क्या कभी आपने सोचा है कि अगर बॉलीवुड के दो सबसे अडियल, बेबाक और मुंहट सुपरस्टार्स एक ही फिल्म के सेट पर आमने-सामने आ जाएं, तो क्या होगा? दोस्तों, बॉलीवुड के पूरे इतिहास में जब भी अपनी शर्तों पर जीने वाले सबसे बेबाक और अडियल सुपरस्टार्स का नाम लिया जाता है, तो जुबान पर सबसे पहले सिर्फ दो ही नाम आते हैं। राजकुमार और नाना पाटेकर। यह दोनों वो फनकार थे जिनके आगे फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स भी बात करने से पहले 10 बार सोचते थे। एक तरफ थे अपनी गूंजती आवाज और हर किसी को जानी कहकर उसका गुरूर चकनाचूर कर देने वाले राजकुमार तो दूसरी तरफ थे जमीनी हकीकत से निकले बिना समझौते के जीने वाले और अपने बेकाबू गुस्से के लिए मशहूर नाना पाटेकर।
बॉलीवुड के गलियारों में हमेशा यह माना जाता था कि यह दो ऐसे जलते हुए बारूद हैं, जिन्हें अगर एक ही फ्रेम में ला खड़ा किया जाए तो वहां किसी धमाके के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता। लेकिन साल 1993 में जब डायरेक्टर मेहुल कुमार ने फिल्म तिरंगा के लिए इन दोनों अडियल दिग्गजों को एक साथ लाने की ज़िद ठानी तो पूरी इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया था। आज जब अक्टूबर 2026 में नाना पाटेकर इस दुनिया को अलविदा कहकर रुखसत हुए।
वह भी ठीक उस वक्त जब हिंदी सिनेमा राजकुमार के जन्म की 100वीं जयंती मना रहा था। तो इस अनोखे इत्तेफाक ने इन दो सबसे मुंहट, जिद्दी और स्वाभिमानी सुरमाओं के उस टकराव और दोस्ताना रिश्ते को एक बार फिर हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया है। इस पूरी दास्तान को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब बॉलीवुड का मतलब सिर्फ फिल्मों की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि सितारों के भारी-भरकम ईगो और उनके अपने उसूल हुआ करते थे। एक तरफ थे राजकुमार जिनका असली नाम कुलभूषण पंडित था और जो फिल्मों में आने से पहले मुंबई पुलिस में सब इंस्पेक्टर रह चुके थे। उनके अंदर एक पैदाइशी नवाबियत थी जिसे वह पर्दे पर और असल जिंदगी में कभी छुपाते नहीं थे। वो इंडस्ट्री में किसी भी एक्टर को अपने बराबर का नहीं समझते थे और हर किसी को अपने अंदाज में जानी कहकर बुलाते थे।
उनके मिजाज का आलम यह था कि सेट पर बड़े से बड़ा प्रोड्यूसर या डायरेक्टर भी उनसे सीधी आंख मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। उनकी इस बेपरवाह और हैरान कर देने वाली फितरत का सबसे मशहूर किस्सा फिल्म जंगबाज के सेट पर देखने को मिला था। उस फिल्म में उनके साथ काम कर रहे थे उस दौर के उभरते हुए डांसिंग स्टार गोविंदा। एक दिन गोविंदा बड़े चाव से एक बेहद चमकीली और रंग बिरंगी डिजाइनर कमीज पहनकर सेट पर पहुंचे। राजकुमार की नजर जब गोविंदा की उस शर्ट पर पड़ी तो उन्होंने अपने उसी शाही और चुटीले अंदाज में कहा कि जानी तुम्हारी यह शर्ट तो बड़ी शानदार है। इसका कपड़ा बहुत उम्दा लग रहा है। मासूम गोविंदा अपने सीनियर एक्टर के इस तंज को भांप नहीं पाए और उन्हें लगा कि राजकुमार वाकई उनकी तारीफ कर रहे हैं।
गोविंदा ने अपने बड़े भाई और सीनियर का सम्मान करते हुए अगले दिन वही शर्ट पैक करवाई और तोहफे के रूप में राजकुमार की वैनिटी में भिजवा दी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरी यूनिट के पैरों तले से जमीन खिसका दी। राजकुमार ने उस शर्ट को पहनने के बजाय तुरंत कैंची मंगवाई। सबके सामने उस खूबसूरत शर्ट को टुकड़ों में कटवाया, और उसका रुमाल बनवा लिया। अगले ही दिन वो पूरे सेट पर उसी रुमाल से खुलेआम अपनी नाक और हाथ पछते नजर आए। गोविंदा यह देखकर पूरी तरह हक्का-बक्का रह गए। लेकिन राजकुमार को किसी के दिल टूटने से कोई फर्क नहीं पड़ता था। इतना ही नहीं उन्होंने डायरेक्टर मेहुल कुमार को अपने पास बुलाया और बड़ी बेरुखी से पूछा कि यह तुम्हारा हीरो हर वक्त सेट पर नाचता क्यों रहता है? इसे बोलो कि थोड़ा शांत बैठे यह था राजकुमार का वो खौफनाक और बेपरवाह मिजाज जिसके आगे इंडस्ट्री का कोई भी सितारा टिकने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा अंगारे जैसा था और वो थे नाना पाटेकर। नाना किसी राजसी ठाट बाठ या पुलिसिया वर्दी से निकल कर नहीं आए थे। बल्कि उनका बचपन मुंबई की तपती सड़कों पर जेब्रा क्रॉसिंग और फिल्मों के पोस्टर पेंट करते हुए बीता था। उन्होंने मराठी थिएटर के मंच पर अपनी रगों का खून पसीना बहाकर वो पहचान बनाई थी जो किसी स्टारडम की मोहताज नहीं थी। नाना के लिए अभिनय कोई धंधा नहीं बल्कि उनकी आत्मा थी। उन्होंने अपनी फिल्म प्रहार के लिए भारतीय सेना के साथ बाकायदा सबसे कठिन ट्रेनिंग पूरी की थी।
और आगे चलकर टेरिटोरियल आर्मी में मानद कैप्टन का ओहदा हासिल किया था। कारगिल युद्ध के वक्त भी नाना मोर्चे पर जवानों का हौसला बढ़ाने खुद सरहद तक चले गए थे। नाना की सबसे बड़ी खूबी और उनकी सबसे बड़ी कमजोरी एक ही थी और वह था उनका अनियंत्रित गुस्सा और समझौता ना करने वाला स्वाभिमान। वो कैमरे के सामने रत्ती भर भी बनावटीपन बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। और अगर किसी ने उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई, तो वह किसी भी हद तक जा सकते थे। इसका सबसे बड़ा सबूत फिल्म परिंदा के सेट पर दिखा जब उनका टकराव सीधे डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा से हो गया। शूटिंग की शिफ्ट कई घंटों लंबी खींच चुकी थी और नाना की तबीयत बिगड़ने लगी थी।
नाना ने जब पैकअप करने की बात कही तो विधु विनोद चोपड़ा ने नुकसान और बजट का हवाला देकर उन्हें जाने से रोक दिया। बात इतनी ज्यादा बढ़ गई कि गाली गलौज शुरू हो गई और पुलिसकर्मियों के सामने ही दोनों के बीच नौबत हाथापाई तक पहुंच गई। जिसमें विधु विनोद चोपड़ा ने गुस्से में नाना का कुर्ता तक फाड़ डाला था। अब जरा कल्पना कीजिए कि एक तरफ राजकुमार जैसा नवाब जो किसी को इंसान ना समझे और दूसरी तरफ नाना पाटेकर जैसा ज्वालामुखी जो जरा सी चिंगारी पर भड़क जाए। ऐसे दो इंसानों को एक ही फिल्म में साथ लाने का सपना अगर कोई डायरेक्टर देखे तो इंडस्ट्री उसे पागल ही कहेगी।
लेकिन यह पागलपन दिखाया डायरेक्टर मेहुल कुमार ने। जब 90 के दशक की शुरुआत में उन्होंने तिरंगा नाम की एक जबरदस्त देशभक्ति फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी। मेहुल कुमार पहले ही राजकुमार के साथ मरते दम तक और जंगबाज जैसी दो सुपरहिट फिल्में बना चुके थे। इसलिए उनके साथ तालमेल बहुत गहरा था। जैसे ही मेहुल कुमार ने उन्हें ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह की कहानी सुनाई, राजकुमार ने अपनी रॉबीली आवाज में मुस्कुराते हुए कहा कि जानी हम यह फिल्म करेंगे। लेकिन असली महाभारत तो तब शुरू हुई जब फिल्म के दूसरे सबसे ताकतवर किरदार यानी पुलिस इंस्पेक्टर शिवाजीराव वाघले की कास्टिंग की बारी आई।
मेहुल कुमार एक ऐसा एक्टर चाहते थे जो पर्दे पर राजकुमार की भारी-भरकम आवाज और पर्सनालिटी के सामने बौना ना लगे। वो सीधे मद्रास पहुंचे और उन्होंने साउथ के सबसे बड़े थलाइवा रजनीकांत को यह स्क्रिप्ट सुनाई। रजनीकांत को अपनी भूमिका और कहानी बेहद पसंद आई। वह फिल्म करने के लिए लगभग तैयार थे। लेकिन जैसे ही रजनीकांत ने पूछा कि इस फिल्म में ब्रिगेडियर का रोल कौन कर रहा है और मेहुल कुमार ने राजकुमार का नाम लिया तो रजनीकांत के चेहरे का रंग उड़ गया। रजनीकांत ने हाथ जोड़ते हुए फौरन फिल्म ठुकरा दी और साफ कह दिया कि राजकुमार सेट पर बहुत दखलअंदाजी करते हैं और अपने आगे किसी को टिकने नहीं देते। इसलिए वह अपनी इज्जत दांव पर नहीं लगाना चाहते। रजनीकांत के इंकार के बाद मेहुल कुमार पहुंचे पैरेलल और कमर्शियल सिनेमा के संजीदा उस्ताद नसीरुद्दीन शाह के पास। नसीर साहब ने पूरी स्क्रिप्ट ध्यान से सुनी। रोल की गहराई को समझा और स्क्रिप्ट की जमकर तारीफ की।
लेकिन जैसे ही उन्होंने भी राजकुमार का नाम सुना, उन्होंने भी एक पल की देरी किए बिना साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि राजकुमार के साथ काम करने का मतलब है अपने करियर और अपनी शांति को दांव पर लगाना। बॉलीवुड का कोई भी बड़ा और नामी अभिनेता राजकुमार के सामने खड़े होने का जोखिम उठाने को तैयार ही नहीं था। ऐसा लग रहा था कि तिरंगा बनने से पहले ही ठंडे बस्ते में चली जाएगी। निराशा के इस घने अंधेरे में फिल्म के पब्लिसिटी डिजाइनर आत्माराम ने मेहुल कुमार को एक नया सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि आप नाना पाटेकर से बात क्यों नहीं करते? वह एक नया लड़का है। थिएटर से आया है और उसके अंदर एक अजीब सी आग है। उस वक्त तक नाना, परिंदा और प्रहार जैसी फिल्मों से अपनी जबरदस्त छाप छोड़ चुके थे। लेकिन कमर्शियल सिनेमा में उन्हें सोलो हीरो का दर्जा नहीं मिला था। मेहुल कुमार ने रिस्क लेने की सोची और वह सीधे लोखंडवाला में नाना पाटेकर के फ्लैट पर पहुंच गए। मेहुल कुमार ने जब नाना को शिवाजीराव वाघले का बागी और बेखौफ तेवर सुनाया तो नाना की आंखें चमक उठी। नाना को अपना किरदार इतना पसंद आया कि वह खुशी से झूमने लगे। लेकिन जैसे ही नाना ने यह सवाल पूछा कि ब्रिगेडियर का रोल कौन कर रहा है और मेहुल कुमार के मुंह से राजकुमार का नाम निकला नाना का मूड एकदम से बदल गया।
नाना ने तुरंत अपनी चाय का कप नीचे रखा और दो टूक कह दिया कि मेहुल जी मैं यह फिल्म बिल्कुल नहीं कर रहा। राजकुमार की एक्टिंग का स्टाइल और मेरा मिजाज दोनों जमीन और आसमान का फर्क रखते हैं। मेहुल कुमार ने जब बहुत मिन्नतें की और नाना को समझाया कि यह किरदार सिर्फ और सिर्फ उनके लिए बना है तब जाकर नाना पाटेकर ने एक ऐसी ऐतिहासिक शर्त रखी जिसने डायरेक्टर के पसीने छुड़ा दिए। नाना ने अपनी तीखी उंगली उठाकर मेहुल कुमार से कहा कि ठीक है। मैं तिरंगा साइन कर रहा हूं। लेकिन मेरी एक सख्त शर्त है। शूटिंग के दौरान राजकुमार मेरे सीनंस में रत्ती भर भी दखल नहीं देंगे। अगर उन्होंने मुझे कुछ सिखाने की कोशिश की, मेरे डायलॉग में टोकने की कोशिश की या मेरे काम में टांग अड़ाई तो मैं उसी सेकंड सेट छोड़कर चला जाऊंगा और दोबारा कभी वापस नहीं आऊंगा। नाना को एग्रीमेंट पर साइन कराने के बाद मेहुल कुमार की असली अग्नि परीक्षा शुरू हुई। उन्हें अब यह बात राजकुमार को बतानी थी। मेहुल कुमार ने डरते-डरते राजकुमार को फोन लगाया और बताया कि दूसरे हीरो का फैसला हो गया है और वह नाना पाटेकर हैं। यह सुनते ही फोन के दूसरी तरफ से राजकुमार की भारी आवाज गूंजी और उन्होंने नाराजगी से कहा कि जानी तुमने यह क्या कर दिया?
क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? तुम्हें पूरी इंडस्ट्री में वही आदमी मिला। तुम्हें पता नहीं है कि वह सेट पर लोगों को गालियां बकता है। लोगों के साथ मारपिटाई करता है। वह तो बहुत बदतमीज आदमी है। मेहुल कुमार ने बात संभालते हुए कहा कि राज जी आप फिक्र मत कीजिए। लेकिन नाना ने एक शर्त रखी है कि अगर आपने उनके सीन में दखल दिया तो वह वॉक आउट कर जाएंगे। यह सुनते ही राजकुमार के स्वाभिमान को जोर का झटका लगा। कुछ सेकंड की खामोशी के बाद राजकुमार अपने उसी खास नाटकीय अंदाज में हंसे और बोले कि जानी हम किसी के काम में दखल नहीं देते। जब डायरेक्टर ने शॉट ओके कर दिया तो हम कौन होते हैं बोलने वाले? हमारा मिजाज दुनिया जानती है। इस तरह दोनों तरफ से एक दूसरे के प्रति नफरत, शक और सख्त शर्तों के साथ यह तय हुआ कि तिरंगा की शूटिंग शुरू की जाएगी। जिस दिन फिल्म का मुहूर्त हुआ, इंडस्ट्री के कई दिग्गज प्रोड्यूसर्स ने मेहुल कुमार के कान में आकर कहा था, कि तुम अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हो। यह फिल्म एक हफ्ते से ज्यादा नहीं चल पाएगी। सेट पर खून खराबा हो जाएगा और यह प्रोजेक्ट कभी पूरा नहीं होगा। मुंबई के महबूब स्टूडियो में जब पहले दिन शूटिंग शुरू हुई तो ऐसा लग रहा था मानो सेट पर ऑक्सीजन की कमी हो गई हो। चारों तरफ एकदम घोटू सन्नाटा था।
दोनों सितारों के बैठने का इंतजाम सेट के दो अलग-अलग कोनों में काफी दूरी पर किया गया था ताकि वह गलती से भी एक दूसरे से ना टकराएं। शुरुआती हफ्तों में तो सेट पर एक मूक शीत युद्ध यानी साइलेंट कोल्ड वॉर चल रहा था। राजकुमार अपनी कार से उतरते सीधे अपने कमरे में जाते और सिर्फ तभी बाहर निकलते जब लाइट और कैमरा पूरी तरह तैयार होता। वो कैमरे के सामने आते, अपने संवाद बोलते और बिना नाना की तरफ देखे या कोई भी नमस्ते, सलाम किए सीधे अपने कमरे में लौट जाते। उधर नाना पाटेकर का भी यही हाल था। वो अपने हिस्से का शॉट पूरे जुनून और आक्रामकता के साथ देते और एक शब्द बोले बिना अलग कोने में जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाते।
दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं। कोई मुस्कुराहट नहीं बस एक अदृश्य तनाव जो हर पल किसी धमाके की आहट दे रहा था। लेकिन कुदरत ने इस कहानी का क्लाइमेक्स कुछ और ही लिखा था। फिल्म की कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जहां दोनों किरदारों को एक जन्मदिन की पार्टी में एक साथ बैठकर शराब पीनी थी और नाचना था। यह गाना था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का कंपोज किया हुआ और संतोष आनंद का लिखा हुआ ऐतिहासिक ट्रैक पीले पीले ओ मोरे राजा पीले पीले ओ मोरे जानी। इस गाने को मोहम्मद अजीज और सुदेश भोसले ने अपनी बुलंद आवाज से सजाया था। लेकिन इस गाने की शूटिंग के सामने सबसे बड़ा पहाड़ बनकर खड़े थे खुद नाना पाटेकर। नाना ने अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ सीरियस, थिएटर बेस्ड और संजीदा एक्टिंग की थी। उन्होंने कभी भी हिंदी फिल्मों का वो हल्काफुल्का कमर्शियल नाच गाना नहीं किया था। नाना कैमरे के सामने इस तरह बोतल हाथ में लेकर नाचने के ख्याल से ही अंदर तक कांप रहे थे। वो बहुत ज्यादा असहज महसूस कर रहे थे। उनका पसीना छूट रहा था और उन्हें लग रहा था कि वह कैमरे के सामने जोकर बन जाएंगे। दूसरी तरफ राजकुमार अपनी चिर परिचित ढीली ढाली देह के साथ बिल्कुल बेफिक्र खड़े थे। मानो उनके लिए यह बच्चों का खेल हो।
जैसे ही डायरेक्टर ने एक्शन बोला, दोनों अभिनेताओं के भीतर के मंझे हुए कलाकार ने उनके ईगो को एक झटके में कुचल दिया। सीन की मांग थी कि दोनों को एक दूसरे के गले में हाथ डालना था। एक दूसरे को जाम थमाना था और नशे की मस्ती में झूमते हुए कदम ताल मिलाने थे। जब नाना ने देखा कि राजकुमार कितने सहज अंदाज में उनके साथ तालमेल बिठा रहे हैं तो नाना ने भी अपने सारे संकोच को हवा में उड़ा दिया। नाना [गला साफ़ करने की आवाज़] की बिजली जैसी फुर्तीली ऊर्जा और राजकुमार की शाही अदाकारी ने मिलकर कैमरे के सामने ऐसा करिश्मा पैदा कर दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। जैसे ही डायरेक्टर ने कट बोला, पूरे महबूब स्टूडियो में लाइट मैन से लेकर स्पॉटबॉय और कैमरामैन तक सबने तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट शुरू कर दी कि पूरा हॉल गूंज उठा। उस एक गाने के जादू ने दोनों सितारों के बीच जमी सालों की बर्फ को एक ही पल में पिघलाकर पानी-पानी कर दिया। जो दो लोग पिछले कई हफ्तों से एक दूसरे की तरफ देख भी नहीं रहे थे। वो शॉट खत्म होते ही एक दूसरे की पीठ थपथपाते नजर आए।
इसके बाद तो मानो सेट का पूरा मंजर ही बदल गया। जो नाना पाटेकर कभी राजकुमार की शक्ल नहीं देखना चाहते थे और जो राजकुमार नाना को गालीबाज समझते थे वो दोनों लंच ब्रेक के दौरान अपनी-अपनी वैनिटी छोड़कर सेट पर एक ही टेबल पर बैठकर अपने टिफिन का खाना शेयर करने लगे। उनके बीच फिल्मों, दुनिया की सियासत, थिएटर और जिंदगी के फलसफे पर घंटों तक बातें होने लगी। राजकुमार नाना के अभिनय के समर्पण और उनकी सादगी के मुरीद हो गए और नाना को भी यह समझ आ गया कि राजकुमार की सख्त जुबान के पीछे एक बेहद संवेदनशील और उसूलों का पक्का इंसान छुपा हुआ है। पूरी इंडस्ट्री जो यह मानकर बैठी थी कि यह फिल्म कभी पूरी नहीं होगी, मेहुल कुमार ने उन सभी भविष्यवाणियों को गलत साबित करते हुए महज 6 महीने के रिकॉर्ड समय में तिरंगा की शूटिंग पूरी कर ली। साल 1993 की शुरुआत में जब तिरंगा बड़े पर्दे पर रिलीज हुई तो सिनेमाघरों में मानो सुनामी आ गई। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 50 हफ्तों तक चलकर गोल्डन जुबली का इतिहास रच दिया।
दर्शकों के लिए यह फिल्म किसी जंग के मैदान जैसी थी, जहां हर एक सीन में दो शेर एक दूसरे पर दहाड़ रहे थे। एक तरफ जब राजकुमार अपनी भारी आवाज में कहते थे कि हमारी जुबान भी हमारी गोली की तरह है जो एक बार निकल जाए तो वापस नहीं आती तो पूरा थिएटर सीटियों से गूंज उठता था और दूसरी तरफ जब नाना पाटेकर अपनी लाल आंखें दिखाकर चिल्लाते थे कि मराठा या तो मारता है या मरता है तो दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। तिरंगा की इस आंधी ने डायरेक्टर मेहुल कुमार और नाना पाटेकर के बीच एक ऐसा अटूट रिश्ता बना दिया जो फिल्मों की दुनिया में बहुत कम देखने को मिलता है। मेहुल कुमार ने नाना के अंदर छुपे उस असीम टैलेंट को पहचान लिया था और उन्होंने एक बहुत बड़ा दांव खेलने का फैसला किया। उन्होंने फिल्म क्रांतिवीर की कहानी लिखी और नाना पाटेकर को सोलो लीड हीरो के तौर पर साइन करने का ऐलान कर दिया। उस वक्त मुंबई के सभी फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स ने मेहुल कुमार का कड़ा विरोध किया था। उनका कहना था कि नाना पाटेकर विलेन या साइड रोल में तो अच्छे लगते हैं लेकिन वो अकेले दम पर इतनी बड़ी कमर्शियल फिल्म को हिट नहीं करा सकते। लेकिन मेहुल कुमार अपनी जिद पर अड़े रहे और उन्होंने साफ कह दिया कि प्रताप नारायण तिलक का यह रोल अगर कोई कर सकता है तो वह सिर्फ नाना है।
मेहुल कुमार का यह फैसला सिनेमा के इतिहास का मील का पत्थर साबित हुआ। क्रांतिवीर के क्लाइमेक्स में जब नाना पाटेकर फांसी के फंदे पर खड़े होकर वो ऐतिहासिक भाषण देते हैं जिसमें वह कहते हैं कि आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने तो वो पूरा 4 मिनट का सीन बिना किसी कट के बिना किसी टेलीप्रटर के एक सिंगल टेक में शूट किया गया था। जब फिल्म का प्रीमियर हुआ तो दिलीप कुमार साहब ने मेहुल कुमार के कंधे पर हाथ रखकर कहा था कि नाना पाटेकर अपनी पूरी जिंदगी में अब सिर्फ और सिर्फ क्रांतिवीर के नाम से ही जाने जाएंगे। इस फिल्म ने नाना को नेशनल अवार्ड दिलाया और उन्हें बॉलीवुड के सबसे महंगे और बड़े स्टार्स की कतार में सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। समय का पहिया घूमता रहा और दिसंबर 2024 में फिल्म वनवास के प्रीमियर के दौरान मेहुल कुमार और नाना पाटेकर की आखिरी औपचारिक मुलाकात हुई। अगले दिन दोनों ने एक होटल के कमरे में बैठकर करीब 1 घंटे तक एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट पर चर्चा की।
मेहुल कुमार ने नाना के लिए एक बेहद शानदार कहानी तैयार की थी। जिसका टाइटल उन्होंने ऑफिशियली मिशन तिरंगा रजिस्टर करवा लिया था। नाना को यह कहानी इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने कहा था कि मेहुल भाई साल 2027 में हम इस फिल्म को फ्लोर पर ले जाएंगे और तिरंगा का वही जादू एक बार फिर पर्दे पर जिंदा करेंगे लेकिन कुदरत के लिखे को कोई नहीं टाल सकता। किसे पता था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात साबित होगी। अक्टूबर 2026 में नाना पाटेकर के अचानक चले जाने से मिशन तिरंगा का यह सपना हमेशा के लिए अधूरा रह गया। जब नाना के जाने के बाद मेहुल कुमार की आंखें नम हुई तो उन्होंने रंधे हुए गले से सिर्फ एक बात कही कि नाना पाटेकर की जगह इस पूरी दुनिया में कोई दूसरा इंसान नहीं ले सकता। उनके बिना मिशन तिरंगा का कोई वजूद नहीं है क्योंकि तिरंगा और क्रांतिवीर जैसी फिल्में ऊपर वाला किसी डायरेक्टर से सिर्फ एक ही बार बनवाता है। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ हो जाती है कि राजकुमार और नाना पाटेकर का वो टकराव कोई दो मामूली आदमियों की लड़ाई नहीं थी। वो अपनी कला और अपने उसूलों के प्रति दो अलग-अलग पीढ़ियों के बेइंतहा प्यार और स्वाभिमान की गूंज थी।
जहां राजकुमार ने भारतीय सिनेमा को एक ऐसा शाही अंदाज, ठहराव और डायलॉग डिलीवरी दी जिसकी बराबरी कोई कभी नहीं कर सकता। वहीं नाना पाटेकर ने आम आदमी के दर्द, उसके गुस्से और उसकी असल आवाज को पर्दे पर लाकर चीखना सिखाया। राजकुमार की जन्म शताब्दी के साल में नाना पाटेकर का इस दुनिया को अलविदा कह जाना भारतीय सिनेमा के उस बेबाक और जांबाज दौर के आखिरी पन्ने का बंद हो जाना है। जहां सितारे अपनी शर्तों पर जीते थे। अपनी शर्तों पर काम करते थे और अपनी शर्तों पर ही इतिहास रचते थे।