बहू कैसी हो? पत्नी कैसी हो? इन सवालों के जवाब में शायद एक चीज आपको हमेशा सुननेको मिले और वो यह कि मेरे मां-बाप की सेवा करें। उनका ख्याल रखें। शादीशुदा लड़कियों के लिए सासससुर की इज्जत उनके प्रति प्रेम को कई चीजों से जोड़ दिया जाता है। सिर पर पल्लू से लेकर मायके जाने के लिए परमिशन लेने तक कई मामलों में ऐसा भी देखा जाता है कि पति नौकरी के चलते मशरूफ है तो सेवा बहू के हिस्से आती है।
पति के हिसाब से यहlउनकी पत्नी का फर्ज है और सासससुर की उम्मीद भी यही होती है कि बेटी से ज्यादा बहू ख्याल रखे और इन्हीं तमाम चीजों को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट की एक अहम टिप्पणी सामने आई है। दरअसल हाल ही में एक मामले में सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने शादीशुदा महिला के अधिकारों को लेकर बेहद अहम टिप्पणियां की हैं हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी पति अपनी पत्नी को घर का काम करने या अपने माता-पिता की देखभालके लिए मजबूर नहीं कर सकता ना ही उस पर हुक्म चला सकता है।
कोर्ट ने सवाल उठाए कि महिलाओं के मायके जाने जैसी छोटी-छोटी चीजों के लिए भी उन्हें ससुराल वालों से इजाजत लेने की जरूरत क्यों पड़ती है? यह पूरा मामला क्या था और हाईकोर्ट की ओर से कौन सी अहम टिप्पणियां की गई बताएंगे आपको डिटेल में।
दरअसल मजदूर का काम करने वाले एक शख्स ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इससे पहले फैमिली कोर्ट ने उन्हें अपनी अलग रह रही पत्नी और बेटे को हर महीने ₹9000 का मेंटेनेंस देने का आदेश दिया था। हालांकि पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके कहा कि उनकी पत्नी घर में काम नहीं करती। उनके माता-पिता की देखभाल नहीं करती और बिना इजाजत के बार-बार अपने मायके चली जाती है।
वहीं पत्नी के आरोप थे कि पति शराब पीने और जुए की आदि है और ससुराल में उनके साथ अक्सर मारपीट होती है। हाईकोर्ट ने पति की लगाई क्लास। इस मामले की सुनवाई कर रही थी जस्टिस चिल्लाखुर सुमलथा।
जस्टिस चिला सुमलथा की एकल पीठ ने पति की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें फटकार लगाई। कोर्ट की ओर से कहा गया कि पति की बातों से लगता है कि वह खुद को मालिक और पत्नी को अपना गुलाम समझता है। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि एक महिला को अपने ही माता-पिता के घर जाने की इच्छा पूरी करने के लिए ससुराल के हर सदस्य की इजाजत लेने की जरूरत क्यों महसूस कराई जाती है। पीठ ने कहा कि माता-पिता की देखभाल करने की पहली जिम्मेदारी उनके बेटे या बेटे की होती है ना कि बहू या दामाद की।
कोर्ट ने कहा कि महिला को अपने करियर, पैसे और जीवन से जुड़े फैसलेलेने का पूरा मौलिक अधिकार है। पति अपनी इच्छाओं के मुताबिक जीने के लिए पत्नी पर दबाव नहीं बना सकता। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुमलथा ने कहा शादी किसी महिला की व्यक्तिगतस्वतंत्रता, उसकी इच्छा और उसके फैसले को नियंत्रित करने या उस पर हुक्म चलाने का लाइसेंस नहीं है। माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी उनके अपने बेटे या बेटे की होती है। बहू या दामाद की नहीं। किसी महिला को अपने ही माता-पिता के घर जाने के लिए ससुराल के हर सदस्यसे अनुमति लेने की जरूरत क्यों होनी चाहिए?
हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी का ससुराल छोड़कर जाना पूरी तरह वाजिब था। कोर्ट ने कहा कि पति की मानसिकता पत्नी को नियंत्रित करने वाली है। फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए 9000 के भरण पोषण के आदेश में किसी भी बदलाव से इंकार करते हुए हाईकोर्टlकी ओर से इस याचिका को खारिज कर दिया गया।
हाईकोर्ट का यह आदेश वाकई समाज की मानसिकता पर सवाल खड़े करता है। जब एक बहू से यह एक्सपेक्टेशनlकी जाती है, तवकको की जाती है कि वो सासुर का ख्याल रखें।
इस एक्सपेक्टेशन में इस उम्मीद में कोई बुराईlनहीं है। यह स्टेटमेंट कहने के लिए तो बहुत आम है, लेकिन इसमें पुरुषों की गहरी अभिलाषा दिखाई देती है। सोचिए आपने ऐसे कितने मामले देखे होंगे जिसमें बहू का सासससुर की देखभाल ना करना झगड़े की वजह बना हो। आप अपने परिवार में ही गौर कीजिए। [संगीत] कई मामलों में तो पति काम करने के लिए दूसरे शहर दूसरे देश में है और पत्नी को परिवार की देखभाल के [संगीत] लिए माता-पिता के घर में छोड़ दिया गया और वह भी पत्नी की इच्छा के खिलाफ घर के चलन के नाम पर पत्नी को यह बताया जाता है कि कहीं भी जाने के लिए कोई भी डिसीजन लेने के लिए आपको घर के बड़ों की परमिशन चाहिए। फिर चाहे वह बात पत्नी के अपने ही घर अपने मायके ही जाने की क्यों ना हो।