क्या कोई गाना, गीत या गजल हो सकता है? यह सवाल इसलिए 70 के दशक के एक ऐसे ही गलज की जिसे लिखने वाले शायर, गाने वाले गायक ने इसके ठीक बाद दुनिया को अलविदा कह दिया।
अब इसे इत्तेफाक कहिए या कुछ और, उनके बाद जिसने भी इसे गाया, अपनी आवाज से नवाजा, उन सबकी उसके कुछ वक्त बाद ही मौत हो गई। ,के कारण अलग-अलग रहे, लेकिन बरसों बाद तक आज भी उस गजल को गाने की हिमाकत कोई नहीं करता।
यह गजल है उर्दू के मशहूर शायर, लेखक, व्यंग्यकार और यात्रा-वृत्तांत लिखने वाले जादूगर शेर मोहम्मद खान की, जिसे दुनिया इब्न-ए-इंशा के नाम से जानती और कई मायनों में पूजती है। अपनी शायरी के अलावा, उन्हें उर्दू के बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक माना जाता था।
उनकी भाषा-शैली बहुत खास थी। इसमें शब्दों के इस्तेमाल और वाक्य-रचना में अमीर खुसरो की याद दिलाने वाला अंदाज और हिंदी-उर्दू की आम बोलचाल की झलक मिलती थी। उनका व्यंग्य ‘उर्दू की आखिरी किताब’ कद्रदानों के बीच आज भी बेहद मशहूर है।
खुद इब्न-ए-इंशा ने अपनी से एक दिन पहले एक चिट्ठी में लिखा था- ये मनहूस गजल कितनों की । इस गजल में शायर ने मोह-माया और संसार से विरक्ति या अलगाव की बात की है। इब्न-ए-इंशा इसमें खुद को संबोधित करते हुए कहते हैं कि इस दुनियादारी और नगर में दिल लगाने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि जो मस्तमौला और फकीर स्वभाव के हैं, उन्हें दुनिया के सुकून या शहर के ठिकानों से कोई मतलब नहीं होना चाहिए।
इस गजल को सबसे पहले 1974 के जनवरी महीने में पटियाला घराने के उस्ताद अमानत अली खान ने पाकिस्तान टीवी पर गाया था। जब यह गजल प्रसारित हुआ, तो इसके कद्रदानों की बाढ़ सी आ गई। लेकिन इस कार्यक्रम के कुछ ही महीनों बाद 17 सितंबर 1974 को उस्ताद अमानत अली खान इस दुनिया से रुखसत हो गए।