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प्रेमानंद महाराज ने बताया अपना बड़ा जीवन मंत्र, इन आदतों को छोड़ने की की अपील, जानकर दंग दंग रह जाएंगे

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क्या आपके पास सब कुछ होने के बाद भी मन कभी खुश नहीं रहता? क्या आप भी सोशल मीडिया पर दूसरों की लाइफ देखकर अपनी जिंदगी से तुलना करने लगते हैं और दुखी हो जाते हैं और क्या सिर्फ एक आदत आपकी सारी खुशियां छीन सकती है? यह सवाल अगर आपके मन में है आज भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादातर लोग अपनी खुशियों से ज्यादा दूसरों की खुशियों पर नजर रखते हैं।

किसी के पास नई कार है, किसी ने नया घर खरीदा है, किसी की शानदार नौकरी लगी है तो किसी की लग्जरी लाइफ है। ऐसे में अक्सर हम अपनी जिंदगी को कमतर समझने लगते हैं। लेकिन संत प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि यही आदत इंसान को सबसे ज्यादा दुखी बनाती है। उन्होंने एक छोटी सी कहानी के जरिए समझाया है कि आखिर क्यों दूसरों को देखकर जीने वाला व्यक्ति कभी सच्ची खुशी नहीं पा सकता है?

तो चलिए वो कहानी भी आपको सुनाते हैं। प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि एक लड़का रोज पैदल स्कूल जाया करता था। एक दिन उसने रास्ते में एक दूसरे बच्चे को साइकिल से जाते देखा। उसे लगा कि अगर उसके पास भी साइकिल होती तो उसकी जिंदगी बेहतर हो जाती। उसने अपने पिता से जिद की और पिता ने प्यार से उसकी इच्छा पूरी कर दी। कुछ समय तक वो साइकिल चलाकर बहुत खुश रहा।

लेकिन एक दिन उसकी नजर [संगीत] एक स्कूटर और फिर मोटरसाइकिल पर पड़ जाती है। अब उसे लगा कि साइकिल में मेहनत करनी पड़ती है। उसे चलाना पड़ता है। जबकि मोटरसाइकिल ज्यादा आरामदायक है। उसने फिर अपने पिता से नई मांग कर दी। पिता ने इस बार भी उसकी इच्छा को पूरा कर दिया और उसे मोटरसाइकिल यानी कि बाइक दिला दी।

लेकिन कहानी यहीं पर खत्म नहीं होती है। एक दिन तेज बारिश में मोटरसाइकिल चलाते समय वो पूरी तरह बारिश के पानी से भीग जाता है। तभी उसने एक बंद कार में बैठे व्यक्ति को आराम से सफर करते देखा। अब उसके मन में कार की इच्छा जाग गई। उसने घर जाकर कहा कि अब वह तभी स्कूल जाएगा जब उसे कार मिलेगी। पिता ने इस बार भी उसकी बात को मान लिया। फिर कुछ दिनों बाद वह कार से जा रहा था कि रास्ते में लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। तभी उसके ऊपर से एक हेलीकॉप्टर उड़ता हुआ उसे दिखाई दिया। उसे लगा कि असली आराम तो इसमें है। वो फिर घर पहुंचा और पिता से हेलीकॉप्टर खरीदने की जिद करने लगा। यहीं पर पिता का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने बेटी को समझाया कि अगर इंसान हर समय दूसरों को देखकर अपनी इच्छाएं बदलता रहेगा तो उसकी चाहतों का कभी भी अंत नहीं होगा। उसकी इच्छाएं खत्म नहीं होंगी। आज साइकिल चाहिए, कल बाइक चाहिए, फिर कार चाहिए और उसके बाद हेलीकॉप्टर चाहिए। ऐसे इंसान को कभी संतोष नहीं मिलता है।

इस कहानी से प्रेमानंद महाराज समझाना चाहते हैं कि यही हाल आज के समाज का भी हो गया है। पहले लोग अपने पड़ोसियों से तुलना करते थे। लेकिन अब सोशल मीडिया ने इस आदत को और बढ़ा दिया है। मोबाइल खोलते ही किसी की विदेश यात्रा, किसी की महंगी गाड़ी, किसी की आलीशान शादी या किसी की लग्जरी लाइफ नजर आ जाती है। इन्हें देखकर कई लोग अपनी जिंदगी को अधूरा मानने लगते हैं। कमतर मानने लगते हैं। जबकि सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चीज पूरी तरह सच्चाई उस पर नहीं होती है।

इस कहानी के जरिए प्रेमानंद महाराज समझाना चाहते हैं कि अगर इंसान के जीवन में संतोष आ जाए तो वही सबसे बड़ा धन है। संतोष का मतलब यह नहीं कि मेहनत करना छोड़ दें या आगे बढ़ने की इच्छा खत्म कर दें। बल्कि इसका मतलब है अपनी मेहनत करते [संगीत] हुए जो आज आपके पास है उसके लिए आभार महसूस करें और अपनी खुशी को दूसरों की चीजों से ना जोड़ें। इस कहानी का संदेश आज के समय में पहले से कई ज्यादा जरूरी है। तुलना करना स्वाभाविक है। लेकिन जब तुलना हमारी खुशी छीनने लगे तब यह हमारी मानसिक तनाव, ईर्ष्या और असंतोष का कारण बन जाती है। जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा अच्छी बात है। लेकिन अगर हमारी खुशी हमेशा किसी और की उपलब्धि पर निर्भर रहेगी तो हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाएंगे। इसीलिए लक्ष्य जरूर बनाइए।

मेहनत भी कीजिए। लेकिन अपनी खुशियों की चाबी हमेशा अपने पास में रखिए। अपने हाथ में रखिए। तो संत प्रेमानंद महाराज की इस छोटी सी कहानी का संदेश बिल्कुल साफ है। दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी खुशी मत तय कीजिए। जो आपके पास है उसकी कद्र कीजिए और अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ते रहिए। यही सच्चे सुख और शांति का रास्ता है।

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