साल है 1979। इटावा जिले के उसराहार थाने में फटे पुराने कपड़ों में एक शख्स खड़ा हुआ है। पुलिस वालों के पूछने पर बताता है, मैं एक किसान हूं। मेरठ से बैल खरीदने आया था। रास्ते में जेब कट गई। रिपोर्ट लिखवाने आया हूं। पुलिस वालों ने मदद करने के बजाय टर्काना शुरू किया। रिपोर्ट लिखने के लिए ₹100 की मांगी। काफी मोलभाव के बाद ₹35 में सौदा तय होता है। मुंशी शिकायत लिखता है और उस किसान से पूछता है, दस्तखत करोगे या अंगूठा लगाओगे? वो किसान जेब से एक मोहर और स्याही निकालता है और कागज पर ठोक देता है। मोहर पर लिखे अल्फाज़ पढ़ते ही मुंशी के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। प्रधानमंत्री भारत सरकार।
वो मोहर थी देश के प्रधानमंत्री की और मोहर लगाने वाला वो किसान था। देश का पांचवा प्रधानमंत्री नाम था चौधरी चरण सिंह। कि यह जो इट इज एम्ड एट अस हिंदुस्तान के लिए बनाया जा रहा है। विल नॉट बी फार फ्रॉम टू। सच्चाई से बहुत दूर हमारा नतीजा नहीं होगा। पूरे थाने में हड़कंप मच जाता है। प्रधानमंत्री के हुक्म पर फौरन पूरे थाने को निलंबित कर दिया जाता है।
यही चौधरी चरण सिंह की पहचान थी और यही उनकी सियासत। एक ऐसा प्रधानमंत्री जो अपने पूरे कार्यकाल में एक बार भी संसद का सामना नहीं कर सका। एक ऐसा नेता जिसने इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करवाया और एक ऐसा मुख्यमंत्री जिसने उत्तर प्रदेश के किसानों को उनका हक दिलाने की पूरी कोशिश की। पिछले में आपने देखा कि सुचेता कृपलानी के जाने के बाद यूपी की सियासत जातिवाद और सियासी उठापटक के घिनौने मोड़ पर खड़ी थी। मगर उस मोड़ पर जो अब तूफान आ रहा था वो था एक किसान के बेटे का। जो की जड़ों को मिटाने सड़कों पर निकला था। जिसने जाट नाम वाले कॉलेज की प्रिंसिपली ठुकरा दी थी। जिसने नाबार्ड की बुनियाद रखी।
मनरेगा का ख्वाब देखा और एक्ट जैसा कानून दिया। मगर जिस कुर्सी का सबसे ज्यादा हकदार था उस पर सबसे कम बैठ पाया। इस कहानी में सिर्फ जद्दोजहद नहीं है, विवाद भी है, इंदिरा गांधी से टकराव भी है और एक ऐसी सियासी विरासत भी जो आज 50 साल बाद भी हर इंतखाब में जिंदा नजर आती है। यह कहानी है उत्तर प्रदेश के पांचवें मुख्यमंत्री और हिंदुस्तान के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की। साल था 1928। देश भर में कमीशन के खिलाफ प्रोटेस्ट चल रहे थे और मेरठ के छोटे से गांव नूरपुर में 23 दिसंबर 1902 को एक जाट किसान परिवार में जन्मा एक बेटा साइमन कमीशन प्रोटेस्ट के जरिए सियासत में पहला बड़ा कदम रख रहा था। यह वही कमीशन था जो हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का फैसला करने आया था।
मगर उसमें एक भी हिंदुस्तानी न था। पूरे मुल्क में साइमन गो बैक के नारे गूंज रहे थे और चरण सिंह उस आवाज में अपनी आवाज मिला रहे थे। फिर वो लम्हा आया जब चरण सिंह ने एक बड़ा फैसला लिया। अच्छी खासी चलती हुई वकालत छोड़ दी। घर में पैसे कम थे। बच्चे छोटे थे मगर मुल्क की आजादी का जज्बा इन सब पर भारी पड़ा। खुद को पूरी तरह तहरीक आजादी के हवाले कर दिया। अप्रैल 1930 गांधी जी के नमक सत्याग्रह के दौरान गाजियाबाद के लोनी से गिरफ्तार हुए।
6 महीने की कैद हुई। जेल से निकले तो फिर मैदान में उतर गए। 1932 में अंग्रेजों के कम्युनल अवार्ड की मुखालफत की जो धर्म और जातियों के नाम पर जनता को बांटने की एक गहरी साजिश थी। मगर चरण सिंह जमीन पर बदलाव चाहते थे। इसलिए उन्होंने हरिजनों के साथ बैठकर खाना खाया।
उन्हें गांव के उन कुओं से पानी भरने का हक दिलाया जहां सदियों से उनकी मनाही थी। ये आज के परिदृश्य में छोटे-छोटे कदम हैं। लेकिन उस जमाने में यह इंकलाब से कम ना था। नवंबर 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए 11 महीने बरेली जेल में रहे और अक्टूबर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में 13 महीने सलाखों के पीछे रहे। तीनबार जेल हर बार घर में तंगदस्ती आमदनी का कोई जरिया नहीं था। मगर इस पूरे दौर में एक महिला जो कभी डगमगाई नहीं गायत्री देवी।
इन दोनों की शादी 1925 में हुई थी। जब-जब चरण सिंह जेल में होते गायत्री देवी ही पूरा घर संभाल रही होती थी। जब बाहर थे तो भी घर की फिक्र गायत्री देवी की ही थी। भयानक तंगदस्ती में उन्होंने अकेले छह बच्चों की परवरिश की और चरण सिंह के हौसले को कभी भी उन्होंने टूटने नहीं दिया। आखिरकार उनकी यह जद्दोजहद रंग लाई।
सन 1937 में चरण सिंह पहली बार मेरठ साउथ वेस्ट से कांग्रेस के परचम तले यूनाइटेड प्रोविंसेस की असेंबली पहुंचे। मगर यह कोई आम विधायक नहीं था। जब वह असेंबली में खड़े होते थे तो उनकी आवाज सीधे उन लाखों किसानों की बात करती जो कभी वहां पहुंच नहीं सके ना पहुंच सकते थे और अब उनके पास एक कानूनी हथियार भी था। किसानों को बिचोलियों और आड़तियों की लूट से बचाने के लिए एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट बिल पेश किया। सरकारी नौकरियों में किसानों के बच्चों के लिए 50% आरक्षण की मांग उठाई। लैंड यूटिलाइजेशन बिल का खाका तैयार किया जो आगे चलकर जमींदारी प्रथा के खात्मे की बुनियाद बना। उनका मानना था कि जो किसान जमीन जोतता है, लगान की 10 गुनी रकम चुका दे, तो उसे उस जमीन का सीधा मालिकाना हक़ मिलना चाहिए।
मगर सबसे बड़ा काम आया 1939 में। गरीब किसान कर्ज के बोझ तले दबे थे। सूदखोर उनका खून चूस रहे थे। फसल अच्छी हो तो कर्ज चुकाओ, फसल खराब हो तो ब्याज बढ़ता जाए और एक दिन खेतनीलाम हो जाए। चरण सिंह ने डेप्ट रिडेंशन बिल पास कराने में पूरी ताकत झोंक दी। इस एक बिल ने यूपी के हजारों किसानों को सूदखोरों के चंगुल से हमेशा के लिए आजाद कर दिया और उनके खून पसीने से सींचे खेतों को नीलाम होने से बचा लिया। यह 1939 में किसानों के हक में उठाया गया एक कदम था जाति से परे मजहब से परे। एक ऐसा बीज जो उस वक्त जमीन में दबा था मगर जिसने आगे चलकर एक बड़े इंकलाब की शक्ल ली।
यही वो बुनियाद थी जिसने 1979 से 80 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट में ओबीसी के लिए आरक्षण का रास्ता हमेशा के लिए साफ कर दिया था। अब साल आया 1946 चरण सिंह दूसरी बार यूपी असेंबली के लिए मैदान में उतरे। मगर इस बार एक खास बात थी जब बाकी नेता अमीर सेठों और बड़े कारोबारियों के दरवाजे पर चंदे के लिए दस्तक दे रहे थे। चरण सिंह ने सिर्फ आम जनता के दिए हुए चंदे से चुनाव लड़ा। एक पैसा भी किसी रसूखदार से नहीं लिया। खबर सूबे के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत तक पहुंची। पंत ने चरण सिंह को करीब से देखा।
गांव और खेती की गहरी समझ, निडर मिजाज और कानून की पुख्ता तालीम। यह शख्स उनकी नजर में कुछ अलग था और इसलिए 1946 से 1950 तक चली दूसरी कांग्रेस हुकूमत में पंत ने चरण सिंह को अपना पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी मुकरर कर दिया। इसी दौरान वो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी बने और 1954 तक यूपी कांग्रेस लेजिस्लेचर पार्टी के जनरल सेक्रेटरी का ओदा भी संभालते रहे। मगर पंत ने चरण सिंह को सबसे बड़ा काम जो सौंपा वो था जमींदारी खत्म करने वाले कानून की तैयारी।
यह वही लड़ाई थी जो चरण सिंह बचपन से लड़ रहे थे। जब उनके पिता की जमीन जमींदार ने छीन ली थी तब से और अब उनके हाथ में वह हथियार था जिससे वह पूरी निजाम को बदल सकते थे। 1952 में यह कानून मुकम्मल शक्ल में पास हुआ। यूपी की करीब 6 करोड़ 70 लाख एकड़ जमीन पर काम करने वाले करोड़ों बेजमीन किसानों को उनका जायज हक मिला। बिना किसी खूनखराबे के सदियों से गरीबों का खून चूसने वाले जमींदारों का पूरा निजाम जड़ से उखड़ गया। साल 1951 से 1967 तक 19 महीनों को छोड़कर चरण सिंह यूपी की हर कांग्रेस हुकूमत में कैबिनेट मंत्री रहे।
मगर यह 19 महीने कोई मामूली वक्त ना था। हुआ यह कि जनवरी 1959 में नागपुर के एक बड़े कांग्रेस जलसे में पंडित नेहरू ने सामूहिक खेती यानी कलेक्टिव फार्मिंग का मंसूबा पेश किया। पूरे पंडाल में तालियां गूंज रही थी। नेहरू का रसूख ऐसा था कि विरोध की हिम्मत कोई कर नहीं सकता था।
मगर चरण सिंह उठे पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह ने लिखा है कि उस दिन चरण सिंह की तकरीर जादू से कम ना थी। पूरे 1 घंटे तक बेखौफ दलील देते रहे। ऐसा लगा जैसे पूरी बाजी पलट गई हो। मगर नेहरू का दबदबा इतना था कि ना चाहते हुए भी नेताओं को उन्हीं के हक में वोट देना पड़ा। [संगीत] चरण सिंह हारे मगर झुके नहीं। इस बेबाकी की सियासी कीमत चुकानी पड़ी उन्हें। 19 महीने कैबिनेट से बाहर रहे। मगर इन 19 महीनों में वो खाली नहीं बैठे थे। 1959 में जॉइंट फार्मिंग एक्स रेड किताब लिखी।
जिसमें अपना गांधीवादी नजरिया उन्होंने पेश किया। नेहरू और कांग्रेस की सामूहिक खेती की नीतियों की जबरदस्त मुखालफत की। इस किताब ने सत्ता के गलियारों में कई रसूखदार लोगों को उनका पक्का दुश्मन बना दिया। सालों बाद नेहरू के इंतकाल पर उन्होंने एक तंज कसा जो तारीख में दर्ज हो गया। नेहरू जी हिंदुस्तान में पैदा हुए मगर हिंदुस्तान की मिट्टी से पैदा नहीं हुए। उनका कहना था कि नेहरू मुल्क को ऊपर से नीचे बनाना चाहते थे। बड़े कारखानों और शहरों से शुरू करके। जबकि गांधी जी का रास्ता सबसे गरीब आदमी से शुरू होता है और गांव देहात को तरक्की का असली मरकज मानता है और चरण सिंह गांधी के रास्ते पर थे।
ऐसा उनका मानना था। कैबिनेट में उनकी वापसी हुई तो सन 1953 में राजस्व और कृषि मंत्री बने और फिर एक के बाद एक किसानों की तकदीर बदलने वाले फैसले आने लगे। चकबंदी कानून किसानों के बिखरे हुए खेतों को एक जगह जमा करके खेती को मुनाफे का सौदा बनाया। बड़े और रसूखदार किसानों की जमीनों पर हदबंदी लगाई और जो जमीन निकली वह सीधे अनुसूचित जाति के बेज़मीन लोगों में बांट दी गई और जिन किसानों के पास 3 एकड़ तक जमीन थी उनका सारा सरकारी लगान हमेशा के लिए माफ कर दिया गया। अब साल आया 1967 चरण सिंह के सब्र का प्याला भर चुका था।
16 साल कांग्रेस में रहे। 16 साल उसूलों की लड़ाई लड़ते रहे। मगर एक दिन उन्होंने फैसला किया और अपने 17 साथी विधायकों के साथ कांग्रेस को अलविदा कह दिया। यह महज एक पार्टी छोड़ना नहीं था। यह एक नई इबारत लिखने की शुरुआत थी। बिहार, उड़ीसा, बंगाल और राजस्थान के पुरानेऔर नामवर कांग्रेसी नेताओं को साथ लेकर के भारतीय क्रांति दल की बुनियाद रख दी गई।
नई जमात नई पार्टी के पहले जलसे में कार्यकर्ताओं से कहा उन्होंने किस्मत ऊपर वाला तय करता है। यह सोच मुल्क की तरक्की की सबसे बड़ी रुकावट है। इसे बदलना होगा और साफ कह दिया। जातपात का निजाम जम्हूरियत के सख्त खिलाफ है और रहेगा। इसके बाद उन्होंने यूपी में पहली बार एक गैर कांग्रेसी संयुक्त विधायक दल की बुनियाद रखी।
जनसंघ और समाजवादियों से हाथ मिलाया। सीबी गुप्ता की अल्पमत हुकूमत गिरने के बाद अब यूपी के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे चौधरी चरण सिंह। चरण सिंह ने मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहला फैसला आवाम की जबान के हक मेंकिया। ऐलान हुआ। जिन जिलों में 15% से ज्यादा आबादी उर्दू बोलती हो, वहां हुकूमत के तमाम जरूरी आदेश और कानून अब उर्दू में भी मिलेंगे।
पहले यह सहूलियत सिर्फ जिला स्तर तक थी। अब पूरे सूबे में थी। फिर एक और मंसूबा आया। अंतरजातीय शादी करने वाले, इंटरकास्ट मैरिज करने वाले नौजवानों को सरकारी नौकरियों में तरजीह दी जाएगी। जातपात तोड़ने की यह कोशिश उनके दिल के बेहद करीब थी। मगर जब यह मंसूबा कैबिनेट के सामने आया तो उन्हीं की सरकार में शामिल भारतीय जनसंघ के सदस्यों ने इसके खिलाफ वोट कर दिया।
एक्ट पास ना हो सका। यह गठबंधन की मजबूरी थी और चरण सिंह को यह मजबूरी खलती थी। मगर वह जानते थे कि अकेले चलनेसे कहीं नहीं पहुंचा जाता है। सन 1968 प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उत्तर प्रदेश के दौरे पर थी। इसी दौरान उन्हीं के गठबंधन के एक अहम साथी सोशलिस्ट पार्टी के नेता राज नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ हिंसक मुजाहरा कर दिया।
चरण सिंह के लिए यह बर्दाश्त था। उनका उसूल था आजाद हिंदुस्तान में भीड़ जुटाकर प्रदर्शन करना जम्हूरियत का अपमान है। चाहेमुखालिफ कोई भी हो और उन्होंने राज नारायण को गिरफ्तार करने का हुक्म दे डाला। एक फैसला और गठबंधन टूट गया। चरण सिंह की हुकूमत गिरा दी गई। सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1969 में मध्यावधि चुनाव हुए। चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल ने अकेले 98 सीटें जीती और 21% से ज्यादा वोट हासिल किए। कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते हुए सूबे की दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। चरण सिंह खुद छपरौली से जीत गई। मगर कांग्रेस बहुमत से महज दो सीट दूर रह गई और सीबी गुप्ता को एक बार फिर हुकूमत बनाने का न्योता राज्यपाल ने दे दिया। अब सूबे की सियासत एक अजीब मोड़ पर थी।
कांग्रेस के भीतर दरारें गहरी होती जा रही थी। एक साल के भीतर पार्टी दो धड़ों में बंट गई। कांग्रेस ओ और कांग्रेस आर। सीबी गुप्ता कांग्रेस ओ के साथ थे। 90 विधायक कमलापति त्रिपाठी की कांग्रेस आर के पास 120 और 10 फरवरी 1970 को खराब तबीयत की वजह से सीबी गुप्ता इस्तीफा दे देते हैं। सूबे की कुर्सी एक बार फिर खाली थी और इस बार चरण सिंह ने इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस आर का समर्थन किया।
18 फरवरी 1970 को दूसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री की शपथ ले रहे थे चौधरी चरण सिंह। वही इंदिरा गांधी जिनके खिलाफ वो बरसों से लड़ रहे थे आज उन्हीं के सहारे कुर्सी पर बैठे थे। सियासत में उसूल और मजबूरी कभी-कभी एक ही रास्ते पर चलते हैं। दूसरी बार मुख्यमंत्री बनते ही चरण सिंह ने पहला फैसला वही किया जो उनकी फितरत थी। एक साफ और बेलाग ऐलान। पूरे सूबे में शराब की कोई नई दुकान नहीं खुलेगी। पक्के आर्य समाजी विचारों वाले चरण सिंह ने जिंदगी भर शराब को हाथ नहीं लगाया था और जब हाथ में हुकूमत आई तो अपनी सोच को कानून की शक्ल दे दी। मगर इससे भी बड़ा काम अभी बाकी था।
यूपी एक ऐसा सूबा था जो अक्सर सांप्रदायिक फसादों की आग में झुलसता रहता था। हर नई हुकूमत में दंगे होते और हर बार पुलिस किसी न किसी सियासी दबाव में काम करती। चरण सिंह ने यह दस्तूर बदल दिया। उनका उसूल एकदम साफ था। हुकूमत का मुखिया पुलिस की तबादले तैनाती से बिल्कुल दूर रहेगा। पुलिस के काम में कोई सियासी दखल नहीं होगा। अगर कोई अफसर अपना सियासी रसूख इस्तेमाल करने की कोशिश करें तो चरणसिंह बिना किसी लिहाज के उससे निपटते थे।
नतीजा 1970 में यूपी से का मुकम्मल सफाया हो गया। को लेकर वह ताम्र बेचैन रहे। अक्सर कहते थे जैसा राजा वैसी प्रजा। जनता हमेशा अपने नेताओं के नक्शे कदम पर चलती है। इसलिए 1967 में उनकी कैबिनेट ने के खिलाफ पब्लिक मैन इंक्वायरी ऑर्डिनेंस पास कर दिया। और 1970 में जब के पुख्ता सबूत सामने आने लगे तो एक झटके में पूरे सूबे की एक्वाइन जिला परिषदें भंग कर दी। मगर उनके दिल में एक और बात वर्षों से सुलग रही थी।
1939 में उन्होंने कांग्रेस से अपील की थी। किसी भी स्कूल, कॉलेज या सरकारी नौकरी में हिंदू उम्मीदवार की जाति ना पूछी जाए सिवाय अनुसूचित जाति के। उस वक्त किसी ने नहीं सुनी मगर चरण सिंह ने वो यह बात याद रखी। 30 साल बाद 1970 में जब हुकूमत उनके हाथ में आई, उन्होंने उसी उसूल को कानून की शक्ल दे दी। कैबिनेट ने फैसला किया जिस भी शैक्षणिक संस्था के नाम में किसी खास जाति का नाम हो, सरकार उसकी तमाम सरकारी मदद फौरन रोक देगी। इस फैसले का ऐसा रो पड़ा कि रातोंरात तमाम संस्थाओं ने अपने नाम से जाति वाले अल्फाज हटा लिए। वो शख्स जिसने कभी जाट नाम वाले कॉलेज की प्रिंसिपली ठुकराई थी। अब पूरे सूबे में की जड़े काट रहा था। 30 साल पहले का वो नौजवान और 1970 का यह मुख्यमंत्री दोनों एक ही थे। मगर यह दूसरी हुकूमत भी ज्यादा देर ना चली। और इस बार हुकूमत गिरी उसी हाथ से जिसने थामी थी।
सितंबर 1970 इंदिरा गांधी संसद में प्रवी पर्स खत्म करने का बिल लेकर आई। यह वो सालाना शाही भत्ता था जो आजादी के बाद राजा महाराजाओं को उनकी रियासतें हिंदुस्तान में मिलाने के बदले दिया जाता था। इंदिरा गांधी को यकीन था कि उन्हीं की बैसाखी पर चल रही चरण सिंह की हुकूमत के सांसद इस बिल का साथ दे देंगे। मगर चरण सिंह ने यहां राजाओं का साथ दिया।
उनके सांसदों ने बिल के खिलाफ वोट किया। इंदिरा गांधी ने फौरन समर्थन वापस ले लिया और अक्टूबर 1970 में चरण सिंह की दूसरी हुकूमत गिरा दी गई। मगर जाते-जाते वो एक ऐसा कानून छोड़ गए जो आज भी यूपी में उनकी याद दिलाता है। अपने इसी दूसरे कार्यकाल में वह अपराध रोकने के लिए एक सख्त अध्यादेश लाए थे। उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण विधेयक 1970 उनके जाने के बाद टी एन सिंह मुख्यमंत्री बने और 1971 में यह बिल सर्वसम्मति से पास हो गया। आज यही कानून पूरे यूपी में गुंडा एक्ट के नाम से जाना जाता है। कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि 1967 में जब से चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ी थी, इंदिरा गांधी उन्हें वापस खींचने की कोशिश करती रही। मगर हर बार नाकाम रही।
दोनों मजबूत नेता थे। ना अपने उसूलों से पीछे हटते थे, ना एक दूसरे के आगे झुकते थे। फिर 1975 में इमरजेंसी आई और इस दूरी को इतना गहरा कर गई कि वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा। इमरजेंसी के दौरान चरण सिंह ने असेंबली में इंदिरा गांधी को सीधे हाथ लेते हुए कहा, मैं अंग्रेजों के दौर में तीन-चार बार जेल गया। मगर तब भी ऐसा जुल्म नहीं हुआ जैसा आज हो रहा है। न्यायपाल का खस्ता हाल है। जजों में हिम्मत नहीं बची। प्रेस से रेडियो तक सब कुछ हुकूमत के कब्जे में है। विपक्ष जनता की सभाएं नहीं कर सकता और मैं जो आज कह रहा हूं वह भी अखबारों में नहीं छपेगा। आप बोईलर में भाप रोक कर रखते हैं और समझते हैं कि कुछ नहीं होगा। याद रखिए एक दिन इसका होगा। लेकिन 29 अगस्त 1974 को वे भारतीय लोकदल यानी कि बीएएलडी की बुनियाद रख चुके थे। बीकेडी, स्वतंत्र पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, उत्कल कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल, किसान मजदूर पार्टी तमाम जमातों को एक ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। अब लड़ाई सिर्फ यूपी की नहीं पूरे मुल्क की थी।
1975 से 77 तक इमरजेंसी का दौर था। इमरजेंसी ने चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच की खाई इतनी गहरी कर दी कि दोबारा एक साथ आने की कोई गुंजाइश नहीं बची। इमरजेंसी खत्म हुई और मुल्क में चुनाव हुए। चरण सिंह बगावत से जीतकर केंद्र में पहुंचे। मोरारजी देसाई की केंद्र में सरकार बनी और चरण सिंह बने देश के गृह मंत्री और अब उनके हाथ में वो ताकत थी जो वह बरसों से चाहते थे। 3 अक्टूबर 1977 उन्होंने सीबीआई को हुक्म दिया और इंदिरा गांधी को उनके दिल्ली आवास से गिरफ्तार करवा लिया। इमरजेंसी की ज्यादतियों और माली बेनियमियों के इल्जाम लगे। अगले दिन अदालत में पेश किया गया। मगर ठोस सबूत ना होने की वजह से फ़ौरन रिहाई भी कर दी गई।
इंदिरा गांधी से उनकी नफरत इतनी गहरी थी कि एक बार उन्होंने कह दिया इंदिरा गांधी को कनोट प्लेस पर खड़ा करके कोड़े मारे जाने चाहिए। आलोचक सवाल उठा रहे थे कि यह किस तरीके की बात बोल रहे हैं आप? आलोचक सवाल यह भी उठा रहे थे क्या यह गिरफ्तारी इंसाफ की मांग थी या सियासी बदले की थी? वो चरण सिंह जो हमेशा कानून के डंडे को इंसाफ का हथियार मानते थे। क्या इस फैसले में वह उसूल कहीं पीछे छूट गया? यहीं से जनता पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ते गए। 1 जुलाई 1978 को मोरारजी देसाई ने चरण सिंह को गृहमंत्री के ओदे से हटा दिया।
23 दिसंबर 1978 अपने 76वें जन्मदिन पर दिल्ली में एक ऐतिहासिक किसान रैली का आयोजन किया। करीब 8 लाख किसानों का सैलाब दिल्ली की तरफ उमड़ पड़ा। तमाम सड़कें जाम थी। दिल्ली की हुकूमत हिल गई। मोरारजी देसाई को झुकना पड़ा और चरण सिंह को कैबिनेट में वापस लेना पड़ा।
इस बार डिप्टी पीएम और वित्त मंत्री के ओदे के साथ। 28 फरवरी 1979 को उन्होंने केंद्रीय बजट पेश किया मगर जनता पार्टी की अंदरूनी कशमकश खत्म ना हुई। आखिरकार उन्होंने मोरारजी देसाई की हुकूमत से इस्तीफा दे दिया और अपनी नई जनता पार्टी सेुलर अलग बना ली। जनवरी से जुलाई 1979 तक वह मुल्क के उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री रहे। इसके बाद बी शिवरामन कमेटी बनाई। 1982 में नाबार्ड बैंक की बुनियाद रखी जो आज करोड़ों किसानों की माली रीड है। कच्ची को एक्साइज ड्यूटी से आजाद किया। यह टैक्स सिगरेट और बीड़ी पर लगा दिया और फिर एक ऐसी योजना शुरू की जिसकी जड़े आज भी मुल्क में जिंदा हैं। काम के बदले अनाज, मेहनत के बदले अनाज।
रोजगार के नए मौके और सरकारी अनाज भंडार का बेहतरीन इस्तेमाल। यही योजना आगे चलकर मनरेगा की सबसे मजबूत बुनियाद बनी। फिर वो लम्हा आया जिसका चरण सिंह ने कभी ख्वाब भी ना देखा होगा। 28 जुलाई 1979 चौधरी चरण सिंह को कांग्रेस का बाहरी समर्थन मिल गया। अब उत्तर प्रदेश के पांचवें मुख्यमंत्री पूरे देश के पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे। फूस की छत तले पैदा हुआ किसान का बेटा अब मुल्क के सबसे बड़े ओहदे पर था। मगर यह खुशी 23 दिन से ज्यादा ना चल सकी। लोकसभा में बहुमत साबित करने से ठीक पहले इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस नहीं लिया। वजह चरण सिंह ने इमरजेंसी की ज्यादतियों के लिए संजय गांधी के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने से साफ इंकार कर दिया और कुर्सी चली गई।
23 दिन बाद इस्तीफा आ गया। चौधरी चरण सिंह हिंदुस्तान की तारीख के इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्हें अपने पूरे कार्यकाल में कभी संसद का सामना करने का मौका ही नहीं मिला। मगर जितने दिन भी रहे खाली नहीं बैठे। वो ओबीसी यानी पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 25% आरक्षण की योजना लेकर आए। लेकिन उन्होंने कहा प्रमोशन में आरक्षण खत्म होना चाहिए। और जिन्होंने पहले आरक्षण का फायदा उठाकर नौकरी पाई हो या जो इनकम टैक्स भरते हो उनके बच्चे इस दायरे से बाहर रहें। उस वक्त राष्ट्रपति थे नीलम संजीव रेड्डी। उन्होंने गुजारिश की जब तक आम चुनाव ना हो जाए यह योजना टाल दें।
जनवरी 1919 चुनाव हुए। जनता पार्टी की अंदरूनी कलह ने खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारी और इंदिरा गांधी जबरदस्त वापसी के साथ सत्ता में आ गई। मगर इस तूफान में भी चरण सिंह डटे रहे। एक बार फिर शान से संसद पहुंचे। उनकी पार्टी ने 41 सीटें जीती। कांग्रेस के बाद संसद की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। 1980 से 1984 के दरमियान भी वह पूरी तरह सरगर्म रहे। खालिस्तान की मांग का पुरजोर विरोध किया। जान से मारने की धमकियां मिली। साल आया 1984 चुनाव करीब थे। और चरण सिंह एक बार फिर इंदिरा गांधी की कमजोर पड़ती हुकूमत के खिलाफ विरोधी एकता का सबसे बड़ा मरकज बनकर उभर रहे थे।
लग रहा था कि इस बार शायद तवाजुन बदलेगा। मगर अक्टूबर 1984 में एक ऐसा वाकया हुआ जिसने पूरे मुल्क की सियासत पलट दी। अससिनेशन ऑफ इंदिरा गांधी। [संगीत] मुल्क में हमदर्दी की एक ऐसी लहर उठी जो किसी भी हिसाब से नहीं रुक सकती थी। दिसंबर 1984 के चुनाव में राजीव गांधी की कांग्रेस ने तारीख ही बहुमत हासिल किया। विरोधी खेमा बह गया। मगर उस तूफान ने भी चरण सिंह अपनी जगह अड़े रहे। वह उन चंद विरोधी नेताओं में से थे जो 1984 में भी संसद पहुंचे। यह उनका आखिरी सियासी सफर था और नवंबर 1985 में गंभीर दौरे ने उन्हें जिस्मानी तौर पर लाचार कर दिया।
डेढ़ साल वो इस बीमारी से जूझते रहे। मगर वो जज़्बा जो नूरपुर के उस कच्चे से घर से उठा था वो अंत तक नहीं बुझाया। 29 मई 1987 किसानों के इस मसीहा ने आखिरी सांस ली। आज वो दिल्ली के किसान घाट पर हमेशा के लिए महफूज़ हैं और यह घाट कहीं और नहीं बल्कि उनके सबसे बड़े आदर्श महात्मा गांधी की समाधि के ठीक पास में है। साल 2001 में हिंदुस्तान सरकार ने उनका जन्मदिन राष्ट्रीय किसान दिवस घोषित किया और 2024 में मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजा गया।
मगर यूपी की सियासत यहां रुकी नहीं। चौधरी चरण सिंह की हुकूमत गिरने के बाद सूबे में एक अजीब खलाह पैदा हुआ। कुर्सी खाली थी और सबकी नजरें उस पर। संयुक्त विधायक दल के मुखिया चरण सिंह ने सूबे की बागडोर एक ऐसे शख्स को सौंपी जिसका नाम उस वक्त बहुत कम लोगों की जुबान पर था त्रिभुवन नारायण सिंह। सूबे के छठे सूबेदारत्रिभुवन नारायण सिंह की