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सचिन पिलगांवकर का घिनौना सच अपनी ही बेटी के साथ की ऐसी गंदी हरकत, जानकार कलेजा कांप जाएगा।

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क्या होता है जब वह बेटी जिसे आपने अपनी सगी औलाद से भी ज्यादा प्यार दिया हो वही आपकी सबसे बड़ी दुश्मन बन जाए। कैसे एक पवित्र बाप बेटी का रिश्ता बॉलीवुड के इतिहास की सबसे गंदी कंट्रोवर्सी में बदल गया। और आखिर क्यों तीन दशक पुरानी इस खौफनाक गलती की कीमत आज उनकी सगी बेटी श्रेया पिलगामकर को चुकानीपड़ रही है। दोस्तों बॉलीवुड की इस चकाचौंध भरी दुनिया में जो दिखता है वह अक्सर पूरा सच नहीं होता। और जो सच होता है वह इतना करवा होता है कि उसे पचा पाना आम इंसान के बस की बात नहीं होती।

आज हम एक ऐसी ही कहानी के पन्नों को पलटने जा रहे हैं जो शुरू तो हुई थी एक बेहद इमोशनल और खूबसूरत रिश्ते से लेकिन जिसका अंत इतना भयानक हुआ कि उसने एक पूरे परिवार की रातों की नींद उड़ा दी। यह कहानी किसी फिल्म स्लैम की स्क्रिप्ट नहीं है.

बल्कि यह भारतीय सिनेमा के उस दिग्गज कलाकार की जिंदगी का सबसे बड़ा और काला सच है जिसे पूरी दुनिया सचिन पिलगामकर के नाम से जानती है। बिना उसे रंग लगाए गाड़ी हां देन दे। इस पूरी दास्तान की जड़े समझने के लिए हमें उस दौर में चलना होगा जब सचिन पिलगावकर कामयाबी के उस मुकाम पर खड़े थे जहां पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं होती। महज 4 साल की नन्ही उम्र में जब बच्चे बोलना और खिलौनों से खेलना सीखते हैं तब सचिन ने मराठी फिल्म हां मांझा मार्ग एकला से अपने फिल्मी सफर का आगाज किया था। उस मासूमियत और अदाकारी का जादू ऐसा चला कि उन्हें बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का नेशनल अवार्ड मिला और खुद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस नन्हे फनकार को अपनी गोद में उठाकर सम्मानित किया था।

उस दिन से शुरू हुआ यह सफर रुकने का नाम नहीं ले रहा था। बचपन के उस मुकाम से निकल कर जब सचिन जवानी की दहलीज पर पहुंचे तो उन्होंने हिंदी सिनेमा में वो मुकाम बनाया जिसे आज भी मील का पत्थर माना जाता है। शोले का वो मासूम अहमद या फिर नदियां के पार का वो भोला भाला चंदन सचिन ने हर किरदार में अपनी रूह फूंक दी थी। हिंदी मराठी और भोजपुरी सिनेमा पर राज करने वाले सचिन के पास शोहरत, दौलत और इज्जत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन जिंदगी का असली रंग तब खिला जब साल 1984 में मराठी फिल्म नवरी मिले नवरियाला के सेट पर उनकी नजर बेहद हसीन और मासूम सुप्रिया सबनिस पर पड़ी। 27 साल के सचिन और महज 16 17 साल की सुप्रिया के बीच परवान चढ़ी यह मोहब्बत अगलेही साल यानी 1985 में एक खूबसूरत शादी के बंधन में बंध गई।

कामयाबी सचिन के कदम चूम रही थी और दोनों का वैवाहिक जीवन किसी हसीन ख्वाब की तरह गुजर रहा था। लेकिन किस्मत का फलसफा भी कितना अजीब है कि वह किसी को भी मुकम्मल जहान नहीं बखशती। शादी के कई साल गुजर जाने के बाद भी उस बड़े और आलीशान बंगले के आंगन में किसी नन्हे बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। बाहर की दुनिया में तालियों की कड़कड़ाहट थी। लेकिन चार दीवारी के भीतर एक गहरा चुभने वाला सन्नाटा तैरता रहता था। उस [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] दौर में सचिन के एक बेहद करीबी दोस्त हुआ करते थे कुलदीप मखानी जिन्हें कई लोग राजीव मखीजा के नाम से भी जानते थे। राजीव लंदन में एक रेस्टोरेंट का कारोबार संभालते थे और उनके सपने भी सचिन की तरह ही बहुत ऊंचे थे। दोनों दोस्तों ने मिलकर फिल्म प्रोडक्शन की दुनिया में तहलका मचाने की सोची और किट्टू फिल्म्स नाम की एक प्रोडक्शन कंपनी की नींव रखी।

लेकिन माया नगरी का यह दस्तूर रहा है कि यहां रात जितनी रंगीन होती है सुबह उतनी ही बेरहम साबित हो सकती है। अचानक कारोबार में ऐसा घाटा हुआ कि किट्टू फिल्म्स कर के गहरे दलदल में धंसती चली गई। लेनदारों का दबाव और दिवालिया होने का डर इस कदर बढ़ा कि राजीव मखीजा के सामने भारत छोड़कर लंदन भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

लेकिन इस अफरातफरी और भागमभाग के बीच राजीव अपने पीछे छोड़ गए अपनी 3 साल की मासूम सी बेटी करिश्मा को। करिश्मा की मां लंदन में बेहद बीमार और लाचार थी। और राजीव अपनी ही नन्ही बेटी को किसी अजनबी हॉस्टल में लावारिसों की तरह छोड़ने की तैयारी कर रहे थे। जब यह खबर सचिन और सुप्रिया के कानों तक पहुंची तो उनका संवेदनशील दिल अंदर तक कांप गया। जिस घर में खुद औलाद की तड़प हो वो घर किसी दोस्त की 3 साल की मासूम बच्ची को हॉस्टल के कमरों में कैसे सड़ने दे सकता था। सचिन और सुप्रिया ने बिना एक पल गवाए यह फैसला किया कि वह करिश्मा को अपने घर लाएंगे और अपनी सगी औलाद की तरह सीने से लगाकर पालेंगे। लेकिन यहीं पर उनसे जिंदगी की वह सबसे बड़ी सबसे घातक भूल हो गई। उन्होंने भावनाओं के सैलाब में बहकर करिश्मा को अपना तो लिया लेकिन कानून की अदालत में जाकर कभी कोई लीगल अडॉप्शन नहीं कराया। ना कोई कोर्ट का स्टैंप लगा ना किसी सरकारी कागज पर दस्तखत हुए। यह रिश्ता पूरी तरह से जज्बातों, भरोसे और इंसानियत की कच्ची डोर पर टिका हुआ था।

शुरुआती दिनों में सब कुछ किसी परियों की कहानी जैसा जादुई लग रहा था। सूने पड़े बंगले में जब नन्ही करिश्मा के कदमों की आहट और हंसी गूंजी तो सचिन और सुप्रिया को लगा कि जैसे [संगीत] उन्हें भगवान ने सब कुछ दे दिया हो। सचिन ने इस लाडली को एक राजकुमारी की तरह हर ऐशो आराम बख्शा। इतना ही नहीं अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म आत्मविश्वास में उन्होंने इस नन्ही परी को बेबी करिश्मा के नाम से पर्दे पर लॉन्च भी कर दिया। उस दौर की फिल्मी पत्रिकाओं में सचिन और सुप्रिया की इस दरियादिली के कसीदे पढ़े जाने लगे।

इसी दौर के बीच 25 अप्रैल 1989 को पिलगांवकर परिवार में एक और बड़ा चमत्कार हुआ। सुप्रिया ने अपनी बायोलॉजिकल बेटी श्रेया पिलगांवकर को जन्म दिया। अब घर में दो बेटियां थी। एक वो जिसे उन्होंने दिल से अपनाया था और दूसरी वो जो उनके अपने खून का हिस्सा थी। सचिन और सुप्रिया के लिए यह खुशियों का चरम दौर था। लेकिन जैसा कि अक्सर परिवारों में देखा जाता है एक नई पैदाइश ने उस छत के नीचे असुरक्षा और तुलना के ऐसे बीज बो दिए जो वक्त के साथ एक जहरीला दरख्त बनने वाले थे। प्रिंट मीडिया के उस दौर में पत्रकारों ने बिना किसी कानूनी जांच पड़ताल के यह लिखना शुरू कर दिया कि सचिन पिलगांवकर ने करिश्मा को कानूनी रूप से गोद ले लिया है।

जनता के दिमाग में यह बात पत्थर की लकीर की तरह बैठ गई कि करिश्मा उनकी अडॉप्टेड बेटी है। सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन 90 के दशक के शुरुआती सालों में अचानक एक ऐसी आंधी आई जिसने इस पूरे परिवार के होश उड़ा दिए। लंदन से अचानक करिश्मा के सगे पिता राजीव मखीजा वापस लौटे जिन्हें सचिन ने कभी अपने भाई जैसा माना था। एक दिन बिना किसी सूचना, बिना किसी लंबी बातचीत और बिना किसी रजामंदी के राजीव अपनी बेटी करिश्मा को सचिन के घर से लेकर लंदन के लिए रवाना हो गए। सचिन और सुप्रिया जब घर लौटे तो बिस्तर खाली था। खिलौने बिखरे पड़े थे और जिस बच्ची को उन्होंने अपने कलेजे का टुकड़ा बनाया था वो गायब थी।

यह कोई मामूली जुदाई नहीं थी। यह सचिन के आत्मसम्मान और उनकी भावनाओं पर सीधा खंजर घोंपने जैसा था। जिस पिता ने अपनी बच्ची को बेसहारा छोड़ दिया था, वह अचानक आकर उसे एक झटके में कैसे छीन सकता था? गुस्से, बेबसी और तड़प में सचिन ने एक ऐसा कदम उठा लिया जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री [संगीत] को हिला कर रख दिया। उन्होंने अपने ही दोस्त और करिश्मा के सगे पिता पर सीधे किडनैपिंग का मुकदमा ठोक दिया। पूरे बॉलीवुड में यह खबर आग की तरह फैल गई कि एक सुपरस्टार ने एक सगे बाप पर अपनी ही बेटी को किडनैप करने का आरोप लगाया है। लेकिन कानून की अदालत जज्बातों से नहीं बल्कि दलीलों और दस्तावेजों से चलती है। अदालत की दहलीज पर जब यह मामला पहुंचा तो सचिन के पैरों तले से जमीन खिसक गई। करिश्मा के पिता ने साफ कर दिया कि सचिन के पास बच्ची के कोई कानूनी अडॉप्शन पेपर्स हैं ही नहीं।और जब खुद बच्ची के बयानों ने अदालत को बताया कि कोई किडनैपिंग हुई ही नहीं थी। करिश्मा अपने सगे वालिद के साथ अपनी मर्जी से गई थी। तो अदालत के सामने सचिन का वो मुकदमा ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। वो कानूनी जंग तो हार ही चुके थे।

लेकिन उससे कहीं ज्यादा वो अपनी उस ममता की जंग हार गए थे जिसे उन्होंने सालों तक पाला था। उन्होंने अपने इस गहरे जख्म को दुनिया की नजरों से छुपाने की कोशिश की और अपनी सगी बेटी श्रेया की परवरिश में खुद को झोंक दिया। वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा। लंदन की सड़कों पर करिश्मा जवान हो रही थी और इधर मुंबई के स्टूडियोज में सचिन फिर से अपने काम में मशरूफ हो गए। 12 लंबे साल बीत गए। ना कोई फोन कॉल, ना कोई चिट्ठी, ना कोई राब्ता। ऐसा लगा मानो वो बीता हुआ कल किसी बुरे ख्वाब की तरह हमेशा के लिए खत्म हो चुका है।

लेकिन तकदीर के खेल अभी बाकी थे। साल 2000 के दशक में लगभग 12 साल की एक लंबी खामोशी के बाद करिश्मा मखानी एक बार फिर मुंबई की सरजमी पर कदम रखती हैं। वो अब कोई नन्ही बच्ची नहीं थी। बल्कि बॉलीवुड में हीरोइन बनने का ख्वाब अपनी आंखों में संजोई थी। और हैरानी की बात देखिए कि जिस चौखट को 12 साल पहले छोड़ा गया था शोहरत की तलाश में करिश्मा ने वापस उसी चौखट की घंटी बजाई। वो सीधा सचिन और सुप्रिया के घर पहुंची। सचिन और सुप्रिया चाहते तो उसी पल दरवाजा बंद कर सकते थे। लेकिन उन्होंने एक बार फिर इंसानियत और पुराने रिश्ते का लिहाज रखा। उन्होंने करिश्मा को अपने घर में पनाह दी। करिश्मा लगभग 6 महीने तक उसी छत के नीचे रही। सचिन ने उन्हें इंडस्ट्री में पैर जमाने के लिए रास्ते दिखाने की कोशिश की। लेकिन बॉलीवुड की यह दुनिया सिर्फ किसी के नाम के सहारे नहीं चलती। यहां अपनी काबिलियत का लोहा मनमाना पड़ता है। करिश्मा के ऑडिशंस नाकाम रहे।

उन्हें वह बड़ा ब्रेक नहीं मिल सका जिसकी वो उम्मीद लगाए बैठी थी और धीरे-धीरे उनकी यह मायूसी एक कड़वाहट में बदलने लगी। करिश्मा को लगने लगा कि परिवार का सारा ध्यान सिर्फ उनकी सगी बेटी श्रेया पर है। वो श्रेया के साथ खुद को असहज महसूस करने लगी और उनके दिल में यह एहसास गहराता गया कि इस घर में उनके लिए कभी कोई अपनापन था ही नहीं। असफलता का यह जहर जब हद से ज्यादा बढ़ गया तो करिश्मा 6 महीने बाद अपना बोरिया बिस्तर बांधकर वापस लंदन लौट गई। लेकिन इस बार वह अपने पीछे ऐसा तूफान छोड़ गई जिसने सचिन की पूरी जिंदगी की साख को दांव पर लगा दिया। लंदन पहुंचते ही करिश्मा ने मीडिया के सामने आकर परिवार के खिलाफ बयानों की ऐसी तोपें दाग दी कि पूरी इंडस्ट्री दंग रह गई। उन्होंने इंटरव्यू में सचिन और सुप्रिया पर बेहद गंभीर और निजी इल्जाम लगाए।

करिश्मा का सबसे चुभने वाला आरोप यह था कि सचिन और सुप्रिया ने कभी उन्हें दिल से नहीं अपनाया बल्कि सिर्फ दुनिया के सामने अपनी दरियादिली का ढोंग रचा। उन्होंने दावा किया कि बचपन में भी उन्हें बार-बार यह एहसास कराया जाता था कि वह बाहरी हैं और यहां तक कि उनके पिता ने कोई किडनैपिंग नहीं की थी बल्कि खुद सचिन और सुप्रिया ने उन्हें धक्के मारकर घर से जाने को कहा था। इतना ही नहीं साल 2005 में जब सचिन और सुप्रिया ने मशहूर डांस रियलिटी शो नचबलिए का पहला सीजन जीता था। करिश्मा ने उस जीत पर भी कालिक पोतने की कोशिश की। उन्होंने सरेआम आरोप लगाया कि सचिन और सुप्रिया ने पूरे शो के दौरान जनता की सिंपैथी और वोट बटोरने के लिए उनकी झूठी कहानी का ढिंढोरा पीटा था। उन्होंने कहा कि नचबलिए की वह ट्रॉफी उनकी भावनाओं के व्यापार पर जीती गई थी।

इस बयान ने सचिन की उस बेदाग छवि पर वो कीचड़ उछाला जिसकी उन्होंने कभी सपने में भी उम्मीद नहीं की थी। इन आरोपों के बाद मीडिया में सचिन को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। सचिन चाहते तो टीवी चैनलों पर आकर चिल्ला सकते थे। लेकिन उन्होंने एक लंबे अरसे तक इस बदनामी के घूंट को खामोशी से पिया। वो जानते थे कि मीडिया की इस जंग में कोई जीत नहीं होती। सिर्फ इज्जत की धज्जियां उड़ती हैं। लेकिन अंदर ही अंदर यह आग सुलग रही थी। एक ऐसा दर्द जो नासूर बन चुका था। आखिरकार साल 2013 और उसके बाद अपनी आत्मकथा हाच माझा मार्ग में सचिन ने अपने सीने पर रखा वह भारी पत्थर हटा ही दिया। अपनी इस किताब के पन्नों में उन्होंने उस दौर का जो सच बयान किया उसने कहानी का पूरा पासा ही पलट कर रख दिया। सचिन ने साफ तौर पर लिखा कि कैसे करिश्मा के पिता ने उन्हें दोस्ती के नाम पर करोड़ों का चू चुना लगाया। बिजनेस में भारी आर्थिक गबन किया और जब कर्ज सिर पर आ गया तो अपनी 3 साल की बच्ची को छोड़कर लंदन फरा हो गए। सचिन ने अपनी किताब में उस मानसिक प्रताड़ना का भी जिक्र किया जो उस परिवार ने उन्हें दी थी। उन्होंने बताया कि करिश्मा की मां ने केवल एक कागजी दस्तखत के लिए उन्हें सालों तक ब्लैकमेल किया। सचिन का सबसे गहरा दर्द यह था कि जिस इंसान ने एक अनाथ जैसी स्थिति में छूटी बच्ची को अपनी पलकों पर बिठाया उसी बच्ची और उसके लालची परिवार ने उनकी नेकदिली का यह सिला दिया कि उन पर ही शोषण और ड्रामेबाजी के घिनौने इल्जाम मड़ दिए।

दूसरी तरफ सचिन और सुप्रिया की अपनी सगी औलाद श्रेया पिलगांवकर जिन्होंने शाहरुख खान की फिल्म फैन से लेकर मिर्जापुर में स्वीटी गुप्ता के दमदार किरदार में अपनी अदाकारी का डंका बजाया है। श्रेया ने कभी अपने माता-पिता के नाम का सहारा लेकर काम नहीं मांगा। उन्होंने ऑडिशन दिए, थिएटर में पसीना बहाया और अपनी मेहनत के दम पर बॉलीवुड और ओटीटी पर अपनी एक पहचान बनाई। लेकिन इसी बीच अचानक इंटरनेट पर यह फेक न्यूज़ जंगल की आग की तरह फैलने लगी कि श्रेया पिलगांवकर असल में सचिन और सुप्रिया की सगी बेटी हैं ही नहीं। बल्कि वो वही अडॉप्टेड बेटी हैं। लोग घटिया सवाल पूछते, करिश्मा के पुराने आरोपों को घसीट लाते और श्रेया से उनके मां-बाप के साथ खून के रिश्ते का सबूत मांगने लगते। यह मानसिक प्रताड़ना जब बर्दाश्त की हदें पार कर गई, तो आखिरकार अप्रैल 2024 में श्रेया पिलगांवकर को खुद कैमरे के सामने आकर इस गंदी अफवाह की धज्जियां उड़ानी पड़ी। उन्होंने दो टूक कहा कि यह खबर पूरी तरह से बकवास, झूठी और मनगढ़ंत है।

उन्होंने साफ किया कि वह अपने माता-पिता की बायोलॉजिकल यानी सगी औलाद है। उन्हें किसी ने गोद नहीं लिया है। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि उन्हें पूरी दुनिया को यकीन दिलाने के लिए [संगीत] Instagram पर अपना बर्थ सर्टिफिकेट फ्लैश करने की कोई जरूरत नहीं है। यह सिर्फ एक बयान नहीं था। यह उस बेटी का दर्द था जो यह समझ नहीं पा रही थी कि जिस पाप या जिस गलती का हिस्सा वह कभी रही ही नहीं उसका हिसाब उससे क्यों मांगा जा रहा है। सोशल मीडिया ने कैसे तथ्यों की हत्या करके एक परिवार के सबसे गहरे घावों को दोबारा कुरेद दिया था। यह उसका एक जीता जागता और खौफनाक सबूत था। आज जब हम पीछे मुड़कर इस पूरी दास्तान को देखते हैं तो दिल में कई सवाल उठते हैं। क्या सचिन पिलगामकर की सबसे बड़ी खता यह थी कि उन्होंने एक बेसहारा बच्ची को देखकर अपने दिमाग से नहीं बल्कि अपने दिल से फैसला लिया था। क्या इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि वो रिश्तों को कागजों और कानूनों से ऊपर मान बैठता है? क्योंकि अगर उस दिन सचिन ने कागजी कारवाई पूरी की होती तो शायद करिश्मा का पिता कभी उस तरह अचानक बच्ची को छीन कर नहीं ले जा पाता और ना ही बरसों बाद इस तरह के घिनौने आरोपों की नौबतआती। या फिर इस पूरी बर्बादी की जिम्मेदार करिश्मा थी जो बॉलीवुड में नाकामयाब होने के बाद सचिन के परिवार पर फूट पड़ी। जब इंसान के सपने टूटते हैं तो वह अक्सर अपनी नाकामयाबी का ठीकरा उन कंधों पर फोड़ना चाहता है जिन्होंने कभी उसे सहारा दिया था। पर्दे के पीछे की यह दास्तान हमें यह सिखाती है कि भावनाएं चाहे जितनी भी पवित्र हो अगर उन्हें स्पष्ट सीमाओं और कानूनी सुरक्षा का दायरा ना दिया जाए तो वे किसी दिन खुद आपके गले का फंदा बन सकती हैं।

अब फैसला आपके हाथ में है कि आप इस पूरी कहानी में किसे सही मानते हैं और किसे गलत? क्या सचिन की नेकी ही उनकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई या फिरत्वाकांक्षा और लालच ने एक पूरे परिवार को तबाह कर दिया। अपनी राय जरूर सोचिएगा क्योंकि फिल्मी दुनिया के यह अनकहे सच अक्सर कहानियों से कहीं ज्यादा खौफनाक और गहरे होते

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