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कैसे एक रॉ एजेंट पाकिस्तान की टॉप जर्नलिस्ट बन गई?

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क्या होगा अगर मैं आपको बताऊं कि पाकिस्तान की राजधानी में रहने वाली एक मशहूर महिला पत्रकार की असली पहचान पूरी दुनिया में किसी को नहीं पता थी। ना उसके पड़ोसियों [संगीत] को, ना उसके दोस्तों को, ना उन बड़े-बड़े राजनेताओं को जिनका वो हर रात टीवी पर इंटरव्यू लिया करती थी। और ना ही उन खुफिया अधिकारियों को जो हर शाम उसके साथ बैठकर चाय पीते थे। लेकिन एक दिन उसने कुछ ऐसा देख लिया जिसने पूरे दक्षिण एशिया के न्यूक्लियर पावर बैलेंस को खतरे में डाल दिया। और उसी पल उसकी जिंदगी की उल्टी गिनती शुरू हो गई। इस कहानी की शुरुआत होती है इस्लामाबाद की एक सर्द शाम से। शहर की सड़कें हमेशा की तरह व्यस्त थी। टीवी चैनलों के बाहर ओबी वैस की भीड़ थी और उन्हीं सड़कों पर एक सफेद कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। कार के अंदर बैठी महिला को दुनिया आयशा खान के नाम से जानती थी। एक लोकप्रिय पत्रकार, एक सम्मानित एंकर, एक ऐसा चेहरा जो हर रात लाखों घरों की स्क्रीन पर दिखाई देता था। लेकिन सच सच यह था कि आयशा खान नाम की कोई महिला कभी पैदा नहीं हुई थी। स्क्रीन पर टॉप सीक्रेट की स्टैंप लगी एक डिजिटल फाइल खुलती है। उसका असली नाम कहीं और दर्ज था। एक ऐसी फाइल में जिसे देखने की इजाजत देश के प्रधानमंत्री को भी नहीं थी।

पिछले 15 [संगीत] वर्षों से वो पाकिस्तान में रह रही थी। उसने वहां रिश्ते बनाए, दोस्त बनाए, एक पूरी जिंदगी खड़ी की। लेकिन वो कभी ये नहीं भूल पाई कि वो वास्तव में कौन थी। उसका मिशन था सिर्फ इंतजार करना किसी ऐसे पल का जो शायद कभी आई ही नहीं। और फिर वो पल आ गया। उस रात उसे एक इंक्रिप्टेड गुमनाम कॉल मिली। दूसरी तरफ मौजूद शख्स ने बिना कोई सांस लिए सिर्फ एक वाक्य कहा। अगर तुम्हें सच जानना है तो आज रात बंदरगाह पर पहुंचो। लाइन कट गई। कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं। सिर्फ एक रहस्यमई संदेश। सवाल यह था कि कॉल करने वाला कौन था और वो उसे क्या दिखाना चाहता था? कुछ घंटे बाद वो शहर के बाहरी इलाके [संगीत] में स्थित एक सुनसान पुराने गोदाम के पास पहुंची। वहां ऐसा सन्नाटा था जो रीड में सेन पैदा कर दे। [संगीत] लेकिन गोदाम के अंदर कुछ ऐसा हो रहा था जो सामान्य नहीं था। भारी मिलिट्री कंटेनर लगातार अंदर लाए जा रहे थे। चारों तरफ हाईटेक हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मी तैनात थे। और सबसे अजीब बात उन कंटेनरों पर किसी भी देश का कोई झंडा कोई निशान नहीं था। तभी आयशा की नजर वहां पड़ी एक टेबल पर छूटी फाइल पर पड़ी। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था ऑपरेशन साइलेंट होराइजन। आयशा ने कभी यह नाम नहीं सुना था। लेकिन वो भांप गई थी कि यह कुछ ऐसा है जो पूरे एशिया में युद्ध की आग भड़का सकता है। उसने जेब से फोन निकाला और फाइल की तस्वीरें ले ली। लेकिन यहीं से कहानी एक खौफनाक मोड़ लेती है। क्योंकि जिस क्षण उसने उस फाइल की तस्वीर ली, ठीक उसी क्षण अंधेरे में छिपे किसी और ने भी उसकी तस्वीर ले ली [संगीत] थी। अब वो सिर्फ एक पत्रकार नहीं रही थी। अब वो एक टारगेट बन चुकी थी।

अगली सुबह जब आयशा न्यूज़ स्टूडियो [संगीत] पहुंची तो सब कुछ सामान्य था। मेकअप रूम की वही हलचल, प्रोड्यूसर्स का वही शोर। लेकिन आयशा के अंदर का जासूस जाग चुका था। उसे महसूस हो रहा था कि कोई लगातार उसे देख रहा है। दफ्तर के बाहर एक काली एसयूवी लगातार चक्कर काट रही थी और शाम होते-होते उसके फोन पर दूसरा मैसेज आया। सिर्फ चार शब्द। वे तुम्हें देख रहे हैं। उधर दूसरी तरफ रावलपिंडी के एक बेहद गोपनीय बेस में एक इमरजेंसी मीटिंग चल रही थी। अधिकारियों के सामने टेबल पर कुछ तस्वीरें [संगीत] फेंकी गई। उनमें से एक तस्वीर रात वाले गोदाम के बाहर खड़ी आयशा खान की थी। सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप मच चुका था। क्योंकि ऑपरेशन साइलेंट होराइजन के मेन सर्वर से एक डिजिटल कॉपी गायब थी। किसी ने देश का सबसे बड़ा राज चुरा लिया था। आयशा ने रुकने के बजाय अपनी जांच और तेज [संगीत] कर दी। उसने अंडरग्राउंड सोर्सेस से संपर्क किया। कोर्ट के कर्मचारियों से बात की और जो सच सामने आया उसने उसके होश उड़ा दिए। कंटेनरों में हथियार नहीं थे। उनमें एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक ब्लैकआउट सिस्टम थी जो अगर एक्टिवेट हो जाती तो हजारों किलोमीटर दूर तक किसी भी देश के जहाजों, राडार और सैन्य गतिविधियों को पूरी तरह अंधा यानी कि ब्लाइंड कर सकती थी। एक रात जब आयशा अपने अपार्टमेंट लौटी, तो उसके पैर जम गए। दरवाजा खुला हुआ था। वह धीरे से अंदर गई। कोई चोरी नहीं हुई थी। लैपटॉप, पैसे, गहने [संगीत] सब सुरक्षित थे। लेकिन उसकी मेज पर एक चीज रखी थी। एक पुरानी धूल धूसित फोटो। यह फोटो 15 साल पहले की थी। उसकी असली पहचान के साथ। उस चेहरे के साथ जिसे वो खुद भूल चुकी थी। इसका मतलब साफ था। दुश्मन सिर्फ यह नहीं जानता था [संगीत] कि उसने फाइल चुराई है। दुश्मन यह भी जान चुका था कि वह वास्तव में कौन है और किस देश के लिए काम कर रही है। अगले ही दिन उसकी आशंका सच में बदल गई। उसका सबसे पुराना और भरोसेमंद सोर्स शहर के नाले के पास मरा हुआ पाया गया। यह कोई हादसा नहीं था। यह एक वार्निंग थी।

लेकिन अगर आपको लगता है कि आयशा डर कर भाग गई तो आप उसकी ट्रेनिंग को नहीं जानते। गायब होने से ठीक पहले उसने उस डिलीटेड डाटा को रिकवर कर लिया और उस हार्ड ड्राइव के अंदर उसे मिला एक और नाम प्रोजेक्ट जीरो डे। यह सिर्फ किसी एक देश की साजिश नहीं थी। इसमें सीमा के इस पार और उस पार [संगीत] के कई बड़े राजनेताओं, हथियार माफियाओं और खुफिया एजेंसियों के टॉप अफसरों के नाम शामिल थे। वो लोग जो दिन में टीवी पर आकर अमन और शांति की बातें करते थे वो रात में पूरे क्षेत्र को तबाह करने का सौदा कर रहे थे। हार्ड ड्राइव में एक वीडियो भी था। वीडियो में एक शख्स था जिसका चेहरा धुंधला था। लेकिन आवाज पहचानी हुई थी। उसने कहा आयशा अगर तुम यह देख रही हो तो मैं मारा जा चुका हूं। याद रखना साइलेंट होराइजन [संगीत] सिर्फ एक धोखा है। असली खेल कुछ और है। तभी आयशा का लैपटॉप रेड अलर्ट [संगीत] दिखाने लगा। उसका सिस्टम हैक हो चुका था। होटल के बाहर दो काली गाड़ियां आकर रुकी। बिना किसी वारंट के कुछ लोग अंदर घुसे। आयशा पिछले दरवाजे से सीधे बारिश में कूद गई। उसे एक सीक्रेट कोऑर्डिनेट मिला था। शहर से 80 कि.मी. दूर एक परित्यक्त अबंडेंट फैक्ट्री। सुबह की पहली किरण के साथ जब आयशा उस डरावनी जजर फैक्ट्री के अंदर दाखिल हुई तो वहां के इकलौते रोशन कमरे को देखकर उसके कदम रुक गए। सामने एक शख्स बैठा था जो उसे देखकर मुस्कुराया। म्यूजिक में एक बड़ा शॉक या क्रैश साउंड आएगा। यह चेहरा देखकर आयशा के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह वो शख्स था जो सरकारी रिकॉर्ड्स के मुताबिक [संगीत] आज से ठीक 5 साल पहले एक प्लेन क्रैश में मारा जा चुका था। जिसका अंतिम संस्कार पूरी दुनिया ने टीवी पर देखा था।

वो जिंदा था और अब आयशा के सामने बैठा था। उसने धीरे से एक नई फाइल टेबल पर खिसकाई और अपनी ठंडी आवाज में कहा, “तुम जो खोज रही हो आयशा वो सच्चाई नहीं है। सच्चाई इससे कहीं ज्यादा खतरनाक है। और तुम इस खेल में सिर्फ एक मोहरा हो। इससे पहले कि आयशा कोई सवाल पूछ पाती, फैक्ट्री के बाहर अंधाधुंध गोलियों की गूंज सुनाई दी। किसी ने उन्हें ट्रैक कर लिया था। बाहर बख्तरबंद गाड़ियां आ चुकी थी। लेकिन सबसे बड़ा झटका गोलियां नहीं थी। सबसे बड़ा झटका वो सच था जो उस जिंदा लाश बन चुके आदमी ने अभी-अभी आयशा को बताया था। एक ऐसा विश्वासघात जिसकी उम्मीद आयशा को अपने जीवन में कभी नहीं थी। इसके ठीक 11 दिन बाद पाकिस्तान की सबसे मशहूर पत्रकार की कार इस्लामाबाद के हाईवे पर लावारिस मिलती है। वो गायब हो चुकी थी। लेकिन ठीक उसी वक्त दुनिया के 50 बड़े मीडिया हाउसेस को एक साथ प्रोजेक्ट जीरो डे की फाइल्स मेल हो जाती हैं। पूरे दक्षिण एशिया की सरकारों में भूचाल आ जाता है। कई तख्ता पलट होते हैं। कई अफसर जेल जाते हैं। लेकिन आज भी खुफिया गलियारों में सिर्फ एक ही सवाल गूंजता है। आखिर आयशा खान का क्या हुआ? क्या वो उस रात उस फैक्ट्री से जिंदा बच निकली या वो भी इतिहास के पन्नों में एक गुमनाम साया बनकर रह गई? इसका जवाब शायद आज भी इस्लामाबाद की उन ठंडी हवाओं में छिपा है जिसका सच दुनिया कभी नहीं जान पाएगी।

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