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जब ‘भारत कुमार’ से पंगा लेना शाहरुख को पड़ा भारी: 100 करोड़ के मानहानि दावे की पूरी कहानी

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जिंदगी की ना टूटे लड़ी। यह कहानी है एक ऐसे अभिनेता की जिसकी फिल्में सिल्वर और गोल्डन जुबली बनाती थी। आज भी अगर कोई देशभक्ति की बात करता है तो उसके दिमाग में पहला गीत यह आता है। मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। ओ मेरे देश की धरती। वह हीरो जिसने जब यह गाया भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं। तो लोगों ने उसका नाम ही भारत रख दिया था। तो हम बात कर रहे हैं सात फिल्मफेयर अवार्ड और आठ दूसरे अवार्ड और पद्मश्री से सम्मानित एक्टर मनोज कुमार की। तू है तो दुनिया कितनी हंसी है जो तू नहीं तो कैसे बंटवारे के समय शरणार्थी शिविर में अपना बचपन बिताने वाला हर कृष्ण गिरी गोस्वामी नाम का एक लड़का मनोज कुमार बना क्यों राज कपूर उनकी गोद में सिर रखकर रोने लगी थी। आखिर क्यों सरकार उनसे इतना डरती थी कि उनकी फिल्मों को रिलीज नहीं होने दिया जाता था। मैं अपने देश को आजाद देखना चाहता हूं। जो जंजीरें गैरों ने मां के पांव में पहना दी उन्हें काट के रख देना चाहता हूं। ऐसा क्या हुआ था कि मनोज कुमार ने शाहरुख खान पर 100 करोड़ का मानहानि का दावा कर दिया था। उनकी मौत का वो कौन सा चौंकाने वाला सच है जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। जानेंगे और भी बहुत कुछ। तो चलिए शुरू करते हैं। है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं। मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को अबोटाबाद में हुआ था जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। लेकिन उस समय यह पूरा भारत ही था। उनके पिता का नाम था एचएल गोस्वामी और मां का नाम था कृष्ण कुमारी गोस्वामी। मनोज कुमार का असली नाम था हर कृष्ण गिरी गोस्वामी। ये तो लेटेस्ट न्यूज़ है। जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तो उनके पिता ने भारत में रहना चुना, और वो पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गए। उनका परिवार लंबे समय तक दिल्ली में शरणार्थी कैंप में रहा और वहीं मनोज कुमार का बचपन बीता। घर की हालत इतनी खराब थी कि छोटी उम्र में ही हर कृष्ण फैक्ट्री में काम करने लगे थे और वह साइकिल पर फैक्ट्री का सामान ढोते थे। धीरे-धीरे उनके परिवार की हालत कुछ ठीक हुई और हर कृष्ण पढ़ाई लिखाई करने लगे। उन्होंने हिंदू कॉलेज से अपनी डिग्री की। हमारे जमाने में स्कूल कॉलेज को मंदिर माना जाता था। तब पढ़ने वाला यह जानता था कि इधर पढ़ाई खत्म और उधर नौकरी पक्की। लेकिन आज का स्टूडेंट अंधेरे में है। वो नहीं जानता कि बड़ी से बड़ी डिग्री पाने के बाद उसे नौकरी मिलेगी या नहीं। एक दिन वह दिलीप कुमार की एक फिल्म देखने गए। फिल्म का नाम था शबनम और इस फिल्म के हीरो का नाम था मनोज कुमार।

हर कृष्ण पर इस किरदार का इतना असर हुआ कि उन्होंने अपना नाम ही बदल लिया और वह हर कृष्ण गिरी गोस्वामी से बन गए मनोज कुमार। और बस वह हीरो बनने का सपना देखकर घर से निकल पड़े। रघुपति राघव राजा रामपति एक दिन उनकी मुलाकात उनके बुआ के लड़के लेखराज से हुई जो एक फिल्म मेकर थे। उन्होंने मनोज कुमार को देखते ही कहा तुम तो हीरो जैसे दिखते हो। तो मनोज कुमार ने भी तुरंत कह दिया तो बना दो मुझे हीरो। लेखराज ने कहा कि ठीक है देखते हैं। तुम पहले बंबई आ जाओ। मनोज कुमार सिर्फ ₹3 लाख कमाने का उद्देश्य लेकर मुंबई आए थे। उन्हें ₹1 एक लाख अपने मां-बाप को देने थे और ₹1 लाख अपने भाई-बहन में बांटने थे। बस इतना सा सपना लेकर हर कृष्ण गिरी गोस्वामी नाम का लड़का मुंबई आ गया था। एक तारा बोले सुन सुन क्या कहे ये तुमसे सुन सुन एक छ महीनों तक वह मुंबई में धक्के खाते हुए फिरते रहे। इसके बाद उन्होंने लेखपाल से उन्हें काम देने को कहा। इसके बाद उस फिल्म मेकर लेखपाल ने मनोज को अपनी फिल्म में काम देने का वादा भी कर दिया। 1957 में पहली बार मनोज कुमार फिल्म फैशन में दिखाई दिए और 18 साल के मनोज कुमार ने 70 साल के बूढ़े भिखारी का किरदार निभाया जिसमें उन पर फिल्माया गया यह गाना माटी को ना जाना देश है महान इसकी शान को मिटाना बड़ा हिट हुआ। इसके बाद मनोज कुमार को फिल्म में काम मिलने लगा और वह सहारा, चांद, पंचायत, पिया मिलन की आस, कांच की गुड़िया, मां-बेटा जैसी कई फिल्मों में काम करते हुए दिखाई देने लगे। लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बहुत बड़ी हिट नहीं हो पाई। 1962 में मनोज कुमार की फिल्म आई हरियाली और रास्ता और इस फिल्म ने मनोज कुमार को हर किसी का चहेता बना दिया। जी करता है खुद ही घोट दे अपने अरमान। फिल्म के गाने बड़े हिट हुए और यह फिल्म भी एक कल्ट क्लासिक फिल्म बन गई। इसके बाद तो मनोज कुमार के सामने फिल्मों की लाइन लग गई और उन्होंने एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्मों में काम किया। 1964 में एक फिल्म आई जिसका नाम था वो कौन थी और यह फिल्म उस समय की इतनी बड़ी हिट फिल्म बनी कि लोगों ने इसे सबसे बेहतरीन क्लासिक फिल्म बता दिया था। फिल्म का यह गाना लग जा गले के फिर हंसी रात आज भी लोग दिल की गहराइयों से सुनते हैं। इसके बाद फूलों की सेज अपने हुए पराए वो फिल्में रही जिन्होंने मनोज कुमार को हर किसी का पसंदीदा एक्टर बना दिया था और वह एक बड़ा नाम बन चुके थे। फिल्म का नाम था शहीद और जब 1965 में फिल्म थिएटर में लगी तो इसने पूरे देश को देशभक्ति से भर दिया। यह वो पहली फिल्म थी जिसने देश के युवाओं में ऐसा जोश भरा कि लोग भगत सिंह के लिए सड़कों पर उतर कर रोए। ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम तेरी राहों और इस फिल्म के गानों की तो क्या ही तारीफ की जाए जिसकी कॉपी करके बॉलीवुड आज तक अपना पेट भर रहा है। ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे बसंती चोला माहे रंग दे इस फिल्म का हर गाना हिट था और शहीद फिल्म उस समय की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनी जिसने मनोज कुमार को एक एक्टर से नेशनल सुपरस्टार बना दिया था और इस फिल्म के लिए मनोज कुमार को उनका पहला नेशनल अवार्ड भी मिला था पगड़ी संभाल जटा पग पगड़ी संभाल होए ओ पगड़ी संभाल जटा पगड़ी संभाल होए इसके बाद सिनेमा की तस्वीर बदली और अब सिनेमा रंगीन हो गया और कलरफुल सिनेमा में मनोज कुमार की पहली फिल्म आई हिमालय की गोद में और इस फिल्म ने भी कमाल कर दिया चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था फिल्म में उनकी हीरोइन थी माला सिन्हा जिनका यह गाना एक तू जो मिला सारी दुनिया मिले हिला जो मेरा दिल बड़ा हिट हुआ और जब मनोज कुमार ने यह गाया हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था तो लोग उनके दीवाने हो गए। इसके बाद आई फिल्म गुमनाम। 1965 की इस फिल्म को उस समय की सबसे बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फिल्म बताया गया था। गुमनाम है कोई बदनाम है और इस फिल्म ने मनोज कुमार को टॉप का अभिनेता बना दिया था। फिल्म के गाने आज भी बॉलीवुड के क्लासिकल सॉन्ग्स की लिस्ट में शामिल रहते हैं। एक लड़की है जिसने जीना मुश्किल कर दिया। वो मेरे दिल मेरे हमदम बाहों में आ गया। इसके बाद भी पूनम की रात, बेदाग, सावन की घटा, पिकनिक, दो बदन जैसी कई बेहतरीन फिल्में आई। जिसके बाद मनोज कुमार हर किसी के वो पसंदीदा एक्टर बन चुके थे जिसके सामने कोई दूसरा एक्टर टिकता भी नहीं था। 1967 में मनोज कुमार की फिल्म आई पत्थर के सनम और इस फिल्म के सामने तो आज की 200 करोड़ में बनने वाली कहानी ने लोगों के दिल में घर कर लिया और फिल्म के गानों की तो क्या ही तारीफ की जाए। हर गाना दिल में उतरने वाला था। महबूब मेरे तू है

तो दुनिया कितनी हंसी है। तौबा यह मत वाली चाल झुक जाए फूलों की डाल। ये छोटा सा नजराना पिया याद रखोगे कि भूल जाओगे। जिसे अगर आज भी कोई सुन ले तो बस उस गाने में खो ही जाए। इसके बाद आई अनीता और यह फिल्म भी बेहतरीन थी और इसके बाद आई वह फिल्म जिसके बाद मनोज कुमार घर-घर में चर्चित हो गई। फिल्म का नाम था उपकार और इस फिल्म को कौन भूल सकता है? मेरे देश की धरती। फिल्म में जब मनोज कुमार ने ये गाया मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हैं हीरे मोती। ओ मेरे देश की धरती। तो इस गाने ने मानो इतिहास ही बना दिया और शायद ही कोई होगा जिसने इस गाने पर अपने स्कूल में 15 अगस्त या 26 जनवरी को कोई ना कोई प्रोग्राम ना किया हो। फिल्म में एक ऐसा सैड सॉन्ग भी था कसमे वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों जो इतना ज्यादा सैड था कि इसे सुनकर अच्छा खासा इंसान भी दिल थाम कर रोने लगता था। कोई किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं। और मनोज कुमार की यह पहली फिल्म बनी जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई और आज भी इसे मनोज कुमार की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक माना जाता है। इसके बाद नीलकमल, आदमी, साजन जैसी फिल्में भी आई। 1970 में राज कपूर की सबसे बड़ी फिल्म आई थी जिसका नाम था मेरा नाम जोकर और फिल्म में मनोज कुमार ने छोटा सा किरदार निभाया था। इंसान इस दुनिया में चार दिन की जिंदगी गुजारने आता है। लेकिन 40 दिन का गम उसे घेरे रखता है। लेकिन इस फिल्म की कहानी मनोज कुमार ने ही लिखी थी। मनोज कुमार ने बुरे समय में राज कपूर की खूब मदद की। उन्हें ना सिर्फ अपनी फिल्म की कहानी दी बल्कि उनकी फिल्म में बिना पैसे लिए काम भी किया। जब राज कपूर बुरे दौर से गुजरे तो सिर्फ मनोज कुमार थे जिसने उनका साथ दिया। और यह देखकर राज कपूर एक बार मनोज कुमार से गले लगकर खूब रोए थे। और यह बात मनोज कुमार को सच में लीजेंड बनाती थी। इसके बाद यादगार आई। मतलब फिल्म का नाम था यादगार जो सच में यादगार थी। एक तारा बोले सुन सुन क्या कहे यह तुमसे सुन सुन और फिल्म में न्यूतन का यह गाना जिस पथ पे चला उस पथ पे मुझे ऐसा था कि जिस पर लगभग 1000 से भी ज्यादा कॉपी गाने बन चुके हैं। आंचल को बिछाने में साथी 1970 में मनोज कुमार एक और ऐसी फिल्म लेकर आए जिसने फिर से इतिहास लिखा। फिल्म का नाम था पूरब और पश्चिम और इस फिल्म में भी मनोज कुमार ने हर किसी को देशभक्ति में डुबो दिया था। जब जीरो दिया मेरे भारत ने दुनिया को तब गिनती आई। इस फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए और जब मनोज कुमार ने यह गाया है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं तो यह गाना तो मानो भारत की पहचान ही बन गया। इस फिल्म में उनके किरदार का नाम था भारत और इसे लोगों ने इतना पसंद किया कि लोग उन्हें ही भारत कहकर बुलाने लगे। भारत का रहने वाला हूं। भारत की बात सुनाता हूं। थी। इसके बाद पहचान और बलिदान जैसी फिल्मों में भी मनोज कुमार को खूब पसंद किया गया। लोगों ने मनोज कुमार के देशभक्ति वाली छवि को इतना पसंद किया था कि उनका नाम ही भारत पड़ गया था। इसके बाद आई फिल्म शोर और भाई साहब इस फिल्म की भी जितनी तारीफ की जाए वो कम लगती है। फिल्म के गाने दिल को छूने वाली थी। फिर चाहे एक प्यार का नगमा है। एक प्यार का नगमा है। मौजों की रवानी और इस गाने की पॉपुलरिटी बताने की जरूरत नहीं है। जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी। फिल्म में जया बच्चन भी थी जो आज बॉलीवुड की बुड्ढ है। लेकिन उस समय पर वह बॉलीवुड की गुड्डी हुआ करती थी और उसके साथ मिलकर मनोज कुमार ने पानी का रंग बताया। पानी रे पानी तेरा रंग कैसा तो हर कोई दोनों की जोड़ी का दीवाना हो गया। जिसमें मिला दो लगे उस जैसा। इसके बाद मनोज कुमार की फिल्म आई बेईमान और इस फिल्म के लिए भी मनोज कुमार की खूब तारीफ हुई। उन्हें बेस्ट एक्टर का अवार्ड भी मिला। 1974 में मनोज कुमार की एक और ब्लॉकबस्टर फिल्म आई रोटी, कपड़ा और मकान और शायद ही कोई होगा जिसने मनोज कुमार की यह फिल्म ना देखी हो।

विजय भूख से मर जाओ कोई गम नहीं। लेकिन जियो इस देश का अच्छा शहरी बनकर। इस फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए। फिल्म में जीनत अमान उनकी हीरोइन थी और जब बारिश में भीगते हुए जीनत अमान ने यह कहा अरे हायहा मजबूरी तो हर औरत अपने नौकरी करने वाले पति से यह कहने लगी थी तेरी धोकिया नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए यह फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई कि जिसने भी इसे देखा उसने बस यही कहा मैं ना भूलूंगा मैं ना भूलूंगी इसके बाद सन्यासी आई और मनोज कुमार की यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर साबित हुई जिनमें उनकी की हीरोइन थी ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी और इसे भी लोगों ने खूब पसंद किया। हेमा मालिनी मनोज कुमार को इतनी पसंद आई कि उनके साथ अगली फिल्म भी बनाई। फिल्म का नाम था 10 नंबरी। ये दुनिया एक नंबरी दो है 10 नंबरी। और यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर बनी और वह पहले ऐसे हीरो बने जिनकी तीन फिल्में लगातार ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। और अब तो ऐसा लगने लगा था कि मनोज कुमार, दिलीप कुमार और राज कपूर से भी आगे निकल गई थी। 1977 में मनोज कुमार की फिल्म आई अमानत और यह फिल्म भी बेहतरीन थी। तेरी जवानी तपता महीना जिसके गाने भी खूब बड़े हिट हुए। मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं। और मनोज कुमार की हर तरफ वाहवाही होने लगी। इसके बाद मनोज कुमार श्रेणी के साईं बाबा लेकर आए। वो अलग बात है कि उनकी साईं बाबा वाली कहानी किसी ने नहीं देखी और यह फिल्म फ्लॉप हो गई। 1981 में मनोज कुमार की एक ऐसी फिल्म आई जिसे देखकर आज भी लोग मनोज कुमार को दिल से सलाम करते हैं। फिल्म का नाम था क्रांति और मनोज कुमार की यह पांचवी फिल्म थी जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी और फिल्म का यह गाना प्यार कर ले घड़ी घड़ी जिंदगी की आज भी लोग एवरग्रीन कहकर सुनते हैं और इस गाने में हेमा मालिनी बारिश में ऐसी लौटिंग अपना रहा हम मिलेंगे कि उसे देखकर अलग-अलग साइज की हेमा मालिनी मार्केट में ल्च हो गई थी। लाख गहरा हो सागर तो क्या प्यार कर ले प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी ये सब क्या देखना पड़ रहा है? लेकिन अब धीरे-धीरे समय बदल रहा था। मनोज कुमार की उम्र ढलने लगी थी और वह फिल्म के मेन हीरो से हटकर सपोर्टिंग एक्टर बन चुके थे। इसके बाद भी आमने-सामने कलयुग और रामायण, संतोष, क्लर्क, देशवासी जैसी कई फिल्मों में मनोज कुमार ने साइड किरदार निभाया। मनोज कुमार आखिरी बार 1995 में आई फिल्म मैदान जंग में दिखाई दिए थे। सुनो तालियों की आवाज। मैं इलेक्शन जीत गया। मनोज कुमार ने 1993 में एक फिल्म बनाई थी जिसका नाम था जय हिंद। लेकिन इसे रिलीज होने में बहुत ज्यादा समय लग गया और यह फिल्म 1999 में रिलीज हो पाई। मनोज कुमार इस फिल्म की प्रोड्यूसर थी और इसमें इतनी देरी होने के लिए मनोज कुमार मनीषा कोराला पर बहुत भड़की थी क्योंकि उसी की वजह से यह फिल्म इतनी लेट हो गई थी। मनोज कुमार सिर्फ एक एक्टर नहीं रहे बल्कि वह डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, राइटर और सिंगर भी रहे और उन्होंने कई गाने खुद लिखे भी और गाए भी। जान चमन शोला बदन पहलू में आजा मनोज कुमार बॉलीवुड के वो एक्टर रहे जिसने लगभग सात फिल्म फेयर अवार्ड अपने नाम किए थे। एक दिन मनोज कुमार भगत सिंह की मां से मिलने उनके घर गए। भगत सिंह की मां ने उन्हें देखा और देखते ही तुरंत कहा, अरे यह तो मेरे भगत जैसा ही लगता है। मनोज कुमार ने भगत सिंह की मां की गोद में अपना सिर रख दिया और भगत सिंह की मां मनोज कुमार के सामने खूब फूट-फूट कर रोने लगी। इस दृश्य ने मनोज कुमार के दिल पर गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने ठान लिया कि वह भगत सिंह के जीवन पर एक फिल्म बनाएंगे और यह फिल्म वह पैसों के लिए नहीं बनाएंगे। बस उन्हें भगत सिंह की कहानी दुनिया को बतानी है। जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे और वह फिल्म की तैयारी में लग गए। इस फिल्म के लिए मनोज कुमार ने अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी थी। उन्हें यह भी भरोसा था कि यह कोई हीरो हीरोइन वाली फिल्म नहीं है तो यह चल भी सकती है और फ्लॉप भी हो सकती है और हो सकता है कि मनोज कुमार इसके बाद डूब जाए। लेकिन फिर भी उन्होंने यह फिल्म बनाई।

फिल्म का नाम था शहीद। फिल्म शहीद के लिए मनोज कुमार को पहला नेशनल अवार्ड मिला था और वह पहले एक्टर बने जिसे फिल्म की कहानी लिखने के लिए नेशनल अवार्ड मिला था। उन्हें बेस्ट एक्टर का, बेस्ट डायरेक्टर का, बेस्ट राइटर जैसे कई अवार्ड मिल चुके थे और वह दादा साहब फाल्के अवार्ड और पद्म विभूषण से भी सम्मानित किए गए थे। उनकी फिल्में समाज पर इतना असर डालती थी कि सरकार भी घबरा जाती थी। बाकी कुछ बता तो मार गई। एक समय पर जब इंदिरा गांधी की सरकार थी और देश में इमरजेंसी लगाई गई तो इंदिरा गांधी ने मनोज कुमार से रिक्वेस्ट की थी कि वह एक ऐसी फिल्म बनाए जो इमरजेंसी के पक्ष में हो क्योंकि वह यह दिखाना चाहती थी कि इमरजेंसी लोगों के लिए बुरी नहीं थी और यह सरकार का सही फैसला था। लेकिन मनोज कुमार ने इस विषय पर फिल्म बनाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं ऐसी कोई फिल्म नहीं बना सकता जो झूठ की बुनियाद पर खड़ी हो क्योंकि इमरजेंसी किसी भी तरीके से देश के लिए सही नहीं थी और इस पर मनोज कुमार इंदिरा गांधी की सरकार से ही भिड़ गई थी और इंदिरा गांधी ने उनसे ऐसी दुश्मनी निकाली कि उनकी कई फिल्में रिलीज होने से ही बैन कर दी थी और उनकी कई फिल्मों को थिएटर में रिलीज ना करके सीधा टीवी पर प्रसारित किया गया था। कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने जब मनोज कुमार की शहीद फिल्म देखी थी तो वह इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने मनोज कुमार को देश के किसान और जवान की कहानी पर एक फिल्म बनाने की बात कही थी। उनका नारा था जय किसान जय जवान। तो उन्होंने एक ऐसी फिल्म बनाने को कहा जिसे देखकर लोगों को जवान और किसान दोनों पर गर्व हो। मनोज कुमार प्रधानमंत्री से मिलकर लौटे और ट्रेन में बैठे-बैठे ही उन्होंने फिल्म उपकार की पूरी कहानी लिख दी थी। और जब यह फिल्म बनी तो इसने इतिहास रच दिया। इस साल हम कटाई के बाद मंडी में जाकर अनाज खुद बेचेंगे। दो पैसे देर से मिलेंगे तो क्या हुआ? लोगों को तो दो पैसे कम देने पड़ेंगे लाला जी। आप जाइए अब फसल नहीं बिकेगी। इस फिल्म ने उस साल के सभी अवार्ड अपने नाम किए थे। मनोज कुमार की फिल्म पूर्व पश्चिम इतनी बड़ी हिट हुई थी कि इसने ना सिर्फ भारत में रिकॉर्ड बनाए बल्कि इसने अंग्रेजों को भी सोचने पर मजबूर किया कि इतनी बेहतरीन फिल्म कैसे बन सकती है। यह भारत की पहली फिल्म थी जो लंदन के एक थिएटर में 50 हफ्तों तक लगातार चलती रही थी और इसे लंदन के थिएटर से निकालने की भी कोशिश की गई। लेकिन लोग इसे इतना पसंद कर रहे थे कि इसे चाहते हुए भी अंग्रेज अपने थिएटर से निकाल नहीं पाए और यह ना सिर्फ मनोज कुमार के लिए बल्कि पूरे देश के लिए गौरव की बात थी। मैं बात मैं बात वही दोहराता हूं। मनोज कुमार दिलीप कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक रहे। जब वो केवल 11 साल के थे तो उन्होंने दिलीप कुमार की एक फिल्म जुगनू देखी थी जिसमें दिलीप कुमार का किरदार मर जाता है। मनोज कुमार उन्हें मरता हुआ देखकर बहुत दुखी हुए। इसके कुछ समय बाद उन्होंने फिल्म शहीद देखी जिसमें दिलीप कुमार एक बार फिर से मर जाते हैं। मनोज कुमार को भरोसा नहीं हुआ और वह सोचने लगे कि जो आदमी फिल्म जुगनू में मर चुका था वह दोबारा जिंदा कैसे हो सकता है। हालांकि बहुत समय बाद उन्हें रील और रियल लाइफ में फर्क समझ में आया। मनोज कुमार की फिल्म क्रांति भी एक जबरदस्त हिट फिल्म थी और इस फिल्म से जुड़े किस्से भी कमाल के थे। दिलीप कुमार इस समय तक अच्छी फिल्में ना मिलने से परेशान हो चुके थे और उनका दौर खत्म हो चुका था।

उन्हें फिल्मों में काम भी नहीं मिल रहा था। इसलिए उन्होंने एक्टिंग से दूरी बना ली थी। ऐसे में मनोज कुमार उनके लिए वह मसीहा बने जिसने दिलीप कुमार को ना सिर्फ फिल्म में लिया बल्कि उन्हें इतनी बड़ी हिट फिल्म दी कि दिलीप कुमार दोबारा से एक बार फिर से लाइमलाइट में आ गए थे। मर जाएंगे मिट जाएंगे नाम वतन का कर जाएंगे। मतलब जो दिलीप कुमार कभी किसी एक्टर को अपने आसपास भी नहीं मानते थे उनका डूबता हुआ करियर भी मनोज कुमार ने ही बचाया था। हालांकि फिल्म के सेट पर ही दिलीप कुमार ने मनोज कुमार से लड़ाई कर ली थी और यह लड़ाई काफी लंबी चली। फिल्म में जीनत अमान भी थी लेकिन मनोज कुमार उनसे इतने परेशान हो चुके थे कि मनोज कुमार ने जीनत अमान के किरदार को फिल्म के बीच में ही मार दिया था और उनसे छुटकारा पा लिया था। मनोज कुमार का शाहरुख खान के साथ भी एक लंबा विवाद चला था। शाहरुख खान की फिल्म आई थी ओम शांति ओम और इस फिल्म में शाहरुख खान ने मनोज कुमार की नकल की थी और मनोज कुमार के किरदार का मजाक बनाया था। फिल्म में एक सीन था जब मनोज कुमार का किरदार निभाता हुआ एक आदमी थिएटर में घुसने की कोशिश करता है और वह खुद को मनोज कुमार बताता है और मनोज कुमार के स्टाइल को भी कॉपी करता है। सिक्योरिटी गार्ड उसे धक्के मारकर भगा देती हैं। मतलब पूरी तरह से इस सीन में मनोज कुमार को ही दिखाया गया था। मनोज कुमार के साइन, मनोज कुमार का स्टाइल और मनोज कुमार के इंसल्ट को दिखाया गया था। मनोज कुमार को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और उन्होंने शाहरुख खान और हरानाज पर केस कर दिया था। उन्होंने 100 करोड़ की मानहानि का दावा भी किया। लेकिन शाहरुख खान ने इस पर कोई भी ध्यान नहीं दिया और फिल्म मेकर की गलती बताते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया। मनोज कुमार ने फिल्म मेकर से सिर्फ माफी मांगने के लिए कहा था।

लेकिन शाहरुख खान उस समय पर इतने बड़े एक्टर थे कि उन्होंने इतना भी जरूरी नहीं समझा। इसके बाद लोग इतना भड़क गए कि शाहरुख खान को उनकी इस हरकत पर लोग गालियां देने लगे। तो शाहरुख खान को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने हाथ जोड़कर मनोज कुमार से माफी मांगी और इस तरह से उनका मजाक बनाने पर वह शर्मिंदा भी हुए। इसके बाद मनोज कुमार ने बड़ा दिल दिखाते हुए उन्हें माफ भी कर दिया और उन पर किसी तरह का कोई केस भी नहीं किया। मैंने कभी हीरोइन को टच नहीं किया। इसके बाद जब ये फिल्म टीवी पर दिखाई गई तो इस फिल्म से यह सीन हटा दिया गया था। मनोज कुमार की शादी उनकी कॉलेज के समय से प्रेमिका रही शशि गोस्वामी से हुई थी। उनके दो बेटे हुए जो सिर्फ मनोज कुमार के बेटे बनकर ही रह गए और उनकी खुद की कोई पहचान नहीं बन सकी। मनोज कुमार बॉलीवुड के एकमात्र ऐसे एक्टर थे जिसने देशभक्ति फिल्मों की शुरुआत की थी और ऐसी की कि आज तक उस लेवल की देशभक्ति और देश को समर्पित फिल्में दूसरा कोई फिल्म मेकर नहीं बना सका। और मनोज कुमार एकमात्र ऐसे एक्टर भी थे जिसने सिर्फ भगत सिंह की कहानी दिखाने के लिए अपनी जिंदगी की पूरी कमाई झोंक दी थी। 4 अप्रैल 2025 को 87 साल की उम्र में मनोज कुमार जी का निधन हो गया और वो अपने पीछे छोड़ गए कुछ कभी ना भूलने वाले किस्से यादें और बहुत कुछ। इसलिए कि जोकर जो करता है औरों के लिए करता है। तो यह थी मनोज कुमार को समर्पित हमारी एक छोटी सी पेशकश। उम्मीद है आपको वीडियो पसंद आया होगा। इसी तरह के वीडियो देखने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए और देखते रहें फिल्मी विचार। समय की धारा में समय की धारा में

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