क्या कोई इंसान अपनी ही बीवी से 35 साल अलग रहकर भी उसे कभी तलाक दिए बिना पूरी जिंदगी निकाल सकता है? क्या किसी सुपरस्टार का बेइंतहा जुनून और हद से ज्यादा शक किसी खूबसूरत हीरोइन को शराब और डिप्रेशन के गहरे अंधेरे में धकेल सकता है और कैसे एक बंद होटल के कमरे में पकड़े गएंगे हाथों ने 90 के दशक की सबसे विस्फोटक प्रेम कहानी की धज्जियां उड़ा दी थी। दोस्तों अक्टूबर 2026 की उस मनहूस सुबह जब गोवा से यह खबर आई कि 75 साल की उम्र में नाना पाटेकर इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री में सन्नाटा पसर गया। जिस भारी गरजती और बेबाक आवाज ने चार दशकों तक सिनेमा के पर्दे पर आग लगाई थी, वो अचानक हमेशा के लिए शांत हो गई थी। जब उनका पार्थिव शरीर महाराष्ट्र के पुणे जिले के डोंजे गांव स्थित उनके फार्म हाउस पर लाया गया और राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार की रस्में पूरी की जा रही थी। तब वहां मौजूद हर शख्स की आंखें एक बेहद भावुक और हैरान कर देने वाले मंजर पर टिक गई। पुलिस के जवानों ने पूरे सम्मान के साथ तिरंगा लपेटा और उसे थमाया नीलकंती पाटेकर के हाथों में। यह वही नीलकंती थी जिनसे नाना पिछले 35 सालों से अलग रह रहे थे। जिनके साथ उनका कोई आम पति-पत्नी जैसा रिश्ता नहीं बचा था। लेकिन दुनिया के हर कानून और परंपरा की नजर में वही उनकी असली और एकमात्र अर्धांगिनी थी। और ठीक उसी वक्त मीनो दूर से सोशल मीडिया पर एक भावुक संदेश आया मनीषा कोयराला का। जिसमें उन्होंने नाना को भारतीय सिनेमा का सच्चा लेजेंड बताते हुए श्रद्धांजलि दी। लेकिन उस एक छोटे से संदेश ने 90 के दशक के उस बवंडर की याद ताजा कर दी जिसने कभी पूरे बॉलीवुड को हिला कर रख दिया था। एक तरफ वो पत्नी थी जिसे नाना ने कभी छोड़ा नहीं। और दूसरी तरफ वो महबूबा थी
जिसे नाना कभी पूरी तरह अपना ना सके। इस उलझी हुई प्रेम कहानी की जड़े तलाशने के लिए हमें वक्त का पहिया घुमा कर साल 1978 में ले जाना होगा। जब नाना पाटेकर 27 साल के एक नौजवान थे। उस दौर में नाना के पास ना तो नाम था ना पैसा और ना ही कोई पक्का ठिकाना। वे मुंबई में मराठी रंगमंच पर छोटे-मोटे नाटक किया करते थे। जहां हर एक शो के उन्हें सिर्फ ₹50 मिला करते थे। महीने भर में 15-20 नाटक करने के बाद उनकी जेब में बा मुश्किल ₹750 आते थे। जिससे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी किसी जंग से कम नहीं था। इसी थिएटर की रिहर्सल के दौरान उनकी नजर पड़ी नीलकंती पर जो किसी भी मायने में एक साधारण लड़की नहीं थी। नीलकंती का दिमाग इतना तेज था कि उन्होंने फिजिक्स में ग्रेजुएशन करने के साथ-साथ देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली आईआईटी की एंट्रेंस एग्जाम भी पास कर ली थी। उनके पास एक शानदार करियर बनाने का सुनहरा मौका था। लेकिन उन्होंने अपने दिल की सुनी और थिएटर की दुनिया में कदम रखा। जब नीलकंती ने नाना का जुनून, उनकी आंखों की भूख और कला के प्रति उनका पागलपन देखा तो वे अपना दिल हार बैठी। दोनों ने शादी का फैसला किया लेकिन इस शादी की बुनियाद किसी फिल्मी रोमांस से बिल्कुल अलग थी। नीलकंती उस समय एक सरकारी बैंक में बड़ी अफसर थीं और हर महीने ₹2.5 हजार कमाती थी। जो उस जमाने में एक बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। जब नाना अपनी कला के पीछे भाग रहे थे तब नीलकंती ने पूरे घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली थी।
नाना ने खुद कई इंटरव्यूज में यह बात सीना ठोक कर मानी थी कि अगर नीलकंती उनके जीवन में ना होती और उनके सपनों को आर्थिक सहारा ना देती तो नाना पाटेकर नाम का अभिनेता शायद कभी पैदा ही नहीं हो पाता। नीलकंती ने कभी नाना से पैसों का हिसाब नहीं मांगा। कभी उनसे यह नहीं कहा कि तुम कोई पक्की नौकरी ढूंढ लो। उन्होंने नाना को उड़ने के लिए पूरा आसमान दे दिया। लेकिन वे यह नहीं जानती थी कि किस्मत उनके आंगन में एक ऐसा तूफान भेजने वाली थी जो उनके पूरे वजूद को हिला कर रख देगा। शादी के कुछ ही सालों बाद दोनों के घर खुशियों की किलकारी गूंजी और उनके पहले बेटे दुर्वासा का जन्म हुआ। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन टिक नहीं सकी। क्योंकि मासूम दुर्वासा जन्म से ही कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा था। महज 2 1/2 साल की नन्ही उम्र में दुर्वासा ने अपने माता-पिता की गोद में दम तोड़ दिया। इस भयानक सदमे ने नाना के दिमाग पर ऐसा असर किया कि वे पूरी तरह टूट गए। वे खुद को अपने बच्चे की मौत का जिम्मेदार मानने लगे। वे दिन भर में 60-60 सिगरेट फूंकने लगे। रातों की नींद गायब हो गई और उनका गुस्सा बेकाबू होने लगा। हालांकि बाद में उनके दूसरे बेटे मल्हार का जन्म हुआ जिसने परिवार में खुशियां लौटाने की कोशिश की। लेकिन सच तो यह था कि दुर्वासा के जाने के साथ ही नाना और नीलकंती के रिश्ते की डोर हमेशा के लिए कमजोर पड़ चुकी थी। सालों बीतते गए और नाना के मिजाज की कड़वाहट उनका उग्र स्वभाव और नीलकंती की अपनी स्वतंत्र सोच के बीच टकराव बढ़ता चला गया। दोनों के बीच बातचीत कम और खामोशी ज्यादा होने लगी। लेकिन यहां बॉलीवुड के आम रिश्तों जैसा ड्रामा नहीं हुआ। जहां लोग अदालतों के चक्कर लगाते हैं, एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और करोड़ों की एलुमिनी मांगते हैं। नाना और नीलकंती ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसने पूरे समाज को हैरान कर दिया। उन्होंने बिना किसी कानूनी लड़ाई, बिना किसी कोर्ट कचहरी और बिना तलाक की अर्जी दिए एक दूसरे से अलग रहने का फैसला कर लिया। नाना अपनी बूढ़ी मां को लेकर मुंबई के एक बेहद सादे वन रूम किचन फ्लैट में रहने चले गए। जबकि नीलकंती अपनी जिंदगी की राह पर आगे बढ़ गई। 35 सालों तक दोनों अलग रहे लेकिन हर रोज एक दूसरे का हालचाल लेते रहे। एक दूसरे के सुख-दुख में खड़े रहे और हमेशा एक दूसरे का सम्मान किया। नाना अक्सर गर्व से कहते थे कि हम तलाकशुदा नहीं हैं। हम बस अलग रहते हैं ताकि हमारे बीच का प्यार और इज्जत कभी खत्म ना हो। जब नाना अपनी शादीशुदा जिंदगी के इस शांत और अनोखे समझौते में जी रहे थे, तभी 90 के दशक के मध्य में एक ऐसा सितारा चमका जिसने नाना की जिंदगी की पूरी दिशा ही बदल दी। साल 1996 में निर्देशक पार्थो घोष की एक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की शूटिंग शुरू हुई जिसका नाम था अग्नि साक्षी। इस फिल्म की लीड एक्ट्रेस थी मनीषा कोयराला, जो नेपाल के एक शाही राजनीतिक खानदान से ताल्लुक रखती थी। और उस वक्त बॉलीवुड की नंबर वन हीरोइनों की कतार में खड़ी थी। अपनी मासूम खूबसूरती, कातिलाना मुस्कान और बेहतरीन अदाकारी से लाखों दिलों पर राज करने वाली मनीषा उस वक्त अंदर से बेहद तन्हा और टूटी हुई थी। क्योंकि बॉलीवुड एक्टर विवेक मुशरान के साथ उनका पहला सीरियस अफेयर बुरी तरह टूट चुका था और उन्हें किसी ऐसे मजबूत कंधे की तलाश थी जो उन्हें जिंदगी में संभाल सके।
फिल्म अग्नि साक्षी की कहानी में नाना पाटेकर एक ऐसे वैशी सनकी और हिंसक पति का रोल कर रहे थे जो अपनी खूबसूरत बीवी पर जुल्म ढा है और उस पर बेइंतहा शक करता है। जबकि मनीषा उस बेबस और प्रताड़ित पत्नी के किरदार में थी। कैमरे के सामने जब दोनों का आमना-सामना हुआ, तो चिंगारियां सिर्फ रियल लाइफ में नहीं उड़ी, बल्कि रियल लाइफ में भी शोले भड़क उठे। फिल्म के लेखक रणबीर पुष्प ने बाद में खुलासा किया था कि नाना और मनीषा के बीच सेट पर एक अजीब तरह का आकर्षण था। वे घंटों तक एक कोने में बैठकर अपने सींस पर बात करते, एक दूसरे की आंखों में खोए रहते और जैसे ही डायरेक्टर कट बोलता उनका यह संवाद खत्म होने का नाम नहीं लेता था। पर्दे पर नाना और मनीषा की जो खौफनाक केमिस्ट्री नजर आई, उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए और नाना को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवार्ड भी दिलाया। लेकिन पर्दे के पीछे नाना का वो इंटेंस व्यक्तित्व मनीषा के दिल में इस कदर उतर गया कि वे उनकी उम्र के फासले, उनके शादीशुदा होने और उनके मिजाज की तल्खी को पूरी तरह भूलकर उनके प्यार की गिरफ्त में आ गई। उसी साल यानी 1996 में ही संजय लीला भंसाली की मास्टर पीस फिल्म खामोशी द म्यूजिक रिलीज हुई। जिसने इस रिश्ते को और ज्यादा गहरा कर दिया। यह सिनेमा की सबसे बड़ी विडंबना थी कि जिस वक्त अखबारों और फिल्मी गॉसिप पत्रिकाओं में नाना और मनीषा के बेपनाह इश्क के चर्चे छप रहे थे उसी वक्त बड़े पर्दे पर नाना पाटेकर मनीषा के गूंगे बहरे पिता जोसेफ ब्रैगेंजा का किरदार निभा रहे थे। पर्दे पर एक बेटी के प्रति पिता का वो ममतामई प्यार देखकर लोग सिनेमाघरों में रो पड़े थे। लेकिन असल जिंदगी में दोनों एक दूसरे के प्यार में दीवाने हो चुके थे। नाना की कार अक्सर देर रात बैंड्रा में मनीषा के अपार्टमेंट के बाहर खड़ी देखी जाती थी। पड़ोसी बातें बनाने लगे थे और मीडिया के कैमरे उनके पीछे पड़ गए थे। खुद नाना ने भी यह बात छुपाने की कोशिश नहीं की और माना कि मनीषा उनके घर आती थी। उनकी मां के पैर छूती थी और उनके बेटे मल्हार के साथ घंटों घुल मिलकर वक्त बिताती थी। ऐसा लगने लगा था कि जैसे नाना को अपनी जिंदगी का खोया हुआ सुकून मिल गया हो। लेकिन बॉलीवुड की प्रेम कहानियां जितनी हसीन पर्दे पर दिखती हैं, उनके पीछे की हकीकत उतनी ही डरावनी होती है। नाना पाटेकर का प्यार कोई आम प्यार नहीं था। वो एक ऐसा जुनून था जिसमें सामने वाले को पूरी तरह अपनी मुट्ठी में कैद कर लेने की जिद थी। नाना का उग्र और शक्की मिजाज धीरे-धीरे मनीषा की आजादी पर पहरा बैठाने लगा। वे मनीषा के कपड़ों पर ऐतराज जताने लगे। उन्हें पार्टीज में वेस्टर्न या मॉडर्न ड्रेस पहनने से रोकने लगे और यह तय करने लगे कि वे किस को-स्टार के साथ बात करेंगी और किसके साथ नहीं। जब भी मनीषा किसी दूसरे हीरो के साथ दोस्ताना अंदाज में हंसकर बात करती नाना का पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता था। मनीषा जो एक आजाद ख्याल, पढ़ी लिखी और अपने दम पर जीने वाली मॉडर्न लड़की थी, उनके लिए यह प्यार धीरे-धीरे एक घुटन भरा पिंजरा बन गया। उन्हें लगने लगा कि जिस इंटेंसिटी और मजबूती को देखकर वे नाना के करीब आई थी, वही इंटेंसिटी अब उनकी अपनी पहचान को निगल रही है। इस घुटन के बीच सबसे बड़ी दीवार बनकर खड़ी थी नाना की शादीशुदा जिंदगी। मनीषा इस रिश्ते को दुनिया की नजरों में एक जायज मुकाम देना चाहती थी। वे चाहती थी कि नाना उनसे शादी करें। उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा दें और वे दोनों एक आम जोड़े की तरह खुलकर दुनिया के सामने आए। लेकिन जब भी मनीषा शादी की बात छेड़ती नाना एक कदम पीछे खींच लेते। मनीषा की सीधी सी मांग थी कि अगर आप अपनी पत्नी नीलकंती के साथ नहीं रहते अगर आप दोनों पिछले कई सालों से अलग हैं तो फिर आप उन्हें कानूनी तौर पर तलाक क्यों नहीं दे देते? लेकिन नाना का साफ कहना था कि वे दुनिया में कुछ भी कर सकते हैं। पर नीलकंती को कभी तलाक नहीं देंगे। नीलकंती उनके बुरे वक्त की साथी थी। उनके संघर्ष की गवाह थी और नाना किसी भी कीमत पर उस रिश्ते के कागज को फाड़ना नहीं चाहते थे। इस एक इंकार ने मनीषा के दिल में असुरक्षा और बेबसी का ऐसा जहर घोल दिया कि उनके बीच आए दिन भयानक झगड़े होने लगे। घर की दीवारों ने चीखें सुनी, दरवाजे पटके जाने लगे, और प्यार की जगह कड़वाहट ने ले ली। रिश्ते की यह डगमगाती कश्ती अभी डूबने से बच ही रही थी कि 1997 के आखिर में कहानी में एक तीसरे किरदार की एंट्री हुई जिसने इस आग में घी डालने का काम किया। उस वक्त नाना पाटेकर निर्देशक मेहुल कुमार की फिल्म युगपुरुष की शूटिंग कर रहे थे। जिसमें उनके साथ मनीषा भी थी। लेकिन इसी दौरान नाना की नजदीकियां बढ़ने लगी 90 के दशक की चुलबुली और बेहद हसीन एक्ट्रेस आयशा जुल्का के साथ। जो जीता वही सिकंदर और खिलाड़ी जैसी सुपरहिट फिल्मों से तहलका मचाने वाली आयशा जुल्का उस वक्त नाना के साथ एक थिएटर प्ले और कुछ बोल्ड फोटोशूट्स में काम कर रही थी। बॉलीवुड के गलियारों में यह सुगबुगाहट तेज हो गई कि नाना का दिल अब मनीषा से ऊबकर आयशा की तरफ खींचने लगा है। मनीषा के कानों तक जब ये बातें पहुंची तो उनका शक यकीन में बदलने लगा। लेकिन वे अपनी आंखों से सच देखना चाहती थी और फिर वो दिन आ ही गया। जिसने इस पूरी प्रेम कहानी का सबसे खौफनाक और शर्मनाक ड्रामा देखा। बॉलीवुड के इनाइडर्स के मुताबिक मनीषा को किसी ने खबर दी कि नाना और आयशा एक नामी होटल के कमरे में एक साथ हैं। मनीषा बिना कुछ सोचे समझे गुस्से में आग बबूला होकर उस होटल पहुंची और सीधे उस कमरे का दरवाजा खटखटाया। जैसे ही दरवाजा खुला, सामने का नजारा देखकर मनीषा के पैरों तले जमीन खिसक गई। नाना और आयशा को बेहद करीबी हालत में देखकर मनीषा का सारा सब्र टूट गया। उस दौर की पत्रिकाओं की रिपोर्ट्स बताती हैं कि मनीषा ने आपा खो दिया और वे कमरे के भीतर ही आयशा जुल्का पर झपट पड़ी। उन्होंने चीखते हुए आयशा से कहा कि वह उनके मर्द से तुरंत दूर हो जाएं और अपनी हद में रहे। होटल के उस कमरे में जो तमाशा हुआ, उसने 90 के दशक के सारे गॉसिप रिकॉर्ड तोड़ दिए।
उस दिन मनीषा को यह बात शीशे की तरह साफ समझ आ गई कि जिस इंसान के लिए वे अपने करियर और अपनी खुशियों को दांव पर लगा रही थी वो उन पर तो पाबंदियां लगाता था लेकिन खुद किसी भी कायदे को मानने के लिए तैयार नहीं था। मनीषा का दिल हमेशा के लिए टूट गया और उन्होंने उसी रात नाना पाटेकर से अपना हर नाता तोड़ लिया। युगपुरुष फिल्म की जो शूटिंग बची हुई थी, वह किसी यातना से कम नहीं थी। सेट पर दोनों मौजूद रहते थे। कैमरे के सामने अपने डायलॉग बोलते थे, लेकिन जैसे ही शॉट खत्म होता, दोनों एक दूसरे की तरफ देखते तक नहीं थे। दोनों के बीच बात करने के लिए असिस्टेंट डायरेक्टर्स को बीच में आना पड़ता था। शूटिंग खत्म होते ही मनीषा ने अपनी जिंदगी का यह सबसे दर्दनाक पन्ना हमेशा के लिए पलट दिया। हालांकि इस पूरे हंगामे के दशकों बाद आयशा जुल्का ने जब कई सालों बाद पत्रकारों को इंटरव्यू दिए तो उन्होंने इस पूरी घटना को सिरे से खारिज कर दिया। आयशा का कहना था कि उनका नाना पाटेकर के साथ कभी कोई रोमांटिक या लिव इन रिलेशनशिप रहा ही नहीं था। आयशा ने सफाई देते हुए कहा कि नाना उम्र और तजुर्बे में उनसे बहुत बड़े थे और वे उन्हें हमेशा एक छोटी बच्ची या स्टूडेंट की तरह ट्रीट करते थे। आयशा ने दावा किया कि मनीषा और नाना के ब्रेकअप में उनका कोई हाथ नहीं था और उस दौर की मीडिया ने महज मिर्च मसाला लगाने के लिए उनका नाम घसीट लिया। ठीक वैसे ही जैसे कभी अक्षय कुमार के साथ उनकी दोस्ती को जबरन अफेयर का नाम दे दिया गया था। लेकिन आयशा चाहे जो भी कहें, हकीकत यही थी कि उस होटल के ड्रामे ने नाना और मनीषा के प्यार की चिता उसी दिन जला दी थी। इस ब्रेकअप ने सिर्फ मनीषा को ही नहीं तोड़ा बल्कि उस सख्त और फौलादी नाना पाटेकर को भी अंदर से खोखला कर दिया जो कभी किसी के सामने सिर नहीं झुकाते थे। साल 1997 में जब एक पत्रकार ने नाना से मनीषा के बारे में सवाल पूछा तो कैमरे के सामने जो हुआ, उसने पूरी इंडस्ट्री को सन कर दिया। पर्दे पर विलेन की हड्डियां तोड़ने वाले नाना पाटेकर अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए और कैमरे के सामने फफ कर रो पड़े। कांपती आवाज में नाना ने स्वीकार किया कि यह ब्रेकअप उनकी जिंदगी का सबसे भयानक दौर है। उन्होंने कहा कि इस दर्द को लफ्जों में बयां नहीं किया जा सकता। इसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसके सीने पर यह बीती हो। वे आज भी मनीषा को बेपनाह याद करते हैं। उसी इंटरव्यू में नाना ने मनीषा के बारे में बात करते हुए एक ऐसी बात कही जो आज भी बॉलीवुड के इतिहास में अमर है। उन्होंने मनीषा की तुलना कस्तूरी हिरन से करते हुए कहा कि मनीषा खुदा की बनाई हुई सबसे नायाब अदाकारा हैं। वे उस कस्तूरी हिरन की तरह हैं जिसे खुद यह नहीं पता कि जिस खुशबू की तलाश में वह दर-दर भटक रहा है, वह खुशबू तो उसकी अपनी नाभि के भीतर ही मौजूद है। उसे किसी की होड़ में भागने की जरूरत नहीं है। वह अपने आप में मुकम्मल है। नाना ने रूंधे गले से कहा था कि जब मैं देखता हूं कि मनीषा अपनी जिंदगी के साथ क्या कर रही हैं।
वे खुद को कैसे बर्बाद कर रही हैं तो मेरे आंसू थमने का नाम नहीं लेते। नाना का यह डर बिल्कुल सच साबित हुआ क्योंकि इस ब्रेकअप के बाद मनीषा पूरी तरह बिखर चुकी थी। अकेलेपन और डिप्रेशन के उस भयानक दौर में उन्होंने खुद को भुलाने के लिए शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। अपनी आत्मकथा हील्ड में मनीषा ने बेबाकी से कबूल किया है कि उस दौर में वे दर्द को सुन्न करने के लिए सुबह शाम वोटका पीने लगी थीं। शूटिंग का तनाव और टूटे हुए दिल का दर्द उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। बाद में साल 2010 में उन्होंने नेपाली बिजनेसमैन सम्राट दहाल से शादी करके अपनी जिंदगी को संवारने की कोशिश की। लेकिन वो शादी भी महज 2 साल में तलाक की दहलीज पर खत्म हो गई। इसके बाद जब उन्हें कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी ने घेरा तो उन्होंने मौत के मुंह से लड़कर वापसी की और एक नई जिंदगी की शुरुआत की। लेकिन उस पुराने प्यार का जख्म शायद उनके दिल के किसी कोने में हमेशा हरा रहा। इसके अलावा नाना पाटेकर के इस उलझे हुए और खतरनाक व्यक्तित्व की सबसे सटीक और बेबाक तस्वीर खींची थी मशहूर अभिनेत्री डिंपल कपाडिया ने। डिंपल ने नाना के साथ प्रहार, अंगार और खासकर साल 1994 की ब्लॉकबस्टर फिल्म क्रांतिवीर में काम किया था। साल 2010 में जब दोनों कई सालों बाद फिल्म तुम मिलो तो सही में दोबारा साथ आए, तो जानेमाने पत्रकार अनुपमा चोपड़ा ने डिंपल से पूछा कि नाना के साथ दोबारा काम करने का अनुभव कैसा रहा? डिंपल कपाड़िया ने बिना एक पल गवाए सीधा जवाब दिया कि नाना बेहद अप्रिय और बदमिजाज इंसान है। जब अनुपमा ने हैरान होकर पूछा कि क्या आप यह मजाक में कह रही हैं या सीरियसली? तो डिंपल ने गंभीर होकर कहा कि मैं दोनों ही मायनों में कह रही हूं। डिंपल ने आगे जो कहा वह नाना के पूरे वजूद का सबसे बड़ा एक्सरे था। डिंपल ने कहा कि एक अभिनेता के तौर पर नाना इतने महान हैं कि उनकी प्रतिभा के सामने 100 खून भी माफ हैं। वे इतने जीनियस हैं कि अगर वे किसी की जान भी ले लें तो भी उन्हें माफ किया जा सकता है। व्यक्तिगत तौर पर वे मेरे लिए हमेशा बहुत अच्छे और मददगार रहे हैं। लेकिन मैंने नाना का वो भयानक डार्क साइड भी देखा है जिससे लोग खौफ खाते हैं। हर इंसान के अंदर एक अंधेरा कोना होता है जिसे वह छुपा कर रखता है। लेकिन नाना के भीतर वह अंधेरा बहुत गहरा और खतरनाक है जिसे वे बहुत संभाल कर रखते हैं। डिंपल की इस एक बात ने यह साबित कर दिया कि नाना पाटेकर सिर्फ पर्दे पर ही आग नहीं उगलते थे बल्कि असल जिंदगी में भी उनके अंदर एक ऐसा ज्वालामुखी धकता था जो उनके करीब आने वाले हर इंसान को झुलसा देता था। यही नाना पाटेकर की जिंदगी का सबसे बड़ा अंतर्विरोध था। एक तरफ वे वो इंसान थे जिसने नाम फाउंडेशन बनाकर महाराष्ट्र के गरीब, बेबस और कर्ज में डूबे किसानों के लिए अपनी तिजोरी खोल दी। खुद मुंबई के एक कमरे के फ्लैट में साधारण चटाई पर सोए और लाखों लोगों की दुआएं बटोरीं। लेकिन दूसरी तरफ, निजी जिंदगी के आंगन में वे एक ऐसे कैदी थे जो अपने ही गुस्से, अपने पज़ेसिवनेस और कमिटमेंट के डर से कभी आजाद नहीं हो सके। वे नीलकंती को छोड़ नहीं सके क्योंकि उनमें वफादारी की एक अजीब सी ज़िद थी और वे मनीषा को पा नहीं सके क्योंकि उनमें अपनी जिद को कुर्बान करने का हौसला नहीं था। नाना पाटेकर चले गए अपने पीछे कालजई फिल्में छोड़कर। लेकिन उनकी यह दास्तान हमेशा याद दिलाती रहेगी कि कभी-कभी सबसे ज्यादा प्यार करने वाला इंसान ही सबसे ज्यादा दर्द देने वाला बन जाता है।