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वो राष्ट्रपति जिसके लिए बना था पहला AC, ये नाम और दर्दनाक किस्सा चौंका देगा।

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10 जून 2025 दिन मंगलवार। दिल्ली में देश के नए आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एक बड़ा ऐलान किया। उन्होंने कहा कि सरकार जल्द ही एक नियम लाने वाली है जिसके तहत आपके घर, दफ्तर और गाड़ी के एसी को 20° सेल्सियस से नीचे ठंडा नहीं किया जा सकेगा। ना ही 28 डिग्री से ऊपर चलाया जा सकेगा। मकसद है बिजली बचाना।

क्लाइमेट चेंज और बढ़ती गर्मी के बीच पिछले सालों में यह बहस जिंदा हुई है कि एसी को किस टेंपरेचर पर चलाना चाहिए। एसी 20 पर चले या 24 पर सरकार नियम बना रही है। हम और आप इस पर अपनी राय दे रहे हैं। तो चलिए आपको एक ऐसे दौर में ले चलते हैं जब एसी का तापमान तो छोड़िए। ठंडी हवा में बैठना ही किसी गुनाह से कम नहीं था।

एक ऐसा भी वक्त था जब एक देश का राष्ट्रपति गर्मी से बिस्तर पर तड़प रहा था और उसे बचाने के लिए दुनिया की सबसे अजीबोगरीब मशीन बनाई गई। साल 1881 महीना जुलाई का और जगह अमेरिका का वाइट हाउस। अमेरिका के 20वें राष्ट्रपति जेम्स गारफील्ड बिस्तर पर पड़े हैं। एक की उनके जिस्म में है। लेकिन उन्हें गोली से ज्यादा कुछ और तड़पा रहा है। जानलेवा गर्मी और चिपचिपी उमस। कमरे की खिड़कियां बंद है। पर्दे खींचे हुए हैं। फिर भी पसीना बह रहा है। डॉक्टरों की फौज खड़ी है लाचार और हताश। तभी बुलावा भेजा जाता है।

नौसेना के इंजीनियर्स को यानी नेवी इंजीनियर्स को और वह बनाते हैं एक मशीन। एक अजीबोगरीब मशीन, एक इंजन, कुछ पाइप, एक बड़ा सा पंखा और इन सबके सामने बर्फ से लबालब भरी एक विशालकाय बाल्टी। मशीन चालू होती है। पंखा घूमता है और बर्फ की ठंडक को राष्ट्रपति के कमरे में फेंकता है। जुगाड़ काम कर रहा था। कमरे का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से घटकर लगभग 24 डिग्री सेल्सियस पर आ गया। लेकिन यह मशीन हर घंटे सैकड़ों पाउंड बर्फ खा रही थी। इतनी कोशिशों के बाद भी राष्ट्रपति गारफील को बचाया नहीं जा सका। लेकिन उनकी तड़प और उस बर्फ खाने वाली मशीन के किस्से ने एक ख्वाब को हवा दे दी।

एक सपना कि काश कोई ऐसी तरकीब होती जो गर्मी के इस जानलेवा सितम को काबू कर सके। यह किस्सा है एयर कंडीशनर का। वह मशीन जिसने हमारे शहर बदले, सियासत बदली और हमारी जिंदगी भी। इंसान का गर्मी से रिश्ता बड़ा अजीब है। हजारों साल से उसने आग जलाकर ठंड को तो काबू में कर लिया था, लेकिन गर्मी, गर्मी तो बस झेलने के लिए थी। एक दैय प्रकोप। पर इंसान जुगाड़ू है। वह रास्ते निकाल ही लेता है। किस्सा है रोम के एक सनकी बादशाह का। नाम था इलाकाबास। उसे गर्मी लगी तो उसने गुलामों की एक फौज पहाड़ों पर दौड़ा दी। हुक्म था जाओ बर्फ लेकर आओ। गुलाम बर्फ की विशाल सिल्लियां ढोकर लाए और बादशाह ने उन्हें अपने बगीचे में ढेर करवा दिया। इस उम्मीद में कि हवा उस बर्फ से टकराएगी, ठंडी होगी और महल में दाखिल होगी।

यह तो हुई बादशाहत। लेकिन 19वीं सदी में एक व्यापारी ने इसी जुगाड़ को धंधा बना लिया। नाम फ्रेडरिक ट्यूटर बॉस्टन का आइस किंग। ट्यूडर सर्दियों में न्यू इंग्लैंड की जमी हुई झीलों से बर्फ की बड़ी-बड़ी चट्टानें कटवाता। उन्हें लकड़ी के बुरादे में लपेटता ताकि वह पिघले नहीं और फिर जहाजों में लादकर दुनिया के गर्म कोनों में बेच देता। अमीरों के लिए ठंडी और ठंडे कमरों का बंदोबस्त हो गया था।

लेकिन यह बर्फ भी बाहर से आ रही थी। क्या कोई मशीन बर्फ बना सकती थी? जब जान पर बनाए तो इंसान हर हद पार कर जाता है। कहानी है फ्लोरिडा के एक डॉक्टर की जॉन गोरी।

साल 1851 उनके मरीज के तेज बुखार में तप रहे थे। डॉक्टर गोरी ने उनकी जान बचाने के लिए एक मशीन बनाई जो हवा को ठंडा कर सके। लेकिन एक दिन उस मशीन के पाइपों पर कुछ जम गया। वह बर्फ थी। डॉक्टर गोरी ने गलती से बर्फ बनाने वाली मशीन का आविष्कार कर लिया था। उन्हें लगा दुनिया शाबाशी देगी मगर हुआ उल्टा। उनका मजाक उड़ाया गया। न्यूयॉर्क के एक बड़े अखबार द न्यूयॉर्क ग्लोब ने लिखा एक सनकी डॉक्टर है डॉक्टर गोरी जो सोचता है कि वह अपनी मशीन से वैसी ही बर्फ बना सकता है जैसी सर्वशक्तिमान ईश्वर बनाता है।

इस सोच ने तरक्की की रफ्तार धीमी कर दी। यहां तक कि 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी कांग्रेस ने अपने लिए ठंडी हवा का इंतजाम करने से मना कर दिया। उन्हें डर था कि वोटर मजाक उड़ाएंगे कि हमारे नेता पसीना तक नहीं बहा सकते। दुनिया को गर्मी से लड़ने वाली असली मशीन के लिए अभी और इंतजार करना था और यह क्रांति लाने वाला कोई डॉक्टर नहीं बल्कि एक 25 साल का नौजवान इंजीनियर था। नाम विलिस कैरियर। कैरियर को इंसानों के आराम की कोई फर्क नहीं थी। उसकी समस्या कुछ और थी। साल 1902 न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में एक प्रिंटिंग प्रेस थी।

नाम था सेकेट एंड विलियम्स लिथोग्राफिंग एंड प्रिंटिंग कंपनी। वहां गर्मी और नमी के चलते बड़ी दिक्कत हो रही थी। कागज नमी से कभी सिकुड़ जाता था तो कभी फैल जाता। इससे रंगीन छपाई में रंगों की लाइनें बिगड़ जाती। लाखों डॉलर का नुकसान हो रहा था। प्रेस के मालिकों ने कैरियर की कंपनी बफेलो फोर्स को बुलाया। कहा इस नमी का कुछ करो। कैरियर ने दिमाग लगाया और एक मशीन बनाई जो हवा को ठंडे पाइपों के ऊपर से गुजारती थी। इन पाइपों में कंप्रेस्ड अमोनिया जैसी ठंडी गैस घूम रही थी। जब गर्म और नमी वाली हवा इन पाइपों से टकराती तो हवा में मौजूद नमी पानी बनकर अलग हो जाती। प्रेस की समस्या सुलझ गई लेकिन इस प्रक्रिया में एक और जादू हो गया। नमी खींचने के साथ-साथ वो मशीन हवा को ठंडा भी कर रही थी।

कैरियर ने ही इस प्रक्रिया को नाम दिया एयर कंडीशनिंग यानी हवा को अपनी शर्तों पर ढालना। तो इस तरह दुनिया को गर्मी से लड़ने वाली मशीन मिली। यह मशीन बनी तो थी एक एक्सीडेंट से कागज और स्याही बचाने के लिए लेकिन इसने इंसानों को गर्मी से बचाना शुरू कर दिया। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। इस मशीन को अभी लोगों के घरों में नहीं उनके दिमागों में जगह बनानी थी। इसे पाप के तमंगे से निकलकर जरूरत का दर्जा पाना था। और जब ऐसा हुआ तो उसने सिर्फ हवा ही नहीं बदली। उसने दुनिया की शक्ल बदल दी।

विलेज कैरियर की मशीन ने ठंडी हवा तो बना दी लेकिन यह ठंडी हवा अभी भी कुछ खास फैक्ट्रियों और मिलों में ही कैद थी। आम आदमी की जिंदगी में इसका आना अभी बाकी था और जब यह आई तो इसने सबसे पहले उस चीज पर हमला किया जिसमें हम रहते और काम करते हैं। हमारी इमारतें। एसी से पहले इमारतें सांस लेती थी। आर्किटेक्ट्स को गर्मी और हवा का पूरा ध्यान रखना पड़ता था और ऊंची-ऊंची छतें बनाई जाती थी ताकि गर्म हवा ऊपर उठ जाए। बड़े-बड़े बरामदे होते थे जो सीधी धूप को रोकते थे। आंगन और रोशन दान होते थे ताकि हवा आ जा सके। अमेरिका के गर्म दक्षिणी इलाकों में तो एक खास तरह का घर बनता था डॉग ट्रॉट हाउस। दो कमरों के बीच में एक खुला गलियारा जहां से हवा सर पर दौड़ती थी। लेकिन फिर आया एयर कंडीशनर। और उसने आर्किटेक्ट से कहा, भूल जाओ यह सब पुराने टोटके। अब तुम मेरे भरोसे हो।

अब तुम शीशे और स्टील के बंद डिब्बे बना सकते हो। ऐसे डिब्बे जो सूरज की गर्मी को सोख कर भट्टी बन जाए। लेकिन मैं उन्हें अंदर से ठंडा रखूंगा। इस नई आजादी का पहला बड़ा और बदनाम किस्सा जुड़ा है न्यूयॉर्क में बनी यूनाइटेड नेशंस की इमारत से। दुनिया के सबसे मशहूर आर्किटेक्ट्स में से एक ली कारबुजिए इस प्रोजेक्ट का हिस्सा थे। उन्होंने चेतावनी दी। कहा न्यूयॉर्क की भयानक गर्मी में बिना सनशेट वाली कांच की दीवारें बनाना खतरनाक है।

बहुत खतरनाक लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। नतीजा वह शानदार इमारत एक शीशे का कैदखाना बन गई। सूरज की गर्मी से उसके दफ्तर भुनने लगे। अंदर काम करने वाले लोग गर्मी से बेहाल हो गए और उन्होंने अपनी खिड़कियों पर पर्दे डाल दिए। कारबूजिए ने जब यह देखा तो गुस्से से कहा, इन्होंने तो इमारत को मुर्दा घर जैसी रोशनी से भर दिया है। लेकिन फिर 1952 में न्यूयॉर्क में ही एक और इमारत बनी जिसने दुनिया को रास्ता दिखाया। नाम था लीवर हाउस। यह साबुन बनाने वाली एक कंपनी का हेड क्वार्टर था और यह इमारत खुद भी साबुन की तरह चमक रही थी। पूरी तरह से कांच की बनी। अंदर से एयर कंडीशन। यह पहली ऐसी इमारत थी जिसकी दीवारें पूरी तरह से शीशे की थी और कंपनी ने इसका खूब प्रचार किया।

इमारत की खिड़कियां साफ करने के लिए एक खास मशीन बनाई गई जो छत से लटकती थी और वह भी कंपनी के ही सर्फ ब्रांड साबुन से खिड़कियां धोती थी। यह एक शानदार पब्लिसिटी स्टंट था। लीवर हाउस मॉडर्न होने का एक प्रतीक बन गया और इसके बाद दुनिया भर के शहरों में कांच की ऊंची-ऊंची इमारतें उगने लगी। एसी का असर सिर्फ ऑफिसों पर नहीं हो रहा था। वह हमारी मौज मस्ती के तरीके भी बदल रहा था। 1920 के दशक में अमेरिका में सिनेमाघर खुल रहे थे और वह अपनी सबसे बड़ी खासियत बताते थे एयर कंडीशनिंग। लोग फिल्म देखने कम ठंडी हवा खाने ज्यादा जाते थे।

हॉलीवुड के निर्माताओं ने यह बात पकड़ ली। उन्होंने अपनी सबसे बड़ी सबसे महंगी फिल्में गर्मी में रिलीज़ करनी शुरू कर दी। और इस तरह जन्म हुआ समर ब्लॉकबस्टर का। वो परंपरा जो आज भी जारी है। लेकिन एसी का सबसे हैरतंगेज असर दिखना अभी बाकी था। उसने एक देश का सियासी भूगोल ही बदल दिया। अमेरिका के दक्षिणी राज्य फ्लोरिडा, टेक्सस, एरिजोना इन्हें सन बेल्ट कहा जाता है। एसी से पहले यहां की भयंकर गर्मी में रहना और काम करना बहुत मुश्किल था। लेकिन एसी ने इन राज्यों को रहने लायक बना दिया। लाखों अमेरिकी उत्तर के ठंडे पुराने औद्योगिक शहरों को छोड़कर दक्षिण के इन नए चमकते शहरों में बसने लगे। आबादी का यह विशाल फेरबदल हुआ तो सियासत का तराजू भी झुक गया।

लेखक स्टीवन जॉनसन तो यहां तक कहते हैं कि इसी बदलाव ने 1980 में रोनाल्ड रीगन को अमेरिका का राष्ट्रपति बनने में एक अहम भूमिका निभाई। सोचिए एक ठंडी हवा देने वाले डिब्बे ने वाइट हाउस तक का रास्ता तय कर दिया। एसी अमेरिका और यूरोप की शक्ल तो बदल रहा था लेकिन हिंदुस्तान में क्या?

यहां कहानी बिल्कुल अलग थी। यहां ठंडी हवा पहले एक शाही मेहमान बनकर आई। फिर वो ताकत का एक औजार बनी और फिर सालों बाद वो एक ऐसी जरूरत बनी जिसके लिए आम आदमी अपनी जेबें खाली करने को तैयार था। हिंदुस्तान में एसी की कहानी शुरू होती है ब्रिटिशर्स के साथ। अंग्रेजों के लिए यह सिर्फ आराम की चीज नहीं थी। यह हुकूमत करने का एक तरीका था। कोलकाता की भयंकर गर्मी जिसे एक अंग्रेज ने विशाल बदबूदार भाप का गुसलखाना कहा था। उसमें गोरे साहब कैसे काम करते? कैसे वह खुद को आम हिंदुस्तानी से अलग और बेहतर दिखाते? जवाब था एयर कंडीशनिंग। नई दिल्ली और शिमला में बड़े-बड़े साहबों के दफ्तर में यह मशीनें लगाई गई। यह एक कूल माहौल बनाती थी जो बताता था कि असली हुक्मरान कौन है और जहां अंग्रेज साहब वहां हमारे देसी राजे रजवाड़े कैसे पीछे रहते।

वो पश्चिमी दुनिया की हर नई चीज अपनाने में आगे थे। साल 1936 जयपुर के आलीशान रामबाग पैलेस में कैरियर कंपनी ने भारत के पहले एसी सिस्टम्स में से एक को इंस्टॉल किया। जोधपुर के उम्मेद भवन पैलेस में भी ठंडी हवा का इंतजाम किया गया। लेकिन आम जनता तक एसी की पहली झलक पहुंची सिनेमाघरों के रास्ते। साल 1933 जगह बॉम्बे। रीगल सिनेमा खुला और वो भारत का पहला पूरी तरह से एयर कंडीशनिंग सिनेमा हॉल बना। टिकट पर लिखा होता था कूल्ड बाय आइस डियर। लोग फिल्म देखने के साथ-साथ गर्मी से बचने के लिए भी आते थे। एसी अब मनोरंजन का प्रतीक बन गया था। आजादी के बाद तस्वीर बदली लेकिन धीरे-धीरे यह परमिट राज का दौर था।

सरकार ने विदेशी सामान पर भारी टैक्स लगा दिए और देश में फैक्ट्रियां लगाने के लिए लाइसेंस का सख्त सिस्टम बना दिया। इसी माहौल में दो बड़ी भारतीय कंपनियों का जन्म हुआ। 1943 में मोहन टी आडवाणी ने ब्लू स्टार की शुरुआत की जो शुरू में पुराने एसी और फ्रिज ठीक करने का काम करती थी और 1954 में Tata और एक स्विस कंपनी volc ब्रदर्स ने मिलकर बनाई Vols Vols ने 1954 में ही भारत का पहला देसी रूम एसी बनाया Vols क्रिस्टल यह एक भारीभरकम विंडो एसी था। 1956 में ऐसे आठ क्रिस्टल एसी बॉम्बे के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई के घर पर लगाए गए। लेकिन आम आदमी के लिए यह एक सपना था। 70 और 80 के दशक में एक एसी की कीमत थी ₹15,000 से ₹00 जबकि एक सरकारी अफसर की महीने की तनख्वाह होती थी ₹3000।

मतलब एसी खरीदना एक गाड़ी खरीदने जैसा था। लोग सालों तक पैसे जोड़ते थे और क्योंकि यह विंडो एसी होते थे तो यह घर की दीवार से बाहर झांकते थे। यह सिर्फ एक मशीन नहीं थी। यह पूरी दुनिया को आपकी हैसियत का ऐलान था। रात की खामोशी में जब किसी पड़ोसी के घर से एसी के कंप्रेसर की आवाज गूंजती तो वह अमीरी और गरीबी के बीच की लकीर को और गहरा कर देती थी। फिर आया साल 1991। भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल दिए। परमिट राज खत्म हुआ। विदेशी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछाया गया और फिर जो हुआ उसने भारत के एसी बाजार को हमेशा के लिए बदल दिया। कैरियर जैसी पुरानी कंपनी और मजबूत हुई। लेकिन असली खेल बदला दक्षिण कोरिया की दो कंपनियों ने। LG और Samsung। यह कंपनियां अपने साथ लाई नई तकनीक, आक्रामक कीमतें और जबरदस्त मार्केटिंग। इन्होंने विंडो एसी की जगह स्प्लिट एसी को लोकप्रिय बनाया जो शांत थे। ज्यादा बिजली बचाते थे और घर की दीवार पर भद्दे भी नहीं लगते थे। लेकिन सबसे बड़ा हथियार था ईएमआई यानी आसान मासिक किश्ते। अब एक नौकरी पेशा आदमी भी एसी खरीदने का सपना देख सकता था। जो एसी कभी सालों की बचत के बाद आता था। अब वह बस एक डाउन पेमेंट और कुछ कागजी कारवाई के बाद आपके घर में लग सकता था।

बढ़ती आमदनी शहरों में बनते कंक्रीट के गर्म जंगल और ऊपर से जानलेवा होती गर्मी ने एसी को स्टेटस सिंबल से एक जरूरत बना दिया। हिंदुस्तान में ठंडी हवा की लड़ाई अब कुछ अमीरों की नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की लड़ाई बन चुकी थी। इस तरह भारत ने कुछ ही दशकों में एक लंबा सफर तय कर लिया। एक शाही शौक से करोड़ों घरों की जरूरत तक। लेकिन इस ठंडी हवा के सौदे की एक गर्म कीमत भी थी। एक ऐसी कीमत जो सिर्फ भारत को नहीं पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है। दो तस्वीरें देखिए। पहली तस्वीर है जैसलमेर की एक पुरानी हवेली की। पत्थर पर पत्थर रखकर बनाई गई। दीवारों पर बारीक जालियां तराशी हुई हैं। बाहर सूरज आग उगल रहा है, लेकिन अंदर एक सुकून भरी ठंडक है।

हवा जब इन जालीदार पत्थरों से होकर गुजरती है तो उसकी तासीर बदल जाती है। यहां आराम किसी मशीन का मोहताज नहीं वह दीवारों, आंगन और पत्थरों की सदियों पुरानी समझदारी का नतीजा है। अब दूसरी तस्वीर देखिए। दिल्ली से सटे गुड़गांव के किसी चमचमाते कांच के ऑफिस की। बाहर वही आग उगलती गर्मी है लेकिन अंदर का हाल अजीब है। शीशे की दीवारों से बनी इस इमारत में एक सर्द सन्नाटा है। सेंट्रलाइज्ड एसी अपनी पूरी ताकत से चल रहा है। इतनी ताकत से कि एक कोने में बैठा नौजवान इंजीनियर अपनी शर्ट के ऊपर कंपनी की दी हुई जैकेट पहने कांप रहा है और दूसरे कोने में कांच की दीवार के पास बैठी उसकी सहकर्मी को पसीना आ रहा है। दोनों के बीच थर्मोस्टेट की जंग छिड़ी हुई है। यह दो तस्वीरें सिर्फ दो इमारतों की नहीं बल्कि दो हिंदुस्तान की कहानी है। एक वो जो गर्मी के साथ जीना जानता है और दूसरा वो जो गर्मी को हराने की ज़िद में खुद अपनी ही बनाई भट्टी में कैद हो गया है। यह कहानी है एयर कंडीशनर की। उस मशीन की जिसने सिर्फ हवा ही नहीं बदली। उसने हमारे घर बनाने, घर बसाने और यहां तक कि जिंदगी को महसूस करने का तरीका भी हमेशा के लिए बदल दिया।

एसी के आने से बहुत पहले हिंदुस्तान की इमारतें मौसम से बतियाती थी। वह जिंदा थी, वह सांस लेती थी। कंप्रेसर के शोर से पहले हमारे पुरखों ने गर्मी को मात देने के नायाब तरीके निकाले थे। इसका सबसे शानदार नमूना है जाली। मुगल और राजस्थानी वास्तुकला की यह पहचान सिर्फ सजावट के लिए नहीं थी। पत्थर या लकड़ी पर तराशे गए यह एंट्री के डिजाइन असल में एक नेचुरल एयर कूलर थे। जब तेज धूप इन पर पड़ती तो यह उसे छानकर नरम रोशनी में बदल देते और हवा जब हवा इन हजारों छोटे-छोटे छेदों से होकर गुजरती तो वेंचुरी इफेक्ट के कारण उसकी रफ्तार बढ़ जाती और तापमान गिर जाता। कुछ स्टडीज तो यह भी बताती हैं कि एक अच्छी जाली सूरज की लगभग 70% गर्मी को कमरे में घुसने से पहले ही रोक देती है।

सिर्फ जालियां ही नहीं हमारे घरों का पूरा ढांचा ही एक सोच का नतीजा है। घर के बीचों-बीच एक खुला आंगन होता था। यह सिर्फ तुलसी के पौधे या चारपाई बिछाने की जगह नहीं थी। यह घर का फेफड़ा था। यहां से ताजी हवा और रोशनी घर के कोने-कोने में पहुंचती। गर्म हवा हल्की होकर इसी आंगन से ऊपर उठकर बाहर निकल जाती और एक कुदरती वेंटिलेशन का चक्र चलता रहता। बावलियों के बारे में सोचिए। पश्चिमी भारत में बने यह सीढ़ीदार कुएं सिर्फ पानी बचाने का जुगाड़ नहीं थे। यह जमीन के कई फुट नीचे बने ठंडे छांव वाले कम्युनिटी सेंटर्स थे। धरती खुद एक हीट सिंक की तरह काम करती है और पानी की मौजूदगी से होने वाला वाष्पीकरण आसपास के तापमान को काफी कम कर देता है।

इनके अलावा भी अनगिनत तरकीबें थी। मिट्टी, पत्थर या ईंट की बनी मोटी-मोटी दीवारें जो दिन में गर्मी सूखती और रात में धीरे-धीरे छोड़ती। ऊंची छतें ताकि गर्म हवा ऊपर जमा हो जाए। खिड़कियों पर निकले छज्जे जो दीवारों पर सीधी धूप पड़ने से रोकते थे। यह वो समझ थी जहां आराम और टिकाऊपन एक ही सिक्के के दो पहलू थे। भारत में एसी का आना सिर्फ एक मशीन का आना नहीं था। यह एक पूरी सोच, एक पूरी संस्कृति का आयात था। आजादी के बाद एयर कंडीशनिंग, तरक्की, ताकत और पश्चिमी दुनिया की बराबरी करने का प्रतीक बन गया। दिल्ली का आलीशान अशोका होटल भारत का पहला पूरी तरह से एयर कंडीशन होटल बना। यह एक ऐलान था कि हिंदुस्तान अब मॉडर्न हो रहा है। जैसा पहले डिस्कस किया। 1991 में जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले, दुनिया भर की मल्टीीनेशनल कंपनियां भारत आई और वह अपने साथ सिर्फ पैसा और नौकरियां नहीं लाई। वह अपने साथ ऑफिस बनाने का एक खास तरीका भी लाई। सील बॉक्स यानी कांच और स्टील से बने हर तरफ से बंद डिब्बे जिन्हें बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं।

बेंगलुरु जैसे शहर जो कभी अपनी सुहावनी हवा के लिए गार्डन सिटी कहलाते थे उनकी शक्ल बदलने लगी। शहर में अब पारंपरिक हवादार इमारतों की जगह कांच के ऊंचे-ऊंचे आईटी पार्क उगाए थे। इन इमारतों को गर्मी को बाहर रखने के लिए नहीं बल्कि गर्मी को अंदर कैद करने के लिए डिजाइन किया गया था और इस कैदखाने को रहने लायक बनाने का सिर्फ एक ही तरीका था एयर कंडीशनिंग। एसी ने आर्किटेक्ट्स को एक ऐसी आजादी दी जो खतरनाक साबित हुई। अब उन्हें इस बात की फिक्र नहीं थी कि इमारत दिल्ली की लू में बन रही है या मुंबई की उमस में। उनके पास हर मौसम का एक ही जवाब था एयर कंडीशनर। नतीजा यह हुआ कि हमारे शहर अपनी आत्मा, अपनी पहचान खोने लगे।

राजस्थान के एक शहर में बनी इमारत वैसे ही दिखती जैसी केरल के किसी तटीय कस्बे में। इस चलन को आलोचकों ने नाम दिया अर्बन प्लेसलेसनेस यानी ऐसे शहर जिनकी अपनी कोई जगह, अपनी कोई पहचान ना हो। आर्किटेक्ट यतिन पांड्या का एक आकलन चौंकाने वाला है। उनके मुताबिक भारत में आज बन रही लगभग 90% इमारतें अपने इलाके की जलवायु को पूरी तरह नजरअंदाज करके बनाई जा रही हैं। यह कुकी कटर डिजाइन यानी एक ही सांचे से निकली इमारतें बनाने में भले ही आसान और सस्ती हो, लेकिन यह हमें दशकों तक बढ़ने वाली गर्मी के खतरे में धकेल रही हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बना कांच। कांच की बड़ी-बड़ी दीवारें मॉडर्न होने की पहचान बन गई। लेकिन एक बहुत बड़ी दिक्कत थी। कांच गर्मी को रोकने में बहुत ही बुरा है। वो सूरज की गर्मी को सीधे अंदर आने देता है और वहीं से एक खतरनाक दुश्चक्र शुरू हुआ।

कांच की चमचमाती इमारत बनाने का सपना पूरा करने के लिए एसी जरूरी था। लेकिन कांच की वजह से इमारत एक भट्टी बन जाती है और उस भट्टी को ठंडा करने के लिए एसी को अपनी दोगुनी तिगुनी ताकत से चलना पड़ता। ज्यादा एसी मतलब ज्यादा बिजली की खपत। इस बेढंगे डिजाइन का असर हम आज अपने दफ्तरों में महसूस करते हैं। ऑफिस के अंदर थर्मोस्टेट वॉर एक आम बात है। कोई एसी के ठीक नीचे बैठकर ठंड से परेशान है तो कोई कांच की खिड़की के पास बैठकर पसीने से। यह इस बात का सबूत है कि हम अरबों रुपए खर्च करके भी अपनी इमारतों में सही मायनों में आराम पैदा नहीं कर पा रहे हैं।

लेकिन इस अंधेरे में उम्मीद की कुछ किरणें भी हैं। आज के दौर के कई भारतीय आर्किटेक्ट इस अंधी दौर पर सवाल उठा रहे हैं। वो वापस अपनी जड़ों की ओर देख रहे हैं। वो उस भूली बिसरी अक्ल को फिर से जिंदा कर रहे हैं जो हमारे पुरखों के पास थी। चार्ल्स कोरिया जैसे महान आर्किटेक्ट ने अपनी पूरी जिंदगी यही सिखाया कि इमारतें अपने माहौल से कटकर नहीं जी सकती। मुंबई में बना उनका कंचनजंगा अपार्टमेंट इसका बेहतरीन उदाहरण है। जहां उन्होंने पारंपरिक बंगलों के बरामदे के आईडिया को एक ऊंची इमारत में इस्तेमाल किया ताकि हर घर को छांव और हवा मिल सके। आज की पीढ़ी इसी सोच को नई तकनीक के साथ मिला रही है। दिल्ली की एक फर्म कूलेंट ने एक ऐसा कूलिंग सिस्टम बनाया है जो मिट्टी के मटों के सिद्धांत पर काम करता है। टेराकोटा से बने मधुमक्खी के छत्ते जैसे इस डिजाइन पर जब पानी बहता है तो हवा के संपर्क में आकर वह ठंडा हो जाता है। यह भविष्य की एक झलक है।

जहां प्रेरणा अपनी मिट्टी से ली गई है और उसे तराशने के लिए मॉडर्न तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। आर्किटेक्ट विनोद गुप्ता तो यहां तक कहते हैं कि हम एसी की लत के शिकार हो गए हैं। जिसने हमें मौसम के मामूली उतार-चढ़ाव को सहने की क्षमता से भी महरूम कर दिया है। तो रास्ता क्या है? रास्ता एसी को पूरी तरह से निकालने का नहीं है। बढ़ती गर्मी में यह कई लोगों के लिए एक जरूरत है। लेकिन रास्ता इसे अपना मालिक बनाने का भी नहीं है। भविष्य उन इमारतों का है जो पहले अपनी अक्ल का इस्तेमाल करें जो सूरज की दिशा, हवा का रुख और स्थानीय मटेरियल की समझ से खुद को ठंडा रखें और एसी वो बस एक बैकअप की तरह हो। एक सहायक की तरह। जब हमारी कुदरती तरकीबें जवाब दे जाए तब मशीन अपना काम करें। एसी की ठंडी हवा ने हमारी जिंदगी को बेहतर बनाया इसमें कोई शक नहीं। एक पुरानी स्टडी के मुताबिक जब अमेरिकी सरकार के दफ्तरों में एसी लगाए गए तो वहां काम करने वाले टाइपिस्टों की काम करने की रफ्तार 24% तक बढ़ गई। मतलब ठंडे दिमाग से काम बेहतर होता है। एसी सिर्फ काम ही नहीं सुधारता। यह जाने भी बचाता है।

जब भी कहीं जानलेवा लू या हीट वेव चलती है तो एसी वाले घरों में मौत का खतरा कम हो जाता है। और अर्थशास्त्री तो यह भी कहते हैं कि जिन गर्म देशों में लोग ठंडे माहौल में काम कर पाते हैं वहां की अर्थव्यवस्था ज्यादा तेजी से बढ़ती है। तो क्या इसका मतलब सब कुछ बढ़िया है? आराम, प्रोडक्टिविटी, बेहतर अर्थव्यवस्था। लेकिन रुकिए। कहानी में एक बहुत बड़ा लेकिन है। एक ऐसा पेंच जो इस पूरी ठंडी कहानी को बेहद गर्म और खतरनाक बना देता है। जिसका जवाब इस सवाल में है कि एसी काम कैसे करता है? वो कमरे की गर्मी को खींच कर बाहर फेंकता है। यानी आपके कमरे में ठंडक तो बाहर और ज्यादा गर्मी। और जब एक शहर में लाखों एसी एक साथ यही काम करते हैं तो पूरा शहर ही एक भट्टी बन जाता है। अमेरिका के एरिजोना स्टेट के फिनिक्स शहर में एक स्टडी हुई। पता चला कि एसी के इस्तेमाल की वजह से शहर की रात का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था और यह तो बस एक शहर की बात है। आज दुनिया की लगभग 20% बिजली सिर्फ इमारतों को ठंडा करने में खर्च की जाती है और यह बिजली बनती कैसे है?

ज्यादातर कोयला और गैस जलाकर यानी और ज्यादा प्रदूषण और ज्यादा गर्मी। लेकिन 80 के दशक में वैज्ञानिकों ने एक और भी भयानक खतरा खोज निकाला। पता चला कि पुराने एसी और फ्रिज में इस्तेमाल होने वाली गैस जिसे फ्रियोंन कहते हैं, वह हमारी धरती के सुरक्षा कवच यानी ओजोन लेयर में छेद कर रही है। यह क्लोरोफ्लोरोकार्बंस थे। यानी सीएफसीस। यह वो छेद था जिससे सूरज की खतरनाक किरणें सीधे धरती पर आ सकती थी। यह एक ग्लोबल इमरजेंसी थी। यहां इंसानियत ने एक मिसाल कायम की। दुनिया के सारे देश एक साथ आए और 1989 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल नाम का एक समझौता हुआ। सबने मिलकर तय किया कि इन खतरनाक सीएफसीस का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए और यह काम कर गया। आज ओजोन लेयर का वो छेद धीरे-धीरे भर रहा है। सीएफसी से तो हम बच गए। लेकिन एसी की वजह से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग का खतरा आज भी हमारे सामने मंडरा रहा है और इस चुनौती को भारत जैसे देश से बेहतर कौन समझ सकता है जहां एसी की मांग हर साल रॉकेट की तरह बढ़ रही है। इसलिए अब भारत सरकार कुछ बड़े कदम उठा रही है। आपने एसी खरीदते वक्त उस पर लगे एक से पांच स्टार वाले स्टीकर तो देखे ही होंगे। यह है बीई यानी ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी की स्टार रेटिंग। इसे 2009 में अनिवार्य कर दिया गया था। इसका मकसद सीधा सा है। आपको बताना कि कौन सा एसी कम बिजली खाएगा। पांच स्टार मतलब सबसे कम बिल और इसका असर भी हुआ।

इस रेटिंग के चलते एसी पहले से 60% तक ज्यादा बिजली बचाने लगे हैं। लेकिन यह तो बस एक कदम था। 2019 में सरकार एक और बड़ा और दूर की सोच वाला प्लान लाई। आई कैप यानी इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान। यह अगले 20 साल का रोड मैप है। इसका लक्ष्य सिर्फ ज्यादा बिजली बचाने वाले एसी बनाना नहीं है बल्कि यह भी है कि हमें एसी की जरूरत ही कम पड़े। कैसे? इमारतों के डिजाइन को सुधार कर ताकि वह अपने आप ठंडी रहे। आई कैप का लक्ष्य है कि 2038 तक देश में कूलिंग की जरूरत को 25% तक कम किया जाए और इसके लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली में 40% तक की कटौती हो। तो कोशिश जारी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल और सबसे बड़ी विडंबना वही है।

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