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जब राजेश खन्ना ने इंदिरा गांधी को दे दी बड़ी चुनौती? फिर….

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में बात 70 के दशक के सुपरस्टार राजेश खन्ना की थी कि 70 के दशक के लिए वह दिन थे जब बिना का एक मशहूर टूथपेस्ट का ब्रांड था रेडियो सिलोन से प्रसारित होने वाला हिंदी फिल्मी गीतों का कम डोंट शो बिनाका गीतमाला रेडियो का सबसे मशहूर शो हुआ करता था जिसके जाने-माने होस्ट थे अमीन सयानी राजेश खन्ना के जादू से यह शुभ भी अछूता नहीं रहा जिस समय उनका सुपर स्टारडम चरम पर था।

अक्सर टॉप 5 में से 12 गीत राजेश खन्ना की फिल्मों के होने लगे थे 1977 में फिल्म दो रास्ते का बिंदिया चमकेगी और 1971 में अंदाज का जिंदगी एक सफर है सुहाना साल की टॉप हित रहे हैं जी हां भाइयों बहनों पहले और दूसरे दोनों पायदान पर राजेश खन्ना के गीत अमीन सयानी के खास अंदाज को बयां करते हुए उनके शो के एक फैन ने कुछ इस तरह उस दौर को याद किया है थे इश्यू के माध्यम से राजेश खन्ना की फिल्मों के गीतों की गूंज सरहद पार तक पहुंचती थी।

1965 के भारत-पाक के बाद भारतीय फिल्में पाकिस्तान में कर दी गई थी 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरा हुआ था जिसने दोनों के रिश्ते में और ज्यादा खटास पैदा की में भारत को विजय के साथ ही बांग्लादेश का जन्म हुआ तो और भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दूसरी बार सत्ता में आई थी और विजय का सेहरा उनके सिर बंधा था इंदिरा गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व को दुनिया भर में मीडिया कवर कर रहा था है।

1971 में मराठी कवि दिलीप चित्रे ने राजेश खन्ना की कामयाबी को परिभाषित करते हुए लिखा अगर भारत में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसका आकर्षण मैं देश के प्रधानमंत्री से भी ज्यादा है तो वह है राजेश खन्ना की पत्रिका रिक्वेस्ट और को इस पत्रिका में छपे इस अनिबद्ध करिश्मा ऑफ राजेश खन्ना ने इस तरह से उस दौर में भारत की दो सबसे मशहूर शख्सियतों को एक ही पायदान पर रख दिया दिलीप चित्रे ने लिखा लाखों भारतीय सिनेमा हॉल्स में घंटों तक कि देखने के लिए लाइन लगाते हैं कि कैसे राजेश खन्ना अपनी मुस्कान के साथ उनका दिल जीतेंगे कैसे हो झूमेंगे कैसे वो अपना गुस्सा दिखायेंगे कैसे फुसफुसाकर उन्हें बिहार के बुलगे जाएंगे या फिर कोई खूबसूरत गीत गुनगुनाते कुछ सुनाई देंगे दिखाई देंगे।

इसी निबंध को बाद में मुंबई यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में रखा गया कि इसी साल एक और हम घटना हुई उस जमाने में बंगाल में राज्य सरकार की स्टेट लॉटरी हुआ करती थी राजेश खन्ना की लोकप्रियता को देखते हुए सरकार को लगा कि अगर लॉटरी का लकी नंबर राजेश खन्ना के हाथों निकलवाया जाए तो लॉटरी को अच्छा प्रमोशन मिलेगा लकी नंबर निकलवाने का पूरा आयोजन विधानसभा के पास मैदान में किया गया और उस जैन राजेश खन्ना ने अपने साथ लेखक जावेद अख्तर को भी लिया ताकि सफर करते हुए कुछ स्क्रिप्ट पर चर्चा हो जाए।

लेकिन जैसे राजेश खन्ना उस मैदान में पहुंचे वहां का माहौल देखकर सन्न रह गए थे के बाद जावेद अख्तर ने याद करते हुए बताया कि मुझे नहीं लगता कि मैंने ऐसा मंजर दोबारा मैंने कभी देखा होगा या देख पाऊंगा राजेश खन्ना को देखते ही 50 हजार लोगों की आवाज एक साथ में के लिए वह एबीसी ज की तरह था वह मंजर अविश्वसनीय था उस दिन बेंगलुरु की सड़कें बिल धुंधली हो गई थी करीब 50 हजार लोग एक शख्स को देखने के लिए एक ही जगह पर राजा के सामने हाजिर लगे इधर राजेश खन्ना

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