वह एक ऐसे सुपरस्टार की कहानी थी, जिसकी एक झलक पाने के लिए मुंबई की व्यस्त सड़कें पूरी तरह थम जाती थीं, जिसकी भारी और गंभीर आवाज से सिनेमाहॉल गूंज उठते थे, और जिसकी आकर्षक काया तथा दिलकश मुस्कान पर उस दौर की हर बड़ी नायिका जान छिड़कती थी। वह सफलता के ऐसे शिखर पर थे जहाँ अमिताभ बच्चन जैसे सदी के महानायक को भी अपनी कुर्सी हिलती हुई महसूस होने लगी थी, और उनके घर के बाहर बड़े-बड़े फिल्ममेकर पैसों के सूटकेस लेकर हफ्तों लाइन में खड़े रहते थे। लेकिन अचानक एक सुबह पूरी फिल्म इंडस्ट्री स्तम्भ रह गई, जब उस सुपरस्टार ने एक अचानक बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि उन्हें अब इस शोहरत, इस चकाचौंध और इस दुनिया की कोई जरूरत नहीं है, और वह यह सब छोड़कर हमेशा के लिए जा रहे हैं। वह रातोंरात गायब हो गए और सात समंदर पार अमेरिका के ओरेगन के एक सुनसान जंगल में जाकर बस गए, जहाँ उन्होंने कोई आलीशान जिंदगी नहीं बल्कि आम लोगों के इस्तेमाल किए जाने वाले गंदे टॉयलेट साफ किए, झूठे बर्तन माँजे और दिनभर की चिलचिलाती धूप में पेड़ों को पानी देकर एक माली का काम किया। यह हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे रहस्यमयी और सबसे चौंकाने वाला मोड़ था, जिसे सुनकर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है, क्योंकि यह किसी फिल्म की काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि बॉलीवुड के सबसे हैंडसम और दिग्गज अभिनेता विनोद खान्ना की असल जिंदगी का कड़वा सच था। विनोद खान्ना का जीवन सिर्फ एक अभिनेता की दास्तान नहीं था, बल्कि यह उस इंसान की गाथा थी जिसने जिंदगी के हर चरम को छुआ—चाहे वह अथाह सफलता हो, चरम आध्यात्मिकता हो, गहरा पारिवारिक कलह हो, परदे पर अनियंत्रित ऊर्जा हो या राजनीति के शिखर पर पहुँचना। आज हम विनोद खान्ना की जिंदगी के उन्हीं पन्नों को गहराई से पलटने जा रहे हैं
जो आज भी इतिहास के अंधेरे में छिपे हैं और जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे।शुरुआत उस समय से होती है जब विनोद खान्ना का जन्म भी नहीं हुआ था और उनका परिवार पाकिस्तान के पेशावर में बेहद अमीर और प्रतिष्ठित जीवन जी रहा था, जहाँ उनके पिता किशन चंद खान्ना कपड़े और केमिकल्स के बहुत बड़े और नामी व्यापारी थे। 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर के उसी अमीर घरराने में एक बेहद सुंदर बच्चे का जन्म हुआ जिसका नाम विनोद रखा गया। लेकिन जन्म के कुछ ही महीनों बाद, 1947 में देश का विभाजन हो गया और रातोंरात खान्ना परिवार की किस्मत बदल गई। विभाजन के उन खूनी दृश्यों और भयानक दंगों के बीच किसी तरह अपनी जान बचाकर किशन चंद खान्ना अपनी पत्नी कमला और बच्चों के साथ पाकिस्तान से भागकर मुंबई आ गए, जहाँ उन्हें अपनी जिंदगी की शुरुआत बिल्कुल शून्य से करनी पड़ी।विनोद खान्ना बचपन से ही बहुत शांत लेकिन बेहद जिद्दी स्वभाव के थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई मुंबई के सेंट मेरी स्कूल में हुई और बाद में उनके पिता ने उन्हें दिल्ली के दिल्ली पब्लिक स्कूल में भेज दिया, जहाँ उन्होंने अनुशासन और खेलों में महारत हासिल की। जैसे-जैसे विनोद बड़े हो रहे थे, उनका शारीरिक गठन और नक्श किसी यूनानी देवता (ग्रीक गॉड) की तरह निखरते जा रहे थे। मुंबई के मशहूर सिडेनहम कॉलेज से कॉमर्स की पढ़ाई पूरी करते-करते उनके मन में थिएटर और अभिनय के प्रति गहरी रुचि जाग चुकी थी। कॉलेज के दिनों में जब भी वे आईने के सामने खड़े होते, उन्हें लगता कि उनका जन्म बिजनेस की फाइलें पलटने के लिए नहीं बल्कि सिल्वर स्क्रीन पर राज करने के लिए हुआ है।और तभी उनके परिवार में एक बड़ा भूकम्प आने वाला था। एक शाम जब पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर बैठा था, तब विनोद खान्ना ने बहुत हिम्मत जुटाकर अपने सख्त मिजाज पिता किशन चंद खान्ना के सामने अपनी इच्छा जाहिर की और कहा कि वे पारिवारिक कारोबार नहीं संभालना चाहते बल्कि फिल्मों में काम करना चाहते हैं। यह सुनते ही किशन चंद खान्ना का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने हाथ में पकड़ा कांच का गिलास मेज पर जोरदार तरीके से दे मारा और विनोद को कड़ी चेतावनी दी कि अगर उन्होंने फिल्मी दुनिया की तरफ कदम बढ़ाया या किसी स्टूडियो
के चक्कर काटे, तो वे उन्हें अपने हाथों से गोली मार देंगे। उनके पिता का मानना था कि भद्र, संभ्रांत और अमीर पंजाबी परिवारों के लड़के फिल्मों में जाकर नाच-गाकर तमाशा नहीं करते। उनकी नजर में सिनेमा की दुनिया आवारा और घटिया मानसिकता के लोगों का अड्डा थी, जहाँ उनके खानदान का कोई लड़का पैर नहीं रख सकता था।पिता की इस खतरनाक और हिंसक धमकी के बाद पूरे घर में सन्नाटा छा गया। विनोद की आँखें नम थीं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी स्थिरता और जिद थी जो साफ कह रही थी कि वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। कई दिनों तक घर में चूल्हा नहीं जला, विनोद और उनके पिता के बीच बातचीत पूरी तरह बंद थी। ऐसे में उनकी माँ कमला खान्ना ने बीच-बचाव किया और अपने पति को अलग ले जाकर समझाया कि अगर बच्चे का मन वहीं है, तो उसे जबरन रोककर कोई फायदा नहीं होगा। माँ के लगातार समझाने और अनुरोध के बाद किशन चंद खान्ना का गुस्सा कुछ शांत हुआ। उन्होंने विनोद को अपने पास बुलाया और एक बेहद कड़ी शर्त रखते हुए कहा कि वे उन्हें अपनी किस्मत आजमाने के लिए सिर्फ दो साल का वक्त दे रहे हैं। पिता का साफ कहना था कि अगर इन दो सालों में वे फिल्मों में कुछ बड़ा नहीं कर पाए, तो अभिनय का यह भूत अपने दिमाग से हमेशा के लिए निकाल देंगे और वापस लौटकर चुपचाप बिजनेस की कमान संभालेंगे।विनोद खान्ना ने पिता की इस कठिन चुनौती को आशीर्वाद की तरह स्वीकार किया और उसी दिन से मुंबई के स्टूडियो के चक्कर काटने लगे। वहीं उनकी मुलाकात उस दौर के मशहूर अभिनेता और निर्माता सुनील दत्त से हुई। सुनील दत्त तब अपने भाई सोमदत्त को लॉन्च करने के लिए ‘मन का मीत’ नाम की फिल्म बना रहे थे, और उन्हें एक ऐसे विलेन की तलाश थी जो दिखने में बेहद हैंडसम हो लेकिन परदे पर खतरनाक लगे। जब सुनील दत्त की नजर 6 फीट लंबे, चौड़े कंधों और तीखे नैन-नक्श वाले विनोद खान्ना पर पड़ी, तो वे झट से समझ गए कि उन्हें उनका खलनायक मिल गया है।और इस तरह 1968 में विनोद खान्ना पहली बार कैमरे के सामने आए। जब ‘मन का मीत’ थिएटर्स में रिलीज हुई, तो एक अजीब करिश्मा हुआ—लोग फिल्म के हीरो सोमदत्त को भूल गए और हॉल से बाहर निकलने वाला हर शख्स सिर्फ उस हैंडसम विलेन विनोद खान्ना की चर्चा कर रहा था। विनोद ने विलेन के किरदार में भी ऐसी अदा और आकर्षण भर दिया था कि लोग उससे नफरत करने के बजाय उसके मु मु मुरीद हो गए।इसके बाद मानो बॉलीवुड में विनोद खान्ना के नाम का तूफान आ गया। शुरुआत में उन्होंने ‘झूठा’ और ‘अनमिलो सजना’ जैसी फिल्मों में खलनायक और सहायक भूमिकाएँ निभाईं। लेकिन 1971 में रिलीज हुई गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ ने विनोद खान्ना की तकदीर हमेशा के लिए बदल दी। इस फिल्म में उन्होंने श्याम नाम के एक ‘एंग्री यंग मैन’ का किरदार निभाया था, जिसके भीतर का गुस्सा और दर्द विनोद ने अपनी आँखों के जरिए जिस शिद्दत से परदे पर उतारा, उसे देखकर सब हैरान रह गए। इसी फिल्म के बाद उन्होंने विलेन की छवि तोड़कर मुख्य अभिनेता के रूप में अपनी जगह बनाई।उसी साल यानी 1971 में आई ‘मेरागाँव मेरा देश’ में विनोद खान्ना द्वारा निभाया गया डकैत जब्बर सिंह का खूंखार और बेखौफ किरदार इतिहास बन गया। कई फिल्म समीक्षकों का मानना है कि अगर विनोद खान्ना जब्बर सिंह का यह रोल न निभाते, तो शायद आगे चलकर ‘शोले’ फिल्म का गब्बर सिंह कभी वजूद में ही नहीं आता। इसके बाद 1973 में आई फिल्म ‘अचानक’ में विनोद खान्ना ने एक ऐसे फौजी का किरदार निभाया जो अपनी बेवफा पत्नी को मौत के घाट उतार देता है।
बिना किसी गाने या भारी-भरकम डायलॉग के इस फिल्म ने विनोद खान्ना को अभिनय की सर्वोच्च ऊँचाइयों पर बिठा दिया।समय के साथ विनोद खान्ना बॉलीवुड के सबसे महंगे, सबसे ज्यादा मांग वाले और सबसे सफल सुपरस्टार्स की फेहरिस्त में शामिल हो चुके थे। और यही वह दौर था जब बॉक्स ऑफिस पर उनकी सीधी टक्कर अमिताभ बच्चन से हो रही थी। अमिताभ भी उस समय ‘जंजीर’ और ‘दीवार’ जैसी फिल्मों से ‘एंग्री यंग मैन’ बनकर उभर रहे थे, लेकिन विनोद खान्ना इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो अमिताभ के सामने टिकने का माद्दा रखते थे और कई मामलों में उन पर भारी भी पड़ जाते थे। ‘अमर अकबर एन्थोनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘परवरिश’, ‘हेराफेरी’ और ‘खून पसीना’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में जब ये दो दिग्गज साथ आते थे, तो थिएटर्स तालियों और सीटियों से गूँज उठते थे। आज भी अगर आप इन फिल्मों को गौर से देखें, तो महसूस करेंगे कि कई दृश्यों में विनोद खान्ना का दबंग व्यक्तित्व और उनकी सहज एक्टिंग अमिताभ बच्चन के स्टारडम को भी फीका कर देती थी।नतीजा यह हुआ कि पूरी इंडस्ट्री में यह चर्चा आम हो गई थी कि विनोद खान्ना बहुत जल्द अमिताभ को पछाड़कर नंबर वन की गद्दी पर कब्जा कर लेंगे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उस दौर की प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ और समीक्षक खुलेआम लिखने लगे थे कि अमिताभ बच्चन का साम्राज्य अब खतरे में है, क्योंकि विनोद खान्ना हर तरह के रोल में उनसे ज्यादा जंचते और आकर्षक लगते थे। वह रोमांटिक और एक्शन—दोनों जॉनर के बेताज बादशाह थे। उनकी फिल्म ‘कुर्बानी’, जो 1980 में रिलीज हुई थी, ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और इस फिल्म की सफलता ने विनोद को लोकप्रियता के ऐसे मुकाम पर पहुँचा दिया जहाँ से आगे सिर्फ इतिहास ही इतिहास था। (प्रिय दोस्तों, विनोद खान्ना की आपकी पसंदीदा फिल्म कौन सी है और किस किरदार में आप उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।)लेकिन इस अथाह सफलता, बेहिसाब दौलत, करोड़ों फैंस के प्यार और स्टारडम के सातवें आसमान पर खड़े होने के बावजूद विनोद खान्ना के भीतर कुछ ऐसा चल रहा था
जिससे बाहरी दुनिया पूरी तरह अनजान थी। वह हर शुक्रवार को एक नई ब्लॉकबस्टर दे रहे थे, लेकिन रविवार की रात जब वे अपने आलीशान बंगले के बेडरूम में अकेले बैठते, तो उन्हें एक गहरा सूनापन महसूस होता था। उन्हें लगता था कि यह शोहरत, यह कैमरों की चमक, यह झूठी तारीफ और यह अंधी दौड़ उनके अंदर की आत्मा को खोखला कर रही है।इसी मानसिक उथल-पुथल के बीच उनकी मुलाकात आध्यात्मिक गुरु ओशो यानी भगवान रजनीश से हुई। ओशो के प्रवचनों ने विनोद के अशांत मन पर मरहम का काम किया। वह धीरे-धीरे ओशो के इतने बड़े भक्त हो गए कि फिल्मों की शूटिंग के दौरान भी गेरुआ कपड़े पहनने लगे और गले में ओशो की माला डालकर सेट पर पहुँचने लगे। डायरेक्टर और प्रोड्यूसर उनका यह बदला रूप देखकर खौफ में आ जाते थे, क्योंकि विनोद का ध्यान अब फिल्मों से ज्यादा पुणे स्थित ओशो आश्रम की तरफ था जहाँ वे हरH हफ्ते शांति की तलाश में भाग जाते थे।और फिर आया साल 1982—जब विनोद खान्ना अपने करियर के सबसे पीक पर थे और अगर चाहते तो अगले दस साल तक बॉलीवुड पर राज कर सकते थे। लेकिन उन्होंने एक ऐसा आत्मघाती फैसला लिया जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। उन्होंने एक इमोशनल प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और रोते हुए ऐलान किया कि वे फिल्म इंडस्ट्री हमेशा के लिए छोड़ रहे हैं। वे अपनी सारी संपत्ति, गाड़ियाँ, आलीशान बंगले और सुपरस्टार के तमगे को लात मारकर ओशो के साथ अमेरिका जा रहे हैं।यह खबर बॉलीवुड के लिए किसी बड़े भूकम्प से कम नहीं थी। वितरकों के करोड़ों रुपए दाँव पर लगे थे, कई फिल्में बीच मझधार में अटक गई थीं, लेकिन विनोद को अब किसी की कोई परवाह नहीं थी। वे अमेरिका के ओरेगन प्रांत चले गए, जहाँ ओशो ने हजारों एकड़ बंजर जमीन पर अपनी एक नई आध्यात्मिक नगरी बसाई थी—’रजनीशपुरम’।वहाँ जाकर बॉलीवुड का यह चमकता सितारा ‘स्वामी विनोद भारती’ बन गया, और उनकी जिंदगी का एक ऐसा खौफनाक और हैरान करने वाला अध्याय शुरू हुआ जिसे सुनकर आज भी लोगों का कलेजा कांप जाता है। अमेरिका के उस रजनीशपुरम आश्रम में विनोद खान्ना के साथ कोई वीआईपी बर्ताव नहीं होता था।
ओशो के स्पष्ट निर्देश थे कि वहाँ हर इंसान बराबर है—चाहे वह कोई आम नागरिक हो या भारत का सबसे बड़ा सुपरस्टार।जिस विनोद खान्ना के एक इशारे पर मुंबई के बंगले में नौकरों की फौज दौड़ पड़ती थी, वही इंसान अमेरिका के उस आश्रम में सुबह 4 बजे उठकर आम संन्यासियों के इस्तेमाल किए गए गंदे कमोड और टॉयलेट ब्रश से साफ करता था। वे दिनभर आश्रम की कम्युनिटी किचन में खड़े होकर सैकड़ों लोगों के जूठे बर्तन माँजते थे और दोपहर की उस चिलचिलाती धूप में, जब तापमान 40 डिग्री पार कर जाता था, वे नंगे बदन बगीचे में जाकर फावड़े से मिट्टी खोदते, पेड़ों की झाड़ियाँ छाँटते और एक आम माली की तरह मेहनत करते थे।जब भारत से मीडिया उनके इस रूप को कवर करने अमेरिका पहुँचा, तो उनकी तस्वीरें देखकर सब दंग रह गए—बाल बढ़े हुए, चेहरे पर सफेद दाढ़ी, बदन पर एक साधारण चोगा और हाथ में फावड़ा, जिसके बाद मीडिया ने उन्हें ‘सेक्सुअली अट्रैक्टिव मोंक’ (सेक्सि संन्यासी) का नाम दिया था। विनोद खान्ना का कहना था कि टॉयलेट साफ करने और माली का काम करने से उनका सारा अहंकार मिट्टी में मिल गया है और उन्हें वह मानसिक शांति मिल रही है जो मुंबई की चकाचौंध में कभी नहीं मिली थी।लेकिन क्या विनोद खान्ना सचमुच वहाँ पूरी तरह शांत और खुश थे? क्या उनकी अंदर की सारी सांसारिक इच्छाएँ सचमुच मर चुकी थीं? इस रहस्य से पर्दा कई सालों बाद ओशो के अपने भाई स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने एक इंटरव्यू में उठाया, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने जो खुलासा किया, वह विनोद खान्ना की जीवनी का सबसे डार्क और सबसे बड़ा अनसुना सच था।उन्होंने बताया कि अमेरिका के आश्रम में रहते हुए विनोद खान्ना अक्सर अंदर से बेहद उदास, अशांत और डिप्रेशन में रहते थे। कई बार ऐसा होता था कि जब आश्रम के बाकी संन्यासी सो जाते थे, तब विनोद खान्ना आश्रम के किसी सुनसान कोने में पेड़ों के पीछे अकेले बैठ जाते थे और पूरी-पूरी रात फूट-फूटकर रोते थे। उनके आँसू थमने का नाम नहीं लेते थे। जब ओशो को विनोद खान्ना के इस गहरे अवसाद, उनकी बेचैनी और अकेले में रोने की बात पता चली, तो ओशो ने विनोद की मानसिक स्थिति को बहुत बारीकी से परखा और अपने भाई स्वामी शैलेंद्र से इस पर चर्चा की।ओशो ने अपने भाई को जो बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था। ओशो ने कहा कि विनोद खान्ना रातभर इसलिए नहीं रो रहे हैं कि वे भारत में अपनी अरबों की संपत्ति छोड़ आए हैं, और न ही वे अपनी पत्नी गीतांजलि और दोनों मासूम बेटों राहुल व अक्षय खान्ना की याद में तड़प रहे हैं। ओशो के मुताबिक, विनोद खान्ना के रोने की असली वजह उनके अवचेतन मन में बैठी एक गहरी, अदृश्य और सुप्त जलन थी—और वह जलन थी उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी अमिताभ बच्चन को लेकर।असल बात यह थी कि जब विनोद खान्ना 1982 में भारत छोड़कर अमेरिका गए थे, तब वे अमिताभ बच्चन के साथ नंबर वन की रेस में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। लेकिन उनके जाते ही अमिताभ बच्चन फिल्म इंडस्ट्री के निर्विवाद बेताज बादशाह बन गए और पूरी दुनिया में उनका डंका बजने लगा। सिर्फ इतना ही नहीं, उसी दौरान अमिताभ बच्चन ने राजनीति में भी कदम रख दिया और इंदिरा गांधी के कहने पर चुनाव लड़कर भारी बहुमत से सांसद बन गए, जिससे उनका कद और स्टारडम आसमान छूने लगा।विनोद खान्ना भले ही अमेरिका में गेरुआ चोगा पहनकर आध्यात्म और संन्यास की बातें करते थे, लेकिन उनका मन अभी भी मुंबई की उसी रेस कोर्स में अटका हुआ था। उनका भीतर का कलाकार और उनका अहंकार इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उनकी गैरमौजूदगी में अमिताभ बच्चन ने उस सिंहासन पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया है, जो कभी उनका हो सकता था।
उन्हें यह मलाल अंदर ही अंदर खाए जा रहा था कि अगर वे भारत में होते, तो नंबर वन की गद्दी पर अमिताभ नहीं बल्कि विनोद खान्ना का नाम होता।और यह दबी हुई प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या उन्हें दीमक की तरह अंदर से चाट रही थी, जिसकी वजह से वे डिप्रेशन में रहते थे और रातों को रोते थे। विनोद खान्ना के इस मानसिक द्वंद्व, उनकी छटपटाहट और अमिताभ बच्चन के प्रति इस छिपी हुई जलन को ओशो बहुत अच्छी तरह भाप चुके थे और वे जानते थे कि ध्यान या प्रवचनों से विनोद की यह बीमारी ठीक होने वाली नहीं है।तब ओशो ने विनोद खान्ना को अपने कक्ष में बुलाया और एक ऐसा अजीब, अभूतपूर्व और चौंकाने वाला सुझाव दिया जिसे सुनकर विनोद के पैरों तले जमीन खिसक गई। ओशो ने विनोद से कहा—”स्वामी विनोद भारती, इस तरह आश्रम के कोने में बैठकर रोने से, टॉयलेट साफ करने से या अंदर ही अंदर घुटने से तुम्हारी यह कसक कभी कम नहीं होगी। तुम खुद को धोखा दे रहे हो कि तुम संन्यासी बन गए हो, जबकि तुम्हारा मन अभी भी उसी पुरानी दौड़ में जिंदा है।”ओशो ने कहा कि अगर तुम अपने भीतर की इस टीस, इस असुरक्षा और अमिताभ बच्चन के प्रति इस ईर्ष्या को हमेशा के लिए मिटाना चाहते हो, तो तुम्हें यह आश्रम छोड़कर तुरंत भारत वापस लौट जाना चाहिए।ओशो ने इसके बाद जो कहा, वह और भी हैरान करने वाला था। उन्होंने विनोद से कहा कि तुम भारत वापस जाओ, वहाँ के मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल में शामिल हो जाओ और सीधे चुनावी मैदान में अमिताभ बच्चन के खिलाफ ताल ठोको। ओशो का मानना था कि विनोद खान्ना का भीतर का एक्टर अपनी हार स्वीकार नहीं कर पा रहा है, इसलिए जब वे राजनीतिक मंच पर अमिताभ बच्चन को आमने-सामने की टक्कर देंगे और मुकाबला करेंगे, तभी उनके मन का यह मलाल, यह असुरक्षा और यह अहंकार पूरी तरह शांत होगा।