जंतरमंतर पर भूख हड़ताल, बिगड़ती सेहत और लद्दाख के अधिकारों की लड़ाई। भूख हड़ताल को लेकर सोनम मांगचुक एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह पहली बार नहीं है जब वांगचुक परिवार ने अपनी मांगों के लिए अनशन का रास्ता चुना हो। करीब 40 साल पहले उनके पिता सोनम बांग्याल भी लद्दाख के हक की लड़ाई के लिए भूख हड़ताल पर बैठे [संगीत] थे। उनके पिता ने अनशन का रास्ता क्यों चुना? उनकी मांगे क्या थी? उस समय की प्रधानमंत्री यानी इंदिरा गांधी तक यह मुद्दा पहुंचा कैसे? चलिए जानते हैं पूरी कहानी। आप देख रहे हैं एबीपी लाइव और मैं साइमा पद।
सोनम मांगचुक जंतरमंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी सेहत को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है और लद्दाख से लेकर दिल्ली तक उनके समर्थन में आवाजें उठने लगी है। लेकिन इस आंदोलन को समझने के लिए हमें करीब चार दशक पीछे जाना होगा। क्योंकि लद्दाख के अधिकारों की लड़ाई आज की नहीं बल्कि कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी और उस संघर्ष के सबसे अहम चेहरों में से एक नाम था सोनम वांग्याल जो सोनो मांगचुक के पिता थे। सोनम वांग्याल लद्दाख के आवाज माने जाते थे। उनके अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत नेशनल कॉन्फ्रेंस से हुई और बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यानी आईएसी से जुड़ गए। अपने लंबे राजनीतिक सफर में उन्होंने लद्दाख के विकास, पहचान और लोगों के अधिकारों को लेकर बात की। साल 1975 में उन्हें जम्मू कश्मीर सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए।
मंत्री के तौर पर उन्होंने लद्दाख से जुड़े कई अहम सोशल और पॉलिटिकल मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया। इसके बाद साल था 1984। उस समय लद्दाख के लोगों की सबसे बड़ी मांग थी पूरे क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति यानी स्ेड्यूल ट्राइब का दर्जा दिया जाए। उनका मानना था कि पहाड़ी और दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों को स्पेशल कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोडक्शन मिलनी चाहिए। इसकी मांग को लेकर सोनम मांग्याल ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। अब सवाल है कि उस समय एसटी दर्जे की मांग इतनी अहम क्यों थी? इसकी कई वजह है। पहली वजह अगर लद्दाख को स्ेड्यूल ट्राइब का दर्जा मिलता तो वहां के युवाओं को एजुकेशन और गवर्नमेंट जॉब्स में रिजर्वेशन मिलता। दूसरी वजह पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के अधिकार मजबूत होते। तीसरी वजह स्थानीय संस्कृति और सामाजिक पहचान को संवैधानिक संरक्षण मिलता और चौथी वजह विकास में जो क्षेत्रीय इनकलिटीज थी उसे कम करने का रास्ता खुल जाता। सोनम बांग्याल की भूख हड़ताल का असर अब भी बड़ा हुआ है। उनके समर्थन में पूरे लद्दाख में जन आंदोलन खड़ा हो चुका है। यह मुद्दा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंचा। हालांकि 1984 में उनकी मांग पूरी नहीं हो पाई।
लेकिन केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना पड़ा। यही आंदोलन आगे चलकर एक मजबूत राजनीतिक दबाव बना और आखिरकार कई सालों की कोशिशों के बाद 1989 में लद्दाख के लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला। अब आइए आज के समय में लौट जाते हैं। आज सोन बांगचुक भी शांतिपूर्ण आंदोलन और भूख हड़ताल का रास्ता अपना रहे हैं। हालांकि उनकी सभी मांगे समय के साथ बदलती है, लेकिन उनका मकसद वही है लद्दाख के लोगों के अधिकारों की रक्षा। वो लंबे समय से एनवायरमेंटल और कॉन्स्टिट्यूशन प्रोडक्शन इसके साथ ही स्थानीय लोगों के अधिकार और लद्दाख से जुड़े मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते रहे हैं। इसलिए कई लोग उनके मौजूदा आंदोलन को उनके पिता के संघर्ष के असली कड़ी मानते हैं। अब चलिए थोड़ा सोनम बांगचुक के बारे में जान लेते हैं। सोना बांगचुक एक मैकेनिकल इंजीनियर, एनवायरमेंटलिस्ट, शिक्षा सुधारक और इनोवेटर हैं। उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख की स्थापना की जिसने लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने का काम किया। इसके अलावा उन्होंने आइस स्तूपा जैसी तकनीक डेवलप की जिसने दुनिया
भर में उन्हें राजनीतिक पहचान दिलाई। वहीं फिल्म 3D इयर्स के फुलसुक बांगड़ू का किरदार भी काफी हद तक उनके काम से प्रेरित माना जाता है। अगर साल 1984 और 2026 के आंदोलन को साथ रखकर देखें तो एक समानता साफ दिखाई देती है। पिता ने भी लद्दाख के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल की थी और आज बेटा भी शांतिपूर्ण आंदोलन के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। मुद्दे अलग हो सकते हैं। समय बदल सकता है लेकिन संघर्ष का तरीका और मकसद लद्दाख की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना आज भी वैसा ही दिखाई देता है। सूर्य वांगचू की मौजूदा भूख हड़ताल सिर्फ आज की राजनीति की कहानी नहीं बल्कि इसके पीछे चार दशक पुराना एक ऐसा इतिहास है जिसमें एक पिता ने लद्दाख के अधिकारों के लिए अनशन किया और सालों बाद उसी रास्ते पर उनका बेटा भी दिखाई दे रहा है और यही वजह है कि सोनम बांगचू के आंदोलन को सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि लद्दाख के अधिकारों और पहचान के उस लंबी लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। इस मामले पर आप क्या समझते हैं? कमेंट सेक्शन में कमेंट करके बताइए।