मेरा नाम कासिम अली, बरकत अली, शमशेर बहादुर नवाब तोपची है।” जब मैं मिलिट्री में था, तो इन हाथों से इतनी गोलियां चला चुका हूं, कि बंदूक से निकली हुई गोली अगर मेरे हाथों की पकड़ में आ जाए, तो अंदर ही फड़फड़ा कर दम तोड़ देगी। साले बाहर नहीं निकलेंगे। यह कहानी है उस शख्स की, जिसने बॉलीवुड में कदम रखा, तो ना तो उनके पास चॉकलेटी चेहरा था, ना पारंपरिक हीरो जैसी शक्ल, और ना ही रोमांस के राजकुमार वाली छवि। लेकिन उसकी दमदार आवाज, बेबाक अंदाज और चेहरे के खास निशान ने उसे बाकी सितारों से बिल्कुल अलग पहचान दी। जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं। जिस राख से बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं। यही है बॉलीवुड के शॉर्ट गन शत्रुघ्न सिन्हा। [हंसी] अरे मेरे बदायूं के लल्ला अभी तक दुनिया में कोई ऐसी जगह ही नहीं बनी जहां से मंगल ना निकल सके। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ फिल्मों और कामयाबी तक सीमित नहीं है। इसमें दोस्ती, प्यार, विवाद, रिश्तों की उलझने और राजनीति तक का लंबा सफर शामिल है। तुमने हमारा नाम जरूर सुना होगा। परशुराम। हमारे बारे में मशहूर है कि हम लोगों की शादियां भी कराते हैं और श्राद्ध भी। एक वक्त था जब शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन की दोस्ती बेहद चर्चित थी। फिर ऐसा क्या हुआ कि दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई। तू मुझे गलत समझ रहे हो यार मैं दोस्त। अपनी गंदी जुबान से दोस्ती का नाम मत ले। तुझसे ज्यादा वफादारी तो कुत्ते में होती है। काश मैंने तुझसे दोस्ती करने के बजाय किसी कुत्ते को पाल लिया होता। रीना रॉय के साथ उनके रिश्ते की असली कहानी क्या थी? [संगीत] सोनाक्षी सिन्हा को लेकर उठी अफवाहओं में कितनी सच्चाई थी? उनके चेहरे पर मौजूद रहस्यमई निशान आखिर कैसे आया और रामायण जैसे चर्चित घर के भीतर की जिंदगी कितनी अलग थी। मेरे ताश के 53वें पत्ते तीसरे बादशाह हम हैं। दिखाई नहीं देता है। फिर फिल्मों के इस बेबाक अभिनेता ने राजनीति का रुख क्यों किया? क्या यह महत्वाकांक्षा थी या वक्त की मांग? कुछ सांप इतने जहरीले होते हैं राजा। कि अगर वो काट ले तो पलक झपकते ही जिंदगी कट जाती है। [संगीत] वो करवट बदलने का मौका तक नहीं देते राजा। आज हम जानेंगे शत्रुघ्न सिन्हा की जिंदगी से जुड़े उन्हीं किस्सों और सवालों को जिनकी वजह से उनका सफर सिर्फ एक अभिनेता की कहानी नहीं बल्कि संघर्ष, शोहरत, रिश्तों और विवादों से भरी एक दिलचस्प दास्तान बन गया। श्याम कहां है?
वो तो बिटो को लेकर दवा खाने गया है। आए तो उससे कह देना छेनू आया था। बहुत गर्मी है खून में तो बेशक आ जाए मैदान में। जो हसरत निकालनी हो निकाल ले वो लेकिन आइंदा मेरे किसी लड़के को हाथ लगाया तो मोहल्ले का मोहल्ला उड़ा के रख दूंगा मैं। तो आइए परत दर परत खोलते हैं शॉर्टगन शत्रुघन सिन्हा की जिंदगी की वह कहानी जो कैमरे के सामने जितनी चमकदार थी कैमरे के पीछे उतनी ही रैलिस पटना की मिट्टी में जन्म लेता है एक ऐसा बच्चा जो आगे चलकर बिहारी बाबू के नाम से पूरे बॉलीवुड में जाना गया। शत्रुघ्न सिन्हा। लेकिन उस वक्त किसी को क्या पता था कि यह बच्चा सिर्फ घर का नहीं बल्कि इंडस्ट्री का भी चौथा स्तंभ बनने वाला है। उनके पिता थे भुवनेश्वरी प्रसाद सिन्हा पेशे से डॉक्टर और सिद्धांतों के पक्के। मां थी श्यामा देवी सिन्हा आस्था और विश्वास की मूर्ति। कहानी यहीं से दिलचस्प हो जाती है। [संगीत] शादी के कई साल बाद तक संतान ना होने से परेशान होकर दोनों ने वाराणसी के एक मंदिर में मन्नत मांगी। और जैसे ही किस्मत ने करवट ली घर में एक नहीं दो नहीं बल्कि चार-चार बेटों की किलकारियां गूंज उठी। कहते हैं उस मंदिर की मान्यता थी कि मन्नत मांगने पर चार संताने होती है। लेकिन डॉक्टर साहब तो विज्ञान में यकीन रखते थे। उन्होंने सोचा देखते हैं किस्मत कितनी दूर तक साथ देती है। जब [संगीत] पांचवी बार कोशिश की गई तो गर्भ में ही शिशु की मृत्यु हो गई। उस दिन भुवनेश्वरी प्रसाद समझ गए कुछ बातों को चुनौती नहीं स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने इसे भगवान का संकेत माना और खुद को दशरथ समझते हुए [संगीत] अपने चारों बेटों के नाम रख दिए। राम, लक्ष्मण, भरत और सबसे छोटा शत्रुघ्न। हालांकि ज्योतिष के अनुसार छोटे बेटे का नाम हेमराज होना चाहिए था। लेकिन पिता ने साफ कह दिया दशरथ के घर में हेमराज नहीं हो सकता और इस तरह हेमराज बनते बनते रह गया और दुनिया को मिला शत्रुघ्न प्रसाद सिन्हा। चारों भाइयों की पढ़ाई शानदार रही। राम और भरत आगे चलकर अमेरिका में वैज्ञानिक बने लक्ष्मण लंदन में नामी डॉक्टर लेकिन चौथे बेटे का रास्ता अलग था। बचपन से ही पढ़ाई में औसत लेकिन फिल्मों के प्रति दीवानगी गजब की। स्कूल की किताबों से ज्यादा उन्हें सिनेमा हॉल की सीटें याद थी। वह आईने के सामने खड़े होकर डायलॉग बोलते,
हीरो की नकल करते और अपने अंदाज में कहते हम अपनी लाइन खुद बनाते हैं। उनके आदर्श थे दिलीप कुमार और राज कपूर। उन्हें देखकर ही उनके भीतर एक्टिंग का कीड़ा जन्म ले चुका था। लेकिन जैसे ही पिता को पता चला कि बेटा एक्टर बनना चाहता है। घर में मानो भूचाल आ गया। डॉक्टर का बेटा जोकर बनेगा। इतने बड़े खानदान का लड़का फिल्मों में तमाशा करेगा। पिता ने साफ मना कर दिया ना फॉर्म पर साइन करेंगे ना इजाजत देंगे। लेकिन किस्मत को कौन रोक पाया है? भाई लक्ष्मण आगे आए। उन्होंने अभिभावक बनकर फॉर्म पर साइन किए और शत्रुघ्न सिन्हा पहुंच गए पुणे के [संगीत] फिल्म इंस्टिट्यूट। वहीं से शुरू हुआ उनका असली संघर्ष। कोर्स पूरा करने के बाद जब वह काम मांगने निकले तो हर दरवाजे से एक ही जवाब मिला तुम्हारा चेहरा हीरो के लायक नहीं विलेन भी मुश्किल है। यह शब्द किसी भी इंसान को तोड़ सकते थे लेकिन उन्होंने इसे अपनी ताकत बना लिया। उसी इंस्टट्यूट में उनका एक दोस्त था जो देव आनंद का रिश्तेदार था। उसकी सिफारिश पर शत्रुघ्न की मुलाकात सीधे देव आनंद से हुई। देव आनंद ने उन्हें अपनी फिल्म प्रेम पुजारी में छोटा सा रोल दे दिया। हालांकि फिल्म रिलीज होने में वक्त लगा लेकिन इसी दौरान उन्हें मनोज कुमार की फिल्म साजन में भी एक छोटा किरदार मिल गया और 1969 में रिलीज हुई साजन उनकी पहली रिलीज फिल्म बन गई। कहानी अभी शुरू ही हुई थी। [संगीत] जिस लड़के को कभी कहा गया था, चेहरा हीरो के लायक नहीं, वही आगे चलकर हीरो की परिभाषा बदलने वाला था। शुरुआत में उन्होंने अपना नाम स्क्रीन पर एसपी सिन्हा लिखा यानी शत्रुघ्न [संगीत] प्रसाद सिन्हा लेकिन घर से साफ संदेश आया नाम छोटा मत करो पहचान पूरी होनी चाहिए और फिर प्रसाद बीच से हट गया नाम रह गया सीधा [संगीत] सख्त और दमदार शत्रुघ्न सिन्हा नाम छोटा हुआ लेकिन इरादे और बड़े हो गए। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक छोटी भूमिकाएं निभाई। चेतना, रातों का राजा, प्यार ही प्यार, खिलौना। फिल्में आती रही लेकिन पहचान नहीं आई। रोल कभी दो सीन का, कभी 5 मिनट का, कभी भीड़ में खड़े एक चेहरे का। लेकिन साल 1971 में कहानी ने अचानक करवट ली। फिल्म थी मेरे अपने। डायरेक्टर थे गुलजार। इस फिल्म में उन्होंने छेनू का किरदार निभाया। रफ टफ गुस्सैल लेकिन करिश्माई बस यही था वह पल डायलॉग हिट किरदार हिट और शत्रुघन सिन्हा पहली बार भीड़ से अलग दिखने लगे। लोग कहने लगे यह विलेन कुछ अलग है। धीरे-धीरे उन्हें नेगेटिव रोल मिलने लगे। लेकिन कमाल यह हुआ कि लोग उन्हें नफरत से नहीं पसंद से देखने लगे।
भारी आवाज, लंबा कद, आंखों में आग। थिएटर में जब वह एंट्री लेते, तालियां बजती थी। वह शायद पहले ऐसे विलेन बने जिसके लिए दर्शक सीटियां बजाते थे। साल 1969 से 1976 तक उन्होंने 60 से ज्यादा फिल्मों में काम कर लिया। लेकिन ध्यान दीजिए एक भी फिल्म में वह मेन हीरो नहीं थे। फिर एंट्री होती है एक नए निर्देशक की सुभाष घई। वह अपनी पहली फिल्म बना रहे थे और उन्होंने रिस्क लिया छोटे-मोटे विलेन को हीरो बनाने का रिस्क। फिल्म थी कालीचरण। पहली बार शत्रुघ्न सिन्हा हीरो बने। पहली बार उन्हें रोमांस करने का मौका मिला। पहली बार गाने गाए और पहली बार दर्शकों ने उन्हें लीडिंग मैन के रूप में स्वीकार किया। उनकी हीरोइन थी रीना रॉय और यहीं से शुरू हुई वह कहानी जिसने आगे चलकर बॉलीवुड में हलचल मचा दी। [संगीत] कालीचरण सुपरहिट रही और एक ही रात में तीन लोगों की किस्मत बदल गई। [संगीत] सुभाष घई, शत्रुघ्न सिन्हा और रीना रॉय। इसके बाद साल 1978 में आई फिल्म विश्वनाथ और इस फिल्म ने शत्रुघ्न सिन्हा को एटीट्यूड का बादशाह बना दिया। यह डायलॉग आज भी लोग दोहराते हैं। यह सिर्फ फिल्म नहीं थी यह इमेज बिल्डिंग थी। इसके बाद उन्होंने सुनील दत्त के साथ काम किया। फिल्म में दोनों की टक्कर सिर्फ हाथों की नहीं डायलॉग्स की भी थी। [संगीत] एटीट्यूड अपने चरम पर था। उसी दौर में वह नजर आए अमिताभ बच्चन के साथ। फिल्म थी काला पत्थर। साथ में शशि कपूर भी थे। लेकिन असली मुकाबला था अमिताभ बनाम शत्रुघ्न सिन्हा। स्क्रीन पर दुश्मनी, डायलॉग की भिड़ंत और वो आइकॉनिक चाय वाला सीन। दोनों एक दूसरे से बेहतर साबित होने की होड़ में थे। लेकिन कहते हैं इस फिल्म के दौरान जो ऑन स्क्रीन टकराव हुआ वो धीरे-धीरे ऑफ स्क्रीन भी असली हो गया। दोस्ती की जगह ले ली ईगो [संगीत] ने और यहीं से शुरू हुई वह दुश्मनी जिसने सालों तक सुर्खियां बटोरी लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। विलेन से हीरो बनने वाला यह शॉर्टगन अब स्टार बन चुका था। लेकिन असली धमाका अभी बाकी था रीना रॉय के साथ रिश्ता। साल था 1979 और पर्दे पर फिर गूंजा एक नाम शत्रुघ्न सिन्हा। फिल्म थी [संगीत] गौतम गोविंद। इसमें वह पूरी तरह बिहारी बाबू बनकर छा गए। [संगीत] उनका लहजा, उनका अंदाज ऐसा लगता था जैसे मुंबई नहीं सीधे बिहार की गलियों से कोई हीरो उठकर आया हो। डायलॉग्स में देसी ठसक [संगीत] थी और दर्शकों को यही असलीपन भा गया। कुछ लोगों को तो सच में लगा यह बॉलीवुड फिल्म है या भोजपुरी टच देने वाली देसी कहानी। उसी साल आई एक और बड़ी फिल्म जानी [संगीत] दुश्मन। आज भी इसे 70 की सबसे चर्चित मल्टीस्टारर फिल्मों में गिना जाता है। [संगीत] इस फिल्म में भी शत्रुघ्न सिन्हा का एटीट्यूड अलग ही लेवल पर था। उनकी हीरोइन थी रीना रॉय। रीना रॉय उस दौर की ग्लैमर क्वीन थी और दोनों की जोड़ी पर्दे पर आग लगा देती थी। फिल्म हिट रही और शॉर्ट गन का स्टारडम और मजबूत हो गया। फिर आई बॉम्बे 405 माइल्स। इसमें उनके साथ थे विनोद खन्ना। दोनों की केमिस्ट्री, दोस्ती और टकराव ने फिल्म को खास बना दिया। आलोचकों ने भी माना शत्रुघ्न अब सिर्फ एटीट्यूड नहीं परफॉर्मेंस भी दे रहे हैं। इसके बाद आई शान साथ में थे अमिताभ बच्चन और विलन साकाल [संगीत] यानी कुलभूषण खरबंदा। जब-जब अमिताभ और शत्रुघ्न साथ आए, स्क्रीन पर एक अलग ही बिजली दौड़ती थी। शान भले शुरुआत में उम्मीद के मुताबिक ना चली हो लेकिन समय के साथ यह कल्ट बन गई। फिर आई दोस्ताना। आज भी शायद ही कोई होगा जिसने इसका गाना बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा ना सुना हो। अमिताभ और शत्रुघ्न की जोड़ी ने दोस्ती को नई पहचान दी। फिल्म सुपरहिट रही और दोनों की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री दर्शकों के दिल में बस गई। फिर साल 1981 में वह दिखे क्रांति में, जिसे मनोज कुमार ने बनाया था। देशभक्ति से भरी इस फिल्म में उनका किरदार दमदार था। फिर आई नसीब, एक और मल्टीस्टारर, एक और ब्लॉकबस्टर। इस फिल्म का गाना आज भी हर दौर में बसता है। [संगीत] नसीब फिल्म ने साबित कर दिया शत्रुघ्न सिन्हा अब इंडस्ट्री के अस्थाई सितारे बन चुके हैं। फिर 1984 में आई बा और बदनाम, फिर माटी मांगे खून। इन फिल्मों में उनका वही तेवर, वही रब, वही डायलॉग बाजी। [संगीत] कभी धर्मेंद्र से टकराव, कभी राज बब्बर के साथ तीखी नोकझोंक। लेकिन अब एक बदलाव दिखने लगा था। जो एटीट्यूड पहले उनकी पहचान था, वही धीरे-धीरे ओवर शैडो करने लगा। लोग कहने लगे यह किरदार बोल रहा है या शत्रुघ्न खुद। उनकी स्क्रीन पर्सनालिटी इतनी मजबूत हो चुकी थी कि [संगीत] किरदार और असल शख्सियत में फर्क मिटने लगा। एक खास बात जो उन्हें सबसे अलग बनाती है। [संगीत] वह पहले बड़े बॉलीवुड स्टार थे जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की कोशिश की। [संगीत] बिहारी बाबू जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने अपनी जड़ों को सलाम किया। देसी अंदाज, भोजपुरी टच और बिहारी स्वाभिमान। दोस्तों, कहते हैं समय किसी के लिए नहीं रुकता। अब वह लीड हीरो से धीरे-धीरे कैरेक्टर रोल्स की ओर बढ़ने लगे। इल्जाम, [संगीत] खुदगर्ज, लोहा इन फिल्मों में उन्होंने पिता, भाई या सशक्त सहायक किरदार निभाए। साल 1987 में आई आग ही आग एक बार फिर धर्मेंद्र के साथ टक्कर उनका डायलॉग आज भी याद किया जाता है। इसके बाद धर्म युद्ध जैसी फिल्मों में उन्होंने फिर साबित [संगीत] किया कि उनकी आवाज और मौजूदगी आज भी भारी पड़ती है। यहां तक कि सुनील दत्त जैसे सीनियर पर भी। लेकिन अब कहानी एक नए मोड़ की तरफ बढ़ रही थी। स्टारडम, एटीट्यूड, सफलता सब कुछ था। लेकिन पर्दे के पीछे रिश्तों की उलझने, अमिताभ से बढ़ती दूरी और रीना रॉय के साथ निजी जिंदगी का तूफान। साल 1989 स्टारडम बरकरार था और नाम था शत्रुघ्न सिन्हा। इस साल वो बने बिल्लू बादशाह के बादशाह। फिर आई कानून की आवाज जहां उनका तेवर वही पुराना, दमदार और दबंग था। इसके बाद साया में उन्होंने पूनम ढिलो के साथ रोमांस किया, फिल्म चली, गाने पसंद किए गए और यह साफ हो गया कि उम्र बढ़ने के बावजूद उनकी स्क्रीन प्रेजेंस कम नहीं हुई थी। उन्होंने गोविंदा के साथ आखिरी बाजी की। फिर आई गोला बारूद जो व्यवसायिक रूप से सफल रही। इसके बाद जख्म हमसे ना टकराना, शहजादे, विरोधी, रणभूमि, [संगीत] औलाद के दुश्मन जैसी कई फिल्में आई। कुछ हिट, कुछ फ्लॉप। लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा की मौजूदगी हर फिल्म में भारी रहती थी। [संगीत] इसके बाद साल 1994 में वह दिखे बेताज बादशाह में। सामने थे अपने अनोखे अंदाज के लिए मशहूर राजकुमार। दोनों के बीच डायलॉग बाजी ऐसी थी कि दर्शक सीटियां बजाने लगे। दो शेर एक ही स्क्रीन पर और दोनों पीछे हटने को तैयार नहीं। फिर साल 1995 में वह बने शाहरुख खान के पिता फिल्म जमाना दीवाना में। [संगीत] फिल्म का म्यूजिक लोकप्रिय हुआ लेकिन बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक कमाल नहीं दिखा पाई फिल्म। फिर 1996 में वह नजर आए सैफ अली खान के पिता के रूप में तू चोर मैं सिपाही में।
फिल्म में सब कुछ मसालेदार था लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। अब शत्रुघ्न सिन्हा पूरी तरह कैरेक्टर रोल्स की ओर बढ़ चुके थे। [संगीत] 2004 में मल्टीस्टारर ऑन मैनेट वर्क में उन्होंने अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी के साथ काम किया। फिर 2010 में वह दिखे रक्त चरित्र में साथ [संगीत] थे विवेक ओबरॉय। यहां उनका किरदार राजनीतिक पावर से भरा हुआ था और उन्होंने उसे पूरी ताकत से निभाया। फिर 2015 में उनकी पुरानी फिल्म [संगीत] दो चेहरे रिलीज हुई जो सालों तक अटकी रही और बिना शोर के आकर चली भी गई। 2018 में आखिरी बार वह दिखे देओल परिवार की फिल्म यमला पगला दीवाना फिर से में। करीब 200 से ज्यादा फिल्मों का सफर एक ऐसी पहचान जो अलग थी, दमदार थी और खामोश कहकर भी शोर मचा देती थी। दोस्तों जब शत्रुघ्न सिन्हा नए-नए थे तब उन्हें बी आर चोपड़ा की फिल्म इत्तेफाक ऑफर हुई लेकिन कहानी पसंद आ गई राजेश खन्ना को और रोल चला गया उनके पास। शत्रुघ्न को गहरा झटका लगा। उन्होंने कसम खा ली अब बी आर चोपड़ा के साथ काम नहीं करेंगे। बाद में धुंध ऑफर हुई लेकिन गुस्से में उन्होंने मना कर दिया। रोल गया डेनी डेंगजोपा को और वह रातोंरात छा गए। तब जाकर शत्रुघ्न को एहसास हुआ इंडस्ट्री में ईगो का नुकसान खुद को ही होता है। दोस्तों एक दौर ऐसा भी था जब अमिताभ बच्चन संघर्ष कर रहे थे और शत्रुघ्न कई फिल्मों में उन पर भारी पड़ रहे थे। काला पत्थर की शूटिंग के दौरान दोनों के बीच [संगीत] खटास बढ़ गई। स्क्रीन पर जो टकराव दिखा वह असल जिंदगी में भी उतर आया। कहते हैं कई बड़े प्रोजेक्ट्स में दोनों की प्रतिस्पर्धा चर्चा का विषय बन गई थी। [संगीत] समय के साथ दूरियां और बढ़ी। यहां तक कि इंडस्ट्री के बड़े आयोजनों में भी दरार साफ दिखी। हालांकि बाद के वर्षों में दोनों ने सार्वजनिक तौर पर रिश्ते सामान्य दिखाए। लेकिन उस दौर की कड़वाहट लंबे समय तक सुर्खियों में रही। दोस्तों, फिल्म हीरा में उन्होंने काम किया था। आशा पारिक और सुनील दत्त के साथ सेट पर गलतफहमी हुई। [संगीत] किसी ने बात बढ़ा दी और मामला मीडिया तक पहुंच गया। युवा शत्रुघ्न ने गुस्से में बयान दे दिया। बाद में यह विवाद सालों तक चर्चा में रहा था और [संगीत] सबसे खास बात उनके चेहरे का वो गहरा निशान जिसे लोग स्टाइल समझते थे। असल में बचपन की [संगीत] शरारत का नतीजा था। अपनी आत्मकथा एनीथिंग बट खामोश में उन्होंने बताया बचपन में सेविंग की नकल करते हुए ब्लेड से चेहरा कट गया। घाव भर गया लेकिन निशान जिंदगी भर साथ रहा। कभी-कभी वह आईने में खुद को देखकर दुखी भी होते थे। उन्हें लगता था यही निशान उन्हें हीरो बनने से रोक रहा है। लेकिन वही निशान आगे चलकर उनकी पहचान बन गया। दोस्तों, फिल्म इंस्टट्यूट के दिनों में उनकी मुलाकात हुई पूनम से जो बाद में बनी पूनम सिन्हा। [संगीत] दोस्ती, फिर प्यार और शादी की इच्छा। जब रिश्ता लेकर परिवार गया तो शुरुआत में हिचकिचाहट हुई लेकिन प्यार जीत गया। साल 1980 में दोनों ने शादी कर ली। आपको बता दें शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा के घर तीन बच्चों ने जन्म लिया। दो बेटे लव और कुश और एक बेटी सोनाक्षी सिन्हा जो आगे चलकर बॉलीवुड की जानीमानी अभिनेत्री बनी। दोस्तों शत्रुघ्न सिन्हा पहले से पूनम सिन्हा से प्रेम करते थे। लेकिन फिल्म कालीचरण के दौरान उनकी नजदीकियां उनकी सह कलाकार रीना रॉय से भी बढ़ी। रीना रॉय और शत्रुघ्न सिन्हा की जोड़ी पर्दे पर बेहद लोकप्रिय हुई और निजी रिश्तों को लेकर भी
लंबे समय तक चर्चाएं होती रही। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों के बीच गहरा लगाव था। [संगीत] साल 1980 में शत्रुघ्न सिन्हा ने पूनम से विवाह कर लिया। इसके बाद भी रीना रॉय के साथ उनके रिश्तों को लेकर खबरें आती रही। हालांकि इन निजी बातों की सच्चाई क्या थी यह कभी आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं हुआ। बाद में रीना रॉय ने पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान से शादी कर ली। दोस्तों, जब सोनाक्षी सिन्हा फिल्म इंडस्ट्री में आई तो कुछ लोगों ने उनकी शक्ल को लेकर बेवजह तुलना शुरू कर दी। मीडिया में तरह-तरह की अफवाहएं भी उड़ी [संगीत] लेकिन इन बातों को पूनम सिन्हा और रीना रॉय दोनों ने सिरे से खारिज किया। शत्रुघ्न सिन्हा ने हमेशा इन चर्चाओं पर चुप्पी साधे रखी। सच्चाई क्या है या परिवार का निजी विषय है और सार्वजनिक [संगीत] तौर पर कोई प्रमाणित तथ्य इन अफवाहों का समर्थन नहीं करता है। [संगीत] सोनाक्षी सिन्हा ने अपनी पसंद से शादी की। हर व्यक्ति को अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार है और यह एक निजी निर्णय होता है। परिवारों में मतभेद होना असामान्य नहीं है। लेकिन समय के साथ रिश्ते अपने संतुलन खोज लेते हैं। दोस्तों, फिल्मी दुनिया में सफलता के बाद शत्रुघ्न सिन्हा ने राजनीति में कदम रखा। उन्होंने 1980 के दशक में भारतीय जनता पार्टी से जुड़कर सक्रिय राजनीति शुरू की। वे बिहार से सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में मंत्री पद भी संभाला। बाद में 2019 में उन्होंने बीजेपी छोड़कर [संगीत] इंडियन नेशनल कांग्रेस ज्वाइन की। इसके बाद उनकी राजनीतिक दिशा में बदलाव देखने को मिला और वे अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में भी रहे। दोस्तों, शत्रुघ्न सिन्हा ने टीवी पर भी काम किया और कई मंचों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। [संगीत] उन्हें 2003 और 2007 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। लगभग 200 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और बेबाक अंदाज से अपनी पहचान बनाई। फिल्मों में उनका एक डायलॉग आज भी याद किया जाता है। खामोश और सच में उनके इस एक शब्द ने पूरे दौर को खामोश कर दिया। दोस्तों, अगर आपको शत्रुघ्न सिन्हा की यह कहानी पसंद आई हो, तो वीडियो को लाइक करें और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें ताकि यह अनकही कहानी और भी लोगों तक पहुंच सके। ऐसी ही दिलचस्प और अनसुनी बॉलीवुड कहानियों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। मिलते हैं अगले वीडियो में एक और सितारे की अनकही कहानी के साथ। तब तक आप अपना ख्याल रखिए, खुश रहिए और देखते रहिए हमारा चैनल। धन्यवाद। हम फिर मिलेंगे अगले वीडियो में।