काफिर हूं। मैं काफिर हूं। सर फिदा हूं। मुझे मार दीजिए। मैं सोचने लगा हूं। मुझे मार दीजिए। ए एतराम ए हजरत ए इंसान मेरा दीन बेदीन हो गया हूं। मैं सभी दीनों को मानने लगा हूं। मुझे मार दीजिए। मैं पूछने लगा हूं सबब अपने कत्ल का। अब हद से बढ़ रहा हूं।
मुझे मार दीजिए। मैं ठीक सोचता हूं। यह कोई हद है मेरे लिए। मैं साफ देखता हूं। मुझे मार दीजिए। जिंदा रहा तो करता रहूंगा प्यार। साहब कह रहा हूं मुझे मार दीजिए। इरफान पे दया या आर्थिक सहायता की आर्थिक सहायता मत कीजिएगा। इरफान की जिंदगी बदलने से देश नहीं बदलेगा। वो गोपाल दास नीरज की कविता थारा प्रभा गा देता है। वह देश केपवित्र संविधान की प्रस्तावना को किसी मधुर गीत की तरह गुनगुना देता है। जहां एक तरफ विरोध प्रदर्शनों में अमूमन तीखे नारे और तल तेवर दिखाई देते हैं।
वहीं मोहम्मद इरफान ने इस पूरे माहौल को अपनी अनूठी कला से बदल दिया। एक तरफ साहित्य के महाकवि गोपाल दास नीरज की कालजीई रचनाओं का प्रवाह तो दूसरी तरफ भारत के लोकतंत्र की आत्मा यानी संविधान की प्रस्तावना का वो संगीतमय पाठ। शब्दों के जादूगर मोहम्मद इरफान की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि इन्हें बस आप सुनते ही रहिए। जंतरमंतर पर हजारों की भीड़ बीते दिनों आई। इस भीड़ में चमकता सितारा दिखा मोहम्मद इरफान जिन्हें सुनकर बड़े-बड़े नेता उनकी सुंदर भाषा शैली के मुरीद हैं। आउटर दिल्ली की एक झुग्गी में इरफान का एक छोटा सा कमरा है। ऊपर सीमेंट की पक्की छत नहीं बल्कि नीली त्रिपाल तनी हुई है। इसी टूटी फूटी झुग्गी में मोहम्मद इरफान अपने परिवार के साथ रहते हैं। परिवार की माली हालत ऐसी है कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए इरफान ठेला लगाते हैं।
लेकिन इस गर्दोगबार और गरीबी के बीच इस लड़के के भीतर एक अलग ही रोशनी पल रही थी। इरफान कभी स्कूल तो नहीं जा पाए क्योंकि जीवन कठिन था। माहौल नहीं था। एक वक्त ऐसा भी था जब इरफान बेघर हो गए थे। लेकिन उन्होंने सिर उठाकर जीने की कसम खा ली थी। जमुना नजदीक थी और हम सलम में रहते थे और माहौल इस तरीके का छोटे बच्चे को इतना पता नहीं होता। तो स्कूल में मम्मी नाम लिखाती थी भाग के आ जाए। समझ रहे हैं?
भाग के आ जाते थे। मतलब इतने होश नहीं था। माहौल नहीं था। और जो जो लोग नारियल बहा देते थे ना जमुना में उन्हें खाते थे हम तोड़-त के जो लोग अपने पूजा पाठ के बाद हम ये हम ये नहीं सोचते थे कि किसी मरने वाले का या जीने वाले का हमारा नारियल मिल रहा है। खा लेते थे और वो नारियल अठन्नी का बिक भी जाता था। अच्छा वो जो नारियल बसों में बेचते थे ना तो हम जमुना से इकट्ठे कर लेते थे। अठनी करके बेच भी देते थे।
₹4 हो जाते थे और उससे हम कुछ और भी चीज़ खा लेते थे। तो इस तरीके का जीवन था। लेकिन झुग्गी टूटने के बाद हम जिस तरीके से झुग्गी टूट गए हम बेघर हो गए। आप इससे पहले कहां रहते थे? लक्ष्मी नगर में रहते। अच्छा लक्ष्मी नगर का जब रीलोकेशन हुआ तो आपको यहां पर जगह मिली उसके बदले। हां। तो उसके बाद उसके बाद रोटी से भी हम टूट गए।
फिर धीरे-धीरे जिंदगी रोटी पे आने लगी। सांस लेने लगे। फिर काम में एक एक संस्था जो है हमारे यहां एनजीओ बहुत काम करती है। तो एक एनजीओ के माध्यम से दिल्ली एयरपोर्ट पे मजदूरी करने लगा। मजदूरी करने लगा और मजदूरी मैं सबसे पहले ना थोड़ा बहुत पढ़ना थोड़ा सा जानता हूं। पथम आंगनबाड़ी होती थी हमारे टाइम में। पथम अभी भी हां पथम के माध्यम से वो पढ़ना सीखा। शीशम के पेड़ के नीचे। हां। वो थोड़ा बहुत पढ़ना सीखा। मोहम्मद इरफान कभी स्कूल नहीं गए। वो ठीक से लिख भी नहीं सकते। लेकिन जहां इच्छा होती है वहां रास्ते अपने आप बन जाते हैं। इरफान ने अपनी पढ़ाई का जरिया बनाया अपने स्मार्टफोन को। वो दिन में कई-कई घंटे Google से सवाल पूछकर और चीजें सुनसुनकर खुद को शिक्षित करते रहे हैं।
इसी डिजिटल दुनिया के सहारे उन्होंने अपनी सुरीली जुबान में उर्दू के अजीम शायर अहमद फराज हिंदी के महाकवि गोपाल दास नीरज की कविताएं और भारत के मजदूरों के कानूनी अधिकारों को संविधान की प्रस्तावना को कंठस्थ कर लिया। ये सब जो आप सीखते हैं, यह सब कुछ YouTube से सीखते हैं आप? किस तरी जैसे कि Google है, YouTube है मैं और कुछ नहीं चला पाता। क्योंकि आपने कहा ना कि आप ज्यादा पढ़ नहीं पाते हैं। तो किताब किताबों से तो आप ज्यादा सीख नहीं पाते। किताबों से नहीं सुन के ही सीख पाते हैं। हां सुन के ही सीख पाते हां और आप जैसे कोई क्या-क्या सर्च करते हैं YouTube पे? क्या-क्या आप कैसे? बस मेरे YouTube में टोटली पत्रकारिता है, साहित्य है और महापुरुषों से जुड़ी हुई चीजें हैं।
सीजेपी आंदोलन कोई पहला आंदोलन नहीं जिससे मोहम्मद इरफान जुड़े। इरफान का कहना है कि वह 15 साल से आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। इरफान रामलीला मैदान पर जाना उनका शुरू हुआ 15 साल पहले। कारण आंदोलन नहीं था। तब कारण था बढ़िया खाना खाने जाना है। लेकिन वहां जाकर अलग-अलग विचारों का पता लगा। फिर 2011 में अन्ना आंदोलन के साक्षी मोहम्मद इरफान का ऐसे ही आंदोलनों से जुड़ाव [संगीत] बढ़ता गया। इसके बाद सरकार के खिलाफ जब सीएए आंदोलन हुआ तो इरफान ने वहां भी खुलकर अपने विचार रखे। जब जुड़े ना तो हम अनपढ़ गवार थे। तो कौन से साल की बात है? ये 2011 की मैं एयरपोर्ट से ना आपने पूछा ना कैसे जुड़े? एयरपोर्ट पे ड्यूटी करता था तो घर नहीं आता था। सीधे रामलीला मैदान पहुंचता था। उसकी पहली वजह ये थी। अच्छा वहां रात की ड्यूटी मतलब शाम शाम को ड्यूटी खत्म होती थी और फिर सीधा रामली रामलीला। रामलीला मैदान।
उसकी पहली वजह ये थी कि वहां पे ना अच्छा भोजन मिलता था सर। पहली बता मैं बताऊं वहां की जरूरत वो जूस वगैरह मिलता था। हम सलम में रहते थे जुग्गी झोपड़ी वाले बच्चे थे और पूरी दुनिया रामलीला मैदान की तरफ जा रही थी तो हम भी जाते थे और खूब खाते पीते थे और उससे जुड़ा फिर हमें विचारों का पता नहीं था। अच्छे बुरे का पता नहीं था। वहां पे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीपी के छात्र नारा लगाते थे कि देश के युवा कहां है? देश के युवा यहां राहुल गांधी कहां है?
मैं भी अन्ना तू भी अन्ना के तो हम मैं अपनी मम्मी से आके बताता था। मम्मी पढ़े लिखों के साथ नारा लगाया। बड़ा मजा आया। दोनों तरफ से पकड़ रखे थे। लड़का लड़कियों के साथ नारे लगाए। 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और 19 में शायद मेरे हिसाब से एनआरसी कानून लेके आई सरकार और उसको कोई लीड नहीं कर रहा था। उसको कोई लीड नहीं कर रहा था। देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी सड़कों पे आ गई। गांधीवादी तरीके से कोई हिंसा नहीं हुई। वो एक अलग वजह है।
उसकी चीजें अलग हैं। और उस आंदोलन में मैं शाहीन बाग और जामिया मिलिया इस्लामिया के गेट पे लगातार अपनी बात रख रहा था। लगातार उस आंदोलन से जुड़ा और 2011 के बाद अन्ना आंदोलन के बाद सीधा सीधा सीएनआई सीएनआर बीच का जो साल रहा इसमें क्या किया आपने? इसमें भी मैं छ सात आठ साल हां ये जो इसमें जो ये था मैं इसमें विचारों को समझ रहा था। अच्छा जब दिल्ली में सीजेपी आंदोलन शुरू हुआ तो इरफान भी उस भीड़ का हिस्सा बने। जहां अमूमन लोग गुस्से में नारे लगा रहे होते हैं वहीं इरफान ने भारत के पवित्र संविधान की प्रस्तावना को किसी रूहानी गीत की तरह धारा प्रवाह सुनाना शुरू कर दिया।
इरफान को सुनकर वहां मौजूद कैमरों और हर शख्स की निगाह उन पर टिक गई। उस टूटे हुए घर से आए। लड़के की साफ सोच देखकर बड़े-बड़े पत्रकार, बुद्धिजीवी, नेता दंग रह गए। आंदोलन के उस वीडियो के वायरल होते ही देश के कोने-कोने में इरफान की चर्चा [संगीत] होने लगी। लोग उन्हें दिल्ली के प्रोटेस्ट से निकला असली हीरो कहने लगे। जब आदमी हताश और निराश हो जाता ना तो नीरज की एक लाइन कह रहा हूं सर। सपन झड़े फूल से मीच चुभे फूल से लुट गया श्रृंगार सभी बाघ के बबूल से। हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे। कारवा गुजर गया। गुबार देखते रहे। नींद भी खुली ना थी। आए धूप डल गई। पांव भी उठे ना थकी जिंदगी फिसल गई।
पात पात झड़ गए। साग साख जल गई। चाहत तो निकल सकी ना पर उमर निकल गई। समझिए सर इस दर्द को इस तड़प को इस क्या सोच रहा है देश। नीरज ऐसे नहीं लिख रहे हैं। नीरज को कोई ख्वाब नहीं आया। नीरज सोच रहे कि कितने वक्त आए, गए, कुछ अच्छे, कुछ बुरे, कुछ लोग मेरे साथ थे। आज मेरे हिस्से में धूल और गुबार आई है। नीरज का कहने का मतलब यह है। तो हमारा कहने का मतलब है कि लोकतंत्र में असहमति रखना कोई अपराध नहीं है।
भारतीय संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें अभिव्यक्ति अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है। ये लोकतंत्र सिमटते जा रहा है। मैं जंतरमंतर पे ऐसे भाग के आया कि जब अभिजीत दीपे ने कहा ना मुझे पीटा और वो रोने लगे। मैं कहा यार मुझे भी पीटना चाहिए। मेरे शरीर की मांसपेशियां मेरी आत्मा से लड़ने लग गई। कैसे खड़े हो? कैसे बैठे हो चुग्गी के अंदर। चलो यार पिटाई खाएंगे दिल्ली पुलिस की। नए नवेले कमिश्नर आए हैं। बड़े जोश में हैं। बहुत बड़ी व्यवस्था और ताकत और धन बल और बड़ी व्यवस्था है उनकी। बड़ा मारेंगे। चलो मार खाएंगे उनकी। ये नहीं है लोकतंत्र का ये रास्ता नहीं है।
लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए। कोई आपसे सहमत हो या ना हो ट्राइबल दोनों के लिए। आइए बात करते हैं। कुछ कुछ गलतफहमियां है तो उसे दूर करते हैं। क्लाइंट को पढ़ते हैं कि पीपल ऑफ इंडिया। हम भारत के लोग भारत को संपन्न प्रभु संपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकात्मक राज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसरों की समानता प्राप्त कराने के लिए कहता हूं उन सब में व्यक्ति की गरिमा व्यक्ति की गरिमा व्यक्ति की गरिमा राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होगा 26 नवंबर 1949 को अंकित अधिनियम और आत्मसमर्पित करते हैं।
फिर इतनी बड़ी आबादी आज भी अमान्य जीवन कैसे जी रही है? सभी की तो बात करी गई थी। सभी की तो बात करी गई थी। सभी की भलाई की बात कही थी। शिक्षा में, राजनीति में, सामाजिक स्तर पे, धार्मिक स्तर पे, किसी भी स्तर पे किसी को नहीं छोड़ा गया।
फिर भारत की आज शक्ल देखो। बड़ी आबादी नरक जीवन जी रही है। सर इस दुनिया विश्व के पटल पर दौड़ती अर्थव्यवस्था है भारत चमकता सितारा है। लेकिन उसके विपरीत बड़ी कंडीशन खराब है। आप ही तो एक देश और एक राज्य एक कानून की बात करते हैं। पूरे देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रम कानून अलग न्यूनतम मजदूरी है। कहीं एक नहीं मिलती। जहां लागू है वो भी नहीं मिलती। आप पूरी तरह से नौजवानों के निरंजन में फेल हैं। मैं अपनी यहां सहमति रखता हूं। बोलूंगा आज मेरी जबान कब कपा रही है पता नहीं बहुत बोलता हूं सर मैं लेकिन कहते हैं ना इतना तोड़िए मत लोगों को इतना कमजोर मत कीजिए मोहम्मद इरफान से राजनीतिक सवाल पूछा गया तो यह भी पता चला कि कैसे वो राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी शामिल हुए थे। इरफान ने कहा कि उस वक्त देश की राजनीति सांप्रदायिक हो गई थी।
राहुल ने जब मोहब्बत की दुकान खोली तो झुकाव उस तरफ बढ़ गया। इरफान ने यह भी कहा कि कभी राहुल से मिलूंगा तो मजदूरों को लेकर यह वादा उनसे जरूर लूंगा। जब भारत जोड़ो यात्रा निकली ना उस टाइम देश में जो उस टाइम देश की जो पॉलिटिक्स है ना बड़ी सांप्रदायिक हो गई थी। तो हर जगह से उल्टी सीधी बातें आ रही थी। जब राहुल जी ने कहा कि मोहब्बत की दुकान तो फिर झुकाव उधर की तरफ हुआ। फिर राहुल जी को देखा कि वो रात को 2:00 बजे एम्स जा रहे हैं। मजदूरों से मिल रहे हैं। तो मेरी भी यही चाह है कि वो मजदूरों को समझो आप और मुझसे मैं कभी राहुल गांधी से मिलूंगा तो मैं उनसे कहूंगा कि सर आप इस देश के बड़े नेता हैं। आज नहीं तो कल सत्ता में आएंगे।
आप मुझसे वादा कीजिए कि इस देश के श्रमिकों को बेहतर जीवन देंगे। उसकी पहली वजह यह है कि आप पूरे देश में एक न्यूनतम मजदूरी लागू करेंगे। अलग-अलग नहीं। फिर मैं राहुल गांधी जी से कहूंगा कि सर आप जो कानून बनाएंगे उसे धरातल पर दिखाई देना चाहिए। इस तरीके का कानून हो कि कोई भी श्रमिक का हक ना मारे। उसकी मेहनत का हक ना मारे। इस पे एक लाइन कहूंगा कि मील मालिक के कुत्ते भी चर्बीले हैं। मील मालिक के कुत्ते भी चर्बीले हैं। मेरे देश के श्रमिक के चेहरे पीले हैं। मेरे मजदूरों के चेहरे पीले हैं।
समझ रहे हैं सर? इसी जो आप जो इस व्यवस्था हां इस व्यवस्था से अंधेरा हटाना है। उनकी मेहनत का वाजिब पैसा उन्हें दिलाना है। अगर आपकी 18 है तो 18 दिलानी होगी। 22 हम यह नहीं कहते आपने 18 लागू कर दिया। हमें 30 दो जो आपने लागू किए वो जमीन पे होना चाहिए। जो जमीन पे होना चाहिए। अगर मैं आपको इस इस एरिया के श्रमिकों से बात कराऊंगा सर आप सोचेंगे कि कौन से कैसे भारत में रह रहे हैं जहां कानून तो हैं लेकिन लागू नहीं होते। इरफान के अलग-अलग वीडियोस देखकर लोग भावुक होकर लिख रहे हैं कि लोकतंत्र को बचाने वाले और देश प्रेम को सही मायने में समझने वाले लोग महलों से नहीं बल्कि इसी तरह देश की जमीन से जुड़े झुग्गियों में रहते हैं।
गरीबी, मुफलिसी और बिना स्कूली शिक्षा के भी मोहम्मद इरफान ने साबित कर दिया कि अगर आपके दिल में देश के लिए मोहब्बत और सीखने का जज्बा हो तो बंदिशे मायने नहीं रखती।