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क्यों अपने ही पिता से जावेद जाफरी करते थे बेहद नफरत? जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

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ये हैं शोले के सूरमा भोपाली फिल्मी नाम है जगदीप असली नाम है सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी यह बतौर बाल कलाकार फिल्मों में आए करीब 70 सालों तक एक्टिंग की और कुल 400 फिल्मों में काम किया अरे भूत बाश मगर हमारा नाम भी रमा भोपाली ये पूरी दुनिया को अपनी अदाकारी से हंसाने वाले जगदीप का बचपन असल में काफी मुश्क मुश्किलों भरा रहा भारत पाकिस्तान बटवारे में हुए में उनके पिता मारे गए उनकी मां ने अनाथ आश्रम में काम करके उन्हें पाला अपनी मां की मदद करने के लिए महज सात आ साल की उम्र से ही वह सड़कों पर गुब्बारे बेचा करते थे पतंग बेचा करते थे और साबुन बनाने की फैक्ट्री में भी काम करते थे।

इसी दौरान उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिल गया बतौर बाल कलाकार उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई और फिर एक वक्त ऐसा भी आ जब उनकी एक्टिंग से पंडित जवाहरलाल नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी छड़ी उन्हें गिफ्ट कर दी यहां हमारी क्या जरूरत है या तो वैसे ही आपके नाम का भारत निकला हुआ है लेकिन हम चाहते हैं कि तुम हमें जेल ले जाओ क्या कि रहे हो।

आप पहले बाल कलाकार और फिर कुछ फिल्मों में लीड रोल निभाने के बाद 1968 में जगदीप ने पहली बार कॉमेडी रोल किया इसके बाद उनकी पूरी एक्टिंग कॉमेडी के इर्दगिर्द होकर रह गई शोले में सूरमा भोपाली का कैरेक्टर लोगों को आज भी याद है के बच्चों कितने आदमी थे मैं पूछता हूं कितने आदमी थे जगदीप की पर्सनल लाइफ भी कम फिल्मी नहीं रही उन्होंने तीन शादियां की जिससे उनको छह बच्चे हैं तीन शादियों का किस्सा भी दिलचस्प है ।

अपने बेटे के लिए उनके घर जिस लड़की का रिश्ता आया उसकी बड़ी बहन जगदीप को पसंद आ गई उन्होंने उसे प्रपोज कर दिया और शादी कर ली वह लड़की उनसे 35 साल छोटी थी हम खिला के मारेंगे उठा अरे उठ तू तो खुद गिर गया उठ उठ हम खिलाएंगे जगदीप का जन्म मध्य प्रदेश के दतिया में 29 मार्च 1939 को एक परिवार में हुआ था जन्म के बाद उनकी परवरिश काफी अच्छे से हुई लेकिन यह खुशियां बस कुछ ही दिनों की थी कुछ समय बाद उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा यह दौर था।

भारत पाकिस्तान विभाजन का हिंदू मुस्लिमों के बीच लड़ाइयां हो रही थी विभाजन के अंजाम से जगदीप का परिवार अछूता नहीं रहा 1947 के इन्हीं दंगों में उनके पिता की हो गई जिसके बाद परिवार को तंगी का सामना करना पड़ा काम की उम्मीद में जगदीप की मां उन्हें लेकर मुंबई आ गई मुंबई उस वक्त बंबई कहलाता था तो बंबई जाने के बाद परिवार के गुजारे के लिए जगदीप की मां अनाथा में काम करने लगी वहां पर उनका काम खाना बनाने का होता था जिस वजह से सुबह से शाम तक उन्हें वहीं काम करना पड़ता था ।

जगदीप को अपनी मां की ऐसी हालत देखकर बहुत बुरा लगता था एक दिन उन्होंने देखा कि उनके हम उम्र बच्चे गुब्बारे बेच रहे हैं और कुछ टीन के कारखानों में काम भी कर रहे हैं यह देखकर उन्होंने ठान लिया कि वह भी इसी तरह कमाई करके अपनी मां की मदद करेंगे जब यह बात उन्होंने अपनी मां को बताई कि उन्हें पढ़ाई नहीं करनी बल्कि काम में हाथ बटाना है तो उनकी मां गुस्सा हो गई हालांकि बहुत मनाने के बाद मान भी गई इसके बाद जगदीप एक टिन की फैक्ट्री में काम करने लगे बाद में साबुन बेचने से लेकर पतंग बनाने तक का काम किया।

इस दौरान एक होटल का मालिक उन्हें और उनके दोस्तों को सूखे पांव के साथ हरी मिर्च खाने के लिए दे दिया करता था जगदीप अपने दोस्तों के साथ मिलकर उस मिर्च को पीसकर सूखे पांव के साथ चाव से खा लेते थे कहां सरदार सिंह के पास के हवाले करके 15000 हासिल करूंगा मगर मुझे क्या मिलेगा का एक वक्त ऐसा भी आया जब ₹ के लिए यह पहली बार फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हुए असल में यह 50 के दशक की बात है उन्हीं दिनों बी आर चोपड़ा फिल्म अफसाना बनाने की तैयारी कर रहे थे।

फिल्म के एक सीन के लिए उन्हें कुछ बच्चों की जरूरत थी जब फिल्म की कास्टिंग टीम एक दिन बच्चों की तलाश में निकली तो उनकी नजर जगदीप पर पड़ गई उस टीम ने जगदीप से पूछा क्या तुम फिल्मों में काम करोगे जगदीप ने तपाक से जवाब दिया अरे यह क्या होता है साहब असल में सवाल उन्होंने इसलिए पूछा था क्योंकि इससे पहले जगदीप ने कोई फिल्म देखी ही नहीं थी।

उन्होंने टीम से पूछा कि वह इस काम के बदले कितने पैसे देंगे जवाब मिला ₹ इतना सुनते ही जगदीप ने फिल्म में काम करने के लिए हां कह दिया हुआ जा र और आप कह रहे हो काम नहीं करो लकड़ी अरे उठाओ अपनी लकड़ी को निकालो पी ये लो रप का हां वो तो मैं भी देख र हूं लेकिन खरा है कि नहीं हां खरा है अब बताते हैं पहले दिन क्या हुआ असल में जगदीप अपनी मां के साथ उस फिल्म स्टूडियो पहुंच गए जिस सीन में उन्हें काम करना था उसमें बच्चों के चल रहे नाटक में बच्चों के साथ बैठकर उनको ताली बजानी थी।

इस नाटक में एक बच्चे को उर्दू की एक लंबी लाइन भी बोलनी थी लेकिन व लड़का बार-बार अटके जा रहा था इसे देखकर जगदीप ने बगल में बैठे लड़के से पूछा अगर मैं यह कर दूं तो इस काम के लिए कितने पैसे मिलेंगे लड़के ने बताया बहुत पैसे मिलेंगे पैसों की जरूरत की वजह से उन्होंने जाकर व लाइन बोल दी यानी डायरेक्टर ने तो कहा था कि आपको पब्लिक में बैठकर ताली बजानी है।

लेकिन उन्होंने कहा मैं तो स्टेज पर जाकर उर्दू बोल सकता हूं और बहुत अच्छी बोल सकता हूं और उर्दू लाइन इतनी अच्छी बोली कि एक ही टेक में पूरा सीन ही ओके हो गया इस काम के लिए उन्हें र मिले अमा भोले यार आज मेरी भा आंख बहुत फड़क रही है अरे भाईया का फड़कना तो बहुत शुभ होता है चारों तरफ से खुशियों के समाचार मिलेंगे अरे काहे के समाचार मिलेंगे खुशियों के ₹ पानी के लालच में किए गए सीन ने उनकी किस्मत ही बदल दी इसके बाद उन्हें लगातार फिल्मों के ऑफर मिलने लगे और वह बतौर बाल कलाकार लैला मजनू और फुटपाथ जैसी फिल्मों में काम करके काफी पॉपुलर हो गए।

अब बात करते हैं कि उनका जो नाम है जगदीप वो कैसे पड़ा असल में इसका किस्सा यह है कि एक फिल्म आई थी 1953 में उ उन्होंने इसमें कैरेक्टर किया था उस कैरेक्टर का नाम था जगदीप और इसी के बाद से उनका नाम सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी से बन गया जगदीप उनके जगदीप वाले रोल को दर्शकों ने बहुत पसंद किया ये रहे 10000 के पांच कड़क नोट अरे अरे प्रेम फिर डब्बागुल कर गया क्यों बहाने बना रहे हो वो बेचारा तो वाहवा स्टूडियो में बैठा हुआ है।

वाह वाह स्टूडियो में बैठा हुआ है अरे फिल्मी मलेरिया जॉनी मेरे बेटे को लूट रहा है जगदीप ने फिल्म धोबी डॉक्टर में किशोर कुमार के बचपन का रोल किया था इस फिल्म में उन्हें रोने का सीन करना था तो इस सीन में जगदीप की परफॉर्मेंस इतनी कमाल की थी कि डायरेक्टर विमल रॉय उनके काम के मुरीद हो गए उन्होंने अपने सेक्रेटरी से कहा कि वह जगदीप को मिलने के लिए बुला लें दोनों की मुलाकात हुई जिसके बाद विमल रॉय ने उन्हें फिल्म दो बीघा जमीन में एक रोल ऑफर किया इसके बाद दोनों ने साथ में कई और फिल्मों में काम किया।

एक किस्सा इनका जवाहरलाल नेहरू के साथ का भी है अ जगदीप ने असल में मुन्ना और अब दिल्ली दूर नहीं हम पंछी एक डाल के जैसी फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम किया था जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया इन सभी फिल्मों में उस वक्त के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी उनके काम को पसंद किया और फिल्म में काम कर चुके सभी चाइल्ड आर्टिस्ट को एक दिन अपने घर नाश्ते पर बुलाया तुम ही तो हमको गिरफ्तार करवाए और हम ही ने तुम्हें बचाया ऐसा क्यों किया तुम ये धंधा है प्यारे कौन सा धंधा है प्यारे जरा हम भी तो सुने पंडित नेहरू ने बच्चों को नाश्ते के साथ गुलदस्ता भी दिया।

लेकिन जब जगदीप का नंबर आया तो गुलदस्ते खत्म हो गए इस पर प्रधानमंत्री ने उनसे कहा था जगदीप भाई फिल्मों में तुम्हारी एक्टिंग बड़ी शानदार थी मुझे बड़ी पसंद आई फिलहाल गुलदस्ते तो खत्म हो गए हैं लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम मेरी छड़ी सम्मान के तौर पर रख लो और फिर प्रधानमंत्री नेहरू की दी हुई उस छड़ी को जगदीप ने ता उम्र संभाल कर रखा मेरी फिल्म में मैं आपको भी हीरो बनाऊंगा अंकल अंकल अबे बहुत पुराना पापी है तू मेरे बाप को झांसा दे चुका है बच्चा बन रहा है एक बात कान खोल कर सुन ले अगर मेरे बेवकूफ बेटे को और बेवकूफ बनाने की कोशिश की ना तो सुई इस कान में घुसे दूंगा इसमें से निकाल के तेरा कलाबत्तू बना दूंगा इबल का किस्सा ऐसा है कि डायरेक्टर के आसिफ ने जगदीप को एक फिल्म ऑफर की फिल्म ऑफर करने के बाद उनसे पूछा गया कि भाई आप इसमें काम करने के कितने पैसे लेंगे जगदीप ने जवाब दिया।

₹2500000 के आसिफ बोले तुम्हें अपनी सही कीमत नहीं पता है इस रोल के लिए मैं तुम्हें ₹5000000 देकर भेज दिया और कहा कि जब बाकी पैसों की जरूरत हो तो आकर मांग लेना कुछ दिनों तक फिल्म की शूटिंग चली इस दौरान जब भी उन्हें पैसों की जरूरत होती वह के आसिफ से जाकर मांग लेते उनकी इस हरकत से आसिफ का नौकर बहुत गुस्सा होता था एक दिन उसने जगदीप को रोक कर कहा तुम बार-बार क्यों चले आते हो पैसे मांगने क्या तुम्हें पता नहीं कि फिल्म की बाकी शूटिंग अब कभी भी नहीं होगी किसी वजह से उसे रोक दिया गया है ।

यह सुनकर जदीप को बहुत बुरा लगा कि फिल्म बंद हो जाने के बावजूद कि आसिफ उनकी मदद करते रहे इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि वह दोबारा कभी भी पैसे मांगने नहीं आएंगे हालांकि एक दिन उन्हें कुछ पैसों की सख्त जरूरत थी आखिरकार उन्हें मजबूरी में कि आसिफ के पास जाना पड़ा क्योंकि उन्हें पता था कि इस मुसीबत के समय वही उनकी मदद कर सकते हैं ।

वह गए और कि आसिफ ने उन्हें 50 दे दिए फिर उनके नौकर ने जगदीप को टोका और कहा तुम फिर आ गए कि और उनकी पत्नी के पास यही 50 थे जो उन्होंने तुम्हें दे दिए हैं इस बात का पछतावा जगदीप को ता उम्र रहा इस घटना को याद करते हुए वो अक्सर कहते थे कि के आसिफ जैसा महान और दिलदार डायरेक्टर ही मुगले आसम जैसी फिल्म बना सकता था पिताजी आप मुझे निखट्टू बोल दीजिए टट्टू बोल दीजिए लेकिन मैं आपको कुछ बन के दिखाऊंगा नमस्ते जी नमस्ते के बच्चे मुंह को टाके लगा और हाथ में तैची पकड़ पिताजी ये मुझे नहीं होगा नहीं होगा तो हाथ में भीख का कटोरा पकड़ेगा नहीं पिताजी फिल्म शोले में जगदीप सूरमा भोपाली के रोल में दिखे थे यह रोल इतना पसंद किया गया कि जगदीप को लोग सूरमा भोपाली के नाम से ही जानने लगे वहीं उनको यह रोल मिलने का किस्सा भी बड़ा मजेदार है ।

दरअसल सूरमा भोपाली का किरदार भोपाल के फॉरेस्ट ऑफिसर नाहर सिंह पर आधारित था भोपाल में कई अरसे तक रहे जावेद अख्तर ने नाहर सिंह के कई किस्से सुन रखे थे इसीलिए उन्होंने जब सलीम के साथ फिल्म शोले लिखना शुरू किया तो कॉमेडी के लिए नाहर सिंह से मिलता-जुलता एक किरदार सूरमा भोपाली तैयार कर दिया एक दिन जावेद अख्तर ने उन्हें फिल्म शोले की कहानी सुनाई जगदीप को लगा कि दोस्ती की वजह से उन्हें काम मिलेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं फिल्म की लगभग पूरी शूटिंग भी हो गई तब एक दिन अचानक उन्हें डायरेक्टर रमेश सिप्पी का फोन आया उन्होंने जगदीप को फिल्म में सूरमा भोपाली का रोल ऑफर किया ।

इस पर जगदीप ने कहा कि फिल्म की शूटिंग तो पूरी हो गई है तब सिप्पी ने कहा कि अभी कुछ सींस की शूटिंग बाकी है इसके बाद उन्होंने सूरमा भोपाली का किरदार निभाया जो आज भी अमर है आप लोगों को और कोई काम कि नहीं दिन भर गठ रहते हो शोले और सूर्मा भोपाली का रोल दोनों ही हिट रहे इस सक्सेस के बाद जगदीप ने इसी किरदार पर एक फिल्म बनाई जिसका टाइटल रखा सूरमा भोपाली और उन्होंने यह फिल्म बनाई जो कि 1988 में रिलीज भी हुई यह भारत के बहुत से राज्यों में फ्लॉप रही लेकिन मध्य प्रदेश में इस फिल्म के प्रशंसक बड़ी तादाद में रहे ।

एक वक्त ऐसा भी आया कि जब इनका गला खराब हो गया लेकिन खराब गले से बोला हुआ इनका डायलॉग भी हिट हो गया यह किस्सा फिल्म सुरक्षा की शूटिंग के दौरान का है जब जगदीप का गला खराब हो गया था कई दिनों के आराम के बाद भी जब कोई सुधार नहीं हुआ तो आखिरकार मेकर्स ने उन्हें उसी आवाज में डायलॉग बोलने के लिए कहा जब फिल्म शुरू हुई तो दर्शकों को दबी आवाज में भी जगदीप का अंदाज बड़ा पसंद आया।

इसके बाद कई फिल्मों में इसी तरह दबी आवाज में डायलॉग बोलने के लिए उनसे कहा गया नहीं पिताजी पिताजी मुझे मेरी मंजिल एकदम सामने दिखाई दे रही है सामने पुलिस स्टेशन है और शमशान घाट है कौन सी मंजिल है बेटा तुम्हारी ओ पिताजी मैं आपको कैसे समझाऊं मेरी किस्मत का सितारा चमकने वाला है एक और किस्सा है धर्मेंद्र के साथ का किस्सा यह है कि धर्मेंद्र को पुराने किस्से जमा करने का शौक था इस वजह से जगदीप उन्हें अठन्नी चवन्नी के सिक्के दिया करते थे।

इस बात का खुलासा खुद धर्मेंद्र ने एक अखबार से हुए इंटरव्यू में किया था उन्होंने बताया कि जगदीप ने मुझे कुछ पुराने सिक्के दिए खासकर अठन्नी लाकर मुझे दीी और कहा पाजी मुझे पता है कि आपको पुराने सिक्कों का बहुत शौक है तो ऐसे कुछ दगार किस्से हैं जगदीप के पर सबसे मजेदार किस्सा है उनकी तीसरी शादी का असल में यह तो आप जानते ही है कि उन्होंने तीन शादियां की जिससे उन्हें छह बच्चे हुए इनकी पहली जो पत्नी थी वह थी नसीम बेगम दूसरी सुघ्र बेगम और तीसरी नजीमा थी तीसरी पत्नी से शादी करने का किस्सा बड़ा मजेदार है तो कुछ ऐसा है कि जगदीप के बेटे को लड़की वाले देखने आए थे।

लेकिन उनके बेटे नावेद को शादी नहीं करनी थी अब ज लड़की का रिश्ता आया उसकी बड़ी बहन जगदीप को पहली नजर में ही पसंद आ गई उन्होंने उस लड़की को प्रपोज कर दिया जिसके बाद दोनों की शादी हो गई और इस शादी से उन्हें एक बेटी मुस्कान जाफरी भी हुई जगदीप के दूसरे बेटे जावेद जाफरी भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं मीडिया रिपोर्ट्स का दावा था कि जाफरी और जगदीप के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे वजह यह थी कि एक समय ऐसा था कि जगदी बहुत ज्यादा लगे थे और यह बात जावेद जाफरी को बिल्कुल पसंद नहीं थी जिस वजह से आए दिन उनके बीच बहस होती रहती थी उन्होंने जगदीप को कई बार मना भी किया ।

लेकिन कुछ समय बाद दोनों के रिश्ते पहले से बेहतर हो गए एक मर्द अपनी औरत के कमरे में क्यों आता है अरे मेरी जान अरे आ 81 साल की उम्र में जगदीप बीमारियों से जूझ रहे थे और यह वक्त था का जब वह काफी कमजोर भी हो गए थे।

आखिरकार 8 जुलाई 2020 को वह अपने पीछे छह बच्चों और ती पोतों से भरा परिवार छोड़कर दुनिया को

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