया तो वह कभी लोगों के दिलों तक नहीं पहुंचेगी। उसे एक ऐसी पहचान बनानी थी जो युवाओं की लाइफ स्टाइल का हिस्सा बन जाए। और इसके लिए उसने सिर्फ एक रास्ता चुना यंग जनरेशन।

उस दौर में बेंगलुरु तेजी से बदल रहा था। भारत में मॉडर्न नाइट लाइफ और पप कल्चर की शुरुआत यहीं से हो रही थी। यही वो जगह थी जहां विजय माल्या को अपना सबसे बड़ा मौका दिखाई दिया। उसने बड़ी चालाकी से किंग फिशर को युवाओं की जिंदगी में उतारना शुरू किया। शहर के पब्स में ऐसा माहौल तैयार किया जाने लगा जहां लोग सिर्फ करने नहीं बल्कि फील लेने आते थे। खासतौर पर लड़कियों के लिए सेफ और ग्लैमरस माहौल बनाया गया ताकि ज्यादा से ज्यादा युवा वहां आए। धीरे-धीरे यह ट्रेंड आग की तरह फैलने लगा। रात होते ही बेंगलुरु की सड़कें जगमगाने लगती और युवा सुबह 4:00 बजे तक में बैठे रहते।

लोग कहते अगर पार्टी करनी है तो किंगफिशर के बिना मजा नहीं आएगा। जिस शहर में कभी मुश्किल से एक पब हुआ करता था वहां कुछ ही सालों में 40 नए पब खुल गए। और इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा फायदा सीधे-सीधे किंग फिशर को मिल रहा था। विजय माल्या ने शराब को सिर्फ प्रोडक्ट नहीं रहने दिया।

उसने उसे कूल लाइफस्ट बना दिया। हालत यह हो गई कि लोग बार में जाकर नहीं मांगते थे। सीधे कहते थे भाई एक किंग फिशर देना। धीरे-धीरे किंगफिशर एक ब्रांड से कहीं ज्यादा बन चुका था। यह युवाओं की पहचान बन गया था। उस वक्त भारत में कई नेता और सामाजिक संगठन इस तेजी से बढ़ते वेस्टर्न कल्चर के खिलाफ आवाज उठाने लगे। उनका कहना था कि पब्ज़ और शराब युवाओं को गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं। लेकिन विजय माल्या इन बातों की परवाह करने वालों में से नहीं था। उसके लिए सबसे जरूरी चीज थी अपने बिजनेस को हर हाल में ऊंचाई तक पहुंचाना।

और सच भी यही था कि यूनाइटेड ब्ररीज उस समय भारत की सबसे बड़ी लकर कंपनी बन चुकी थी। हालात ऐसे थे कि देश में बिकने वाली हर दो बोतलों में से एक किंग फिशर की होती थी। विजय मालिया की जिंदगी उस दौर में किसी फिल्मी राजा जैसी दिखाई देती थी। उसका नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में पैसा, ग्लैमर और रॉयल लाइफस्टाइल घूमने लगती। जिस समय आम भारतीयों के लिए एक साधारण कार खरीदना भी सपना माना जाता था, उस समय माल्या के पास लग्जरी कारों का ऐसा काफिला था जिसे देखकर लोग दंग रह जाते।

वह जहां जाता वहां कैमरे अपने आप पहुंच जाते। उसकी पार्टियां, उसकी ओट, उसके प्राइवेट जेट सब कुछ लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र था। लेकिन हर चमकती हुई चीज हमेशा नहीं चमकती। धीरे-धीरे हालात बदलने लगे। भारत के कई राज्यों में शराब के खिलाफ माहौल बनने लगा और कुछ जगहों पर शराबबंदी लागू कर दी गई। इसका सीधा असर किंगफिशर की बिक्री पर पड़ा। जिन राज्यों में शराब पर रोक लगी, वहां हजारों बोतलों को ज्त किया जाने लगा।

कई जगह सरकारें उन बोतलों पर रोड रोलर तक चलवाने लगी। टीवी चैनलों पर वो तस्वीरें दिखाई जाती और यह सब विजय मालिया के लिए करोड़ों का नुकसान था। लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई। सरकार ने इसके बाद एक और बड़ा कदम उठाया। जिन राज्यों में शराब बेचना कानूनी था, वहां भी टीवी और अखबारों में शराब के विज्ञापनों पर रोक लगा दी गई। यह फैसला ऐसे वक्त में आया जब विजय माल्या अपने ब्रांड को और तेजी से बढ़ाने की तैयारी कर रहा था।

अचानक उसके सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया। अगर विज्ञापन ही नहीं कर पाएंगे तो ब्रांड जिंदा कैसे रहेगा? यहीं पर विजय मालिया ने एक ऐसा तरीका अपनाया जिसने पूरी इंडस्ट्री का खेल बदल दिया। यह था सरोगेट एडवरटाइजिंग। दुनिया भर में यह तकनीक उन प्रोडक्ट्स के लिए इस्तेमाल की जाती है जिनके सीधे विज्ञापन पर रोक होती है।

यानी असली प्रोडक्ट की जगह किसी दूसरी चीज का प्रचार करो लेकिन लोगों के दिमाग में वही पुराना ब्रांड घूमता रहे। किंग फिशर पहले ही देश भर में मशहूर हो चुका था। इसलिए विजय मालिया ने किंग फिशर मिनरल वाटर और सोडा ल्च कर दिए। टीवी पर विज्ञापन पानी और सोडा के चलते थे। लेकिन हर इंसान समझता था कि असली मकसद क्या है।

स्क्रीन पर चमकदार पार्टी, म्यूजिक, मॉडल्स और किंग ऑफ गुड टाइम्स की लाइन दिखाई देती और लोगों के दिमाग में सीधे बियर की तस्वीर बन जाती। यानी नाम पानी का था। लेकिन खेल पूरी तरह शराब के ब्रांड का चल रहा था। 1996 में जब क्रिकेट वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत कर रहा था, उस वक्त पूरा देश क्रिकेट के रंग में डूबा हुआ था। विजय मालिया ने इस मौके को सिर्फ खेल की तरह नहीं देखा। उसने इसे करोड़ों लोगों तक पहुंचने का सबसे बड़ा जरिया समझा।

उसने ऐसी एडवरटाइजिंग रणनीति अपनाई जिसने किंग फिशर का नाम हर जगह पहुंचा दिया। टीवी, स्टेडियम, बड़े इवेंट्स जहां नजर जाती वहां किसी ना किसी रूप में किंग फिशर दिखाई देता। अब यह सिर्फ एक शराब का ब्रांड नहीं रह गया था बल्कि एक ऐसी पहचान बन चुका था जिसे देश का हर दूसरा इंसान जानता था।

विजय मालिया धीरे-धीरे लोगों की सोच को समझने में माहिर हो चुका था। उसे पता चल गया था कि सिर्फ युवाओं को नहीं बल्कि हर उम्र के लोगों तक पहुंचना जरूरी है। उसने छोटे से छोटे और बड़े से बड़े हर इवेंट को स्पोंसर करना शुरू कर दिया। खासकर वो जगह जहां मीडिया मौजूद रहता था।

खेल हो, फैशन शो हो, म्यूजिक इवेंट हो या कोई हाई प्रोफाइल पार्टी, किंग फिशर का नाम हर जगह दिखने लगा। मीडिया चाहे चाहकर भी उससे दूरी नहीं बना पाता था। क्योंकि कैमरा जहां घूमता वहां कहीं ना कहीं किंग फिशर की ब्रांडिंग मौजूद होती। इसके बाद विजय मालिया ने एक और ऐसा कदम उठाया जिसने ग्लैमर की दुनिया में तहलका मचा दिया। किंग फिशर कैलेंडर लॉन्च किया गया। यह सिर्फ एक कैलेंडर नहीं था बल्कि मॉडलिंग और फैशन इंडस्ट्री में एंट्री का सबसे बड़ा दरवाजा बन गया। हर साल खूबसूरत लोकेशनेशंस पर फोटो शूट होते और नए चेहरों को मौका दिया जाता।

धीरे-धीरे यह कैलेंडर इतना मशहूर हो गया कि इसमें जगह मिलना खुद एक उपलब्धि माना जाने लगा। इसी कैलेंडर से बॉलीवुड को कई बड़े चेहरे मिले। दीपिका पादुकोण ने 2006 में किंगफिशर कैलेंडर गर्ल का टाइटल जीता और सिर्फ 2 साल बाद 2008 में उनकी पहली फिल्म रिलीज हुई।

इसके अलावा कैटरीना कैफ और नरगिस फाखरी जैसी मॉडल्स और एक्ट्रेसेस को भी इस प्लेटफार्म से बड़ी पहचान मिली। कहा जाता था कि इस कैलेंडर के लिए मॉडल्स का चुनाव विजय मालिया खुद करता था। 2003 में शुरू हुआ यह सिलसिला लगातार 19 साल तक चलता रहा और फैशन इंडस्ट्री में इसकी अलग ही पहचान बन गई। विजय मालिया ने भारत में ड्रिंकिंग कल्चर को जिस स्तर तक पहुंचाया उसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। उसने शराब को सिर्फ एक आदत नहीं रहने दिया बल्कि उसे ग्लैमर, पार्टी और हाई स्टेटस लाइफस्टाइल के साथ जोड़ दिया।

उसके पास वो सब कुछ था जिसका लोग सिर्फ सपना देखते हैं। बेहिसब दौलत, बेशुमार शहरत और एक ऐसा ब्रांड जो हर दिन करोड़ों कमा रहा था। लेकिन इतनी सफलता के बावजूद उसके अंदर एक खालीपन था। उसे एक चीज हमेशा चुभती थी।

लोग उसे लेकर बैरन कहते थे। का बादशाह कहते थे। बाहर से वह मुस्कुराता रहता। लेकिन अंदर ही अंदर यह नाम उसे परेशान करता था। वह समझता था कि लोग उसके आसपास जरूर घूमते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर उसके पैसों और ताकत की वजह से है। समाज में उसे वह सम्मान नहीं मिल रहा था जिसकी उसे तलाश थी। विजय मालिया चाहता था कि लोग उसे सिर्फ शराब बेचने वाले बिजनेसमैन के रूप में ना देखें।

इसी वजह से उसने राजनीति में कदम रखा। उसे लगा कि सत्ता और राजनीति उसे वह इज्जत दिला सकती है जो पैसे से नहीं मिल रही। लेकिन उसके दिमाग में इससे भी बड़ा सपना पल रहा था। वह कुछ ऐसा करना चाहता था जिससे उसकी पहचान पूरी तरह बदल जाए। वह चाहता था कि लोग उसका नाम सुनते ही सिर्फ बियर नहीं बल्कि क्लास और लग्जरी को याद करें और यहीं से शुरू हुआ उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दांव।

2004 में विजय मालिया ने 12 एयर बस A320 विमान खरीदने का फैसला किया। इन विमानों की कीमत करीब 204 मिलियन थी। इसके साथ ही उसने किंग फिशर एयरलाइंस लॉन्च करने की घोषणा कर दी। यह सिर्फ एक नई एयरलाइन नहीं थी बल्कि विजय मालिया का सपना था। भारत के आम आदमी को ऐसा फ्लाइंग एक्सपीरियंस देना जो उस समय सिर्फ अमीर लोग महसूस करते थे।

उसका कहना था अगर लोग ट्रेन और बस में सफर करते-करते थक चुके हैं तो उन्हें हवा में भी रॉयल फील मिलनी चाहिए। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यही सपना आगे चलकर विजय मालिया की जिंदगी का सबसे बड़ा तूफान बनने वाला है। किंग फिशर एयरलाइंस की शुरुआत से पहले ही विजय मालिया ने साफ कर दिया था कि वह बाकी एयरलाइंस जैसा कुछ नहीं करने वाला। उसके कमर्शियल्स में खुलेआम कहा गया कि यहां सिर्फ फ्लाइट अटेंडेंट्स नहीं बल्कि मॉडल्स को हायर किया जाता है। यह सिर्फ एक एयरलाइन नहीं थी बल्कि हवा में उड़ती हुई लग्जरी लाइफस्टाइल थी।

लॉन्च को यादगार बनाने के लिए एक भव्य इवेंट रखा गया जिसमें देश भर की बड़ी-बड़ी हस्तियों को बुलाया गया। चमकती लाइट्स, मीडिया कैमरे, सेलिब्रिटीज और ग्लैमर के बीच विजय मालिया ने अपने बेटे के 18वें जन्मदिन पर किंग फिशर एयरलाइंस लॉन्च कर दी। यह एयरलाइन बाकी कंपनियों से पूरी तरह अलग दिखाई देती थी। लॉन्च के बाद देखते ही देखते इसकी चर्चा भारत से बाहर तक पहुंच गई। लोग इसे सिर्फ एयरलाइन नहीं बल्कि लाइफस्ट ब्रांड कहने लगे। विजय माल्या हर छोटी बड़ी चीज में खुद दिलचस्पी लेता था। फ्लाइट में मिलने वाले खाने से लेकर एयर होस्टेस के लुक तक हर चीज उसकी निगरानी में तय होती।

यहां तक कि एयरलाइंस स्टाफ का यूनिफार्म भी मशहूर फैशन डिजाइनर मनु वीरवानी खोसला से डिजाइन करवाया गया ताकि सब कुछ प्रीमियम लगे। उस दौर में ज्यादातर एयरलाइंस इकॉनमी और बिजनेस क्लास में बंटी होती थी। लेकिन किंग फिशर खुद को अलग बताती थी। विजय मालिया का कहना था हमारी अपनी क्लास है किंग फिशर क्लास और सच कहें तो उस समय भारत में इतनी शानदार सर्विस बहुत कम एयरलाइंस देती थी। कम कीमत के टिकट में यात्रियों को ऐसी सुविधाएं मिलती जिनकी लोगों ने उम्मीद भी नहीं की थी। आरामदायक सीटें, प्रीमियम सर्विस, शानदार खाना और ऐसा अनुभव जो आम भारतीय यात्रियों के लिए बिल्कुल नया था। लेकिन धीरे-धीरे विजय मालिया की सोच बदलने लगी। शुरुआत में यह एयरलाइन आम यात्रियों को बेहतर अनुभव देने के लिए बनाई गई थी। मगर अब उसका ध्यान लग्जरी और प्रीमियम मार्केट पर ज्यादा जाने लगा। एक दिन एयरबस की फैक्ट्री विजिट के दौरान सेल्स टीम ने उसे नए-नए एयरक्राफ्ट्स और फीचर्स दिखाए।

चमकदार प्रेजेंटेशन, हाईटेक केबिन और लग्जरी सुविधाएं देखकर विजय इतना प्रभावित हुआ कि उसी दिन उसने करीब $1 अरब डॉलर के नए विमान खरीदने का फैसला कर लिया। यहीं से खेल बदलने लगा। अब एयरलाइन धीरे-धीरे बजट मॉडल से हटकर प्रीमियम क्लास की तरफ बढ़ रही थी।

जबकि असली बाजार की मांग कुछ और थी। भारत में उस समय ज्यादातर लोग सस्ती फ्लाइट टिकट चाहते थे ना कि महंगी लग्जरी सर्विस। लेकिन विजय मालिया को लग रहा था कि लोग रॉयल एक्सपीरियंस के लिए ज्यादा पैसे खर्च करेंगे। पहले जहां एयरलाइन में अलग क्लासेस नहीं थी, अब नई प्रीमियम क्लास लॉन्च की गई। यहां यात्रियों को ऐसी चीजें परोसी जाने लगी जिनके नाम तक बहुत से भारतीय पहली बार सुन रहे थे। लग्जरी सीटिंग, फाइव स्टार जैसी सर्विस और खाने में जैसी ।

यह सब आम भारतीय यात्री के लिए बिल्कुल नया अनुभव था। समस्या यह थी कि इन सब सुविधाओं का खर्च बहुत तेजी से बढ़ रहा था। ज्यादा ग्राउंड स्टाफ रखा गया। अतिरिक्त फ्लाइट अटेंडेंट्स हायर किए गए और हर फ्लाइट पर खर्च बढ़ता चला गया। लेकिन दूसरी तरफ यात्रियों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ी जितनी उम्मीद की गई थी। लोग सस्ती टिकट चाहते थे। जबकि एयरलाइन का खर्च लगातार लग्जरी की तरफ भाग रहा था। नतीजा यह हुआ कि शुरुआत के सिर्फ 18 महीनों में ही किंगफिशर एयरलाइंस को ₹347 करोड़ का नुकसान हो गया। हालांकि विजय माल्या के लिए उस समय यह रकम बहुत बड़ी नहीं थी। उसे भरोसा था कि आगे चलकर सब ठीक हो जाएगा।

इसी भरोसे में वह लगातार एयरलाइन में पैसा झोंकता रहा। उस वक्त तक किंग फिशर सिर्फ घरेलू उड़ाने चला रही थी। लेकिन विजय माल्या को इंटरनेशनल मार्केट में उतरने की बहुत जल्दी थी। वह चाहता था कि उसकी एयरलाइन दुनिया के बड़े एयरपोर्ट्स पर दिखाई दे। मगर भारत के नियम साफ थे। कोई भी एयरलाइन तब तक अंतरराष्ट्रीय उड़ाने शुरू नहीं कर सकती थी जब तक उसे घरेलू उड़ानों का 5 साल का अनुभव ना हो जाए। यही वो जगह थी जहां जल्दबाजी ने खतरा पैदा किया। विजय माल्या ने रास्ता निकालने के लिए एयर डेक्कन नाम की दूसरी एयरलाइन खरीदने का फैसला किया। यह सौदा बाजार कीमत से काफी ज्यादा पैसों में हुआ और सबसे बड़ी बात इसके लिए लिया गया पैसा खुद का नहीं था। यह पैसा भारतीय बैंकों से लिए गए लोन का था। उसकी सोच बेहद आसान लगती थी।

बैंक से कर्ज लो, बिजनेस में लगाओ, कंपनी बड़ी होगी, मुनाफा आएगा और फिर आराम से लोन चुका दिया जाएगा। सुनने में यह प्लान बहुत शानदार लगता था। लेकिन असली खेल उस एक चीज पर टिका हुआ था जिस पर बिजनेस की दुनिया हमेशा भरोसा नहीं करती। रिटर्न आएगा भी या नहीं? अब किंग फिशर, एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय उड़ाने भरने लगी थी।

बाहर से सब कुछ शानदार दिखाई देता था। एयरपोर्ट्स पर चमकदार स्टाफ, लग्जरी सर्विस, मुस्कुराते हुए क्रू मेंबर्स और यात्रियों के लिए रॉयल ट्रीटमेंट। पैसेंजर्स भी इस अनुभव से खुश थे। लोगों को लगने लगा था कि भारत को आखिरकार एक ऐसी एयरलाइन मिल गई है जो विदेशी कंपनियों को टक्कर दे सकती है। लेकिन इस चमकदार पर्दे के पीछे एक खतरनाक सच्चाई धीरे-धीरे आकार ले रही थी। एयरलाइन अंदर ही अंदर कर्ज के बोझ तले दबती जा रही थी। हैरानी की बात यह थी कि जिस द्वार में कंपनी को संभालने की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उसी समय विजय मालिया अपने दूसरे शौकों में भी करोड़ों रुपए झोंक रहा था।

उसने फार्मूला वन टीम खरीदी। क्रिकेट टीमों में पैसा लगाया और अपनी लग्जरी लाइफस्टाइल पहले की तरह जारी रखी। वह यह जानते हुए भी खर्च कर रहा था कि उसकी एयरलाइन का बड़ा हिस्सा उधार के पैसों पर टिका हुआ है। लेकिन शायद उसे भरोसा था कि उसका नाम और ब्रांड वैल्यू हर मुश्किल से बाहर निकाल लेंगे। फिर 2008 आया और इसके साथ आई पूरी दुनिया को हिला कर रख देने वाली आर्थिक मंदी। अमेरिका की मार्केट अचानक गिर गई। स्टॉक मार्केट क्रैश हो गए। डॉलर का असर पूरी दुनिया पर पड़ने लगा। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी और लोगों की खरीदने की ताकत कमजोर पड़ गई।

जब भी दुनिया में मंदी आती है, लोग सबसे पहले अपने गैर जरूरी खर्च कम करते हैं। घूमना फिरना, छुट्टियां और हवाई सफर इन सब पर सबसे पहले असर पड़ता है। इस बार भी यही हुआ। फ्यूल की कीमतें लगभग तीन गुना तक बढ़ गई। बड़ी कंपनियों ने अपने बिजनेस ट्रिप्स कैंसिल करने शुरू कर दिए और आम टूरिस्ट ने भी यात्रा कम कर दी। ऐसे हालात में वही एयरलाइंस बच सकती थी जो खर्चों पर कंट्रोल रखना जानती थी।

लेकिन किंग फिशर की पहचान ही उसके भारीभरकम खर्च थे। बाकी कंपनियां खर्च कम कर रही थी। जबकि किंग फिशर अब भी उसी शाही अंदाज में पैसा बहा रही थी। टिकट के दाम दूसरी एयरलाइंस से कम रखे जा रहे थे। लेकिन सुविधाएं उनसे कहीं ज्यादा दी जा रही थी। यानी कम कमाई और ज्यादा खर्च। यह मॉडल ज्यादा दिन टिक नहीं सकता था। धीरे-धीरे नुकसान इतना बढ़ गया कि बात छुपाना मुश्किल होने लगी और फिर वो दिन आया जब पूरी कहानी दुनिया के सामने खुलने लगी। 12 सितंबर 2011 को कनाडा की एक रिसर्च फर्म ने एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट का नाम था पाई इन द स्काई। जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, बिजनेस जगत में हलचल मच गई। रिपोर्ट में किंगफिशर एयरलाइंस की असली हालत का खुलासा किया गया था।

रिसर्च फर्म ने गौर किया कि दुनिया की ज्यादातर एयरलाइंस घाटे में होने के बावजूद खर्च घटा रही थी। लेकिन किंग फिशर आदि खाली उड़ानों में भी लग्जरी सर्विस देती जा रही थी। मामला संदिग्ध लगा तो उन्होंने गहराई से जांच शुरू की। जांच में जो सामने आया उसने सबको चौंका दिया। पता चला कि एयरलाइन के खर्च उसकी कमाई से कहीं ज्यादा थे। और सबसे बड़ी बात यह पूरा खेल उधार के पैसों पर चल रहा था। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि किंग फिशर ने अलग-अलग बैंकों से भारी मात्रा में लोन लिया हुआ था।

अक्टूबर 2009 में IDBI बैंक जो एक सरकारी बैंक था उसने किंग फिशर को करीब 200 मिलियन का कर्ज दिया था। आमतौर पर कोई भी बैंक इतना बड़ा लोन देने से पहले पूरी जांच करता है। यह देखा जाता है कि सामने वाली कंपनी पैसे लौटाने की हालत में है या नहीं। गारंटी ली जाती है। दस्तावेज जांचे जाते हैं। लेकिन विजय मालिया ने बैंकों को ऐसे दस्तावेज और भविष्य के आंकड़े दिखाए जिनसे यह साबित किया गया कि आगे चलकर एयरलाइन भारी मुनाफा कमाएगी और सारा पैसा लौटा दिया जाएगा। उस समय विजय माल्या का नाम इतना बड़ा था कि कई बैंकों ने सिर्फ उसकी पहचान और ब्रांड वैल्यू पर भरोसा कर लिया।

यही सबसे बड़ी गलती साबित हुई। बिना मजबूत सुरक्षा के करोड़ों डॉलर का कर्ज पास कर दिया गया। 2009 और 2010 के दौरान किंग फिशर एयरलाइंस ने जितने बड़े खर्च किए उनमें से ज्यादातर या तो लोन लेकर किए गए थे या फिर उधार पर सेवाएं लेकर। यह रकम बढ़ते-बढ़ते करीब $ अरब डॉलर तक पहुंच गई। पाई इन द स्काई रिपोर्ट ने पूरे भारत में टहलका मचा दिया क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि किंग फिशर दिवालिया होने के बेहद करीब पहुंच चुकी है। रिपोर्ट सामने आते ही हालात और बिगड़ गए। फ्यूल कंपनियों ने उधार पर तेल देना बंद कर दिया। जिन कंपनियों से एयरलाइन सर्विस लेती थी, उन्होंने भी हाथ खींचना शुरू कर दिया।

यहां तक कि कैटरिंग सर्विस देने वाली कंपनियों को महीनों से पैसे नहीं मिले थे। आखिरकार उन्होंने भी खाना सप्लाई करने से मना कर दिया। यह विजय माल्या और किंग फिशर एयरलाइंस के लिए सबसे मुश्किल दौर था। अब हालत यह हो गई कि फ्लाइट्स में यात्रियों के लिए खाने की कमी पड़ने लगी। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि फ्लाइट अटेंडेंट्स ने अपना खाना तक पैसेंजर्स को ऑफर कर दिया। बाहर से एयरलाइन अब भी मुस्कुरा रही थी लेकिन अंदर सब कुछ टूटने लगा था। फिर वह दिन भी आया जिसका किसी ने कभी सोचा नहीं था। किंग फिशर एयरलाइंस के कर्मचारियों की सैलरी रुक गई। स्टाफ को भरोसा दिलाया गया।

बस थोड़ा वक्त और कंपनी संभल जाएगी। सबका पैसा मिल जाएगा। लेकिन दिन हफ्तों में बदले हफ्ते महीनों में और देखते ही देखते 6 महीने गुजर गए। कर्मचारियों को ₹1 की भी सैलरी नहीं मिली। वही लोग जो कभी इस एयरलाइन को भारत की सबसे शानदार कंपनी बताते थे। अब अपने घर चलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। किंग फिशर एयरलाइंस के हालात अब इतने खराब हो चुके थे कि कर्मचारियों के सब्र का बांध टूटने लगा। महीनों से सैलरी ना मिलने की वजह से स्टाफ सड़कों पर उतर आया। एयरपोर्ट्स के बाहर प्रदर्शन होने लगे।

कर्मचारी हाथों में पोस्टर लेकर खड़े रहते और सिर्फ एक सवाल पूछते हमारी मेहनत का पैसा कहां है? लेकिन उन्हें हर बार सिर्फ भरोसे दिए गए। थोड़ा और इंतजार करो। कंपनी संभल जाएगी। मगर वक्त गुजरता गया और हालात बद से बदतर होते चले गए। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि लगभग 900 कर्मचारी लगातार 6 महीनों से बिना सैलरी के काम कर रहे थे। कई लोगों के घरों का खर्च रुक गया था। किसी के बच्चों की फीस नहीं भर पा रही थी तो कोई किराया देने में असमर्थ था। लेकिन दूसरी तरफ विजय माल्या की जिंदगी में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा था। वह अब भी फार्मूला वन टीम चला रहा था। क्रिकेट टीमों में पैसा लगा रहा था और उसी शाही अंदाज में जिंदगी जी रहा था।

किंग फिशर एयरलाइंस के पास पैसा भले ना बचा हो लेकिन विजय मालिया की लग्जरी लाइफस्टाइल में कोई कमी नहीं आई थी। जब कर्मचारी टीवी पर उसकी आलीशान पार्टियां और महंगी लाइफ देखते तो उनका गुस्सा और बढ़ जाता। उन्हें लगता था कि जिस आदमी के लिए उन्होंने दिन रात मेहनत की वही आज उनकी परेशानी से आंखें फेर चुका है। इसी बीच मुंबई इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने टैक्स बकाया रहने की वजह से दो बार किंगफिशर एयरलाइंस के बैंक अकाउंट्स सीज कर दिए। हालात इतने खराब हो चुके थे कि 2012 की शुरुआत तक एयरलाइन के आधे से ज्यादा विमान जमीन पर खड़े रह गए।

उड़ाने लगातार रद्द होने लगी और कभी भारत की टॉप एयरलाइन कहलाने वाली किंग फिशर धीरे-धीरे अपना नाम खोने लगी। फिर आखिरकार वो दिन आ गया जिसने इस पूरे साम्राज्य का अंत तय कर दिया। अक्टूबर 2012 में डायरेक्टेट जनरल ऑफ सिविल एवीएशन यानी डीजीसीए ने किंगफिशर एयरलाइंस का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया। यह सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं था बल्कि किंग ऑफ गुड टाइम्स की उड़ान का आखिरी पड़ाव था। जांच में सामने आया कि विजय मालिया ने भारत के 17 बैंकों से कुल करीब ₹9000 करोड़ का कर्ज लिया था। इनमें ज्यादातर सरकारी बैंक थे। यानी वह पैसा आम जनता की मेहनत की कमाई था। जब बैंकों को पैसा वापस नहीं मिला तो उन्होंने विजय मालिया के खिलाफ केस दर्ज किए।

उसे विलफुल डिफॉल्टर कहा गया। मतलब ऐसा व्यक्ति जिसने यह जानते हुए भी भारी कर्ज लिया कि उसकी कंपनी डूब रही है और पैसा लौटाना मुश्किल होगा। मामला इतना बड़ा हो चुका था कि सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने भी जांच शुरू कर दी। जांच एजेंसियों को पता चला कि कई लोन फर्जी दस्तावेजों और गलत जानकारी के आधार पर लिए गए थे। आगे की जांच में यह भी सामने आया कि जो पैसा एयरलाइन को बचाने के नाम पर लिया गया था, उसका एक हिस्सा निजी लग्जरी और यूबी ग्रुप के दूसरे कारोबारों में इस्तेमाल किया गया। लेकिन लोगों का गुस्सा उस वक्त और भड़क गया जब इन सब हालात के बीच विजय माल्या ने अपना 68वां जन्मदिन गोवा में बेहद शाही अंदाज में ।

इस पार्टी में मशहूर सिंगर एनरिक इग्लेसियस को बुलाया गया था। बताया जाता है कि सिर्फ एनरिक की परफॉर्मेंस फीस ही करीब 1.5 मिलियन थी। बाकी खर्च अलग। लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया। अगर पार्टी पर इतना पैसा खर्च हो सकता है तो कर्मचारियों की सैलरी क्यों नहीं दी जा सकती? कई रिपोर्ट्स में यह तक कहा गया कि उस पार्टी के कुल खर्च का सिर्फ 20% हिस्सा देकर कर्मचारियों की महीनों की सैलरी चुकाई जा सकती थी। वही कर्मचारी जो उस समय आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुके थे। फिर कानूनी शिकंजा तेजी से कसना शुरू हुआ।

जब भारत में विजय माल्या के खिलाफ जांच और कानूनी कार्यवाही तेज हुई तो 2016 में वह देश छोड़कर यूनाइटेड किंगडम चला गया। भारतीय एजेंसियों ने उसका पासपोर्ट रद्द कर दिया और ब्रिटेन सरकार से उसे भारत वापस भेजने की मांग की गई। भारत चाहता था कि विजय माल्या को वापस लाकर यहां उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जाए।

यूके की अदालतों में यह मामला लंबे समय तक चलता रहा। आखिरकार दिसंबर 2018 में ब्रिटिश कोर्ट ने फैसला सुनाया कि विजय मालिया को भारत प्रत्यार्पित किया जा सकता है। लेकिन माल्या ने इस फैसले के खिलाफ अपील कर दी और कानूनी लड़ाई आगे बढ़ती रही। उधर भारत में उसकी संपत्तियों पर कारवाई शुरू हो चुकी थी। अदालतों ने उसकी प्रॉपर्टीज सीज करने के आदेश दिए। ईडी ने भारत और विदेशों में मौजूद उसकी कई संपत्तियां फ्रीज कर दी ताकि बैंकों का पैसा वापस निकाला जा सके। उसकी लग्जरी कारें, आलीशान बंगले और यूबी ग्रुप के शेयर तक नीलामी के लिए रखे गए।

विजय मालिया ने कई बार बैंकों और अदालतों के साथ समझौते की कोशिश भी की। लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया। किंग फिशर एयरलाइंस के खत्म होने के बाद उसकी पब्लिक इमेज पूरी तरह बदल चुकी थी। कभी किंग ऑफ गुड टाइम्स कहलाने वाला आदमी अब देश के सबसे बड़े आर्थिक विवादों में गिना जाने लगा।

मीडिया और आम लोग लगातार उसकी आलोचना कर रहे थे। खासतौर पर इसलिए क्योंकि वह ब्रिटेन में लग्जरी जिंदगी जी रहा था। जबकि भारत में हजारों करोड़ रुपए का कर्ज और अधूरी जिम्मेदारियां उसके नाम से जुड़ी थी। आज भी विजय मालिया की कानूनी टीम उसे बचाने की कोशिश कर रही है। लेकिन भारत उसे वापस लाने की कोशिशें लगातार जारी रखे हुए हैं। यह कहानी सिर्फ एक बिजनेसमैन के उठने और गिरने की नहीं है। यह उस घमंड, जल्दबाजी और दिखावे की कहानी भी है जहां इंसान यह मान बैठता है कि पैसा हर गलती को ढक सकता है।

लेकिन वक्त आखिरकार हर चमक के पीछे छुपी सच्चाई दुनिया के सामने ले ही आता है। और शायद यही वजह है कि किंग ऑफ गुड टाइम्स कहलाने वाला आदमी आज इतिहास में एक चेतावनी बनकर दर्ज हो चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *