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मोहमद रफ़ी का गाना सुनकर क्यों रो पड़ीं थी इंदिरा गांधी?

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क्या कोई एक गाना इतना शक्तिशाली हो सकता है कि वह देश की सबसे ताकतवर और सख्त राजनेता को सरेआम फूट-फूट कर रोने पर मजबूर कर दे? क्या किसी की मखमली आवाज में ऐसा जादुई असर हो सकता है कि वह सत्ता के गलियारों की दीवारों को महज 5 मिनट में हमेशा के लिए धराशाई कर दे। और आखिर ऐसा क्या हुआ था कि भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री जिन्हें पूरी दुनिया आगे चलकर आयरन लेडी के नाम से जानने वाली थी, एक गाना सुनते ही अपने जज्बात खो बैठी और उन्होंने भरे कमरे में अचानक चीखते हुए कहा, चुप हो जाइए रफी साहब। अब मैं इससे ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी। दोस्तों मोहम्मद रफी साहब के निधन को आज भले ही लगभग 43 वर्ष से ज्यादा का समय बीत चुका है लेकिन उनकी आवाज का जादू आज भी पूरी दुनिया में करोड़ों दिलों पर राज करता है। आज हम भारतीय सिनेमा और राजनीति के इतिहास के उसी रूह कंपा देने वाले पन्ने को पलटेंगे जिसने एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री को पल भर में फूट-फूट कर रोने पर मजबूर कर दिया था। कहानी की शुरुआत होती है साल 1960 के उस सुनहरे दौर से। जब सिनेमा के पर्दे पर राज कपूर, पृथ्वीराज कपूर और देव आनंद जैसे दिग्गजों की अदाकारी और रोमांस का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा था। उसी दौर में 27 मई 1964 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन की खबर ने पूरे देश को एक गहरे और खामोश सन्नाटे में धकेल दिया था। उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे एक युवा निर्माता सावन कुमार टाक को इस राष्ट्रीय शोक ने बहुत गहरी चोट पहुंचाई। सावन कुमार टाक पंडित नेहरू के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उन्हें उस दिन ऐसा महसूस हुआ जैसे देश का हर एक बच्चा आज पूरी तरह से अनाथ हो गया हो। इसी भारी उथल-पुथल के बीच सावन कुमार टाक ने एक बेहद दुस्साहसिक फैसला लिया और पंडित नेहरू को समर्पित एक फिल्म बनाने का दृढ़ संकल्प कर लिया जिसका नाम उन्होंने रखा नौनिहाल। एक नए निर्माता के तौर पर यह उनका पहला बड़ा कदम था। लेकिन उस जमाने में बिना किसी बड़े बैनर के एक अनाथ बच्चे और दिवंगत राजनेता पर केंद्रित फिल्म बनाना किसी बड़े फाइनेंसियल रिस्क से कम नहीं था। सावन कुमार के पास उस वक्त पैसे नहीं थे। लेकिन उनके भीतर एक आग थी। अपने इस सपने को पर्दे पर उतारने के लिए उन्होंने अपनी ही बहन से ₹25,000 का भारी कर्ज लिया। इतने कम बजट में एक नेशनल लेवल फिल्म बनाने की सोचना ही अपने आप में एक पागलपन था। लेकिन सावन कुमार टाक पीछे हटने वालों में से नहीं थे। उन्होंने इस कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए राज मारब्रोस को फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी। कहानी एक ऐसे मासूम और अनाथ बच्चे राजू के इर्द-गिर्द बुनी गई थी जिसने प्लेग जैसी भयानक महामारी में अपने माता-पिता को खो दिया था और पंचगनी के एक स्कूल के प्रिंसिपल ने उसे पनाह दी थी। मास्टर बबलू द्वारा निभाया गया यह राजू का किरदार जब बड़ा होने लगता है और अपनी तन्हाई से उदास रहने लगता है तो उसे एक ऐसा झूठ बोला जाता है जो आगे चलकर एक ऐतिहासिक दर्द में बदल जाता है। राजू को दिलासा देने के लिए कहा जाता है कि उसका भी इस दुनिया में एक बहुत बड़ा और अपना रिश्तेदार मौजूद है जिसे सब चाचा नेहरू कहते हैं। यह मासूम बच्चा इस मीठे झूठ को ही अपनी दुनिया का सबसे बड़ा सच मान लेता है। जब उसे कहीं से यह भनक लगती है कि उसके वही चाचा नेहरू मुंबई के चौपाटी इलाके में एक भाषण देने आने वाले हैं, तो वह उनसे मिलने की बेताबी में स्कूल से भाग निकलता है। राजू का यह उतार-चढ़ाव भरा मासूम सफर उसे अंततः देश की राजधानी दिल्ली तक ले जाता है। लेकिन नियति का सबसे क्रूर मजाक तो देखिए। वह बच्चा ठीक उसी मनहूस दिन दिल्ली की सड़कों पर पहुंचता है

जिस दिन पंडित नेहरू का वास्तविक अंतिम संस्कार चल रहा होता है। इस भारी और दिल दहला देने वाली कहानी को पर्दे पर जीवंत करने के लिए सावन कुमार ने अपने बेहद सीमित बजट में भी उस दौर के कुछ बेहतरीन और संजीदा कलाकारों को एक साथ लाने का जो चमत्कार किया वह वाकई काबिले तारीफ था। इस फिल्म के जरिए संजीव कुमार जैसे महान अभिनेता ने अपने शुरुआती सफर में एक गंभीर अभिनेता के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाई। संजीव कुमार के साथ-साथ इस फिल्म में रियलिस्टिक एक्टिंग के बेताज बादशाह बलराज साहनी ने भी अनाथालय के प्रिंसिपल की भूमिका निभाई। जिसने फिल्म की कहानी को एक भारी वजन दिया। इंद्रानी मुखर्जी ने उमा नाम की एक बेहद टीचर का किरदार पर्दे पर उतारा। जबकि जगदीप जिन्हें हम अक्सर कॉमेडी कैरेक्टर्स में ठहाके लगाते देखते हैं। उन्होंने एक बहुत सीरियस कवि का किरदार निभाकर सबको चौंका दिया था। इन सभी दिग्गजों की अदाकारी फिल्म को एक अलग ही स्तर पर ले जा रही थी। लेकिन कहानी का असली मसाला और सबसे बड़ा ट्विस्ट तो अभी बाकी था जो सिनेमा के पर्दे के पीछे एक अलग ही पॉलिटिकल और म्यूजिक हलचल पैदा करने वाला था। जब फिल्म की शूटिंग अपने बिल्कुल एंड में पहुंच चुकी थी तब सावन कुमार टाक के मन में एक विचार ने दस्तक दी कि पंडित नेहरू को समर्पित इस फिल्म के क्लाइमेक्स में कुछ ऐसा होना चाहिए जो सीधे पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दे। उन्हें एक ऐसा गाना चाहिए था जो सिनेमा हॉल में बैठे हर दर्शक को ऐसा महसूस कराए मानो खुद एक दिवंगत नेता अपनी जनता को अपना आखिरी संदेश दे रहा हो। उन्होंने इस बेहद मुश्किल काम की जिम्मेदारी उस दौर के मशहूर शायर कैफी आजमी साहब को सौंपी। कैफी आजमी ने पंडित नेहरू की पॉलिटिकल आईडियोलॉजी की गहराई में उतर कर अपनी कलम से कुछ ऐसे बोल लिखे जिन्हें पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उन्होंने लिखा मेरी आवाज सुनो प्यार का राज सुनो जिसे कुछ जगहों पर प्यार का राग सुनो भी कहा जाता है। बोल तो कागज पर उतर चुके थे लेकिन उनमें जान फूंकने और एक ऐसी रूहानी धुन बनाने का काम बाकी था जो सदियों तक याद रखी जाए। यह भारी जिम्मेदारी भारतीय सिनेमा में गजलों के बेताज बादशाह कहे जाने वाले महान संगीतकार मदन मोहन को दी गई। जिनका जन्म 1924 में बगदाद में हुआ था और जो फिल्मों में आने से पहले सेना में भी काम कर चुके थे। मदन मोहन ने इस गीत के लिए एक ऐसी गंभीर उदास और ऑनर कैस्ट्रल धुन तैयार की जो सीधे दिल के तारों को छेड़ती थी। धुन तैयार होते ही सावन कुमार और मदन मोहन दोनों को एक ही पल में यह बात समझ आ गई कि इस गाने को अपनी आवाज देने का सामर्थ्य पूरी दुनिया में सिर्फ और सिर्फ एक ही शख्स में है और वो नाम था मोहम्मद रफी। लेकिन यह वो दौर था जब बॉलीवुड के प्लेबैक सिंगिंग जगत में एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ था। रॉयल्टी के मुद्दे को लेकर सुर साम्राज्य ही लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच एक गहरा मतभेद और विवाद चल रहा था। जिसके चलते इन दोनों दिग्गजों ने कई सालों तक एक साथ कोई भी गीत गाना बंद कर दिया था। इंडस्ट्री खेमों में बंट चुकी थी। लेकिन मदन मोहन की शख्सियत ही कुछ ऐसी थी कि उन्होंने दोनों कलाकारों के साथ अपने रिश्ते कभी खराब नहीं होने दिए। एक बार जब रफी साहब अपने करियर को लेकर कुछ हताश और उदास महसूस कर रहे थे। तब मदन मोहन ने ही उन्हें दिलासा देते हुए उनके लिए तुम जो मिल गए हो। जैसी अमर रचना रची थी। तुम जो मिल गए हो इसी रिश्ते और गहरे विश्वास का नतीजा था कि जब मदन मोहन ने मेरी आवाज सुनो का प्रस्ताव रफी साहब के सामने रखा तो उन्होंने इसे महज एक फिल्म का गाना मानने से साफ इंकार कर दिया। रफी साहब इस गीत की राष्ट्रभक्ति और इसके पीछे की भावना से इतने ज्यादा भावुक हो गए थे कि उन्होंने इसके लिए अपनी फीस लेने से भी साफ मना कर दिया और सिर्फ ₹300 की एक नाम मात्र टोकन फीस पर इस ऐतिहासिक गीत को अपनी जादुई आवाज दी। गाना तो रिकॉर्ड हो गया लेकिन सावन कुमार की असली परीक्षा तो अब शुरू होने वाली थी। सावन कुमार टाक ने फिल्म के क्लाइमेक्स को यादगार बनाने के लिए एक ऐसा एक्सपेरिमेंट करने की सोची थी जिसके बारे में उस वक्त कोई सोच भी नहीं सकता था। उन्होंने तय किया था कि जब सिनेमाघरों में बैकग्राउंड में मोहम्मद रफी का यह दर्द भरा गाना बजेगा तो पर्दे पर किसी अभिनेता को नहीं बल्कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के अंतिम संस्कार के वास्तविक सरकारी फुटेज को दिखाया जाएगा ताकि दर्शक सीधे इतिहास के उस दर्दनाक दिन से जुड़ सकें। लेकिन जैसे ही यह बात बाहर आई, तत्कालीन भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के बेहद सख्त और कड़े नियम उनके सामने एक चट्टान बनकर खड़े हो गए। पंडित नेहरू के निधन के बाद सरकार ने यह कड़ा आदेश जारी किया था कि पंडित जी के नाम उनकी छवि या उनके अंतिम संस्कार के फुटेज का किसी भी कमर्शियल फिल्म में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सरकार को डर था कि कुछ फिल्म निर्माता जनता की भावनाओं को भुनाकर सिर्फ पैसा कमाने की कोशिश करेंगे। इस एक सरकारी आदेश ने अचानक से सावन कुमार टाक की पूरी फिल्म और उनके 25,000 के कर्ज पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया था। बिना इस क्लाइमेक्स के फिल्म की आत्मा ही अधूरी थी। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए थे कि सावन कुमार को अपनी सालों की मेहनत पानी में मिलती हुई दिखाई दे रही थी। इसी बीच फिल्म के निर्देशक राज मार्ब्रोस ने सावन कुमार को एक और सुझाव दिया किक चकि यह फिल्म पंडित नेहरू के महान आदर्शों को बढ़ावा देती है और बच्चों को एक अच्छी प्रेरणा देती है। इसलिए क्यों ना इसे सीधे भारत सरकार से कर मुक्त यानी टैक्स फ्री करवाने की अर्जी दी जाए। सावन कुमार को यह बात जंची तो बहुत, लेकिन वह अच्छी तरह जानते थे कि सिर्फ एक सरकारी दफ्तर में कागज थमा देने से ना तो असली फुटेज इस्तेमाल करने की परमिशन मिलेगी और ना ही फिल्म टैक्स फ्री होगी। नौकरशाही की लाल फीताशाही किसी भी फाइल को सालों साल धूल फांकने के लिए छोड़ सकती थी। ऐसे में सावन कुमार ने एक बेहद दुस्साहसी और चौंकाने वाला फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वह इस मामले पर बीच के किसी भी मंत्री या बाबू से नहीं बल्कि सीधे देश की तत्कालीन शक्तिशाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलकर बात करेंगे। लेकिन बात वही थी कि एक ऐसा निर्माता जिसका इंडस्ट्री में कोई बड़ा रुतबा नहीं था। वह आखिर देश की सबसे ताकतवर महिला तक पहुंचे तो पहुंचे कैसे? सत्ता के वो बंद दरवाजे इतनी आसानी से आम लोगों के लिए नहीं खुलते।

और यहीं पर कहानी में एंट्री होती है एक ऐसे शख्स की जो पर्दे पर तो एक छोटा सा रोल कर रहा था। लेकिन असल जिंदगी में उसका कद बॉलीवुड के किसी भी सुपरस्टार से कहीं ज्यादा बड़ा था। वो नाम था हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय। फिल्म नौनिहाल में हरेंद्रनाथ एक डायरेंज्ड पर्सन का किरदार निभा रहे थे जो समाज की अमानवीयता को दर्शाता था। लेकिन वास्तविक जीवन में वह भारत की मशहूर कांग्रेस नेत्री और भारत की कोकिला कहलाने वाली श्रीमती सरोजनी नायडू के सगे छोटे भाई थे। यही नहीं उनकी पहली पत्नी कमला देवी चट्टोपाध्याय भी एक बहुत बड़ी समाज सुधारक थी। जिन्होंने नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था और पंडित नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। हरिंद्रनाथ खुद अंग्रेजी के कवि, नाटककार, चित्रकार और संगीतकार होने के साथ-साथ पहले लोकसभा चुनाव में निर्दलीय सांसद भी रह चुके थे। नेहरू जी के साथ उनके इतने संबंध थे कि वह अक्सर संसद में अपनी खास हास्य शैली में प्रधानमंत्री पर व्यंग कर लिया करते थे और नेहरू जी उसका कभी बुरा नहीं मानते थे। इंदिरा गांधी हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय को उनके इसी राजनीतिक और पारिवारिक रसूख के कारण बहुत अच्छी तरह से जानती थी और उनका दिल से बेहद सम्मान करती थी। सावन कुमार को हरिंद्रनाथ के इसी रसूख का पता चला और जैसे ही हरिंद्रनाथ ने प्रधानमंत्री कार्यालय में संपर्क किया इंदिरा गांधी उनसे मुलाकात करने के लिए तुरंत राजी हो गई। हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के इन्हीं सफल प्रयासों से आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया जब सत्ता के शिखर और कला के बीच एक आमने-सामने की टक्कर होने वाली थी। प्रधानमंत्री निवास के उस बेहद सुरक्षित और शांत कक्ष में तीन लोग हरिंद्रनाथ के साथ पहुंचे थे। जिनमें निर्माता सावन कुमार टाक, निर्देशक राज मारब्रोस और संगीतकार मदन मोहन शामिल थे। जैसे ही यह लोग इंदिरा गांधी के कमरे में दाखिल हुए, वहां का माहौल बहुत ही सख्त, कड़ा और पूरी तरह से औपचारिक था। हरिंद्रनाथ ने बात की शुरुआत करते हुए कहा कि यह फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं जो चाहते हैं कि इनकी फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया जाए और नेहरू जी के अंतिम संस्कार के फुटेज के इस्तेमाल की आधिकारिक अनुमति भी दे दी जाए। इंदिरा गांधी जो उस वक्त अपने तमाम राजनीतिक कामकाज में बेहद व्यस्त थी, उन्होंने एक कड़क और रूखे अंदाज में जवाब दिया कि ठीक है मैं सोच कर बताऊंगी। यह जवाब सुनते ही सावन कुमार टाक के पैरों तले जमीन पूरी तरह से खिसक गई। वह अच्छे से जानते थे कि राजनीति में सोच कर बताऊंगी का सीधा सा मतलब होता है कि फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। सावन कुमार को लगा कि शायद इंदिरा जी इस फिल्म को मुंबई की कोई आम मसालेदार कमर्शियल फिल्म समझ रही हैं। इसलिए उन्होंने अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर इंदिरा गांधी से हाथ जोड़कर आग्रह किया कि वह एक बार अपना कीमती समय निकालकर पूरी फिल्म देख लें ताकि उन्हें इस कहानी की गहराई और सच्चाई का खुद अंदाजा हो सके। लेकिन सावन कुमार की इस गुजारिश पर इंदिरा गांधी ने कुछ ऐसा कहा जिसने कमरे में मौजूद सभी लोगों की सांसे अटका दी। उन्होंने बेहद स्पष्ट और कठोर लहजे में इंकार करते हुए कहा कि उनके पास 3 घंटे की इतनी लंबी फिल्म देखने के लिए बिल्कुल भी समय नहीं है। बात पूरी तरह से बिगड़ती हुई नजर आ रही थी और ऐसा लग रहा था कि सावन कुमार का सपना उसी कमरे में दम तोड़ देगा। ठीक इसी तनावपूर्ण और नाजुक पल में संगीतकार मदन मोहन ने अपनी कमान संभाली। उन्होंने एक सच्चे कलाकार की दृढ़ता और विनम्रता को अपने शब्दों में पिरोते हुए तुरंत कहा, मैडम अगर आपको अपने पिता पर बनी 3 घंटे की फिल्म देखने का समय नहीं है तो कम से कम 5 मिनट का एक गाना जरूर सुन लीजिए जिसे हमने खासकर सिर्फ उन्हें ही श्रद्धांजलि देने के लिए रचा है। मदन मोहन की इस सीधी बेबाक और भावनाओं से भरी अपील ने इंदिरा गांधी को एक पल के लिए निरुत्तर कर दिया। वो इस छोटी सी गुजारिश को टाल नहीं पाई और आखिरकार गाना सुनने के लिए राजी हो गई। सावन कुमार ने कांपते हाथों से तुरंत अपना टेप रिकॉर्डर चालू किया और फिर उस शांत और गंभीर कमरे में मदन मोहन की रची गई। उस आर्केस्ट्रल धुन के साथ मोहम्मद रफी की वो दर्द भरी रूहानी और जादुई आवाज गूंज उठी। रफी साहब गा रहे थे मेरी आवाज सुनो। प्यार का राज सुनो। यह कोई आम प्लेबैक सिंगिंग नहीं थी। बल्कि मोहम्मद रफी ने इस गीत में इतना गहरा दर्द, इतनी बेबसी और ऐसा ठहराव डाल दिया था कि हर एक शब्द सीधे रूह को चीरते हुए अंदर तक उतर रहा था। जैसे-जैसे वो गाना आगे बढ़ रहा था प्रधानमंत्री कक्ष का वो पूरा सख्त वातावरण किसी रहस्यमई जादू की तरह बदलने लगा था। वो इंदिरा गांधी जो कुछ ही मिनट पहले तक एक बेहद सख्त राजनेता और आयरन लेडी के रूप में पेश आ रही थी। वो अब अपनी कुर्सी पर पूरी तरह से खामोश हो चुकी थी। जब गाने के बोल आए, मैंने एक फूल जो सीने पर सजा रखा था, उसके पर्दे में तुम्हें दिल से लगा रखा था। तो इन पंक्तियों ने सीधा नेहरू जी के उस मशहूर लाल गुलाब की याद दिला दी जो वो हमेशा अपनी अचकन पर सजा कर रखते थे। कैफी आजमी के इन खूबसूरत बोलों ने उस गुलाब को सीधे भारत की जनता के प्रति नेहरू जी के असीम प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया था। रफी साहब की आवाज जैसे-जैसे अपनी ऊंचाइयों और दर्द के चरम को छूने लगी। इंदिरा गांधी की आंखों के ठीक सामने उनके पिता की पूरी छवि किसी फिल्म की तरह उभरने लगी। वो मनहूस दिन, वो धू-धू कर जलती हुई चिता, अपार भीड़ का वो शोर और एक पिता को हमेशा हमेशा के लिए खो देने का वो असहनीय और गहरा दर्द जिसे शायद इंदिरा जी ने एक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अपने सीने में कहीं बहुत गहराई में दबा दिया था। आज रफी साहब की आवाज के झटके से ज्वालामुखी की तरह फूट कर बाहर आ रहा था।

देखते ही देखते उनकी आंखें पूरी तरह से भर आईं। आंसू उनके गालों पर बेकाबू होकर बहने लगे और वह इतनी ज्यादा भावुक हो गई कि अब उनसे उस कुर्सी पर एक पल भी बैठा नहीं जा रहा था। गाना अभी टेप रिकॉर्डर पर चल ही रहा था कि अचानक इंदिरा गांधी ने अपने दोनों हाथों से अपने आंसुओं से भीगे चेहरे को ढक लिया और रंधे हुए बुरी तरह कांपते स्वर में लगभग चीखते हुए बोली, चुप हो जाइए। मोहम्मद रफी साहब, अब मैं इससे ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी। ऐसा कहा जाता है कि इतना कहने के तुरंत बाद इंदिरा गांधी वहां से झटके से उठी और बेहद तेजी से अपने प्राइवेट केबिन के अंदर चली गई। कमरे का भारी दरवाजा धड़ाम से बंद हो गया और अंदर से उनके फूट-फूट कर रोने की दर्दनाक आवाजें बाहर तक आने लगी। बाहर सोफे पर बैठे हरिंद्रनाथ, चट्टोपाध्याय, मदन मोहन और सावन कुमार टाक के चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह पूरी तरह से स्तब्ध, जमे हुए और घबराए हुए थे। उन्हें लगा कि शायद उन्होंने जोश-जोश में कुछ बहुत ही गलत कर दिया है। देश की सबसे बड़ी नेता को इस कदर रुला देना और उनकी पुरानी चोट को इस तरह कुरेद देना उनके लिए किसी बहुत बड़ी मुसीबत का बुलावा हो सकता था। उनके दिमाग में यह खौफ बैठ गया कि अब तो उनकी फिल्म पर हमेशा के लिए पक्का बैन लग जाएगा और हो सकता है कि उन्हें इसी कमरे से सीधे गिरफ्तार भी कर लिया जाए। कमरे में पसरा हुआ वो अगले 10 मिनट का सन्नाटा उनके लिए किसी एक पूरी सदी से कम नहीं था। वो बस एक दूसरे का डरा हुआ चेहरा देख रहे थे और सोच रहे थे कि अब आगे क्या होगा। लेकिन ठीक 10 मिनट के उस जानलेवा इंतजार के बाद प्राइवेट केबिन का दरवाजा खुला और इंदिरा गांधी का सेक्रेटरी बाहर आया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। उसने इन तीनों लोगों की तरफ देखा और एक ऐसा ऐतिहासिक वाक्य कहा जिसने बॉलीवुड और राजनीति के पन्नों पर इतिहास रच दिया। उस सचिव ने शांति से कहा, “आप तीनों लोग अब घर जाइए।” मैडम ने कहा है कि आपका काम हो जाएगा। यह कोई आम राजनीतिक खोखला आश्वासन नहीं

था बल्कि यह उस दर्द और उस कला का सबसे बड़ा सम्मान था जो मोहम्मद रफी की आवाज ने जगाया था। ठीक अगले ही दिन भारत सरकार के उसी सख्त सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से ऐलान कर दिया कि फिल्म नौनिहाल के क्लाइमेक्स में पंडित नेहरू के अंतिम संस्कार के वास्तविक और ओरिजिनल फुटेज के इस्तेमाल की पूरी छूट और अनुमति दी जाती है। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई। सरकार ने इस फिल्म के गहरे महत्व को स्वीकार करते हुए इसे पूरे देश में टैक्स फ्री घोषित कर दिया। यह किसी बड़ी राजनीतिक लॉबिंग, पैसे की ताकत या किसी रसूखदार दबाव की जीत बिल्कुल नहीं थी। यह पूरी तरह से मोहम्मद रफी की उस रूहानी आवाज का जादू था जिसने देश की सबसे कठोर और सख्त प्रधानमंत्री के दिल को भी मोम की तरह पिघला दिया था। सावन कुमार टाक इस घटना से इतने ज्यादा अभिभूत हुए थे कि उन्होंने सालों बाद एक इंटरव्यू में कहा था कि यही वह पल था जब उनके दिल में संगीतकार मदन मोहन के प्रति सम्मान की नीव सबसे ज्यादा मजबूत हो गई थी। जब 1967 में नौनिहाल सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो इसने दर्शकों पर एक अमिट छाप छोड़ी और फिल्म सुपरहिट साबित हुई। संघर्ष कर रहे सावन कुमार रातोंरात एक बेहद सफल फिल्मकार बन गए और उनकी इस क्रिएटिविटी के कारण इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कारों में राष्ट्रपति की ओर से प्रेसिडेंशियल मेंशन से भी सम्मानित किया गया। संजीव कुमार का करियर उड़ान भर चुका था और फिल्म ने हर तरफ तारीफें बटोरी। सावन कुमार टाक की यह शानदार शुरुआत सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रही। नौनिहाल की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद उन्होंने अपने करियर में पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने बाद के वर्षों में गोमती के किनारे जैसी क्लासिक फिल्म का निर्देशन भी किया जो 1972 में आई और महान अभिनेत्री मीना कुमारी की अंतिम फिल्म साबित हुई। इसके अलावा उन्होंने हवस, सौतन और सनम बेवफा जैसी कई बड़ी और ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाकर इंडस्ट्री में अपना दबदबा कायम किया। लेकिन नौनिहाल की वो सफलता और वो

किस्सा उनके पूरे करियर का एक ऐसा गोल्डन पेज बना रहा जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ी। राजनीति और सत्ता की दुनिया अक्सर बहुत कठोर होती है जो नियमों और प्रोटोकॉल के लोहे में लिपटी होती है। इंदिरा गांधी ने भी अपने लंबे राजनीतिक सफर में कई ऐसे कड़े और सख्त फैसले लिए जिन्होंने पूरे इतिहास की धारा ही बदल कर रख दी। लेकिन उस दिन घटे इस वाक्य ने यह साफ तौर पर साबित कर दिया कि उस आयन लेडी के अंदर भी एक ऐसी बेटी है जो अपने पिता की याद में किसी आम इंसान की तरह फूट-फूट कर रो सकती है। जिस सरकारी लालफीता शाही और सख्त नियमों को कोई भी नहीं तोड़ सका था। उसे कला और संगीत के महज 5 मिनट के अंश ने हमेशा हमेशा के लिए ढा दिया। आज मोहम्मद रफी साहब भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं। साल 1980 में उनके निधन के साथ ही संगीत के एक बहुत बड़े युग का अंत हो गया था। लेकिन लगभग 43 से ज्यादा साल बीत जाने के बाद भी उनकी वो मखमली और दर्द भरी आवाज आज भी हमारी हवाओं में, लोगों की यादों में और रेडियो की तरंगों में उसी तरह ताजा है। फिल्म नौनिहाल और उसका यह अमर गीत इस बात का गवाह है कि सच्ची कला कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होती। वह समय और उम्र की सभी सीमाओं को लांघ कर आने वाली कई पीढ़ियों के दिलों पर राज करती है। यह घटना केवल बॉलीवुड का एक दिलचस्प या मसाला किस्सा भर नहीं है बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास का वो स्वर्णिम अध्याय है जहां सिनेमा, संगीत और राष्ट्रवाद एक ही बिंदु पर आकर पूरी तरह से एक हो गए थे। और दोस्तों अगर आपको बॉलीवुड के इन अनकही कहानियों और गहरे राजों को जानना पसंद है तो अभी इस वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन दबाना ना भूलें। ने

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