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इन पांच जगहों से होता है पेपर लीक? सरकार का क्या है प्लान?

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जब भी कोई पेपर लीक होता है, सबसे पहले टूटता है छात्रों का भरोसा। उसके बाद बर्बाद होता है उनका समय। महीनों नहीं कई बार सालों की मेहनत एक झटके में सवालों के घेरे में आ जाती है। लाखों छात्र फिर से एग्जाम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने को मजबूर हो जाते हैं। हर बार गिरफ्तारियां होती हैं। पॉलिटिकल ब्लेम गेम चलते हैं और सुधार के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है। आखिर सिस्टम फेल क्यों हो जाता है? आज की इस वीडियो में हम कुछ सवालों के जवाब देंगे कि कौन-कौन से पेपर लीक, किस-किस स्टेजेस में हुए। सरकार ने कमेटी बनाई। उनकी क्या राय रही और केस स्टडीज क्या कहती हैं? इन सब सवालों के जवाब देने के लिए हमने मदद ली है इंडिया टुडे की रिपोर्ट ओपन सोर्स इंटेलिजेंस टीम की। उसके साथ ही कुछ और मीडिया रिपोर्ट्स और रिसर्च आर्टिकल्स की। पहले हम पांच स्टेजेस की चर्चा कर लेते हैं। जहां से पेपर लीक होते हैं। पहला स्टेज क्वेश्चन पेपर सेटिंग स्टेज यानी कि पेपर तैयार करते समय। सबसे पहले सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स और पेपर सेटर्स क्वेश्चन पेपर तैयार करते हैं।

यह पूरी प्रक्रिया सीक्रेट होती है और केवल कुछ ऑथराइज्ड लोगों को ही पेपर देखने की इजाजत होती है। अगर इन्हीं लोगों में से कोई व्यक्ति पेपर की जानकारी बाहर दे दे तो पेपर लीक हो सकता है। एग्जांपल के तौर पर नीट यूजी 2026 का केस लेंगे तो सीबीआई के मुताबिक पी वी कुलकर्णी जो केमिस्ट्री लेक्चरर थे और एनटीए की ओर से एग्जाम प्रोसेस से जुड़े हुए थे उन्हें एग्जाम से पहले केमिस्ट्री पेपर देखने की इजाजत थी। जांच एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने कोचिंग क्लासेस के दौरान छात्रों को क्वेश्चंस, ऑप्शंस और आंसर्स बता दिए थे। यानी पेपर प्रिंटिंग या डिस्ट्रीब्यूशन से पहले ही बाहर पहुंच गया था। इन सब से यही मतलब निकलता है कि अगर किसी इंसाइडर के पास पेपर का एक्सेस है और वहीं उसे लीक कर दे तो केवल इंक्रिप्शन डिजिटल सिक्योरिटी से पेपर लीक नहीं रोका जा सकता। दूसरा स्टेज प्रिंटिंग स्टेज यानी कि क्वेश्चन पेपर छापने के दौरान क्वेश्चन पेपर तैयार होने के बाद उसे हाई सिक्योरिटी प्रिंटिंग प्रेस में छापा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक यही सबसे कमजोर स्टेज साबित हुई। इंडिया टुडे की जांच में शामिल 17 मामलों में से पांच मामलों में प्रिंटिंग प्रेस से ही पेपर लीक हुआ जो सबसे अधिक है। बिहार एसएससी इंटर लेवल एग्जामिनेशन 2017, गुजरात हेड क्लर्क रिक्रूटमेंट 2020, यूकेपीएससी रिक्रूटमेंट 2022, यूपीपीएससी आरओ एआरओ एग्जामिनेशन 204 इन मामलों में जांच एजेंसियों ने पाया कि क्वेश्चन पेपर डिस्ट्रीब्यूशन से पहले ही प्रिंटिंग फैसिलिटीज से बाहर चला गया। मतलब प्रिंटिंग प्रेस में काम करने वाले कर्मचारियों, प्रिंटिंग प्रोसेस और सिक्योरिटी सिस्टम पर सबसे ज्यादा निगरानी की जरूरत है। अगर यहां सुरक्षा कमजोर हुई तो पूरा एग्जाम इंपैक्ट हो सकता है।

तीसरा ट्रांसपोर्टेशन एंड स्टोरेज स्टेज यानी कि पेपर भेजने और सुरक्षित रखने के दौरान प्रिंटिंग के बाद क्वेश्चन पेपर्स को सील करके बॉक्सेस में रखा जाता है। फिर उन्हें वेयर हाउसेस, स्ट्रांग रूम्स और एग्जाम सेंटर्स तक भेजा जाता है। अगर इस दौरान किसी को पेपर की मूवमेंट की जानकारी मिल जाए या स्टोरेज की सुरक्षा कमजोर हो तो लीक हो सकता है। अगर इसका एग्जांपल देखा जाए तो यूपी पुलिस कांस्टेबल रिक्रूटमेंट 2024 का एग्जाम जिसके जांच में पता चला कि क्वेश्चन पेपर्स को डिस्पैच से पहले ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के वेयर हाउस में रखा गया था। इनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट यानी कि ईडी का आरोप था कि इसी दौरान कुछ लोगों ने पेपर लीक करने की साजिश रची। अगर इस मामले में देखा जाए तो पेपर केवल प्रिंटिंग प्रेस में ही नहीं बल्कि ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के दौरान भी पूरी सुरक्षा की जरूरत होती है। चौथा एग्जामिनेशन सेंटर स्टेज यानी कि परीक्षा केंद्र पर क्वेश्चन पेपर एग्जाम सेंटर तक सुरक्षित पहुंच जाता है। लेकिन एग्जाम शुरू होने से पहले भी लीक हो सकता है। अगर सेंट्रल स्टाफ प्रिंसिपल या इनविजिलेटर नियमों का पालन ना करें तो पेपर बाहर जा सकता है। आपको 67 बीपीएससी पेपर लीक याद होगा जिसमें आरोप था कि एग्जाम सेंटर के प्रिंसिपल ने सील खोलने के बाद क्वेश्चन पेपर स्कैन करके बाहर भेज दिया था। मतलब पेपर एग्जाम सेंटर तक पहुंच जाना ही काफी नहीं होता है। एग्जाम शुरू होने तक उसकी सुरक्षा उतनी ही जरूरी है। पांचवा एग्जाम हॉल एंड कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट यानी कि सीबीटी स्टेज। कई बार एग्जाम शुरू होने के बाद भी टेक्नोलॉजी या नकल के जरिए पेपर लीक या एग्जाम फ्रॉड हो सकता है। आज से करीब 10 साल पहले एआईपीएमटी 2015 का केस आया था जिसमें कुछ कैंडिडेट्स ने कपड़ों के अंदर ब्लूटूथ डिवाइसेस छिपा रखे थे। एग्जाम हॉल के बाहर बैठे लोग उन्हें ब्लूटूथ के जरिए आंसर कीज़ भेज रहे थे। जिसमें सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि पूरे देश में दोबारा परीक्षा हो क्योंकि परीक्षा की निष्पक्षता पूरी तरह खत्म हो गई थी। उसके साथ ही एक एसएससी सीजीएल टायर टू 2017-1 का केस सीबीआई के मुताबिक कुछ कैंडिडेट्स के कंप्यूटरटर्स को रिमोट सॉफ्टवेयर के जरिए कंट्रोल किया गया। इसके अलावा क्वेश्चन पेपर के स्क्रीनशॉट्स भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए। इससे पता चला कि कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग यानी कि सीबीटी सिस्टम और वेंडर सिक्योरिटी में भी गंभीर कमियां थी। देखा जाए तो ऑनलाइन एग्जाम हो या ऑफलाइन दोनों में डिजिटल सिक्योरिटी, डिवाइस मॉनिटरिंग और साइबर सिक्योरिटी बेहद जरूरी है। पेपर लीक मामलों में हमने एक केस स्टडी का रेफरेंस लिया है। फ्रंटलाइन द हिंदू में एक आर्टिकल छपा शीर्षक था व्हाट तुर्कीज़ एग्जाम लीक स्कैंडल मींस फॉर इंडियास नीट क्राइसिस। जिसमें तुर्की के पेपर लीक स्कैंडल का केस स्टडी है।

इफ्तखार गिलानी इस आर्टिकल के लेखक हैं। उन्होंने लिखा है जिस तरह इंडिया में यूपीएससी एग्जाम रेलेवेंट है उसी तरह तुर्की में यानी कि टर्की में केपीएसएस पब्लिक पर्सनल सिलेक्शन एग्जामिनेशन रेलेवेंट है। इस एग्जाम को सरकारी नौकरी को स्थिरता और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था। 2010 में केपीएसएस परीक्षा के नतीजों में एक असामान्य बात सामने आई। 350 उम्मीदवारों ने 120 में से 120 अंक हासिल किए जो थोड़ा अनयूजुअल पैटर्न लगा। जांच में पता चला कि कई टॉपर आपस में जुड़े हुए थे। कुछ पति-पत्नी थे। कुछ एक ही संस्थानों से जुड़े थे। जांचकर्ताओं के मुताबिक यह सिर्फ परीक्षा में नकल का मामला नहीं था। बल्कि लंबे समय तक शिक्षा संस्थानों, कोचिंग सेंटरों और छात्र नेटवर्क के जरिए लोगों को तैयार कर उन्हें सरकारी संस्थानों जैसे न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासन में पहुंचाने की रणनीति का हिस्सा था। इसे लेकर तुर्किए में आंदोलन भी हुआ। गुलेन आंदोलन और राष्ट्रपति रिकेप तैयब एरोदगन की पार्टी एपी के बीच पहले सहयोग था लेकिन बाद में मतभेद बढ़ गए। ओवरऑल अगर तुर्की का केस देखेंगे तो कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स में पेपर लीक केवल करप्शन का मामला नहीं हो सकता बल्कि अगर कोई प्लांट नेटवर्क लंबे समय तक एग्जामिनेशन सिस्टम को इंपैक्ट कर रहे हैं तो यह इंस्टीट्यूशन की निष्पक्षता और देश के डेमोक्रेटिक सिस्टम पर सवाल उठाता है।

तुर्किए की तरह भारत में भी पेपर लीक के मामले आते रहते हैं। कभी सरकार के सिस्टम पर तो कभी वेंडर पर तो कभी खुद एस्पिरेंट्स पर भी सवाल उठते रहे हैं। अभी हाल ही में जेपीएससी का मामला देख लीजिए जिसमें ओएमआर शीट में गड़बड़ियां पैसे लेकर पोस्ट देने का आरोप लगे हैं। पर तुर्की मामले जैसी किसी प्लान राजनीतिक साजिश का प्रमाण भारत में इस्टैब्लिश नहीं हो पाया है। तो दोनों केसेस में हमें लीक और आंदोलन के मामले में सिमिलरिटीज मिल सकती है। पर एक प्लांड पॉलिटिकल कास्परेसी कहने में थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। अब इस पूरे मामले में हम सरकार का पक्ष जान लेते हैं। आप सभी को पता है कि पेपर लीक के मुद्दे को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले दिल्ली के जंतरमंतर पर लगभग 1 महीना प्रोटेस्ट चला।

नतीजन शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। उसके अलावा सरकार ने नंदन नीलेकड़ी हाई पावर्ड कमेटी 2026 बनाई। जिसका एम टेक्नोलॉजी और एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स के जरिए पेपर लीक रोकने के नए उपाय सुझाना है। अगर हम पास्ट का एग्जांपल देखेंगे तो साल 204 में डॉक्टर के राधाकृष्णन कमेटी बनाई गई। कमेटी ने 101 सुझाव दिए जिनमें प्रश्न पत्र तैयार करने, प्रिंटिंग, सेफ ट्रांसपोर्ट, ऑनलाइन एग्जाम्स, परीक्षाओं, एजेंसियों की निगरानी और पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर दिया गया। इनमें से कई सुझाव लागू किए जा चुके हैं। कुछ पर अभी भी काम चल रहा है। इसके साथ ही पब्लिक एग्जामिनेशन प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मींस एक्ट 204 बनाया गया और हाल ही में 2026 में इसे और सख्त करने के लिए संशोधन विधेयक भी पेश किया गया है। तो यह रहे सरकार के कुछ कदम। फिलहाल यह कुछ पेपर लीक के स्टेजेस को हमने डिफरेंट स्टडीज के जरिए आइडेंटिफाई करने की कोशिश की है। सरकार की भी स्ट्रेटजी बताएं हैं। आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? आप अपनी राय हमें कमेंट सेक्शन में बता सकते हैं। शुक्रिया।

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