अभिनेता नज़र हुसैन की। देखो आई एम सोनी यस फादर मैं एज अ पुलिस नहीं बल्कि एज अ गार्डियन तुमसे कहता हूं कि तुम ये धंधा छोड़ दो वरना मैं पुलिस में कंप्लेंट कर दूंगा। नजीर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 में हुआ और 16 अक्टूबर 1987 में हुई। नजीर हुसैन ने लगभग 500 फिल्मों में अभिनय किया।
कुछ प्रमुख फिल्में हैं। पहला आदमी परिणीता दो बीघा जमीन देवदास न्यू दिल्ली नया दौर काला पानी बंबई का बाबू गंगा जमुना साहिब बीबी और गुलाम कश्मीर की कली जुल थीफ राम और श्याम कटी पतंग शर्मीली बॉम्बे टू गोवा जुगनू कुंवारा बाप धर्मात्मा प्रतिज्ञा महबूबा अमर अकबर एंथोनी द बर्निंग ट्रेन मजदूर और लव एंड गॉड एक समय ऐसा भी था जब नजीर हुसैन को सरकार ने फांसी की सजा सजा सुनाई थी।
क्यों सुनाई गई थी फांसी की सजा? कैसे नजीर हुसैन फांसी होने से पहले जेल से भागे? क्यों भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नजीर हुसैन की मदद की और नजीर हुसैन ने भोजपुरी सिनेमा की नीम रखी यह सब आज मैं इस वीडियो में बताऊंगा। नमस्कार दोस्तों, केके एचईएसपीए के मंच पर आपका स्वागत है। मैं हूं एलन माइकल किशोर। सेकंड वर्ल्ड वॉर से पहले गुलाम भारत के लखनऊ शहर में नजीर हुसैन के पिता लखनऊ रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे। पिता की सिफारिश से नजीर हुसैन को भी लखनऊ रेलवे में फायरमैन की नौकरी मिल गई। सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू हुआ तो नज़र हुसैन फायरमैन की नौकरी छोड़कर ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए।
मलेशिया में पोस्टिंग के दौरान नज़र हुसैन की बटालियन का मुकाबला एक जापानी बटालियन से हुआ।
जीत जापानी बटालियन की हुई। जापानियों ने नजीर हुसैन को गिरफ्तार कर लिया और प्रिजनर ऑफ होम में डाल दिया। वहीं नजीर हुसैन की मुलाकात एक आदमी से हुई जो आजाद हिंद फौज का सिपाही था। उस आदमी की सोबत में रहकर नजीर हुसैन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मुरीद बन गए। कुछ समय बाद जापान ने युद्धबंदियों को रिहा कर दिया। भारत वापस आकर नज़र हुसैन उसी आदमी के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिले। नजीर हुसैन ने आजाद हिंद फौज में शामिल होने की रिक्वेस्ट की जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वीकार कर लिया। नजीर हुसैन क्योंकि अच्छा लिख और बोल लेते थे इसलिए आजाद हिंद फौज में उन्हें प्रचार प्रसार का काम सौंपा गया। जब सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म हुआ तो बाकी आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के साथ ब्रिटिश हुकूमत ने नज़र हुसैन को भी गिरफ्तार कर लिया। ब्रिटिश हुकूमत ने नज़र हुसैन को की सजा सुनाई। जब एक ट्रेन के द्वारा नजीर हुसैन को फांसी देने के लिए लाल किले लाया जा रहा था। तब कुछ क्रांतिकारी साथियों ने उस ट्रेन पर हमला करके नजीर हुसैन की भागने में मदद की और उन्हें निश्चित से बचा लिया। लेकिन दुर्भाग्यवश नजीर हुसैन फिर पकड़े गए और उन्हें हावड़ा जेल में डाल दिया गया। नज़र हुसैन भारत के स्वतंत्र होने तक इसी जेल में रहे। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और जेल में बंद सभी क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया गया।
इस तरह नजीर हुसैन भी रिहा हो गए। नजीर हुसैन ने नवनिर्मित पाकिस्तान जाने की जगह भारत में ही रहने का फैसला किया। अब समस्या आजीविका चलाने की थी। कोई रोजगार तो उन्हें चाहिए ही था। इसी सिलसिले में नजीर हुसैन सुभाष चंद्र बोस के भाई शरद चंद्र बोस से मिले। शरद चंद्र बोस ने उन्हें सलाह दी कि तुम अच्छा लिखते हो, अच्छा बोल लेते हो। इसलिए तुम रंगमंच या नाटक मंचन का काम क्यों नहीं करते? शरद चंद्र बोस की सलाह मानकर नजीर हुसैन नाटकों में अभिनय करने लगे। उनके अभिनय से प्रभावित होकर कोलकाता की नामी थिएटर कंपनी न्यू थिएटर के मालिक बी एन सरकार ने उन्हें कोलकाता बुला लिया। दिग्गज निर्माता निर्देशक विमल रॉय एक बार बीए एन सरकार से मिलने आए। दरअसल विमल रॉय नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर एक फिल्म बनाना चाहते थे।
इसी सिलसिले में विमल रॉय किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहते थे जो आजाद हिंद फौज का हिस्सा रहा हो। बीएन सरकार ने विमल रॉय को नजीर हुसैन से मिलवाया। पहले तो नजीर हुसैन फिल्मों में काम करने के नाम पर हिचकिचाए फिर विमल रॉय के समझाने पर मान गए। यह फिल्म है पहला आदमी। सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज पर बनी इस फिल्म में नज़र हुसैन ने सिर्फ अभिनय ही नहीं किया था बल्कि कहानी और डायलॉग भी लिखे थे। इस तरह हिंदी फिल्मों में नज़र हुसैन का आगमन हुआ और वो चरित्र अभिनेता के तौर पर स्थापित हुए। नहीं पहुंच पाएगा।
मेरा बेटा हीरा हीरालाल साल 1960 में एक अवार्ड फंक्शन के दौरान नजीर हुसैन की मुलाकात भारत के राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से हुई। दोनों मूल रूप से बिहार के थे इसलिए दोनों के बीच एक दोस्ताना संबंध बन गया। एक दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नजीर हुसैन से कहा कि तुम्हें भोजपुरी में फिल्म बनानी चाहिए। नजीर हुसैन ने इस बात को गंभीरता से लिया। नजीर हुसैन ने विधवा पुनर्विवाह पर एक कहानी लिखी थी जिस पर विमल रॉय फिल्म बनाने वाले थे। विमल रॉय से रिक्वेस्ट करके नजीर हुसैन ने वो कहानी वापस ले ली। अब कहानी तो थी लेकिन फिल्म बनाने के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मदद के लिए आगे आए। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने आरा के एक बड़े उद्योगपति विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी को चिट्ठी लिखकर पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण को फाइनेंस करने के लिए आग्रह किया। विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी फिल्म को फाइनेंस करने को तैयार हो गए। शुरुआत में फिल्म के बजट का अनुमान ₹1.5 लाख का था।
लेकिन फिल्म लगभग 5 लाख में बनकर तैयार हुई। यह पहली भोजपुरी फिल्म है। गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाई बो। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं असीम कुमार, कुमकुम, नजीर हुसैन और तिवारी। उस समय के हिसाब से विधवा पुनर्विवाह एक विवादित विषय था। फिर भी फिल्म बहुत सफल रही और भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। बेशक नजीर हुसैन, राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद की तरह सुपरस्टार नहीं है। लेकिन फिर भी हिंदी भोजपुरी सिनेमा के लिए और देश के लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।