हो सकता हो आपको सुनने में थोड़ा अजीब लगे मगर शत्रुधन सिन्हा को भारतीय जनता पार्टी में शामिल कराने के प्रस्ताव पर अटल बिहारी वाजपेयी पहले दिन से नाखुश थे। इसके पीछे शत्रुधन सिन्हा से वाजपेयी की कोई व्यक्तिगत रार या दुश्मनी हो ऐसा नहीं था। शत्रुधन सिन्हा की अदाकारी के कायल थे वाजपेयी। उनकी फिल्म कालीचरण वाजपेयी की सबसे फेवरेट फिल्म हुआ करती थी। शत्रुजन सिन्हा खुद व्यक्तिगत साक्षात्कारों में बताते हैं कि वाजपेयी हमेशा उन्हें कालीचरण कह के ही संबोधित किया करते थे कि आइए आइए कालीचरण जी।
इतनी पसंद थी वाजपेयी को उनकी फिल्म। मगर क्या था वाजपेयी को ये सिनेमाई चमक धमक और सितारा हैसियत के दम पर सियासत में आने वाले सितारे जरा रास नहीं आते थे। उन्हें यह सियासत के अवमूल्यन का प्रतीक लगता था। यही वजह थी कि जब आडवाणी के जैक के दम पर शत्रुधन सिन्हा भारतीय जनता पार्टी में आने में कामयाब हो गए, तब भारतीय जनता पार्टी में आने के बाद वाजपेयी ने उन्हें जो सबसे पहला मिशन सबसे पहला काम सौंपा था, वो था भारतीय जनता पार्टी के पितृ पुरुष कहे जाने वाले नानाजी देशमुख और मदन लाल खुराना जैसे दिग्गज भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के पास जाकर एक सियासी प्रशिक्षण शिविर लेने का ताकि वो अब जब सियासत में आ ही गए हैं तो सिनेमा पर सियासत को वरीयता देना सीख सके।
मगर तारीख गवाह है। शत्रु बाबू ने वो वरीयता कभी नहीं दी सियासत को। और इसका सबूत शत्रुबाबू खुद बताते हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें अपनी सरकार में काबीना मंत्री का पद दिया था। तब काबीना मंत्री का पद देते वक्त वाजपेयी ने शत्रुधन सिन्हा को स्पष्ट रूप से समझाइश दी थी। कहा था कि आप वो पहले फिल्मी सितारे हैं जिन्हें किसी सरकार में काबीना मंत्री का पद दिया जा रहा है। इसीलिए अब इस पद की गंभीरता का ख्याल रखिएगा और फिल्मों की शूटिंग वूटिंग वगैरह से जरा थोड़ा दूरी बनाइएगा।
मगर शत्रु बाबू ने स्पष्ट रूप से वाजपेयी के उस आदेश की अवहेलना करते हुए अपनी ऑन फिल्म की पूरी की पूरी शूटिंग मंत्री बनने के बाद की। और हद तो तब हो गई जब अटल बिहारी वाजपेई ने अपने आदेश की इस कदर अवहेलना करने के बाद शत्रु पर अनुशासनात्मक कारवाई के तहत उन्हें काबिना मंत्री से नजरअंदाज करना शुरू किया तो शत्रु बाबू वाजपेयी पर दबाव बनाने लगे। माने अपनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी पर सवाल खड़े करने के मौके ढूंढने लगे। कभी जॉर्ज फर्नांडिस के मसले को लेकर, कभी ममता बनर्जी के इस्तीफे के मसले को लेकर लगातार अपनी ही सरकार को मीडिया में घेरने लगी। अपनी बच्ची के बर्थडे की पार्टी में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को निमंत्रित कर लिया।
अटल बिहारी वाजपेयी के बजाय वाजपेयी परोक्ष दबाव बनाने की खातिर। ये वो चंद शत्रु बाबू की चुनिंदा हरकतें हैं जिन हरकतों के चलते अटल बिहारी वाजपेयी और शत्रु बाबू में कभी नहीं बनी। मगर इतना सब कुछ होने के बावजूद यकीन मानिए अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी ख्वाबों में भी नहीं सोचा था कि शत्रु उनके साथ ऐसा करेंगे कुछ ऐसा जो उन्हें जिंदगी भर का दर्द दे जाएगा। यकीन मानिए वाजपेयी की जिंदगी की सबसे बड़ी टीस सबसे बड़ा दर्द उन्हें शत्रुधन सिन्हा ने दिया था। ये बात हम नहीं कह रहे हैं। दैनिक भास्कर नवभारत टाइम्स द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस जैसे तमाम विश्वसनीय मीडिया संस्थानों की रिपोर्टें कह रही हैं।
जिन रिपोर्टों के मुताबिक अटल बिहारी वाजपेयी के 55 बरस के सफरनामे में अगर एक कोई सियासत की कड़वी याद अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी जिंदगी की आखिरी सांस तलक सालती होगी तो वो याद शत्रु बाबू ने उन्हें तोहफे के तौर पे दी थी। यकीन मानिए ये वो याद थी जिसे याद कर वाजपेयी अपनी नज़रों में शर्मसार हो जाया करते थे। ये वो याद थी जिसने वाजपेयी से उनका गुरूर छीन लिया था। ये वो याद थी जो वाजपेयी के कलेजे में उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बनकर उनकी जिंदगी की आखिरी सांस तक दफन थी। अब ये याद शत्रु बाबू ने उन्हें कैसे दी थी? क्या है इस याद के पीछे की सारी कहानी? मगर एक दिक्कत है।
इसे जानने के लिए आपको हमारे साथ सफर करना पड़ेगा। आज से करीब 35 वर्ष पहले का क्योंकि यह कहानी शुरू होती है वर्ष 1991 में बिहार की राजधानी पटना के उस ऐतिहासिक गांधी मैदान से जिस ऐतिहासिक गांधी मैदान में अटल बिहारी वाजपेयी की एक रैली थी जिस रैली में जाहिराना तौर से भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं का हुजूम था भाजपा के परचम लहर रहे थे मंच पर भाजपा के नेताओं का जमावड़ा वाजपेयी के पीछे लगा हुआ था जिन नेताओं में शत्रु बाबू का नाम भी शुमार था मगर शत्रु बाबू रैली में नहीं आई। जिसके बाद दायराना तौर से जब तय समय सीमा गुजरने लगी तो भारतीय जनता पार्टी के तमाम साथी नेताओं ने कहा कि अब शत्रु जी अभी नहीं आए हैं तो चलिए रैली ऐसे ही शुरू कर ली जाए। तो उसके बाद रैली में एक-एक कर वक्ताओं के मंच पर आने और भाषण देने का वो कार्यक्रम शुरू हुआ।
जाहिरात तौर से अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के सबसे वरेण्य पुरुष थे। प्राण पुरुष थे। स्टार वक्ता थे। तो वह सबसे आखिर में ही भाषण दिया करते थे। और यह रवायत आज की नहीं 50 सालों की थी। जब भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई थी ना तब भी वाजपेयी सबसे आखिर में भाषण दिया करते थे। तो वाजपेयी आराम से बैठे थे। एक-एक कर वक्ता आ रहे थे। भाषण देकर जा रहे थे। साथ ही सारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को ये उम्मीद भी थी कि शायद शत्रु बाबू भी आ जाए।
मगर शत्रुबाबू नहीं आए और एक-एक कर तमाम वक्ता भाषण देकर वापस कुर्सी पर बैठ गए और केवल और केवल अटल बिहारी वाजपेयी की बारी बची। तो तमाम भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि वाजपेयी जी अब शत्रु जी नहीं आए हैं तो आप भाषण दीजिए। रैली समाप्त कर देते हैं। किसी काम में फंस गए होंगे। जाहिरात ना तौर से वाजपेयी ने भी मौके की नजाकत भांपी और मंच पर खड़े हुए और अपने चिर परिचित मनमोहनी अंदाज में आंख मंद कर पूरी तन्मयता के साथ भाषण देना शुरू ही किया था वाजपेयी ने कि अचानक वाजपेयी की तंद्रा टूटती है क्योंकि अचानक से वाजपेयी के कानों में कार्यकर्ताओं का कुछ शोर सा मालूम होता है।
वाजपेयी आंख खोलकर बगल में देखते हैं तो देखते हैं कि शत्रु बाबू अब मंच से सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर चढ़ रहे हैं। जाहिराना तौर से पहले पहले तो वाजपेयी की भुकटी वहीं तन गई इस अनुशासन हीनता पे कि अब आप आ रहे हैं मंच पर। मगर यकीन मानिए उस बखत तलक भी वाजपेई को तनिक एक भी अंदाजा नहीं रहा होगा जो उनके साथ आने वाले वक्त में उसी मंच पर घटने वाला था। क्योंकि शत्रु बाबू जैसे ही सीढ़ियां फटफटा के चढ़ते हुए मंच पर चढ़े सामने खड़े हुए शत्रु के समर्थक इतना हो हल्ला हुलड़ करने लगे कि भारतीय जनता पार्टी के प्राण पुरुष कहे जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी माइक पर अक खड़े हुए थे वो अपना भाषण पूरा ही नहीं कर पा रहे थे। चुपचाप खड़े हुए थे क्योंकि कार्यकर्ता इतना शोर कर रहे थे। अब सामान्य शिष्टाचार क्या होता है कि अगर कोई कनिष्ठ नेता वह भी इतना कनिष्ठ जो चंद वर्ष पहले ही भारतीय जनता पार्टी में आया है वह अगर मंच पर लेट आया है और पार्टी के प्राण पुरुष कहे जाने वाले वंदनीय वरेण्य नेता अपना भाषण पूरा कर रहे हैं तो वो हल्ला और हुल्लड़ मचाते अपने समर्थकों को तत्काल शांत करेगा और वरेण्य नेता से क्षमा प्रार्थना कर अपना स्थान लेगा। मगर भास्कर की रिपोर्ट कहती है कि शत्रु बाबू ने ऐसा कुछ नहीं किया। माइक पर अटल बिहारी वाजपेई अवाक किंग कर्तव्य विमूढ़ खड़े थे और शत्रु बाबू हो हल्ला हुलड़ करते अपने समर्थकों का हाथ जोड़कर अभिवादन स्वीकार कर रहे थे मुस्कुराते हुए जिससे शत्रु के समर्थकों का उत्साह और बढ़ा और देखते ही देखते चंद मिनटों के भीतर आलम यह हो गया कि पार्टी के सबसे बड़े प्राण पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी माइक पर किंग कर्तव्य विमूढ़ अभागक खड़े हैं और सामने गांधी मैदान में क्या नारा गूंज रहा है? देश का नेता कैसा हो? बिहारी बाबू जैसा हो। आप यकीन मानिए पीछे बैठे हुए भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के मुंह खुले के खुले थे। मीडिया कर्मी आवाक खड़े थे। अटल बिहारी वाजपेयी को तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्योंकि उनके 55 बरस के सफरनामे में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि वाजपेयी जैसा वक्ता माइक पर खड़ा हो और जनता उसे सुनने को ना तैयार हो। आप समझ सकते हैं वाजपेयी के कलेजे में कैसी कुलबुलाहट हुई होगी उस वक्त। मतलब वो अटल बिहारी वाजपेई जिनके भाषणों के मुरीद विपक्षी नेता हुआ करते थे। जिनके भाषणों को सुनने के लिए लोग बसों से किलोमीटरों का सफर तय कराया करते थे।
वो वाजपेई माइक पर ऐसे किंग कर्तव्य विमूढ़ अवाक मुद्रा में खड़े रहेंगे और सामने जनता उनकी बात सुनने को नहीं तैयार होगी। यकीन मानिए भास्कर अपनी रिपोर्ट में लिखता है कि इन तमाम सुरते हालों से वाजपेयी के दिल में इतनी बेचैनी उठी थी उस वक्त कि हर वक्त शांत रहने वाले वाजपेयी अपना आपा खो बैठे थे और वाजपेयी ने सामने खड़ी हुई भीड़ को लगभग डपटते हुए जोर से माइक से कहा था जानता हूं आपको लग रहा होगा यह मंच बिहारी बाबू के लिए है मगर बिहारी बाबू से पूछ लीजिए वो यहां सिर्फ अटल बिहारी की वजह से हैं। यह मंच अटल बिहारी के लिए है। यकीन मानिए वाजपेयी ने यह टिप्पणी इतने तीखे अंदाज में दी थी कि शत्रु बाबू मौके की नजाकत भांप गए और तत्काल मंच पर ही वाजपेयी से क्षमा प्रार्थना करने में लग गए कि वाजपेयी जी क्षमा कर दीजिए ये ऐसा है वैसा है
वैसा है और जैसे ही शत्रु बाबू ने गंभीर प्रतिक्रियाएं दी अपने समर्थकों को तत्काल समर्थक भी शांत हुए वाजपेयी ने अपना भाषण भी पूरा किया मगर भास्कर नव भारत टाइम्स इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू जैसे तमाम समाचार पत्रों में लिखी गई रिपोर्टें बताती हैं कि वाजपेई यह एक वाक्या ता उम्र कभी नहीं भुला सके क्योंकि वाजपेयी ही क्या शायद अटल बिहारी वाजपेयी को जानने वाला कोई भी शख्स कभी ख्वाबों में कल्पना नहीं कर सकता है कि शब्दों के इस जादूगर को कभी अपने शब्द कहने के लिए भी इतना संघर्ष करना पड़ेगा लोग उसके शब्दों को सुनना नहीं चाहेंगे।
कोई सोच सकता है कि अटल बिहारी वाजपेई अपना भाषण देने के लिए माइक पर खड़े होंगे और जनता उन्हें सुनने से इंकार कर देगी। इससे बड़ा अपमान किसी वक्ता का नहीं हो सकता है और कम से कम अटल बिहारी वाजपेई जैसा वक्ता इस अपमान का अधिकारी तो कतई नहीं था। इस बात से आप सहमत हैं या नहीं कमेंट सेक्शन में कमेंट करके जरूर बताइएगा। बाकी वाजपेई और शत्रु बाबू का यह किस्सा आज यहीं तलक