‘सीमा’, ‘सुजाता’, ‘बंदिनी’, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ जैसी फिल्मों में सशक्त अभिनय से छाप छोड़ने वाली भारतीय सिनेमा की सबसे सौम्य अभिनेत्री नूतन को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। वुमन सेंट्रिक रोल वाली फिल्में उनकी पहचान बनीं। उन्होंने एक्ट्रेसेज के महज शोपीस के तौर पर इस्तेमाल होने की परंपरा को बदला। वे ‘मिस इंडिया’ का खिताब जीतने वाली पहली एक्ट्रेस भी बनीं। सबसे ज्यादा फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने का रिकॉर्ड भी लंबे समय तक उनके नाम रहा। 21 फरवरी को उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जानते हैं उनकी लाइफ से जुड़े कुछ फैक्ट्स…
शादी के बाद भी ऑफर होते रहे हीरो के बराबर या लीड रोलनूतन का स्टारडम ऐसा था कि जहां ये माना जाता था कि शादी के बाद एक्ट्रेस का करियर डाउन हो जाता है, वहीं नूतन को शादी के बाद भी फिल्ममेकर्स अपनी फिल्मों में कास्ट करने को तैयार रहते थे। उन्हें फिल्म में लेने से पहले वे सुनिश्चित करते थे कि फीमेल लीड की भूमिका सशक्त और हीरो के बराबरी होनी चाहिए। नूतन को पाथ ब्रेकिंग किरदार निभाने के लिए पहचाना गया। नूतन ने परदे पर साड़ी में लिपटी शांत, सरल और सुलझी हुई महिला का किरदार भी निभाया और स्क्रिप्ट की डिमांड पर बोल्ड कपड़ों में भी नजर आईं। शबाना और स्मिता पाटिल जैसी एक्ट्रेसेज भी उनसे इंस्पायर हुई। आज दिग्गज निर्देशक माने जाने वाले संजय लीला भंसाली ने
भी एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने नूतन की तरह सहज और करिश्माई एक्ट्रेस नहीं देखी। वह चाहकर भी किसी से नूतन जैसी एक्टिंग नहीं करवा सकते।प्रेग्नेंसी में किया काम, करियर की बेस्ट फिल्म बनी ‘बंदिनी’नूतन ने अपने करियर में तमाम हिट फिल्में कीं, लेकिन उनकी चॉइस अपने जमाने की एक्ट्रेसेज से जुदा थी। वे अधिकतर वुमन सेंट्रिक फिल्मों का चयन ही करती थीं। यही कारण था कि उन्होंने ‘सीमा’, ‘सुजाता’, ‘बंदिनी’ और ‘सोने की चिड़िया’ जैसी फिल्में कीं। बता दें कि नूतन ने जब फिल्मों से ब्रेक लेने का मन बना लिया था तब बिमल रॉय उनके पास अपनी फिल्म ‘बंदिनी’ का ऑफर लेकर आए। वे खुद भी बिमल दा की फिल्म को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने पहले बिमल दा को मना कर दिया। फिर उनके पति रजनीश ने उन्हें कन्विंस किया कि बिमल रॉय की फिल्म है तुम्हें करनी चाहिए। नूतन उन दिनों प्रेग्नेंट थीं फिर भी उन्होंने फिल्म करने के लिए हामी भर दी। फिल्म जब रिलीज हुई तो हर कोई उनके अभिनय का कायल हो गया। ये फिल्म उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म बन गई।अपनी ही फिल्म के प्रीमियर में थिएटर के अंदर नहीं घुसने दिया1951 में फिल्म ‘नगीना’ रिलीज हुई थी जिसमें डरावने सीन भी थे इसलिए नाबालिगों के लिए फिल्म देखने की मनाही थी। नूतन की उम्र उस वक्त महज 15 साल थी। वे अपने अपने फैमिली फ्रेंड शम्मी कपूर के साथ फिल्म के प्रीमियर पर पहुंची। उन्हें लग रहा था कि वे फिल्म की हीरोइन हैं तो उनका जोरदार स्वागत होगा, लेकिन हुआ इसका उलटा। वॉचमैन ने थिएटर के गेट पर ही नूतन को रोक दिया। काफी बहस के बाद भी उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया।
हिंदी सिनेमा में एक से बढ़कर एक अभिनेता हुए। लेकिन आज तक किसी को राजेंद्र कुमार से पहले और ना ही उसके बाद जुबली कुमार का टाइटल मिला। 60 के दशक में राजेंद्र कुमार का ऐसा जलवा था कि उनकी फिल्में करीब 25 हफ्तों तक सिनेमाघरों में चलती रहती थी। यानी हर फिल्म सिल्वर जुबली बनकर ही उतरती थी। यही वजह थी कि उनका नाम जुबली कुमार पड़ गया। लेकिन क्या आप जानते हैं राजेंद्र कुमार को इंडस्ट्री के लोग कंजूस कहते थे? जब उनकी माली हालत खराब हुई तो उन्होंने अपना लकी बंगला राजेश खन्ना को बेच दिया। जब उन्हें यह बंगला छोड़कर जाना पड़ा तो वह पूरी रात रोते रहे। आखिर कैसे एक महान अभिनेता इस कदर बर्बाद हो गया कि उसे अपना बंगला तक बेचना पड़ा। आइए जानते हैं पूरी कहानी। 20th जुलाई 1929 को सियालकोट पाकिस्तान में जन्मे राजेंद्र कुमार बंटवारे के दौरान परिवार के साथ भारत आ गए। पिता कराची के बड़े व्यापारी थे। यहां भी पिता ने बिजनेस शुरू किया और वह अच्छा चल निकला। लेकिन फिर राजेंद्र फिल्मों में कैसे आए? ये कहानी बहुत रोचक है। दरअसल वो शुरू से ही बंबई जाकर एक्टर बनना चाहते थे। पर पिता इसके सख्त खिलाफ थे। पिता की मर्जी से सब इंस्पेक्टर की परीक्षा दी और सफल भी रहे। लेकिन एक दिन उनका एक दोस्त घर आया और बंबई जाकर फिल्मों में काम करने की सलाह दी। राजेंद्र ने सलाह मान ली और अपनी ट्रेनिंग से ठीक दो दिन पहले वो हीरो बनने का ख्वाब लिए निकल गए। जिस वक्त वह मुंबई आए थे, उस समय उनकी जेब में मात्र ₹50 थे। जो उनके पिता से मिली घड़ी को बेचकर मिले थे। यहां वह काफी भटके लेकिन किसी ने उन्हें काम नहीं दिया। बड़ी मुश्किल से गीतकार राजेंद्र कृष्ण की मदद से उनको ₹150 सैलरी पर डायरेक्टर एच एस लेवल के सहायक के तौर पर काम मिल गया। धीरे-धीरे किस्मत ने साथ दिया और 1950 में आई फिल्म जोगन में राजेंद्र कुमार को काम करने का अवसर मिला। इस फिल्म में उनके साथ दिलीप कुमार लीड रोल में थे। एक्टिंग तो शुरू हो गई थी लेकिन अब भी पहचानता कोई नहीं था। 1950 से 1957 तक राजेंद्र कुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। लेकिन फिर 1957 में आई फिल्म मदर इंडिया। राजेंद्र को इसमें रोल तो बहुत छोटा मिला लेकिन छोटे से रोल के बावजूद उन्हें खूब पसंद किया गया। इसके बाद 1959 में आई फिल्म गूंज उठी शहनाई में उन्हें बतौर लीड एक्टर काम मिला जो राजेंद्र कुमार की पहली हिट फिल्म साबित हुई। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उन्होंने एक के बाद एक धूल का फूल मेरे महबूब आई मिलन के बेला संगम आरजू सूरज जैसी बेहतरीन सफल फिल्मों में काम किया। फिल्मों की कामयाबी को देखते हुए उनके फैंस ने उनका नाम जुबली कुमार रख दिया था क्योंकि उनकी फिल्में 25 हफ्तों तक सिनेमाघरों में चलती रहती थी। लेकिन 70 के दशक में उनका रंग फीका पड़ने लगा। 70 के दशक में जब राजेश खन्ना अपने उफान पर आए तो राजेंद्र का करियर डूबने लगा। फिल्में मिलनी बंद हो गई और माली हालत भी खराब होने लगी। एक समय तो वह हालत ऐसी हो गई कि अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए राजेंद्र कुमार को अपना बंगला डिंपल बेचना पड़ा था। 1960 की शुरुआत में राजेंद्र कुमार ने बांद्रा के काटा रोड पर समुद्र किनारे बने इस बंगले को ₹60,000 में एक्टर भारत भूषण से खरीदा था। उन्होंने इसे नया रूप देकर इसका नाम अपनी बेटी डिंपल के नाम पर रखा था। इस बंगले में आते ही राजेंद्र कुमार को सफलता मिलनी शुरू हो गई थी। इस कारण यह बंगला लकी माना जाता था।
राजेश खन्ना को जब यह पता चला कि राजेंद्र कुमार इसे बेच रहे हैं तो उन्होंने इसे तुरंत खरीदने का फैसला कर लिया। बंगला खरीदने के बाद राजेश खन्ना ने उसका नाम आशीर्वाद रख दिया। राजेश खन्ना के लिए यह बंगला काफी लकी साबित हुआ। उन्होंने इसमें शिफ्ट होने के बाद एक के बाद एक 15 हिट फिल्में दी। यही वजह थी कि उन्हें यह बंगला बेहद प्यारा था। जिंदगी का अंतिम वक्त भी उन्होंने इसी बंगले में काटा। 18 जुलाई 2012 को उनकी मौत के बाद इसे बेच दिया गया था। इसे ₹90 करोड़ में बिजनेसमैन शशि किरण शेट्टी ने खरीदा था। खैर राजेंद्र जिस आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे उसी बीच उनकी तबीयत बहुत बिगड़ने लगी। उनका हीमोग्लोबिन बहुत कम रहने लगा। जब उनका चेकअप अस्पताल में करवाया गया तो पता लगा उनको ब्लड कैंसर हो गया है। आखिरी दो साल राजेंद्र कुमार के लिए बहुत खराब रहे। लगातार अस्पतालों के चक्कर से वह पूरी तरह से टूट चुके थे। अपने अंतिम समय में तो उन्होंने परेशान होकर दवाइयां तक खाने से मना कर दिया था। वो पूरी तरह से बिस्तर से लग गए थे और फिर 12 जुलाई 1999 को खबर आई कि राजेंद्र कुमार नहीं रहे। इस कहानी में फिलहाल इतना ही। अब राजेंद्र कुमार के इस जीवन को कैसे देखते हैं? अपनी राय कमेंट करें।