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किसने किया था सुभाष चन्द्र बोस की बेटी के भारत आने का विरोध? नाम चौंका देगा।

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भारत के नेताओं की प्रतिक्रिया कैसी थी? भारत की जनता की प्रतिक्रिया कैसी थी? आजाद भारत में जब नेताजी सुभाष की बेटी अनीता भारत आ रही थी तो कौन लोग थे जो पलक पांव बिछाए उनका इंतजार कर रहे थे और कौन लोग थे जो विरोध कर रहे थे काले झंडे दिखाने की धमकी दे रहे थे यह भी जानेंगे कि आजाद भारत ने आजाद भारत की सरकार ने नेताजी सुभाष की बेटी की सुध ली भी या नहीं ली और यह भी देखेंगे ऐसा क्या हुआ था कि बोस परिवार के ही किसी सदस्य ने एमली शेंकल को धमकी दी बोस परिवार से बाहर निकालने की। द्वितीय विश्व समाप्त हो चुका था और इसके साथ ही वो मनहूस खबर आई थी कि एक विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाष चले गए हैं।

वो खबर सच्ची थी कि झूठी थी इस पर बात करने की आज आवश्यकता नहीं है क्योंकि विषय यह नहीं है और वैसे भी पिछले कुछ वर्षों में इसके बारे में बहुत बात हो चुकी है। अब यह खबर जब पहुंचती है वियना में एमली शेंकल के पास, सोच के देखिए क्या बीती होगी उनके ऊपर। घर में मां है, बूढ़ी मां है। और नन्ही सी बेटी हैं। कितनी उम्र? 1942 में पैदा हुई। 1945 की यह घटना है। ढाई तीन साल की बच्ची है। और एमली शेंकल वियना में टेलीफोन डिपार्टमेंट में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी कर रही हैं।

थोड़ी सी तनख्वाह है और उनके सहारे ही घर चल रहा है। और इतना बड़ा वज्रपात होता है। ऐसी खबर आती है। शुरू में विश्वास नहीं कर पाती हैं। लेकिन खुद को संभालना था। नेताजी सुभाष के साथ इतना समय बिताया था तो वह हौसला भी तो था ना और फिर उस बेटी को देखना था वो खड़ी होती हैं स्वयं को संभालती हैं और फिर वर्ष 1946 में वो नेताजी सुभाष के परिवार से संपर्क करती हैं। शरद चंद्र बोस के नाम नेताजी सुभाष पत्र लिखकर दे गए थे बंग में।

8 फरवरी 1943 को जर्मनी से जब सुभाष चले थे तो बंग में एक पत्र लिखा था अपने बड़े भाई शरद चंद्र बोस के नाम कि मैंने यहां विवाह कर लिया है। मेरी बेटी भी है। मैं जिस यात्रा पर जा रहा हूं उसमें क्या होगा कोई नहीं जानता। और जिस तरह आपने सदैव पिता तुल्य मेरी देखभाल की है, उसी तरह मेरी पत्नी और मेरी बेटी का ख्याल रखना। यह पत्र सुभाष एमली को ही देकर गए थे और यह कह कर गए थे कि यदि मुझे कुछ हो जाए तब यह पत्र आप शरद चंद्र बोस मेरे बड़े भाई के पास भेज देना। वैसे नहीं भेजना है। तो अब वह खबर आए कई महीने हो चुके थे। कहीं और से कोई ऐसी इंफॉर्मेशन कंक्रीट इंफॉर्मेशन भी नहीं आ रही थी कि नेताजी जीवित हैं। हालांकि बातें तो दोनों चल रही थी।

पर दिल को तसल्ली हो जाए। ऐसी तो कोई खबर कहीं से नहीं आ रही थी। अंतत गतत्वा 12 मार्च 1946 को एमली शेंकल उस लेटर की फोटोकॉपी करती हैं और साथ में अपनी ओर से एक पत्र लिखती हैं और शरत चंद्र बोस को भारत में वो पत्र भेजती हैं जिसमें वो स्वयं के बारे में बताती हैं मैं कौन हूं और किस तरह आपके भाई के साथ मेरा संबंध जुड़ा और उसमें वह बताती हैं कि वर्ष 1942 में हमारा विवाह हुआ। ध्यान करें। उस पत्र में एमली लिखती हैं कि वर्ष 1942 में हमारा विवाह हुआ। हमारी बेटी हैं। इस पत्र का उत्तर नहीं आता है। इसके बाद वो फिर दूसरी बार पत्र लिखती हैं शायद 15 अप्रैल को 1946 में। फिर उत्तर नहीं आता है। फिर तीसरा पत्र लिखती हैं 1 अगस्त को। इसका भी उत्तर नहीं आता है। तीन पत्र लिख चुकी हैं। किसी पत्र का उत्तर नहीं आया है। निराशा भी होगी। मन में तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे होंगे। कारण क्या था?

इन तीनों पत्रों में से कोई भी पत्र शरद चंद्र बोस के पास पहुंचा ही नहीं था। अंग्रेज सरकार इन पत्रों को उन तक पहुंचने से पहले ही ले लेती थी। तो शरद चंद्र बोस को खबर नहीं हुई। एमली निराश हैं, परेशान हैं। धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता है।

वर्ष 1947 शुरू होता है। जून का महीना है। अब देखिए भारत में 1946 में ही भारत की आजादी से पहले ही 1946 में इंट्रिम गवर्नमेंट बन गई थी। और इस गवर्नमेंट में जवाहरलाल नेहरू हम कह सकते हैं, प्रधानमंत्री नहीं थे, पर प्रधानमंत्री की तरह थे। और गृहमंत्री की तरह काम कर रहे थे सरदार पटेल। तो जवाहरलाल नेहरू से एक व्यक्ति आकर मिलते हैं जून 1947 में और नाम है अब्दुल हफीज अकमत।

डॉक्टर अब्दुल हफीज अकमत। यह व्यक्ति वियना में रह रहे थे और नेताजी सुभाष से इनका अच्छा परिचय था। उस समय जब नेताजी सुभाष भी यूरोप में थे। अकमत की पत्नी विना की ही रहने वाली थी और एमली शेंकल के साथ उनका बड़ा अच्छा परिचय था। एमली शेंकल और नेताजी की बेटी अनीता पर क्या बीत रही थी उन दिनों इसके बारे में डॉक्टर अब्दुल हफीज अकम को सब मालूम था। वह भारत आए हैं। जवाहरलाल नेहरू से मिलते हैं और सारी कहानी बताते हैं। जवाहरलाल नेहरू सुनकर सन्न रह जाते हैं। यहां किसी को कानों कान कोई खबर ऐसी नहीं थी और नेताजी सुभाष की छवि ऐसी देश में बनी हुई थी।

वो भारत माता के लिए उनका समर्पण तो निसंदेह वो तो था ही था। सर्वोच्च था। अपने देश में देखिए अपनी संस्कृति में एक परंपरा भी है। यहां ब्रह्मचारी को विशेष सम्मान मिलता है। ब्रह्मचारी का मतलब क्या? एक ऐसा व्यक्ति जिसने किसी महान धेय के लिए उद्देश्य के लिए अपने सभी सुखों का त्याग कर रखा हो। तो सुभाष की छवि ऐसी थी कि वह तो भारत स्वतंत्र करवाए बिना विवाह की बात सोच ही नहीं सकते। तो जवाहरलाल नेहरू विश्वास नहीं कर पाते हैं। वह अकमत से कहते हैं कि जो आपने बताया है ना इसकी राइटिंग में रिपोर्ट दे दीजिए। इसके बाद 22 जून 1947 की डेट में डॉ. अकमत साइन करके वो रिपोर्ट देते हैं।

तो रिटन रिपोर्ट अब जवाहरलाल नेहरू के पास है। और इसके बाद जवाहरलाल नेहरू कांटेक्ट करते हैं सरदार वल्लभ भाई पटेल को। Ok7 अगस्त 1947 का पत्र है जवाहरलाल नेहरू का जो उन्होंने लिखा सरदार वल्लभ भाई पटेल को और इस पत्र में नेहरू कहते हैं कि मैं आपको एक रिपोर्ट अटैच करके यहां भेज रहा हूं। यह अकमत वाली रिपोर्ट है और मुझे यह सूचना मिली है कि वियना में नेताजी सुभाष की पत्नी है और उनकी बेटी भी हैं। यदि यह खबर सच्ची है तो हमें उनकी मदद भी करनी चाहिए।

आप नथालाल पारिक से इसका पता करवाएं। अब नथालाल पारिक कौन हैं? यह गुजरात के रहने वाले हैं मूलता और नेताजी सुभाष के भी बड़े अच्छे परिचित हैं। ये रहते हैं उस समय में बेल्जियम में ये रह रहे हैं। यूरोप में ही हैं। तो कहते हैं न्थाललाल पारिक से आप पता करवाओ। क्या ये खबर सच्ची भी है? और अगर सच्ची है तो हमको उनकी मदद करनी चाहिए। जैसे ही जवाहरलाल नेहरू का पत्र मिलता है सरदार वल्लभ भाई पटेल को वह हैरान रह जाते हैं। उसी दिन वो न्थालाल पारिक को पत्र लिखते हैं और कहते हैं कि देखें ऐसा-सा हमें पता चला है। आप जरा कंफर्म करिए यह रिपोर्ट्स सच्ची है या नहीं है और अगर सच्ची है तो किस हाल में है वो परिवार और उनकी मदद करें। यह सरदार वल्लभ भाई पटेल लिख रहे हैं नथलाल पारिक को और उसी दिन यानी 7 अगस्त को ही एक दूसरा पत्र लिख रहे हैं.

सरदार वल्लभ भाई पटेल शरद चंद्र बोस को नेताजी सुभाष के बड़े भाई शरद चंद्र बोस को और यह रिपोर्ट वहां भी भेज रहे हैं इसकी कॉपी और कहते हैं मैंने नथालाल पारिक को जिम्मेदारी दी है कि वह पता करें पहले तो कि खबर सच्ची है या झूठी अगर खबर सच्ची है तो उनकी मदद करें अब जैसे ही पत्र मिलता है शरद चंद्र बोस को वो नाराज होते हैं सरदार वल्लभ भाई पटेल से और अपनी नाराजगी व्यक्त करते हैं 14 अगस्त 1947 भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पहले अब शरद चंद्र बोस पत्र लिख रहे हैं सरदार वल्लभ भाई पटेल को और उनकी शिकायत क्या है? वो कहते हैं कि पहले तो मैं ऐसी किसी खबर की सच्चाई पर विश्वास नहीं करता। मैं नहीं मानता कि सुभाष ने ऐसे विवाह किया है और उनकी पत्नी है, बेटी है। मैं इस खबर को सच नहीं मानता हूं। पहली बात तो यह है। और दूसरी बात इसकी सच्चाई पता करने के लिए भी न्थालाल पारिक को क्यों लिखा आपने? उनके पास कोई स्पेशल ट्रेनिंग है क्या इस तरह का? आपने नत्थालाल पारिक को लिखने से पहले मुझसे यह बात करनी चाहिए थी।

पता लगाना है मैं पता लगाता। और जहां तक बात है मदद करने की तो सुभाष की पत्नी और सुभाष की बेटी यदि हैं तो उनकी मदद नथालाल पारख नहीं उनकी मदद मैं करूंगा। वो हमारे बच्चे हैं। तो ये पत्र लिखते हैं शरद चंद्र बोस वल्लभ भाई पटेल को। वल्लभ भाई पटेल को जब ये पत्र मिलता है तो वो अफसोस जाहिर करते हैं। वो पत्र लिखते हैं वापस। दोबारा वो पत्र लिख रहे हैं और कहते हैं कि देखें जब मुझे वह खबर मिली तो मैं भावातरेक में मैं इमोशनल होके मैंने तुरंत पत्र लिख दिया और आप शायद सही कह रहे हैं। आपसे बात करनी चाहिए थी। बहरहाल उधर नथालाल पारिक मिलते हैं एमली शेंकल से। वो भी अपनी रिपोर्ट भेजते हैं। बल्कि नथालाल पारिक के माध्यम से एमली शंकर भी अपना पत्र सरदार वल्लभ भाई पटेल को भेजती हैं। उधर जवाहरलाल नेहरू एक दूसरे चैनल से भी वो पता करवा रहे हैं एसीए नामर।

एशियन नामियार भी यूरोप में ही हैं। और जिन दिनों नेताजी यूरोप में थे एशियन नामियार उनके सेकंड इन कमांड हुआ करते थे। तो जवाहरलाल नेहरू ने नामर को भी लिखा कि आप पता करिए यह खबर मिली है कहां तक सच है कहां तक झूठ है। एशियन नामर भी अपनी रिपोर्ट जवाहरलाल नेहरू को भेजते हैं और इस बात को कंफर्म करते हैं बल्कि वो पूरा नाम नहीं लिखते वो बॉस नहीं लिखते बी लिख के बात करते हैं और एमली शेंकल का एस लिखते हैं और बताते हैं कि हां ऐसे एमली शेंकल उनकी पत्नी और उनकी बेटी हैं। तो उधर नाम से भी कंफर्मेशन आ जाती है।

इसके बाद जवाहरलाल नेहरू एक्टिव हो जाते हैं। उधर से शरद चंद्र बोस एक्टिव हो चुके हैं। संपर्क करते हैं। उनके बेटे हैं अमीरनाथ बोस। वो संपर्क करते हैं। बोस परिवार के एक दूसरे सदस्य दूसरे भाई के बेटे अरविंद बोस वो भी मिलते हैं इमली शंकल से। खैर तो यह कंफर्म हो गया कि हां जी नेताजी सुभाष की पत्नी है।

उनकी बेटी हैं। अब स्थिति कैसी थी कि स्थिति फाइनेंसियल कंडीशंस तो बहुत अच्छी नहीं थी। आगे क्या हो? तो इधर शरद चंद्र बोस आर्थिक सहायता ₹200 कभी ₹300 कभी उनके बेटे शिशिर बोस भिजवा रहे हैं बल्कि रुपए भेजने के लिए भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से परमिट लेना पड़ा और फिर उस परमिट के थ्रू भी रुपए कभी ₹200 महीना है ₹300 महीना ऐसे अपने को पता चलता है तो शरद बोस का परिवार भी मदद कर रहा है। इधर जवाहरलाल नेहरू वियना में अपने दूतावास को लिख रहे हैं। अपने जो एंबेसडर हैं बल्कि फुल एंबेसी है। ऑस्ट्रिया वीना में फुल एंबेसी नहीं है। यहां लिगेशन है भारत का और प्रॉपर एंबेसी स्विट्जरलैंड में है। तो वहां डीबी देसाई एंबेसडर हैं। जवाहरलाल नेहरू पत्र लिख रहे हैं और कई पत्र उपलब्ध हैं। एक नहीं कई सारे पत्र उपलब्ध हैं। और देसाई को जवाहरलाल नेहरू कह रहे हैं कि भाई आप मिलिए पता भी करिए और उनसे मिलिए भी और कितनी कैसी मदद की जा सकती है आप स्वयं तय करिए।

और ये सरकार की तरफ से नहीं होगा। ये कंप्लीटली प्राइवेट अफेयर होगा। आपको जितना उचित लगता है उतनी मदद आप वहां करें और मुझे बताएं और यहां से मैं पैसे भेज दूंगा और इस तरह वो पैसे भेज भी रहे हैं। लेकिन जब यह खबर बोस परिवार को होती है कि जवाहरलाल नेहरू आर्थिक मदद कर रहे हैं।

थोड़ी बहुत मदद जो भी है वो भेज रहे हैं तो इस बात पर शरद चंद्र बोस के परिवार को सख्त आपत्ति होती है। बल्कि एक रिपोर्ट है नेशनल आर्काइव्स में। अभिलेख पटल पर आप जाकर देखें। एमली शेंकल करके एडवांस सर्च में जब आप जाएंगे आपके सामने जो फाइल्स आएंगी उसमें मिलेगी। 10 अगस्त 1953 को वियना के एलिगेशन में जो बड़े अधिकारी हैं केवी रामास्वामी उनकी रिपोर्ट है। शुरू से तब तक एमली शंकर के बारे में 10 पेज में डिटेल जानकारी दे रहे हैं। और वहां वो बताते हैं कि वर्ष 1950 में दिसंबर के शुरू में एमली शंकल कहते हैं कि मेरे पास आई वहीं ऑफिस में और तब तक जो 1800 शीलिंग्स उनको दिए गए थे तीन किश्तों में देखें हमारी करेंसी क्या रुपए वीना की करेंसी क्या शीलिंग्स तो यहां से जो भेज रहे थे वो कन्वर्ट करके शीलिंग्स में दे रहे थे तो टोटल 1800 शीलिंग तब तक दिए जा चुके थे जो जवाहरलाल नेहरू भिजवा रहे थे। कहते हैं.

वो आई और वो वापस लौटा दिया। ऑब्वियस सी बात है कि भाई मदद जो भी की थी आज वापस क्यों कर रही हैं? तो पूछा तो कहते हैं पूछने पर उन्होंने बताया कि जवाहरलाल नेहरू ने भारत में यह बता दिया है कुछ लोगों को कुछ पार्लियामेंटेरियंस को कि मैं वहां उनकी मदद कर रहा हूं। और इस बात से बोस परिवार बहुत नाराज हुआ है। और अमयनाथ बोस ये भी बेटे हैं शरद चंद्र बोस के। अमनाथ बोस कहते हैं मेरे से मिले आके और उन्होंने कहा कि यदि आप जवाहरलाल नेहरू से मदद लेती हैं जो सुभाष के पॉलिटिकल एनिमी हैं। यह शब्द भाव उस रिपोर्ट में लिखा है। अब क्या बातें उनकी हुई होंगी मैं नहीं जानता। लेकिन वो रिपोर्ट आप स्वयं पढ़ सकते हैं। अमनाथ बोस के नाम पे वो बता रहे हैं कि एमली शंकर ने बताया कि अमनाथ बोस ने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जो सुभाष के पॉलिटिकल एनिमी है यदि आप उनसे कोई मदद लेंगी तो फिर आप बोस परिवार की सदस्य होने का अधिकार खो देंगी। आपको बोस परिवार में शामिल नहीं किया जाएगा।

और एमली शंकल बोस परिवार को नहीं खोना चाहती थी और यह अच्छी बात थी। यह तो बड़ी बात थी ना। नेताजी सुभाष के परिवार से एमली शेंकल जुड़े रहना चाहती थी। वो 1800 शीलिंग लौटा देती हैं। अब यह खबर जब इनको पता चली होगी भारत में तो फिर जवाहरलाल नेहरू के वो भी कॉस्पोंडेंस बहुत सारे लेटर्स अवेलेबल वहां अपने को मिलते हैं। वो कह रहे ठीक है तो अगर ऐसे यूं कैश में वो नहीं मदद ले रही तो अलग-अलग ओकेस पे तो मदद की जा सकती है। जैसे क्रिसमस आया तो कोई गिफ्ट दे दिए क्रिसमस पे। ऐसे ही अनीता का वो बच्ची जन्मदिन जब है जन्मदिन पे गिफ्ट दे दिए। तो इस तरह फिर वो मदद खैर होती रहती है धीरे-धीरे। लेकिन इन मदद के सहारे कब तक चलेगा? बल्कि यहां एक बात मैं पहले बीच में कह दूं। हमने समाज को इस तरह बांट दिया है कि हमने इंसान को इंसान छोड़ा ही नहीं। कोई किसी का हीरो है तो दूसरे का विलेन। हमने या तो देवता बना दिए हैं या बना दिए हैं।

इंसान इंसान छोड़े ही नहीं। किसी के लिए जवाहरलाल नेहरू हीरो है, दूसरे के लिए विलेन है। बीच में नहीं है। किसी के लिए सावरकर एक क्रांतिकारी है। देश की आजादी का सिपाही है। दूसरे के लिए वही माफीवीर है। जवाहरलाल नेहरू 27 जनवरी 1951 को एक पत्र लिख रहे हैं। एमली शंकल के नाम और डायरेक्ट नहीं भेजते हैं बल्कि वियना में लेगेशन जो है हमारा जो दूतावास है उसी के द्वारा भेज रहे हैं। और इस पत्र में क्या लिखते हैं? मैं बहुत समय से आपको पत्र लिखना चाह रहा था पर संकोच करता रहा। किंतु बर्न में अपने मंत्री देसाई बर्न स्विट्जरलैंड की उन दिनों राजधानी हुआ करती थी और एंबेसडर वहां बैठते थे देसाई। तो कहते हैं किंतु बर्न में अपने मंत्री देसाई व अन्य मित्रों के माध्यम से समय-समय पर आपके बारे में जानकारी लेता रहा हूं।

मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि मुझे आपके और आपकी बेटी के बारे में बहुत रुचि है। मैं यह पत्र भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से और सुभाष बोस के पुराने मित्र के रूप में लिख रहा हूं। हमें आपकी बेटी के लिए कुछ करना चाहिए। निसंदेह हमें आपकी भी सहायता करनी चाहिए और मैंने कुछ समय पहले देसाई को ऐसा करने के लिए कहा भी था। मैं समझता हूं कि अमय बोस आपसे मिले थे और उन्होंने भी आपकी कुछ सहायता की है। यह अच्छी बात है पर आवश्यकता इस बात की है कि इस उद्देश्य के लिए कुछ स्थाई व्यवस्था की जाए। निसंदेह यह सरकार की ओर से नहीं होगा। यह मामला पूरी तरह से मित्रों की बीच की बात होगा। जवाहरलाल नेहरू उन दिनों एक ट्रस्ट बनाने के बारे में विचार कर रहे थे। एक ऐसा ट्रस्ट जिससे रेगुलर फिर हेल्प की जा सके अनीता बोस की।

वैसे एक बात कहूं कुछ मेरे भाइयों को आज मुझसे शिकायत होगी कि मैं तो जवाहरलाल नेहरू को ग्लोरिफाई करने के लिए वीडियो बना रहा हूं। अपना काम जो प्रमाणिक सत्य है वो सामने लेके आना है। समाज को बांटना नहीं। बढ़ाना नहीं। देखें जब मैं वीर सावरकर की बात करता हूं। मेरे वीर कहने पे ही आपत्ति हो जाती है कई लोगों को। जब उनके योगदान की बात करता हूं तो कुछ उधर से लोग सुनाते हैं। आज नेहरू के बारे में सुनाएंगे।

बहरहाल जो सत्य है वही बोलना है। तो एक और पत्र उसके बाद जवाहरलाल नेहरू लिख रहे हैं 7 मार्च 1951 को और यह पत्र उन्होंने लिखा था वहीं लेगेन में अपने दूतावास को और वहां कहा कि आप एमली शेंकल को बताएं कि हम ट्रस्ट बनाने पे विचार कर रहे हैं और इस ट्रस्ट में 10,000 पाउंड या इससे ज्यादा रुपए डालेंगे। 10,000 पाउंड यानी कि उस जमाने में एक डेढ़ लाख आप कह सकते हैं कि उससे यह ट्रस्ट बनाएंगे और इससे फिर एक परमानेंट हेल्प का इंतजाम हो सकेगा। बल्कि इसके बाद वर्ष 1953 में समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। वर्ष 1953 में बीसी रे डॉ. विधान चंद्र रे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री भी रहे।

बड़े नेता थे। वो भी पत्र लिख रहे हैं एमली शेंकल को और वो भी बता रहे हैं उस ट्रस्ट के बारे में विस्तार से और बल्कि कहते हैं आप अपनी सहमति दें कि आप भी एक ट्रस्टी हो। इसके बाद एमली शेंकल अपनी सहमति भी भेज देती हैं ट्रस्टी बनने के लिए। वर्ष 1954 में फाइनली वो ट्रस्ट फंड क्रिएट होता है। अनीता बोस ट्रस्ट फंड। ₹ लाख से वह ट्रस्ट फंड क्रिएट होता है और इसके दो ट्रस्टी हैं। 23 मई 1954 की डेट के साइन हैं। इसके दो ट्रस्टी हैं स्वयं जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बी सी रे। कैलाशनाथ काटजू उसमें गवाह के तौर पर साइन किए हैं। ₹ लाखों से एक ट्रस्ट बन गया। अब यह ₹ लाख आए कहां से? भारत सरकार ने नहीं दिए थे। फिर किसने दिए थे? देखिए किसी समय में कांग्रेस ने एक फंड बनाया था आईएनए फंड। जब आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को उनको गिरफ्तार करके भारत लाया गया। दिल्ली के लाल किले में उन पर मुकदमा भी चला। नौकरी से तो वो सारे निकाल दिए गए थे।

किसी जमाने में वो ब्रिटिश इंडियन आर्मी के ही सैनिक हुआ करते थे और यहां से तो वो निकाले जा चुके। इसके बाद उनकी रिहबिलिटेशन के लिए या जो भी कहें हम तो जनता ने डोनेशंस दिए थे और उनसे कांग्रेस ने एक फंड बनाया था आईएनए फंड फ्रॉम दी पब्लिक डोनेशंस जनता का दिया दान था वो पैसा कांग्रेस के पास था तो आजाद हिंद फौज का के लिए जो फंड बना था उसमें से ₹ लाख अलग करके जो पैसा कांग्रेस के पास था उससे ये फंड बनाया गया तो ये कोई गलतफहमी ना हो किसी को कि भाई ये गवर्नमेंट ने कोई ट्रस्ट फंड बनाया था या कांग्रेस पार्टी ने बनाया था ये पैसा कांग्रेस के पास था आईएनए फंड का खैर बन गया। इसमें प्रोविज़ंस क्या थे?

प्रोविज़ंस यह थे कि जब तक अनीता 21 वर्ष की नहीं हो जाती तो यह ₹ लाख जहां यह फंड इन्वेस्ट करेगा वहां से जो इनकम जनरेट होगी या जो इंटरेस्ट आएगा उन इन्वेस्टमेंट्स पे उससे वो पैसा भेज दिया जाएगा अनीता की मां एमली शंकरल के पास ताकि अनीता की पढ़ाई लिखाई ढंग से हो सके। और जब वो 21 वर्ष की हो जाएंगी उसके बाद यह पूरा ₹ लाख अनीता के हवाले कर दिया जाएगा। वो चाहे फिर इसका जो मर्जी यूज़ करें। अब वो इंटरेस्ट कितना वैसे मेरे को थोड़ी सी इसमें हैरानी हुई और मैं समय नहीं मिला। चेक नहीं कर पाया। कुल ₹6000 सालाना भेजा जा रहा था और यह कहा गया कि भ 3% ₹ लाख डिपॉजिट्स किया अलग-अलग इन्वेस्टमेंट्स में वो गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में ही था कि 3% के हिसाब से इंटरेस्ट अर्न हो रहा है।

मुझे नहीं मालूम उस जमाने में गवर्नमेंट सिक्योरिटीज पे सिर्फ 3% इंटरेस्ट हुआ करता था या ज्यादा था जो भी था। तो ₹6000 सालाना इनको मिलना शुरू हो जाता है। 1954 के बाद और हर वर्ष मिलता रहा वर्ष 1964 तक। 1964 तक यह रुपया उनको मिलता रहा है। 1942 में जन्म हुआ था अनीता का तो कायदे से तो 1963 में वो 21 वर्ष की हो गई थी उसके बाद वो पूरा पैसा उनको मिल जाना चाहिए था लेकिन जून 1964 में अंतिम किस्त मिली है वही ₹6000 की उसके बाद रुपया मिलना बंद हो गया अब कोई रुपया नहीं आ रहा है और अपने को अगेन नेशनल आर्काइव्स में में जैसा जितना ढूंढ पाया वहां फाइल्स से रिकॉर्ड से यह पता चल रहा है कि उसके बाद अनीता ने पहले तो अगली किस्त की बात आई जब 1965 में किस्त नहीं आई है वो इंस्टॉलमेंट नहीं आई तो उन्होंने वही पूछा है जाके अनीता ने एमली ने कि भाई इस वर्ष की इंस्टॉलमेंट आई नहीं है कोई जवाब कहीं से नहीं आ रहा है वो वहीं दूतावास में जा रही हैं और दुनिया भर की कॉस्पोंडेंस अपने को मिलती है.

वर्ष 1983 तक की वर्ष 1983 83 के वहां दूतावास से लिखे गए पत्र यहां भारत में विदेश मंत्रालय को जो लिखे गए हैं वो अपने को मिलते हैं। पूछा जा रहा है कि वो पैसा किसके पास है? अनीता बोस जाती हैं वहां और पूछ रही है उनसे भाई वो पैसा किसके पास है? और वर्ष 1964 के बाद से कितना इंटरेस्ट एक्यूमुलेट हो चुका है। ₹ लाख में इंटरेस्ट भी ऐड हुआ होगा। आज वो कितना बन गया है। कहां है और कब मिलेगा मुझे? और देखें यहां पे वो अपने लिए भी नहीं मांग रही हैं। यह भारत सरकार के ही वहां जो दूतावास से जो पत्र आए हैं उसमें लिखा है कि अनीता ने यह कहा है मेरी कोई मंशा नहीं है इस रुपए को फॉरेन एक्सचेंज में मैं ऑस्ट्रियावी ना ले जाऊं। भारत से बाहर मैं नहीं ले जाना चाहती। और भारत में भी मुझे क्या करना है? भारत में भी किसी नोबल कॉज के लिए, किसी चैरिटेबल पर्पस के लिए इस रुपए को हम लगा देंगे। अब 1983 के बाद का मैं कुछ ढूंढ नहीं पाया वो रुपया कभी मिला भी कि नहीं मिला। और मिला तो कब मिला और कितना मिला और क्या उसका यूज़ हुआ। पर इतना तो कंफर्म मैं ढूंढ पाया कि देखें वन वर्ष 1964 से ले 1983 तक 19 साल तक वो जाती रही दूतावास और हमने कोई उनको सेटिस्फेक्टरी आंसर नहीं दिया।

नेताजी सुभाष की बेटी के साथ हम गीत गाते रहे हैं नेताजी सुभाष के। हम जी बड़ी मोहब्बत करते हैं नेताजी सुभाष से। यह उनकी बेटी के साथ हमने किया है। बहरहाल यह कहानी तो आ गई 1964 या उसके बाद पे बीच में थोड़ा सा एक बार पीछे चलते हैं। एक और महत्वपूर्ण घटना घटती है। वर्ष 1960 में अनीता पहली बार भारत आती हैं। दिसंबर 1960 में और तब बहुत कुछ होता है यहां पर। उसकी बात करेंगे। शरद चंद्र बोस के लड़के थे शिशिर बोस। शिशिर बोस की पत्नी है कृष्णा बोस। कृष्णा बोस ने वो पुस्तक लिखी थी। पिछले वीडियो में हमने दिखाई भी थी। एक सचिव प्रेम कथा एमली और सुभाष। इस पुस्तक में कृष्णा बोस लिख रही हैं कि वर्ष 1959 की सर्दियों में छुट्टियों के दौरान जब हम वीना गए थे तो वहां हमने आंटी को मना लिया था कि अनीता को भारत भेज दें। आंटी कौन? इमली बोस। तो कृष्णा बोस की माने तो कृष्णा बोस ने या शरत बोस के परिवार ने अनीता को भारत आने का निमंत्रण दिया। नेताजी सुभाष के एक और भाई हैं सुरेश चंद्र बोस। इनके बेटे कल्याण बोस और बेटी ललिता बोस।

ये दोनों भी वर्ष 1958 में 59 में अपनी काकी अपनी चाची एमली शंकल के संपर्क में हैं। वेना जा रहे हैं और ये भी अनीता को भारत आने का निमंत्रण दे रहे हैं। और बल्कि ये तो कुछ ज्यादा ही निमंत्रण दे रहे हैं। नेशनल आर्काइव्स की जो फाइल्स को मैं देखता हूं आपको भी दिखाऊंगा। अगर वह रिपोर्ट सही है तो उनमें लिखा है कि यह यह कह रहे हैं कि देखें अनीता के दादा नेताजी सुभाष के पिताजी जानकीनाथ बोस कि बहुत से रुपए छोड़कर गए थे अपने नातियों पोतियों के लिए उनकी शिक्षा के लिए तो उन रुपयों में अनीता का भी हिस्सा है। अनीता भारत आए और वह हिस्सा ले। इसके अलावा एक एनसेेस्टल हाउस एक पैतृक घर जो जानकीनाथ बोस ने बनाया था कोलकाता में कहते हैं उसमें सुभाष का भी तो हिस्सा था हमारे काका का और जिस समय 1941 में नेताजी सुभाष अंग्रेजों को चकमा देके जनवरी की रात को निकल गए थे भारत से और फिर जर्मनी पहुंचे थे उसके बाद अंग्रेजों ने नेताजी सुभाष का उस घर में जो हिस्सा था उस हिस्से को कुर्क किया और नीलाम किया। ऐसा वो रिपोर्ट बता रही हैं। और नीलामी में नेताजी सुभाष का हिस्सा उन्हीं के एक भाई ने खरीद लिया।

वहां कौन से भाई ने खरीदा यह नहीं लिखा है। तो यह कह रहे हैं कल्याण बोस और ललिता बोस अगर वो रिपोर्ट सही है तो कि भारत आकर अनीता वो अपना हिस्सा क्यों नहीं लेती? भारत आना चाहिए। 1960 में अनीता भारत आना चाहती हैं और भारत आई भी वो। वो चाहती हैं कि मैं भारत भारतीय पासपोर्ट पर आऊं। मैं अपने पिता की धरती अपने पिता के देश ऑस्ट्रेलिया के पासपोर्ट पर ट्रैवल करूं तो यह एंबरेसमेंट होगी। तो वो अप्लाई करती हैं कि मुझे भारत का पासपोर्ट दिया जाए। भारत सरकार भारत का पासपोर्ट देना चाहती है। तैयार हैं। लेकिन समस्या ये है कि उनके पास ऑस्ट्रिया का पासपोर्ट है। इनको कहा जाता है कि आप ऑस्ट्रियन पासपोर्ट सरेंडर कर दें। तुरंत मिल जाएगा यहां का। अब देखिए 18 साल की लड़की हैं।

भारत पहले कभी आई नहीं। वो उस परिवार के कुछ सदस्यों से पिछले सालों में मिलती रही हैं। वो आत्मीयता तो हो गई हैं। लेकिन भारत में भारतीय पासपोर्ट लेके आऊं। यानी कि मैं ऑस्ट्रिया की सिटीजनशिप छोड़ के आऊं। भारत में मैं सेटल हो पाऊंगी कि नहीं? आसान नहीं हुआ। किसी को जानती नहीं कैसी संस्कृति, कैसा देश रहेगा। मां भी नहीं चाहती हैं कि बेटी ऐसा करें। तो वो निर्णय वो नहीं ले पाती। ऑस्ट्रेलियन पासपोर्ट वो सरेंडर नहीं कर पाती। ऑस्ट्रेलियन पासपोर्ट पर ही वह भारत आती हैं। और जब यह खबर भारत में होती है कि नेताजी सुभाष की बेटी भारत आ रही हैं तो यहां पे विरोध के स्वर खड़े हो जाते हैं। बोस परिवार इनवाइट कर रहा था। उधर जवाहरलाल नेहरू भी इनवाइट कर रहे हैं। वो भी निमंत्रण भेज रहे हैं कि हां वो भारत आए। और जब भारत आए तो कोलकाता में तो बोस परिवार के साथ ही रहें। बाकी बॉम्बे में वहां व्यवस्था मैं कर दूंगा और दिल्ली जब वो आए तो दिल्ली में तो मेरे मेहमान बनके मेरे घर रहे। खैर दिसंबर 1960 में भारत पहुंचती हैं अनीता और वो कोलकाता जाती हैं सीधी। उनके आने से पहले भारत पहुंचने से पहले ही वियना में उनको टेलीग्राम मिल रहे हैं। उनको लेटर्स मिल रहे हैं अलग-अलग नामों से। 21 नवंबर 1960 को एक पत्र मिलता है उनको और यह दिल्ली में क्रोल बाग के रहने वाले किन्ही जय सिंह के नाम से लिखा गया था। देखिए छद्म नाम से भी पत्र जा रहे थे। ऐसे भी लोग थे जो अपना नाम सामने नहीं चाहते थे तो किसी और नाम से लिख देते थे। और इस पत्र में कहा गया कि 90% भारतीय ये मानने को तैयार नहीं है कि नेताजी सुभाष ने विवाह किया था। और जहां भी आप आएंगी भारत में अनीता बोस को लिखा जा रहा है जहां भी भारत में आएंगी आपका विरोध किया जाएगा और हमने फोटो देखे हैं आपके आपकी सूरत नेताजी सुभाष से नहीं मिलती है।

आपके पास क्या सबूत है? आप नेताजी सुभाष की बेटी हैं और आपकी मां के पास क्या सबूत हैं कि वह नेताजी सुभाष की पत्नी है। यह एक पत्र उनको मिलता है। इसी तरह 28 नवंबर 1960 को कालीघाट कोलकाता के पते से किसी एस सी घोष के नाम से पत्र लिखा गया। उसमें भी भारत ना आने के लिए कहा गया। हद तो यह हुई कि स्वयं नेताजी सुभाष के भाई सुरेश चंद्र बोस ने भी तार भेज दिया टेलीग्राम भेज दिया एमली को और कहा कि भारत अनीता को मत भेजें। अब ऐसी परिस्थिति में कितना प्रेशर होगा उस लड़की पर। 19 साल की वह बच्ची है। 18 साल की 18 साल की वह बच्ची है। वह भारत आ रही हैं। भारत आना चाहती है। कितनी भावनाएं होंगी? कैसा ज्वार होगा भावनाओं का। मैं उस देश जा रही हूं जिसकी आजादी के लिए मेरे पिता ने अपना सब कुछ स्वाहा कर दिया था। मेरी मां को पत्र लिखकर मेरे पिता ने कहा था कि भारत मेरा मेरा पहला प्यार है। और मैं स्वयं को अपने पहले प्यार के हाथों बेच चुका हूं। तो मेरे पिता का पहला प्यार वो भारत मैं अपने पिता की जन्मभूमि पर जा रही हूं और जाने से पहले ही ऐसे ऐसे पत्र मिल रहे हैं। लेकिन 18 वर्ष की वो बेटी वो सुभाष की बेटी हैं। वो हिम्मत वाली बेटी है। वो भारत आती हैं। और बल्कि कृष्णा बोस भी विस्तार से चर्चा कर रही हैं।

अपनी इस पुस्तक में बता रही हैं। कहते हैं सुरेश काका तो यहां तक उन्होंने किया कि जिस दिन कोलकाता पहुंच रही थी अनीता उससे एक दिन पहले अपना एक स्टेटमेंट न्यूज़पेपर्स को भिजवा दिया कि मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि सुभाष ने विवाह किया था। कृष्णा बोस लिखती हैं कि जैसे ही हमें इस बात की सूचना मिली कि सुरेश काका ने अखबारों को स्टेटमेंट भेज दी है। तुरंत सारा बोस परिवार इकट्ठा हुआ। सुरेश चंद्र बोस के भी बेटे बेटियां हैं। सब इकट्ठे हुए और वो तो इंतजार कर रहे थे कि उनकी बहन आ रही है भारत लेकिन पिता नाराज थे। तो कहते हैं कि फिर तुरंत मैंने और स्वयं सुरेश चंद्र बोस के बेटे अरविंद ने हमने अलग-अलग अखबारों से बात की और उनसे कहा कि ऐसी कोई स्टेटमेंट प्लीज मत छापिए और फिर अखबारों ने वो बयान नहीं छापा। खैर वो पहुंची वहां पे और सुरेश काका मान गए और माने तो फिर इतना माने कि पहले तो वो इनके घर पे रही शरद चंद्र बोस के घर पे रही और उसके बाद सुरेश काका भी कोलकाता में दूसरी जगह जहां भी रह रहे थे वहां गई कुछ दिन उनके साथ रही तो बड़े प्यार से अपनी बेटी के लिए उस भतीजी के लिए स्वयं फिशरी बना के खिलाते थे .

एक और भाई बॉम्बे रहते थे नेताजी सुभाष के वहां गई तो उनके साथ रही शैलेश काका उनके यहां रही बल्कि उनके साथ तो वह दक्षिण भारत के अलग-अलग शहरों की यात्रा पर भी गई और वहां एक खास घटना घटती है जब वह बोर गई तो अनीता जब बोर पहुंची अपने शैलेश काकू के साथ वहां एक लड़का मिलता है ऑस्ट्रिया का ही रहने वाला है जहां से ये आई थी लड़के का नाम है मार्टिन पाफ। मार्टिन पाफ पिछले कई सालों से भारत में है। बीकॉम उत्कल यूनिवर्सिटी से उड़ीसा से यहां से उसने बीकॉम किया है और देखें संयोग उड़ीसा में ही कटक में जन्म हुआ था.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का तो ये लड़का मार्टिन पाथ ये अनीता से मिलता है बेंगलुरु में भारत से इसने बीकॉम किया उसके बाद भारत में एनजीओस के साथ ये जुड़ा रहा रोहतक में हरियाणा में भी बल्कि जैसा अपने को नेशनल आर्काइव्स से पता चलता है वहां रोटरी स्कूल ऑफ ब्लाइंड्स है उसके साथ भी ये जुड़ा हुआ है और अब यह बोर में एनजीओ के साथ ही काम कर रहा है। अनीता से मुलाकात होती है। वो मुलाकात धीरे-धीरे मित्रता में कन्वर्ट होती है और फिर दोनों के बीच प्यार हो जाता है। तो भारत की धरती पर प्रथम यात्रा के दौरान अनीता को अपना जीवन साथी मिलता है।

और क्या-क्या गेन हुआ वह अपनी जगह पर यह क्या छोटी बात थी। आगे चल के वर्ष 1965 में 5 जुलाई को अनीता और मार्टिन पाफ की शादी होती है। भारत की पहली यात्रा में बहुत बिजी रही वो। कई जगह वो गई हैं। कई कार्यक्रम मेला लगा रहता था। बहुत सारे फंक्शनंस अटेंड करती है। दिल्ली आई हैं। तो तीन मूर्ति भवन में जवाहरलाल नेहरू की मेहमान हैं। वहां वो रुकी हैं। और इसके बाद वह वापस चली गई। फिर तो बहुत बार वह भारत आई। मुझे भी उनसे मिलने का सौभाग्य मिला था। अ और बहुत देर बात भी की थी। पर उस समय यह समझ नहीं थी। बात कर रहा था। बहुत सारी बातें उनसे मैंने सुनी कि रिकॉर्ड कर लूं। यह समझ उस समय नहीं थी। क्या नेताजी सुभाष और एमली शेंकल का विवाह हुआ था? तो देखिए इस बारे में नेताजी सुभाष ने तो वो पत्र जो लिखकर गए थे वो शरद चंद्र बोस के नाम 8 फरवरी 1943 को उसमें उन्होंने लिखा है कि मैंने यहां विवाह कर लिया है। मेरी बेटी भी है। तो नेताजी सुभाष ने तो बताया है। गवाह कोई है नहीं। चश्मदीद गवाह प्रत्यक्षदर्शी कोई नहीं है जो यह कहे कि हां मैं उनके विवाह में शामिल था। ऐसा तो कोई कोई भी नहीं है। कभी कोई नहीं सामने आ सका। फिर कौन बताए? तो दूसरी बची फिर एमली शंकल।

एमली शंकल का क्या कहना है इस बारे में? उनके अलग-अलग इस पे स्टेटमेंट हैं। 12 मार्च 1946 को जो पत्र उन्होंने लिखा था शरद चंद्र बोस को जो कभी पहुंच नहीं सका। लेकिन आज गवर्नमेंट रिकॉर्ड में तो अवेलेबल है ना। वहां वो विवाह की बात बताते हुए कहती हैं कि वर्ष 1942 में हमारा विवाह हुआ था। नथालाल पारिक भी उनसे मिले और फिर जो रिपोर्ट उन्होंने सौंपी थी सरदार पटेल को तो उसमें वो लिख रहे हैं कि उनका गंधर्व विवाह हुआ था। इसी तरह कृष्णा बोस वो अपनी पुस्तक एक सच्ची प्रेम कथा इमली और सुभाष उसमें वो लिख रही हैं कि हमारे परिवार में ये जनरल मान्यता थी कि 1942 में उनका विवाह हुआ है। लेकिन आगे चलके उसमें लिख रही हैं कि आगे चलके 70 के दशक में जब लनार्ड गार्डन पुस्तक लिख रहे थे ब्रदर्स अगेंस्ट द राज शरथ एंड सुभाष तो कहते हैं उसकी रिसर्च के संबंध में जब वो एमली शंकल से मिले तो एमली शंकल ने लनार्ड गार्डन को बताया और वो अपनी पुस्तक में लिखते भी हैं इस बात को बताया कि हमारा विवाह दिसंबर 1937 में हो गया था और इसी तरह बी आर नंदा जो नेहरू मेमोरियल म्यूजियम लाइब्रेरी के डायरेक्टर रहे और बहुत सारे लोगों के इंटरव्यूज उस टाइम रिकॉर्ड किए थे।

उनमें एमली शंकल भी हैं। तो उनको भी दिसंबर 1937 विभाग की का समय बताया है एमली शंकल ने। लेकिन उसको कहा कि भाई यह डेट आप इसके बारे में आप छापे नहीं। तो कंफ्यूजन इस तरह बन गया कि 1942 वो पहले बताती थी। 1946 में शरद चंद्र बोस को लिखे पत्र में या इवन सरदार पटेल को जो पत्र उन्होंने लिखा था उसमें उन्होंने लिखा था कि लीगल मैरिज हमारी नहीं हुई है। तो पहले खैर 1942 की बात हो रही थी और अब 1937 की इससे कंफ्यूजन होता है। पर करना क्या है इस बात का? 1937 में हुआ या 1942 में हुआ। और इससे बढ़के वह अग्नि के चारों ओर सात फेरे लिए थे कि नहीं लिए थे इससे हजार गुना लाख गुना बड़ी बात यह है कि उन दोनों ने एक दूसरे को पति पत्नी स्वरूप स्वीकार किया और निभाया निभाया आज भी सात फेरे लेके अगले दिन कोर्ट में खड़े होते हैं बहुत सारे लोग जाकर देखें अदालतों में वो सारे गुण दोष भी मिलवा लेते हैं सारी वो जो जन्मपत्री ये ये वो वो सब सब मिलवा लेते हैं। वो फेरे भी ले लेते हैं और अगले दिन कोर्ट में खड़े होते हैं।

यहां वो दो लोग थे एक वो थे सुभाष नेताजी जिन्होंने अपनी मातृभूमि को प्रथम प्यार माना और उसी प्रथम प्यार के लिए अपना जीवन सवाह कर दिया। लेकिन जिनसे विवाह किया वह गंधर्व विवाह था या जैसा भी विवाह था या जिस तरह भी विवाह था। उस औरत के साथ भी वफा की निभाया और वो औरत तो ऐसी महान उनके पास भी जीवन था ना क्या उम्र थी 1945 में नेताजी सुभाष के बारे में जब वो खबर आई सच्ची झूठी जो भी थी अब उस पर बात नहीं करनी 1910 में पैदा हुई थी वो तो कितनी उम्र थी उनकी 35 साल वो दोबारा विवाह कर सकती थी बसा सकती थी अपना घर सारे कष्ट सहती रही नेताजी सुभाष की याद और उनकी बेटी उनकी लाडली अनीता के जीवन के लिए और गिरफ्तार भी कर ली गई थी वो तो जबकि नेताजी सुभाष का साथ उन्होंने दिया था उनकी वो क्लोजेस्ट कंपैनियन थी वो तो अरेस्ट भी हुई तो हजार तकलीफें भी उन्होंने सही और अपनी मर्यादा के साथ जीवन जिया

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