यह साल 2026 के अप्रैल महीने का आखिरी हफ्ता चल रहा है और पश्चिम बंगाल की फिजाओं में एक अजीब सी गर्माहट है। रैलियों में लाखों की भीड़ है। नारे लग रहे हैं और सत्ता की बिसात चारों तरफ बीत चुकी है। लेकिन इस शोरशराबे के बीच सियासत के एक पुराने गलियारे में एक खामोश सवाल आज भी ताल ठोक रहा है।
सवाल यह है कि हुगली में बहुत ज्यादा पानी बह चुका है। सरकारें आई और गई। इंकलाब आए और चले गए। लेकिन बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला चेहरा अक्सर दो ही जातियों के इर्द-गिर्द क्यों घूमता रहा? ब्राह्मण और कायस्त। क्या यह महज इत्तेफाक है या बंगाल के सामाजिक ताने-बाने की कोई गहरी कहानी?
इस कहानी को समझने के लिए हमें 2026 की रैलियों से पीछे हटकर 19वीं सदी के बंगाल में जाना होगा। जब बाकी देश रियासतों में बटा हुआ था। बंगाल में रहनेसा यानी पुनर्जागरण की लहर चल रही थी। अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कोलकाता को बनाया। इसके साथ ही जन्म हुआ एक नए वर्ग का। भद्रोक। यह भद्रलोक मुख्य रूप से तीन ऊंची जातियों का समूह था। ब्राह्मण, कायस्त और वैद्य। अंग्रेजों के समय में शिक्षा के सबसे पहले अवसर इन्हीं को मिला। इन्होंने ना सिर्फ शेक्सपियर, फिरदौस और भावभूति को पढ़ा बल्कि उसे बंगाल की मिट्टी में घोल भी दिया। राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस।
इन महापुरुषों ने बंगाल को एक बौद्धिक लीडरशिप दी। आजादी के बाद जब लोकतंत्र आया तो स्वाभाविक रूप से सत्ता की कमान इन्हीं के हाथ में गई। जो शिक्षित थे जो प्रशासन की बारीकियों को अच्छे से समझते थे। उत्तर भारत में जहां राजनीति जमीन और दबंगई से शुरू हुई वहीं बंगाल में राजनीति प्रेस खिताब और बौद्धिक बहस से शुरू हुई। यही वजह थी कि आजादी के शुरुआती दशकों में कायस्त तबके से डॉ. विधान चंद्र रॉय और प्रफुल चंद्र सेन जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री बने।
वहीं ब्राह्मण तबके से अजय कुमार मुखर्जी सीएम बने। इन नेताओं की काबिलियत पर कोई सवाल नहीं था। यह स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले महानायक थे। जनता के बीच इनकी छवि जनता की रही। इन्होंने हमेशा सभी तबके को साथ लेकर लीड किया।
यही वजह थी कि यह बार-बार सीएम बने और जनता का इन्हें पूरा साथ मिलता रहा। साथियों अब आप कहेंगे कि 1977 में जब वामपंथ आया तो उन्होंने तो जाति को मिटाने की बात कही थी। यहां कहानी में एक बड़ा मोर आता है। 34 साल के कम्युनिस्ट शासन ने बंगाल की राजनीति में जाति शब्द को ही शब्दकोश से बाहर कर दिया। वहां सिर्फ दो ही बातें होती थी। गरीब या अमीर, मजदूर या मालिक। लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत कुछ और ही बयां करती थी।
कायस्त तबके से आने वाले ज्योति बसु और ब्राह्मण तबके से आने वाले बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेता अपनी विचारधारा में भले ही नास्तिक और जाति विरोधी थे लेकिन सत्ता की चाबी हमेशा उनके पास ही रही और दोनों ही राज्य के मुख्यमंत्री बने। लेफ्ट के शासन में जाति का मुद्दा इतना दबा दिया गया कि पिछड़ी जातियों और दलितों को कभी लगा ही नहीं कि वे अपनी अलग राजनीतिक पहचान बना सकते हैं।
जब 2011 में ममता बनर्जी ने सत्ता बदली और टीएमसी की सरकार आई तब भी लीडरशिप का चेहरा नहीं बदला। उनका नाता भी ब्राह्मण तबके से ही है। ममता दीदी ने गरीबों की बात की। आदिवासियों के साथ खाना खाया। लेकिन सत्ता का केंद्र आज भी वही कोलकाता का शिक्षित भद्रलोक वर्ग ही रहा।
2026 में जब हम खड़े हैं, तो हम देखते हैं कि अनुसूचित जाति के मतवा समुदाय और राजवंशी समुदाय साथ ही ओबीसी जाति के सद्गोप और महिषिया अब अपनी आवाज उठा रहे हैं। लेकिन जब मुख्यमंत्री के चेहरे की बात आती है तो पार्टियां आज भी उसी सुरक्षित उच्च वर्गीय पहचान की ओर देखती है।
जरा इस सूची पर गौर कीजिए। के यह नाम और उनकी जाति बंगाल की राजनीतिक अस्थिरता की गवाही देते हैं। आप स्क्रीन पर आजादी के बाद से अब तक के सभी सीएम के नाम और उनकी जातियां देख सकते हैं। बीजेपी और टीएमसी दोनों ही अब अपनी रैलियों में पिछड़े वर्गों को रिझाने की कोशिश कर रही है। ब्राह्मण वर्ग से आने वाले शुभेंदु अधिकारी हो या ब्राह्मण तबके से आने वाली ममता बनर्जी दोनों को पता है कि अब भद्रलोक के साथ-साथ सभी को साधना होगा।
लेकिन बंगाल की मिट्टी की तासीर ऐसी है कि यहां सत्ता के लिए बौद्धिक वजन अनिवार्य माना जाता है और सदियों से शिक्षा और संसाधन पर पकड़ रखने वाले ब्राह्मण और कायस्त इस दौड़ में हमेशा आगे रहे हैं।