कानपुर याद किया जाता है आईआईटी के लिए, चमड़ा उद्योग के लिए या फिर कभी-कभी गुटखा खाकर थूकने वाले जुमलों के लिए भी। फिलहाल तो बात शिक्षा की है। माने शहर में शिक्षा के नाम पर ऐसा मायाजाल बुना गया जिसने ना सिर्फ हजारों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा दिया बल्कि देश की नामीगिरामी हस्तियों को भी अपनी कैलकुलेशन में उलझा दिया। एक साथ लाखों लोगों को प्रवचन देने वाली जया किशोरी, वक्तव पर मसीहा बन जाने वाले सोनू सूद, टीवी की मशहूर अभिनेत्री हिना खान। यह सब वह नाम है जिनके ग्लैमर ने कुछ नक्कालों को अनजाने में करोड़पति बना दिया।
कैसे? कल्पना कीजिए एक आलीशान होटल का हॉल और रोशनी से जगमगाता स्टेज। जहां मौजूद हैं देश के दिग्गज कलाकार और मोटिवेशनल स्पीकर। उन्हें एक ऐसी संस्था सम्मान दे रही है जिसका नाम सुनने में बहुत भारीभरकम लगता है। ग्लोबल बुक ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड्स। इन हस्तियों को लग रहा था कि वे समाज में अपने योगदान के लिए सम्मानित हो रहे हैं।
लेकिन हकीकत में वे एक फर्जी डिग्री गैंग के ब्रांड एंबेसडर बनाए जा रहे थे। जिसका उन्हें कोई अंदाजा भी नहीं था। सिर्फ इतना ही नहीं इस का सरगना डॉक्टर मनीष कुमार इन सितारों के साथ अपनी फोटो खिंचवाता और फिर उन्हीं फोटो को दिखाकर भोलेभाले छात्रों को भरोसा दिलाता कि उसकी पहुंच बहुत ऊपर तक है। मगर अब कानपुर पुलिस और एसआईटी ने मिलकर इस गैंग का पर्दाफाश कर दिया है। फेक मार्कशीट व फेक सर्टिफिकेट के रैकेट में इनको पकड़ा गया है। हमारा जो है क्योंकि शैलेंद्र के साथ इनका संपर्क था। इनके बैंक अकाउंट का डिटेल हमारे पास है।
इनके मोबाइल्स का पूरा डिटेल हमारे पास है। जिसके आधार पर इनको पकड़ा गया है। चलिए पूरी कहानी समझते हैं और जानते हैं कि गैंग कैसे चलता था। इस गैंग के मेन्यू में कौन-कौन सी डिग्रियां थी और कितने की थी। इस पूरे खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब कानपुर पुलिस और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम माने एसआईटी ने एक साझा ऑपरेशन चलाया। 18 मई 2026 को पुलिस ने इस इंटरस्ट गिरोह के दो मुख्य मोहरों को गिरफ्तार किया। मनीष उर्फ रवि और अर्जुन यादव।
मनीष इस का मास्टरमाइंड था और हैदराबाद से अपना नेटवर्क चला रहा था। वहीं अर्जुन यादव उन्नाव का रहने वाला था और एक कोचिंग सेंटर चलाता था। पुलिस ने इन्हें कानपुर के यशोदा नगर इलाके के शनिदेव चौराहे के पास से दबोचा। पुलिस की जांच में जो सामने आया वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं था। यह गैंग देश भर के 98 विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी डिग्रियां बेच रहा था।
इनका नेटवर्क इतना फैला हुआ था कि यह घर बैठे होम डिलीवरी की तरह मार्कशीट और डिग्री पहुंचाते थे। हाई स्कूल की मार्कशीट से लेकर ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, बीटेक, एलएलबी, बी फार्मा और यहां तक कि पीएचडी की फर्जी डिग्रियां भी इनके मेन्यू कार्ड में सब था। फर्जी डिग्रियों के मेन्यू को तैयार करने वाले कलाकारों में मुख्य मनीष कुमार मूल रूप से राजस्थान के सीकर का रहने वाला है। उसकी कहानी खुद एक फर्जीवाड़े से शुरू होती है।
मनीष केवल इंटर पास था लेकिन वह सपना देख रहा था डॉक्टर बनने का। बीडीएस की पढ़ाई करने बेंगलुरु गया लेकिन हो गया फेल। इसके बाद वह हैदराबाद चला गया और वहां उसने चेन्नई की एक संदिग्ध संस्था ग्लोबल ह्यूमन पीस यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट यानी पीएचडी की डिग्री ली।
अपने नाम के आगे डॉक्टर लगा लिया। मनीष ने अपनी जालसाजी को कानूनी जामा पहनाने के लिए 2011 में अपनी मां के नाम पर हैदराबाद में रचना अग्रवाल एजुकेशनल सोसाइटी बनाई। लेकिन उसका असली खेल शुरू हुआ 2019 में जब वह Facebook के जरिए कानपुर के एक शख्स शेखर गुप्ता के संपर्क में आया। शेखर ही वह कड़ी था जिसने मनीष को फर्जी डिग्रियों की दुनिया के बड़े खिलाड़ियों से मिलवाया। मनीष जानता था कि सिर्फ डिग्रियां बेचने से काम नहीं चलेगा। उसे लोगों का भरोसा जीतना होगा।
इसके लिए उसने लंदन की एक संस्था ग्लोबल बुक ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड की फ्रेंचाइजी लेने की कोशिश की। हालांकि वेरिफिकेशन में उसकी डॉक्यूमेंट्स खारिज कर दिए गए। अब फ्रेंचाइजी तो नहीं मिली तो मनीष ने इसी संस्था के नाम को फर्जी तरीके से इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
इस संस्था के बैनर तले उसने मुंबई, गोवा और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में आलीशान अवार्ड फंक्शन आयोजित किए। इन कार्यक्रमों में उसने सोनू सूद, जया किशोरी, हिना खान, करण मेहरा और फिल्म डायरेक्टर योगेश भारती जैसे 60 से ज्यादा सेलिब्रिटीज को बुलाया। इन सितारों को अवार्ड देकर वो उनके साथ तस्वीरें खिंचवाता। सितारों के साथ मनीष की कई तस्वीरें पुलिस ने उसके मोबाइल फोन से निकाली हैं। एसआईटी और पुलिस का मानना है कि इन सेलिब्रिटी लिंक्स का इस्तेमाल क्लाइंट्स को लुभाने यह दिखाने के लिए किया जाता था कि गिरोह बहुत प्रभावशाली है।
वो जल्द ही दुबई में भी ऐसा कार्यक्रम करने वाला था। लेकिन फंडिंग और वेरिफिकेशन की समस्याओं के कारण उसे टालना पड़ा। अब सबसे जरूरी सवाल यह है कि यह फर्जी डिग्रियों की दुकान आखिर काम कैसे करती थी? पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के अनुसार मनीष एक मिडिल मैन की तरह काम करता था। जब कोई छात्र फेल हो जाता या किसी को नौकरी के लिए डिग्री की जरूरत होती तो वे लोग मनीष से संपर्क में आते। मनीष ने हैदराबाद में एक टेलीकॉलिंग सेंटर खोल रखा था। जहां 20-25 लड़के लड़कियों को 25 से ₹00 की सैलरी पर रखा गया था। इन टेलीकॉलर्स का काम फेल होने वाले छात्रों या नौकरी चाहने वालों का डाटा कलेक्ट करके उन्हें फोन करना और फर्जी डिग्री लेकर फ्यूचर की प्लानिंग के बारे में बताना था।
एक बार डील पक्की होने के बाद छात्र का डाटा इंदौर के संजय पंजानी को भेजा जाता था। संजय के पास हाई क्वालिटी प्रिंटिंग सेटअप था। जहां ऐसी डिग्रियां और मार्कशीट तैयार की जाती थी जो देखने में बिल्कुल असली लगती थी। गैंग ने अपनी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए बकायदा वेबसाइट्स बनाई थी।
जहां इन फर्जी डिग्रियों को ऑनलाइन अपलोड कर दिया जाता था ताकि वेरिफिकेशन के समय छात्र को वो असली लगे। अब मेन्यू में लिखी डिग्रियों के रेट भी जान लीजिए। हर डिग्री की एक कीमत तय थी।
जैसे हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की डिग्री ₹00 ग्रेजुएशन की डिग्री ₹500 से ₹75000 बीटेक और एलएलबी की डिग्री ₹1.5 लाख बी फार्मा और डी फार्मा की डिग्री ₹2.5 लाख। मनीष को हर डिग्री बनवाने के बदले में लगभग ₹15,000 का कमीशन मिलता था। पुलिस को मनीष और अन्य आरोपियों के बैंक खातों में करोड़ों के लेनदेन के सबूत मिले हैं।
अकेले मनीष के खाते में 16.44 माने 16 लाख के करीब और अर्जुन यादव के खाते में ₹20 लाख के लेनदेन का पता चला है। इस गैंग ने कोविड महामारी के दौरान सबसे ज्यादा कमाई की जब सब कुछ ऑनलाइन हो गया था और लोग शॉर्टकट के जरिए डिग्रियां चाह रहे थे। यह सब कुछ लंबे वक्त से चल रहा था। पुलिस को कुछ Intel भी थी। ऐसे में इस पूरे गिरोह के सफाई की शुरुआत हुई 18 फरवरी 2026 को जब कानपुर की किद्वई नगर पुलिस ने जूही गौशाला स्थित शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन के ऑफिस पर छापा मारा। वहां से पुलिस को 14 अलग-अलग विश्वविद्यालयों की 1000 से ज्यादा फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट मिली। पुलिस ने मौके से शैलेंद्र कुमार ओझा और उसके साथियों को गिरफ्तार किया।
शैलेंद्र खुद गणित का शिक्षक था। लेकिन वह इस सिंडिकेट का एक बड़ा हिस्सा बन चुका था। जब फरवरी में यह छापेमारी हुई उस समय मुख्य आरोपी मनीष दुबई में था। उसे जब अपने साथियों की गिरफ्तारी की खबर मिली तो वह भारत तो लौटा लेकिन यहां आकर छिप गया। वो पिछले 3 महीनों से पुलिस को छका रहा था और पुणे, मुंबई, फरीदाबाद, गोवा और दिल्ली जैसे शहरों में ठिकाना बदलकर रह रहा था।
आखिरकार कानपुर एसआईटी ने सटीक सूचना के आधार पर उसे और अर्जुन यादव को धबोचा दिया। गिरफ्तारी के दौरान पुलिस और एसआईटी को लगभग 80 फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट, अलग-अलग विश्वविद्यालयों की जाली मोहरे और होलोग्राम, दो लैपटॉप और दो मोबाइल फोन जिनमें हजारों छात्रों का डाटा और डिजिटल सबूत मौजूद थे।
जांच में पता चला है कि यह गैंग फर्जी डिग्रियां बनाने के लिए छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, लिंगायाज विद्यापीठ, मंगलायतन यूनिवर्सिटी, जेएस यूनिवर्सिटी और ग्लोबल यूनिवर्सिटी जैसी बड़ी संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल कर रहा था। हैरानी की बात यह है कि इस गैंग ने केवल छात्रों को ही नहीं बल्कि कानून के रखवालों को भी फर्जी डिग्रियां बांटी थी। जांच में कानपुर के कम से कम 10 वकीलों के नाम सामने आए हैं।
जिन्होंने इस गिरोह से फर्जी एलएलबी की डिग्री खरीदी थी। पुलिस अब इन सभी वकीलों और बाकी लोगों की पहचान कर रही है जिन्होंने इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरियां हासिल की हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा के नाम पर धांधली के इतने बड़े रैकेट का भंडाफोड़ कानपुर पुलिस की बड़ी उपलब्धि है। पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल ने साफ कहा है जांच अभी खत्म नहीं हुई है।
अभी भी गिरोह के कुछ सदस्य जैसे शेखर गुप्ता और संजय पंजानी फरार हैं। इनकी तलाश मिट्टी में जुटी हुई है। भले ही कानपुर पुलिस और एसआईटी ने मिलकर गिरोह का पर्दाफाश कर लिया हो।