है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं। मनोज कुमार जिन्हें उनके प्रशंसक प्यार से भारत कुमार कहते थे। एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने भारतीय सिनेमा में अपनी देशभक्ति और संजीदगी भरी अदाकारी से एक खास मुकाम हासिल किया था।
एक ही मिट्टी, एक ही पूजा इसके सिवाना भाई दूजा। उनका अंदाज ऐसा था कि लोगों के दिलों को छू जाता था और कई बार वो अंदाज उन्हें स्टाइल आइकॉन बना देता था। दुल्हन चली दो बहन चली तीन रंग की टोली। उन्होंने अपनी देशभक्ति भरी फिल्मों से करोड़ों भारतीयों के दिलों में खास जगह बनाई और अपना खास स्टाइल भी ल्च किया। अब के बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि फिल्म निर्माता फराह खान और स्टार शाहरुख खान ने उनके स्टाइल का मजाक उड़ाते हुए इतनी चोट पहुंचाई कि उन्हें अपनी बात मनवाने के लिए अदालत का दरवाजा तक खटखटाना पड़ा था।
कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाऊं तो क्या किसी धान का दरवाजा खटखटाऊं? क्या आप मानेंगे कि फरा और शाहरुख खान ने अदालत के सामने मनोज कुमार से माफी मांग ली।
लेकिन कुछ साल बाद फिर वही गलती दोहरा डाली। मिस्टेकली और क्या आप यकीन करेंगे कि मनोज कुमार साहब ने फराह और शाहरुख खान पर दोबारा मुकदमा ठोक डाला और ₹100 करोड़ का हर्जाना मांग लिया। जो देश के कानून और संविधान को ना समझे वो इस देश का नागरिक कैसे हो सकता है? क्या था पूरा मामला और क्यों मनोज कुमार ने खुद को कह डाला था पठान? क्यों बार-बार समझाने के बावजूद शरारतें करना नहीं छोड़ रहे थे फिल्म निर्माता व स्टार।
कितनी रकम चुकानी पड़ी अदालत के आदेश की धज्जियां उड़ाने पर और किस तरह सुलझा पूरा मामला जानेंगे और भी बहुत कुछ। बस आप बने रहिए हमारे [संगीत] साथ। दोस्तों नमस्कार। आप देख रहे हैं ड्रामा सीरीज भारत और मैं हूं आपकी दोस्त और होस्ट मनीषा खन्ना। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं फिल्म इंडस्ट्री के भारत कुमार यानी मनोज कुमार और फिल्म स्टार शाहरुख खान की तकरार का वो किस्सा जो 100 करोड़ के हरर्जाने की मांग तक जा पहुंचा था।
सबसे पहले आपको सुनाते हैं मनोज कुमार साहब का वो बयान जिसमें उन्होंने खुद को पठान घोषित किया था। मैं गोस्वामी भी हूं और मैं पठान भी हूं। और पठान जब कुछ ठान लेता है तो फिर वो ठान लेता है। यह बयान मनोज कुमार साहब ने तब दिया था जब वो फिल्म स्टार शाहरुख खान से नाराज चल रहे थे। उन्होंने शाहरुख खान को दिल्ली में पैदा हुआ नकली पठान बताया था और स्वयं को फ्रंटियर की पैदाइश कहते हुए असली पठान बताया था। लेकिन इतना बता दूं शायद वो दिल्ली के या दिल्ली के आसपास पैदा हुए हैं। मैं पैदा ही फ्रंटियर में हूं। बात वैसे तो ज्यादा गंभीर नहीं थी।
लेकिन मनोज साहब को इतना गुस्सा क्यों आ गया था कि उन्होंने 100 करोड़ का हर्जाना मांग लिया। पूरी कहानी समझने के लिए एक नजर इसके बैकग्राउंड पर डालना जरूरी है। 24 जुलाई 1937 को तत्कालीन नॉर्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के एबोटाबाद में एक पंजाबी ब्राह्मण परिवार में जन्मे हरिकिशन गिरी गोस्वामी का परिवार देश विभाजन के दौरान दिल्ली शिफ्ट हो गया था।
हिंदी फिल्मों में उनकी एंट्री 1957 की फिल्म फैशन से हुई। उन्हें पहचान मिली विजय भट्ट साहब की सुपरहिट फिल्म हरियाली और रास्ता से जो रिलीज हुई थी 1962 में। जीवन के दो पहलू हैं हरियाली और रास्ता। इसके बाद के कुछ वर्षों में उन्होंने डॉक्टर विद्या, शादी और गृहस्ती जैसी सफल फिल्मों में अपनी पहचान बनाई जो 60 के दशक की शुरुआत में रिलीज हुई थी। मोरी पायल खुल खुल जाए राम मोरी पायल खुल खुल 1964 में मनोज कुमार राज घोसला साहब की मिस्ट्री थ्रिलर फिल्म वो कौन थी में एक नए अंदाज में नजर आई टिकी टिक टिकी टाकरी टिकी टिक कल ही दिया था मैंने दिल तुम्हें 1965 में आई फिल्म शहीद में उनके निभाए भगत सिंह के किरदार को लोगों ने इतना पसंद किया कि मनोज कुमार देशभक्ति के आइकन बन गए।
मेरा रंग दे बसंती चोला ओए रंग दे बसंती चो कहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खुद मनोज कुमार को बुलाकर उनसे मुलाकात की और जोरदार अभिनय के लिए उनकी प्रशंसा की। शास्त्री जी ने उनसे खुद एक देशभक्ति फिल्म बनाने का अनुरोध भी किया था जो उन्होंने 2 साल बाद कर दिखाया और जिसका जिक्र हम आगे करेंगे। इसके बाद 1965 में ही एक रोमांटिक ड्रामा हिमालय की गोद में आई जो एक ब्लॉकबस्टर साबित हुई। चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा। इस फिल्म ने उन्हें एक अभिनेता से स्टार बना दिया। साल के अंत से पहले उन्होंने मिस्ट्री थ्रिलर गुमनाम के साथ लोकप्रियता का एक और इतिहास रचा।
जान चमन शोला बदन के पहलू में आजा। सफलता का सिलसिला 1966 में जारी रहा जब उन्होंने आशा पारिख के साथ फिल्म दो बदन के लिए राज खोसला के साथ फिर से काम किया। भरी दुनिया में आखिर दिल को समझाने इस फिल्म को हौसला के निर्देशन कुमार के अभिनय और गीतकार शकील बदायूनी द्वारा लिखे गए गीतों के लिए याद किया जाता है। जिसमें मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर द्वारा गाए गीत शामिल हैं। नसीब में जिसके जो लिखा था वो तेरी महफिल मनोज कुमार ने उसी साल शक्ति सामंत के फिल्म साफन की घटा में शर्मिला टैगोर के साथ अभिनय करते हुए एक हॉरर हिट सौगात दी जरा हल्लेह चलो मोरे साजना हम भी पीटे हैं तुम दोस्तों प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के अनुरोध पर जय जवान जय किसान के नारे के साथ मनोज कुमार ने जो फिल्म बनाई थी उसका नाम था उपकार।
मेरे देश की धरती सोना उगले उबले हीरे मोती मेरे देश की धरती। हालांकि दुख की बात यह रही कि जब 1967 में यह फिल्म रिलीज हुई तब उनकी पीठ थपथपाने के लिए शास्त्री जी मौजूद नहीं थे। क्योंकि जनवरी 1966 में उनकी मृत्यु हो गई थी। लेकिन फिल्म बेहद लोकप्रिय रही और इसने मनोज कुमार साहब को एक नया आयाम दिया। रंग लो रंग लो दिलों को एक रंग में आई झूम के बसंत। बॉलीवुड जब रोमांस और ट्रेजडी की दो धाराओं में बह रहा था। उस वक्त मनोज कुमार ने अपने लिए देशभक्ति थीम को चुना और दर्शकों के दिलों में देश प्रेम का जज्बा जगाया।
भारत का रहने वाला हूं। भारत की बात उनकी फिल्मों ने उस दौर में भी तहलका मचाया जब राजेश खन्ना की आंधी में बाकी सितारे उड़ से गए थे। 1970 में रिलीज उनकी फिल्म पूरब और पश्चिम ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी उनका डंका बजा दिया था। वो घर वालों जरा इसको संभालो। ये तो है बड़ी। मनोज कुमार ने हमेशा ऐसे किरदार चुने जो समाज को एक संदेश देते थे। उनकी खुद की बनाई फिल्में देशभक्ति से ओतप्रोत तो रहती ही थी। समाज की विषम परिस्थितियों और व्यवस्था की खामियों पर करारा प्रहार भी करती थी। यही कारण था कि सत्ताधारी दल कांग्रेस और उनके दौर में लंबे अरसे तक सत्ता पर काबिज रही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मनोज कुमार फूटी आंखों नहीं सुहाते थे। इमरजेंसी के दौरान तो उनके फिल्मों का प्रदर्शन रोकने की भी कोशिशें की गई जिन्हें उन्होंने अदालत से लड़ाई लड़कर विफल करवाया।
उनकी फिल्म 10 नंबरी पर रोक लगी तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा जीतकर उसे रिलीज करवाया। उनके पूरे फिल्मी सफर पर किसी और वीडियो में विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी बात उनकी विचारधारा और उसके विरोध की। जिंदगी की ना टूटे लड़ी। मनोज साहब हमेशा से राष्ट्र विरोधियों और विपरीत विचारधारा वाले एजेंडाधारी फिल्मकारों के निशाने पर रहे। लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की और अपने मिशन पर हमेशा कायम रहे। लेकिन जब उन्होंने फिल्में बनाने और अभिनय का सिलसिला कम कर दिया तो उनकी विरोधी विचारधारा के फिल्मकार मनोज कुमार साहब की इमेज बिगाड़ने में जुट गए।
2007 में फिल्म ओम शांति ओम रिलीज हुई तो उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उन्हें गहरी ठेस पहुंचाई। यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट साबित हुई थी और दर्शकों ने इस पर जमकर प्यार लुटाया था। लेकिन मनोज कुमार एक खास सीन को लेकर नाराज हो गए। इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म के अभिनेता शाहरुख खान और निर्देशक फराह खान के खिलाफ कानूनी शिकायत तक दर्ज कर दी थी। विवाद का कारण था वह सीन जिसमें शाहरुख खान का किरदार ओम प्रकाश मखीजा मनोज कुमार के पास का इस्तेमाल करके एक फिल्म प्रीमियर में घुसने की कोशिश करता है। इस सीन में वो मनोज कुमार के मशहूर स्टाइल में हाथ से अपना चेहरा ढक लेता है जिसके चलते पुलिस उसे पहचान नहीं पाती।
लेकिन बाद में गार्ड्स उसे लाठियों से मारते हैं और भगा देते हैं। मनोज कुमार ने इस सीन को अपने सम्मान और छवि पर हमला माना। उन्होंने उस वक्त कहा मुझे बहुत ठेस पहुंची है। शाहरुख खान ने मेरी आत्मा को चोट पहुंचाई है। यह मेरे खिलाफ एक साजिश है। मेरा मजाक उड़ाने और अपमान करने की कोशिश है। यह फिल्म मेकिंग नहीं है। पिछले 50 सालों से फिल्म इंडस्ट्री के प्रति मेरी निष्ठा का अपमान किया गया है। अपनी बात को मजबूती देने के लिए उन्होंने मानहानि का मुकदमा दायर किया। मनोज कुमार की मांग थी कि फिल्म से वह सीन हटाया जाए। उनकी इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए फिल्म के निर्माताओं ने उनकी बात मान ली। शाहरुख खान ने भी आगे आकर माफी मांगी और कहा मैं पूरी तरह से गलत था।
अगर उन्हें ठेस पहुंची है तो मैं माफी चाहता हूं। इस माफी के साथ यह विवाद उस समय शांत होता दिखा। लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 2013 में जब ओम शांति ओम जापान में दोबारा रिलीज हुई तो मनोज कुमार को यह जानकर गहरा धक्का लगा कि वो विवादित सीन फिल्म में जस का तस मौजूद था। यह उनके लिए विश्वासघात जैसा था क्योंकि उन्हें पहले आश्वासन दिया गया था कि सीन को हटा दिया जाएगा। गुस्से और निराशा से भरे मनोज कुमार ने फिर से कानूनी रास्ता अपनाया। इस बार उन्होंने शाहरुख खान और फिल्म के निर्माता इरोज इंटरनेशनल के खिलाफ ₹100 करोड़ के हरजाने की मांग की।
मैं मन ही मन में मेरी आत्मा बहुत रोई है। अब मैं इसको और उजाला नहीं चाहता। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा जापान में फिल्म को उस सीन के साथ रिलीज किया गया। जबकि मुझे वादा किया गया था कि इसे हटा दिया जाएगा। यह मेरे साथ धोखा है। कानूनी प्रक्रिया भी शाहरुख और फराह खान में जिम्मेदारी की भावना नहीं जगा सकी। इस पूरे प्रकरण ने मनोज कुमार को गहरी निराशा दी। उन्होंने आखिरकार यह केस वापस ले लिया। लेकिन उनका कहना था कि जवाबदेही की कमी ने उन्हें बेहद आहत किया।
यह घटना उनके लिए केवल एक सीन के अपमान तक सीमित नहीं थी। यह उस सिनेमाई विरासत का सवाल था जिसे उन्होंने दशकों तक मेहनत और समर्पण से बनाया था। मनोज कुमार का भारतीय सिनेमा में योगदान अतुलनीय है। उनकी फिल्में न केवल मनोरंजन का साधन थी बल्कि देशभक्ति, सामाजिक मूल्यों और नैतिकता का संदेश भी देती थी। लेकिन यह विवाद उनके जीवन का एक ऐसा अध्याय बन गया, जिसने उनकी भावनाओं को गहरी चोट पहुंचाई। 87 साल की उम्र में मनोज कुमार का निधन मुंबई में हुआ। उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां दिल से जुड़ी समस्याओं के कारण उनकी मृत्यु हुई। अस्पताल के मेडिकल सर्टिफिकेट के अनुसार उनकी मृत्यु का दूसरा कारण डींपनसेटेड लीवर सिरोसिस था। मनोज कुमार की यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कला और सिनेमा में सम्मान और संवेदनशीलता कितनी महत्वपूर्ण है। एक छोटा सा सीन किसी की भावनाओं को कितना आहत कर सकता है यह इस घटना से साफ हो जाता है।