एक समय ऐसा था जब यह छोटी सी चिड़िया इंडिया के लगभग हर घर के आसपास दिखाई देती थी। लेकिन आज कई शहरों में इसे देखना भी मुश्किल हो गया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इंसानों के इतने करीब रहने वाला यह पक्षी आज इंसानों की दुनिया से ही गायब हो रहा है। आखिर ऐसा क्यों? क्यों हर समय हमारे आंगन में चहकने वाली गौरैया आज इतनी कम नजर आती है? और कैसे यह छोटा सा पक्षी हजारों सालों से इंसानों के साथ जीत आया है। तो आज हम जानेंगे गौरैया की पूरी कहानी। उनकी लाइफ, उनका सर्वाइवल और उनके वह हिडन सीक्रेट्स जो उन्हें दुनिया के सबसे खास पक्षियों में से एक बनाते हैं। गौरैया दुनिया के सबसे आसानी से पहचाने जाने वाले पक्षियों में से एक हैं। इनका साइंटिफिक नाम पैसर डोमेस्टिकस है और इंग्लिश में इन्हें हाउस पैरो कहा जाता है। यह पक्षी यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में पाया जाता है और यह इंसानों के साथ इतना घुलमिल गया है कि आज यह लगभग पूरी दुनिया में पाया जाता है। इंडिया में यह पक्षी कभी हर गांव और हर शहर का एक आम दृश्य था।
सुबह-सुबह इसकी चहचहट सुनना एक आम बात थी। यह पक्षी जंगल की गहराइयों में कम और इंसानों के आसपास रहना ज्यादा पसंद करता है और इन्हें इंसानों का सबसे पुराना पक्षी साथी माना जाता है। अगर इनके फिजिकल अपीरेंस को देखा जाए तो इनका शरीर लगभग 14 से 16 सेंटीमीटर जितना होता है। लेकिन इनका शरीर काफी कॉम्पैक्ट और मजबूत होता है। इनमें मेल और फीमेल अलग-अलग दिखाई देते हैं। मेल गौरैया के गले के पास काला पैच होता है और उसके सिर पर ग्रे और ब्राउन रंग का कॉम्बिनेशन दिखाई देता है। वही फीमेल गौरैया मेल की तुलना में सिंपल रंग की होती है जिसका रंग हल्का भूरा और क्रीम जैसा होता है। इनकी चोंच छोटी लेकिन काफी मजबूत होती है जो बीज और अनाज को तोड़ने के लिए परफेक्ट होती है। इनके पैर छोटे होते हैं लेकिन यह जमीन पर तेजी से चल सकती है और आसानी से छोटी-छोटी जर्म्स भी लगा सकती है। पहली नजर में यह पक्षी काफी ज्यादा सिंपल लग सकता है। लेकिन इसकी सिंपलीसिटी ने इसे दुनिया के सबसे सक्सेसफुल बर्ड्स में से एक बना दिया है। यह एक सोशल बर्ड है। यह अकेला नहीं रहता और अक्सर छोटे ग्रुप्स में दिखाई देता है।
सुबह होते ही इसकी दिन की शुरुआत हो जाती [संगीत] है। यह पक्षी खाने की तलाश में आसपास के इलाकों में घूमता रहता है और दिन भर एक्टिव रहता है। इनका खाना सीजन के हिसाब से बदलता रहता है। यह पक्षी बीज, अनाज, छोटे फ्रूट्स और इंसेक्ट्स भी खा लेता है और अपनी इसी फ्लेक्सिबिलिटी के कारण यह पक्षी अलग-अलग एनवायरमेंट्स में सर्वाइव कर लेता है। यह पक्षी काफी ज्यादा क्यूरियस होता है। अक्सर इसे इंसानों के आसपास बिना डरे घूमते हुए देखा जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्होंने इंसानों के साथ जीना सीख लिया है। जब इंसानों ने खेती करना शुरू किया तब यह गोरैया उनके आसपास रहने लगी। इन्हें खेतों में आसानी से अनाज मिल जाता था और सुरक्षित जगह भी मिल जाती थी। जिसके चलते धीरे-धीरे यह पक्षी और इंसान एक दूसरे के साथ अडॉप्ट हो गए और इसी वजह से यह पक्षी हजारों सालों से हमारे आसपास मौजूद है। एक समय था जब यह हर जगह पर दिखाई देती थी। लेकिन आजकल बड़े शहरों में इनकी संख्या में पहले के मुकाबले काफी गिरावट आई है। इसके पीछे का कारण कहीं ना कहीं हम इंसान ही है।
मॉडर्न बिल्डिंग में इन्हें नेस्टिंग की जगह कम मिलती है। पेस्टिसाइड्स की वजह से इंसेस्ट की संख्या भी कम हो जाती है और कई अर्बन एरियाज में नेचुरल फूड सोर्सेस भी कम हो गए हैं। इसी वजह से गौरैया का नाम कंजर्वेशन डिस्कशन में भी आने लगा है। और यही कारण है कि हर साल वर्ल्ड स्परो डे भी मनाया जाता है। ब्रीडिंग के सीजन के दौरान इस पक्षी का व्यवहार और भी ज्यादा इंटरेस्टिंग हो जाता है। नर पक्षी पहले एक सेफ नेस्टिंग साइड ढूंढ लेता है। इसके बाद वो मादा को अट्रैक्ट करने की कोशिश करता है। फिर दोनों मिलकर सूखी घास, पंख और मुलायम मटेरियल से घोंसला तैयार करते हैं।
इनमें मादा आमतौर पे तीन से पांच अंडे देती हैं। यह अंडे छोटे, हल्के सफेद या ग्रे रंग के होते हैं जिन पर भूरे धब्बे होते हैं। लगभग दो हफ्तों के बाद बच्चे अंडों से बाहर निकलते हैं और वह पूरी तरह से अपने माता-पिता पर निर्भर होते हैं। माता-पिता दोनों मिलकर दिनभर इंसेक्ट्स लाकर बच्चों को खिलाते हैं। गौरैया की सबसे बड़ी ताकत उसकी साइज नहीं बल्कि उसकी एडप्टेबिलिटी होती है। यह पक्षी नए एनवायरमेंट्स में भी जल्दी एडजस्ट कर लेता है। गांव हो या शहर, ठंड हो या फिर गर्मी, गौरैया हर जगह अपने लिए जगह ढूंढ लेती हैं। अगर आपको हमारी यह इंफॉर्मेशन पसंद आई हो तो हमारे इस वीडियो को हाइप करके हमें सपोर्ट जरूर करें। तो मिलते हैं आपसे हमारे अगले वीडियो के साथ।