फ्रांस के इवियान में हुए जी सेवन समिट आउटरीट सेशन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में बार-बार एक शब्द पर जोर दिया। वो शब्द था ट्रस्ट। यह सिर्फ एक सामान्य डिप्लोमेटिक स्टेटमेंट नहीं था बल्कि दुनिया इसे एक क्रिटिक की तरह भी देख रही है। हाल ही में वेस्ट एशिया कॉन्फ्लिक्ट जिस तरह से हैंडल हुआ उस पर। नमस्कार, मेरा नाम है श्वेता शर्मा और इस पूरी हैपनिंग के दौरान दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी यह बात उस वक्त कह रहे थे जब उनके ठीक बगल में यूएस प्रेसिडेंट डोनल्ड ट्रंप बैठे हुए थे।
पीएम मोदी ने साफ कहा दुनिया रिसोर्सेज की कमी से नहीं ट्रस्ट की कमी से जूझ रही है। अब सवाल है कि आखिर उन्होंने ट्रस्ट शब्द पर इतना जोर क्यों दिया? सबसे पहली बात यूनिलटरल मिलिट्री एक्शंस। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ जो मिलिट्री कैंपेन शुरू किया उसमें ट्रेडिशनल एलआई या इंटरनेशनल पार्टनर्स से कोई व्यापक कंसल्टेशन नहीं किया गया। इससे ओवरऑल दुनिया की इकॉनमीज़ इंपैक्ट हुई। प्रधानमंत्री मोदी का ट्रस्ट डेफिसिट वाला पॉइंट यहीं फिट बैठता है। अगर बड़े देश बिना कंसेंस के एक्शन ले लेंगे और इंटरनेशनल लॉ को बायपास कर देंगे तो ग्लोबल स्टेबिलिटी कैसे टिकेगी?
दूसरी बड़ी बात जो वो ट्रस्ट के थ्रू कहना चाहते थे वो थी ह्यूमन कॉस्ट और हिडन डओपॉलिटिकल फॉल आउट। पीएम मोदी ने साफ तौर पर बताया कि ट्रस्ट की कमी का असर न्यूट्रल देशों पर भी पड़ा है। भारत के लिए यह एक सेंसिटिव मुद्दा है क्योंकि गल्फ ऑफ ओमान में यूएस ट्राइक के दौरान एम्प्टी सेटबेलो नाम के ऑयल टैंकर पर हमला हुआ जिसमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई। अमेरिका का दावा था कि टैंकर ईरानियन पो्स ब्लॉकेड का उल्लंघन कर रहा था। पीएम मोदी ने इस उदाहरण के जरिए कहा कि ग्लोबल ट्रेड को चलाने वाले सिविलियन वर्क फोर्स की सुरक्षा के लिए ट्रांसपेरेंट और ट्रस्ट बेस्ड पार्टनरशिप्स जरूरी हैं। तीसरा मतलब था वेपनाइजेशन ऑफ ट्रेड और टेक्नोलॉजी।
प्रधानमंत्री मोदी ने इशारा किया कि आज इंटरकनेक्टेड ग्लोबल सिस्टम में ट्रेड सप्लाई चेस और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नैरो इंटरेस्ट के लिए किया जा रहा है। स्टेट ऑफ थर्मोस जहां से दुनिया का तकरीबन 20% ऑयल गुजरता है कॉन्फ्लिक्ट के दौरान शोक हो गया। इसका सीधा असर ग्लोबल इनफ्लेशन और एनर्जी प्राइसेस पर पड़ा। जब देश ग्लोबल इकोनॉमिक रूट्स को स्ट्रेटेजिक लेवरेज की तरह इस्तेमाल करते हैं तो इंटरनेशनल कॉमर्स का बेसिक ट्रस्ट टूट जाता है। ट्रस्ट से उन्होंने पार्टनरशिप्स ऑफ इक्वल्स पर भी जोर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि आज भी रिच नेशंस और डेवलपिंग कंट्रीज के बीच रिलेशन एक पुराने डोनर रेसिपिएंट मॉडल पर चलता है जो कि इमंबैलेंस पैदा करता है।
उन्होंने कहा कि अब जरूरत है इक्वल पार्टनरशिप्स की जहां डिग्निटी, ट्रांसपेरेंसी और शेयर्ड ओनरशिप हो। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री मोदी का ट्रस्ट वाला मैसेज सिर्फ एक डिप्लोमैटिक बज़वर्ड नहीं था। यह एक ब्रॉडर कॉल था डायलॉग और डिप्लोमेसी की तरफ लौटने का। यूनिलैटरल मिलिट्री एक्शन से दूर जाने का।
साफ शब्दों में समझें तो आज के ग्लोबल ऑर्डर में किसी देश की सबसे बड़ी स्ट्रेटेजिक स्ट्रेंथ सिर्फ उसकी मिलिट्री पावर या इकोनॉमिक साइज नहीं है बल्कि उसकी क्रेडिबिलिटी, रिलायबिलिटी और ट्रस्ट है। और यही वो वर्ड है जिसे बार-बार सुनकर डोनल्ड ट्रंप हिले जरूर होंगे।