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शौक या जानलेवा बीमारी की मजबूरी? जानिए क्यों फिरोज़ खान को अचानक मुंडवाना पड़ा था अपना सिर!

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क्या खूब लगती हो बड़ी सुंदर दिखती हो तेरे चेहरे में वो जादू है। ये कहानी है उस कलाकार की जो अपनी सिगरेट को अलग ही अंदाज में पीता था। किसी को नहीं मिलता। वो हीरो जिसका रॉयल अंदाज देखकर हर लड़की उसकी तरफ खींची चली आती थी। क्या देखते हो सूरत तुम्हारी [गाना गाने की आवाज़] क्या चाहते हो वो डायरेक्टर जिसने पाकिस्तान के 15 साल की नाजिया हसन पर भरोसा किया और कुर्बानी फिल्म में आप जैसा कोई गाने का मौका देकर उसे रातोंरात स्टार बना दिया। आप जैसा [संगीत][गाना गाने की आवाज़] कोई मेरी जिंदगी में आए तो बात बन जाए। तो हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के दबंग और वेलकम में आरडीएक्स के नाम से मशहूर अभिनेता फिरोज खान की। आखिर क्यों फिरोज खान ने अपनी ब्रांड न्यू Mercedes को फिल्म की शूटिंग के दौरान तोड़ दिया था? क्यों उन्होंने एक शादीशुदा हिंदू लड़की से शादी की? उसका धर्म परिवर्तन किया और फिर उन्हें धोखा देकर दूसरी लड़की के साथ लिविन में रहने लगे। आखिर क्यों फिरोज खान को बॉलीवुड का सबसे दबंग और गुंडा डायरेक्टर कहा जाता था। इस ट्रिगर के हर टिक के साथ तेरे चेहरे पर मौत का नक्शा उभरेगा। लेकिन मौत इस रिवाल्वर के किस घर में है? यह सिर्फ मौत का फरिश्ता जानता है कुंदन। क्या फिरोज खान और अंडरवर डॉन दाऊद इब्राहिम के बीच कोई जान पहचान थी या दोनों के बीच कोई गहरा रिश्ता भी था? वह कौन सी वजह थी जिसके चलते फिरोज खान को अपना सिर मुंडवाना पड़ा था? आखिर उनको कौन सी बीमारी हो गई थी जिस वजह से 69 साल की उम्र में ही उनका देहांत हो गया। जानेंगे और भी बहुत कुछ। आप बस दिल थाम कर बैठ जाइए और इस वीडियो को एक लाइक कर दीजिए। [हंसी] तो चलिए शुरू करते हैं फिरोज खान की पूरी कहानी। नैना हो फिरोज खान का जन्म 25 सितंबर 1939 को बेंगलुरु में हुआ था। उनका परिवार भारत का नहीं था। फिरोज खान के पिता का नाम था सादिक अली खान जो अफगानिस्तान के गजनी परिवार से थे और मां का नाम था फातिमा बेगम जो ईरान की थी और इस तरह उनका जन्म एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। फिरोज खान के बचपन का नाम था जुल्फिकार अली शाह खान। वह सात भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। बॉलीवुड के फेमस एक्टर रहे अकबर खान और संजय खान भी फिरोज खान के बड़े भाई थे। फिरोज खान ने बेंगलुरु से ही अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी की और जब वह कॉलेज के दिनों में थे

, तभी उनका लुक अट्रैक्टिव लगने लगा था। उनका शरीर और चाल ढाल देखकर उनके दोस्त उन्हें हीरो बनने के लिए कहने लगे थे। रोज-रोज गली मोहल्ले और दोस्तों के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर फिरोज खान भी हीरो बनने के सपने देखने लगे थे और यही कारण रहा कि जैसे ही उनकी पढ़ाई लिखाई पूरी हुई तो वह बेंगलुरु से मुंबई आ गए और फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करने लगे। शुरुआत में उनको किसी बड़ी फिल्म में काम नहीं मिला इसलिए वह बी ग्रेड और सी ग्रेड फिल्मों में काम करने लगे। आकाश पे एक [संगीत] बादल भी [गाना गाने की आवाज़] नहीं नदियां में घर आई [गाना गाने की आवाज़] है। फिरोज खान ने पहली बार 1956 में आई फिल्म हम सब चोर में काम किया था जो सिर्फ एक गाने में कार चलाते हुए दिखाई दिए थे। इसके बाद उन्हें काम मिलने लगा और उन्होंने कुछ और फिल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाए। 1959 में आई फिल्म दीदी जिसमें हीरो थे सुनील दत्त और इस फिल्म में एक देशभक्ति का गाना भी था। हमने सुना था एक है भारत [संगीत] सब मुल्कों से नेक है भारत। मूवी में फिरोज खान को एक नौकर का किरदार मिला था जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। 1960 में आई मूवी घर की लाज जिसमें पहली बार फिरोज खान ने एक दमदार और लीड रोल निभाया। वह अलग बात है कि लोगों ने उससे ज्यादा ध्यान जॉनी वॉकर को दिया जो कॉमेडी कर रहे थे। नीली नीली काली-काली पीली पीली गोरी-गोरी बाहों का श्रृंगार ले लो। इसके बाद फिरोज खान को एक हॉलीवुड फिल्म तार्जियन गोज टू इंडिया में काम करने का मौका मिला। 1962 में आई मूवी रिपोर्टर राजू जिसमें फिरोज खान का किरदार बड़ा दमदार रहा। इसके बाद बहू रानी में उन्होंने गुरुदत्त के साथ काम किया और फिर आई चार दरवेश जिसमें फिरोज खान हीरो बनकर हीरोइन के साथ रोमांस करते हुए नजर आए। टेक्नोलॉजिया यह पहली फिल्म थी जिसमें उन्होंने लीड रोल में काम किया। हीरोइन के साथ गाने भी गाए और फिल्म भी बड़ी चर्चित रही। प्यार के दामन से लिपटे हम कहां तक आ गए? इसके बाद सुहागन और सैमसन जैसी फिल्मों में भी फिरोज खान ने काम किया। लेकिन इन फिल्मों में वह मेन लीड में नहीं थे। 1965 में आई राजेंद्र कुमार की बेहतरीन फिल्म आरजू और इस समय राजेंद्र कुमार की फिल्मों की तो बात ही अलग होती थी। बहारों की मलका [संगीत] तेरा मुस्कुराना गजब हो गया। जिसकी फिल्में एक बार थिएटर में लग जाए तो जुबली मना कर ही लौटती थी। इसलिए उन्हें जुबली कुमार कहा जाता था। इस मूवी में फिरोज खान ने एक सपोर्टिंग किरदार निभाया। लेकिन वो किरदार इतना दमदार था कि हीरो को टक्कर देता था। इसके बाद आई तीसरा कौन? अच्छा सनम [संगीत] कर ले सितम। लेकिन जनता यह जानने के लिए थिएटर में गई ही नहीं और यह फिल्म फ्लॉप हो गई। 1965 में आई मूवी ऊंचे लोग जिसमें पहली बार फिरोज खान ने राजकुमार के साथ काम किया और राजकुमार के साथ उनकी यह आखिरी फिल्म थी क्योंकि राजकुमार ने उन्हें अपना एटीट्यूड दिखा दिया था। प्रार्थना करना कि जिंदगी के जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो उस रास्ते पर कभी मेरी तुम्हारी मुलाकात ना हो जाए। जिस वजह से दोनों में खटास आ गई और फिर दोबारा दोनों ने कभी एक साथ काम नहीं किया। हालांकि यह फिल्म बहुत अच्छी थी और सच में फिरोज खान का लुक भी इतना अट्रैक्टिव था कि जिसे देखकर लड़कियां पागल हो जाती थी। उन्हें सबसे गुड लुकिंग और हैंडसम एक्टर का दर्जा मिल चुका था। इसके बाद फिरोज खान एक सफेरा एक लुटेरा दोनों बने और इस फिल्म में भी उनका काम सबने पसंद किया क्योंकि वह नागमनी ढूंढ रहे थे। मूवी के गाने भी दिल टूटे लोगों ने खूब सुने। हम तुमसे जुदा हो के मर जाएंगे रो-रो के। इसके बाद भी तस्वीर 100 साल बाद मैं वही हूं। वो कोई और होगा। रात और दिन जैसी कई फिल्मों में फिरोज खान ने बेहतरीन काम किया। 1967 में आई मूवी सीआईडी 909 जिसमें उनकी हीरोइन थी मुमताज और फिरोज खान की यह फिल्म शानदार रही। जिसमें उनकी एक्टिंग की भी लोगों ने खूब तारीफ की। फिल्म के गाने भी खूब सुने। चाहो तो जान [संगीत] ले लो मालिक हो जिंदगी के। इसके बाद भी फिरोज खान की एक से बढ़कर एक फिल्में आती रही। इसी साल मूवी आई औरत जिसमें हीरो थे राजेश खन्ना जो इस समय पर स्ट्रगलिंग एक्टर थे। [संगीत] इसमें फिरोज खान का लुक शानदार था और खासकर पद्मिनी के साथ उनका यह गाना आकाश पे एक [गाना गाने की आवाज़][संगीत] बादल भी नहीं नदियां में घटा गिर आई है जिसे आज भी फिरोज खान को याद करते हुए लोग देखते हैं। इसके बाद भी आग आजा सनम अंजाम प्यासी शाम अनजान है कोई जैसी कई बेहतरीन फिल्मों में फिरोज [नाक से की जाने वाली आवाज़] खान नजर आए। फिरोज खान ने दूसरे एक्टर्स के साथ भी खूब जोड़ी बनाई और कई मल्टीस्टारर फिल्मों में भी काम किया। जैसे धर्मेंद्र के साथ आई उनकी मूवी आदमी और इंसान जो गजब की फिल्म थी। जिंदगी इत्तेफाक है। और लोगों ने इसे खूब पसंद किया और खासकर मुमताज का यह गाना हर खुशी इत्तेफाक है। इस फिल्म के लिए फिरोज खान को अपने करियर का पहला बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड भी मिला था। इसी तरह राजेश खन्ना के साथ आई मूवी सफर और इसमें भी फिरोज खान ने गहरी छाप छोड़ी। जो तुमको हो पसंद [संगीत] वही [गाना गाने की आवाज़] बात है 1971 में आई मूवी मेला अरे मेरा मतलब आमिर खान वाली नहीं फिरोज खान वाली और इसमें फिरोज खान ने अपने ही भाई संजय खान को हीरो बनाया गोरे के हाथ में जैसे ये छल्ला और खुद सपोर्टिंग किरदार में काम किया। यह मूवी इतनी बड़ी हिट हुई कि जिसे आज भी लोग सर्च करते हैं। वो अलग बात है कि लोग सर्च करते हैं फिरोज खान को मगर आ जाती है ट्विंकल खन्ना। तेरी चत मारू किधर भाग गई थी तू? बकरी की तरह मैं क्या करती है? चल नाच। इसके बाद फिरोज खान ने एक पहेली के जरिए कुछ वैसा ही मिस्ट्री और सस्पेंस रचने की कोशिश की जैसा मनोज कुमार की गुमनाम में देखने को मिला था। लेकिन अफसोस उनकी इस पहेली को सुलझाने में दर्शकों ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई और नतीजा यह हुआ कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हो गई। मैं एक पहेली हूं मर अकेली। इसके बाद उपासना में फिरोज खान ने एक बार फिर से अपने भाई संजय खान के साथ स्क्रीन शेयर की और यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठाक रही। आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं। दिखला दो ना। फिरोज खान हॉलीवुड की फिल्में खूब देखा करते थे और उनके मन में हमेशा सवाल उठता था कि हम ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते? अपने हीरो को इतना स्टाइलिश क्यों नहीं दिखाते? एक्ट्रेस को हॉट और बोल्ड क्यों नहीं दिखाते? उन्होंने खूब कोशिश की कि उन्हें इस तरह के रोल मिले। वह अपनी मर्जी के स्टाइलिश कपड़े पहने और अपने लुक को अलग तरीके से दिखाएं। लेकिन कोई भी फिल्म मेकर्स उन्हें इस तरह के रोल ऑफर नहीं करता था और ना ही फिरोज खान की सुनता था। उन्हें वह आजादी नहीं मिल रही थी जिसकी तलाश फिरोज खान को थी। आखिरकार उसने यह तय कर लिया अगर कोई और उन्हें अपने मन मुताबिक फिल्म नहीं देगा तो वह खुद अपनी फिल्म बनाएंगे। तो फिर उन्होंने डायरेक्टर प्रोड्यूसर बनकर अपराध फिल्म बनाई जिसमें उन्होंने सब कुछ फिल्म इंडस्ट्री से हटकर किया और मुमताज को जरूरत से ज्यादा नंगा कर दिया। तुम मिले [संगीत][गाना गाने की आवाज़] प्यार से मुझे जीना गवारा हुआ। इस तरह वो एक एक्टर से डायरेक्टर बन गए और एक ऐसे फिल्म मेकर बनकर उभरे जिसकी फिल्मों की पहचान ही उनका अलग अंदाज, स्टाइल और ग्लैमर बनने वाला था। इसके बाद कशमकश में फिरोज खान ने रेखा के साथ रोमांस किया और रेखा को मिलन का फायदा बताने लगे। इतना जरूरी [संगीत] मन था मिलन। वाओ 1974 में दारा सिंह की एक बेहतरीन फिल्म किसान और भगवान आई जिसमें फिरोज खान ने सपोर्टिंग रोल निभाया था।

फिल्म में उनका अंदाज भी काफी दिलचस्प था। गीता बाली के साथ जंगल में मंगल करते हुए रोमांस किया। डाल बियों में बैया मैं दूंगी साथ सैया। और गाने के सींस ने कहानी में एक अलग ही रंग भर दिया। इसके बाद साधना ने कहा गीता मेरा नाम। जरा पूछिए ना क्यों प्यार के साए में बैठे हैं? और फिरोज खान एक बार फिर से सुनील दत्त के साथ नजर आए। फर्ज और इंसाफ के नाम पर जिंदगियां कुर्बान कर देने वाले जॉनी आज तेरे हाथ क्यों कांप रहे हैं? यह तेरी कौन लगती है? और यह फिल्म भी बहुत अच्छी थी। इसके बाद आई वो फिल्म जिसने फिरोज खान की पूरी इमेज बदल कर रख दी। फिल्म का नाम था खोटे सिक्के। इस फिल्म में पहली बार फिरोज खान एक डशिंग, रफ, टफ और दमदार अंदाज में नजर आए। अब तक उन्हें ज्यादातर एक रोमांटिक हीरो के तौर पर देखा जाता था। लेकिन खोटे सिक्के ने उनके करियर की दिशा ही बदल दी। यही वह फिल्म थी जिसके बाद फिरोज खान की पहचान सिर्फ एक रोमांटिक हीरो की नहीं रही बल्कि एक स्टाइलिश और दमदार अभिनेता के तौर पर बनने लगी। जीवन में तू डरना [संगीत] नहीं, सर नीचा [गाना गाने की आवाज़] कभी करना नहीं। इसके बाद फिरोज खान ने एक के बाद एक कई शानदार फिल्मों में काम किया। जिनमें अनजान राहे, इंटरनेशनल क्रूक और काला सोना जैसी फिल्में शामिल रही। लेकिन फिर आया वो दौर जब फिरोज खान ने सिर्फ एक फिल्म में अभिनय नहीं किया बल्कि एक ऐसी फिल्म बनाई जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। फिल्म का नाम था धर्मात्मा। तेरे चेहरे में वो जादू है। इस फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी खुद फिरोज खान थे। और जब धर्मात्मा रिलीज हुई तो इसने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा धमाका किया कि फिरोज खान का नाम बॉलीवुड के सबसे स्टाइलिश और विजनरी फिल्म मेकर्स में शुमार हो गया। फिल्म की कहानी, स्टाइल, एक्शन और लोकेशन सब कुछ उस दौर के बॉलीवुड से बिल्कुल अलग था। खास बात यह थी कि धर्मात्मा अफगानिस्तान में शूट होने वाली पहली भारतीय फिल्मों में से एक थी जाना होता है और कहीं तेरी ओर चला आता हूं और वहां के खूबसूरत और खतरनाक इलाकों ने फिल्म को एक अलग ही पहचान दे दी। यही वह फिल्म थी जिसने साबित कर दिया कि फिरोज खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि एक ऐसा फिल्म मेकर था जो बड़े पर्दे पर अपने सपनों को हकीकत में बदलना जानता था। इसके गानों ने वह तहलका मचाया कि लोग इसमें खो गए और आज भी लोग इसे सुनते हैं। क्या खूब लगती हो? [संगीत] बड़ी सुंदर दिखती हो। मूवी में फिरोज खान की दो हीरोइन थी। एक तरफ थी रेखा जो उनसे पूछ रही थी। तुमने किसी से कभी प्यार किया है? बोलो ना। लेकिन फिरोज खान रेखा को लाइन मारते हुए कहने लगे प्यार कहां अपनी किस्मत में प्यार का बस दीदार। और दूसरी तरफ थी ड्रीम गर्ल जिसके साथ फिरोज खान की जोड़ी ऐसी जमी कि इसके गाने आज भी लोगों के जुबान पर रहते हैं। क्या खूब लगती [संगीत] हो? बड़ी सुंदर दिखती हो। इसके बाद कबीला, शंकर शंभू, नागिन, दरिंदा और चुनौती जैसी फिल्मों ने फिरोज खान की पहचान को पूरी तरह बदल दिया। अब वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे बल्कि पर्दे पर आते ही अपनी स्टाइल, लुक और दमदार मौजूदगी से छा जाने वाले एक्टर बन चुके थे। उनकी पर्सनालिटी ऐसी थी कि लोग उन्हें बॉलीवुड के सबसे हैंडसम और स्टाइलिश एक्टर्स में गिनने लगे थे। उनके पास था शानदार लुक, जबरदस्त स्टाइल और वह भारी आवाज जो उनकी शख्सियत को और भी ज्यादा दमदार बना देती है। यही वजह थी कि जैसे ही फिरोज खान पर्दे पर एंट्री लेते तो अपने आप सीटियां बजने लगती थी। क्या देखते हो सूरत तुम्हारी? [गाना गाने की आवाज़] क्या चाहते हो? [संगीत] 1980 में फिरोज खान ने एक और बेहतरीन फिल्म बनाई जिसका नाम था कुर्बानी और फिल्म में उन्होंने मेन लीड के तौर पर विनोद खन्ना को लिया। हम तुम्हें [संगीत] चाहते हैं ऐसे [गाना गाने की आवाज़] [संगीत] और कुर्बानी वाला विनोद खन्ना अगर आपने नहीं देखा तो समझो कुछ नहीं देखा। कुर्बानी फिरोज खान की बनाई गई वह फिल्म बनी जिसे आज भी लोग बॉलीवुड की टॉप फिल्मों में से एक मानते हैं। फिर चाहे फिल्म में हीरो का डशिंग लुक हो, हीरोइन का वेस्टर्न लुक हो, मूवी के गाने हो, [संगीत] या फिर मूवी का डायरेक्शन हो। हर तरीके से यह फिल्म कल्ट बनी। इस फिल्म से जुड़ा एक किस्सा बड़ा चर्चित हुआ। बताया जाता है कि शूटिंग के दौरान फिरोज खान ने अपनी ब्रांड न्यू Mercedes को ही एक सीन के लिए तुड़वा दिया था। बड़ा घमंड है

सेट आपको इस गाड़ी पे। हे मिस्टर ये Mercedes गाड़ी है। कभी चलाई है जिंदगी में? चलाई तो नहीं लेकिन कोशिश जरूर करूंगा। उनके लिए फिल्म की एंट्री और उसका इंपैक्ट इतना मायने रखता था कि उन्होंने अपनी महंगी कार की भी परवाह नहीं की। यही उनका अंदाज था कुछ ऐसा करना जिसे दर्शक सालों तक याद रखें। इसके बाद भी लहू पुकारेगा खून और पानी कच्चे हीरे जैसी फिल्में भी आई। 1986 में फिरोज खान ने अनिल कपूर को हीरो लेकर फिल्म बनाई जानबाज। हमें आना पड़ेगा [संगीत] दुनिया में दोबारा। जिसमें हीरोइन थी काका की काकी मतलब डिंपल कपड़िया। तेरे मिलन [संगीत] की लगन में हमें आना पड़ेगा [संगीत] दुनिया। ओह माय गॉड। इस फिल्म के लिए भी फिरोज खान को काफी तारीफें मिली और खासकर घास वाले बोल्ड सीन के लिए जिसे देखकर सब ने कहा कि फिरोज खान ने क्या रोमांटिक सीन शूट किया है। तो नहीं होता। जानबाज मूवी का भी सब कुछ हिट रहा। फिर चाहे कहानी हो, एक्टिंग हो या फिर फिल्म के गाने। एक कदम जिंदगानी [संगीत] से भी कम है जवानी। और खुद फिरोज खान ने श्रीदेवी के साथ रोमांस किया और उनका रोमांस भरा यह गाना भी बड़ा हिट हुआ। हर किसी को नहीं [संगीत] मिलता। 1988 में आई मूवी दो वक्त की रोटी और यह फिल्म भी फिरोज खान की बनाई हुई एक शानदार फिल्म रही। इस फिल्म से जुड़ा एक किस्सा भी बड़ा रोचक रहा। इस फिल्म पर काम 1976 में ही शुरू हो गया था। लेकिन फिर किसी कारण से इसे बंद कर दिया गया। इसके बाद 1980 में इसे दोबारा शूट किया गया। लेकिन यह फिल्म पूरी नहीं हो पाई और इसी बीच संजीव कुमार की मौत हो गई। इस मूवी के डायरेक्टर संजीव कुमार के भाई नकुल जरीवाला थे। लेकिन इसी बीच उनकी भी मौत हो गई तो यह फिल्म दोबारा से बंद हो गया। जब फिल्म मेकर्स को लगा कि अब यह फिल्म कभी नहीं बनेगी तो उन्होंने इस फिल्म के कुछ सीन सनी देओल और अनिल कपूर की मूवी जोशीले में फिल्मा लिए। लेकिन फिर 1988 में अचानक से फिरोज खान ने इसे दोबारा शुरू कर दिया और जोशीले से पहले रिलीज भी कर दिया था। इस तरह फिरोज खान की एक अलग ही तरह की फिल्म बन गई जो जब रिलीज हुई तो कोई इसे देखने ही नहीं गया। मतलब 10 साल का इंतजार, तीन-तीन बार शूटिंग, भारी स्टार कास्ट और बजट लेकिन फिर भी मिला कुछ भी नहीं। इसके बाद इसी साल फिरोज खान ने एक और फिल्म बनाई जिसमें विनोद खन्ना ने एक बार फिर से तहलका मचाया। मूवी आई दयावान। चाहे मेरी जान तू ले ले चाहे ईमान तू ले ले। जिसमें फिरोज खान और विनोद खन्ना साथ में नजर आए। यह फिल्म बड़ी चर्चित रही और चर्चा का मुख्य कारण रहा 16 साल की माधुरी दीक्षिक जिस पर जब विनोद खन्ना को ऐसा प्यार आया आखिर [संगीत] तुम पे प्यार आया है तो इस प्यार ने पूरे बॉलीवुड में बवाल मचा दिया। अपने से दुगनी उम्र के विनोद खन्ना के साथ माधुरी ने ऐसे सीन दिए जिन्हें बाद में देखकर खुद माधुरी भी शर्मा गई और जब लोगों ने माधुरी को ट्रोल करना शुरू किया तो उनके हवाले से यह बात सामने आई कि फिरोज खान और विनोद खन्ना ने उन पर इन सीन को शूट करने के लिए दबाव बनाया था। उनका कहना था कि एक बड़े डायरेक्टर के सामने वो उस वक्त चुपचाप सब कुछ सहने को मजबूर थी और यही वजह थी कि इस फिल्म के बोल्ड सीन ने सिर्फ दर्शकों को ही नहीं बल्कि पूरे फिल्म इंडस्ट्री को भी सवालों के घेरे में ला दिया था। आज फिर तुम पे प्यार आया है। इसके बाद 1991 में फिरोज खान एक और फिल्म लेकर आए जिसका नाम था मीत मेरे मन के और इस फिल्म के भी कर्ताधर्ता खुद फिरोज खान ही थे। उस दौर में बॉलीवुड में ठाकुर वाले किरदारों का खूब बोलबाला था। हर दूसरा हीरो ठाकुर बनने में लगा हुआ था। तो फिरोज खान ने भी सोचा जब सब ठाकुर बन रहे हैं

तो मैं क्यों पीछे रहूं और बस वो भी उतर पड़े एक दमदार ठाकुर के किरदार में। त्रिलोक सिंह यह ठाकुर जगत प्रताप सिंह का घर है। यहां हमारी इजाजत के बगैर परिंदा पर नहीं मारता। मूवी में उनकी भिड़ंत दूसरे ठाकुर यानी महाभारत के दुर्योधन का किरदार निभाने वाले पुनीत इसरार से हुई। ठाकुर दुर्योधन ये आपका गधा नहीं नकली पिस्तौल है और नकली पिस्तौल से महाभारत नहीं लड़ी जाती। समझे? जहां दोनों के बीच जमकर डायलॉग बाजी देखने को मिली। हमारे खानदान में जब बच्चा पैदा होता है और उसके बाद जब बोलने लगता है उसे सबसे पहली चीज यही सिखाई जाती है कि इस दुनिया में भगवान के सिवा किसी के सामने अपना सर नहीं झुकाना। समझे? यानी उम्र के इस पड़ाव पर भी फिरोज खान ने साबित कर दिया कि स्टाइल और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के मामले में वह अभी भी किसी से पीछे नहीं थे। 1992 में फिरोज खान ने संजय दत्त को लेकर एक फिल्म बनाई जिसे आज भी लोग संजू बाबा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक मानते हैं। फिल्म का नाम था यलगार जिसका सब कुछ हिट था। फिर चाहे नगमा की हॉटनेस और बोल्डनेस हो, संजय दत्त का ड्रेसिंग लुक हो, मूवी के गाने हो, आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी। जिन्हें आज भी लोग सुनते हैं या फिर खुद फिरोज खान हो जो एक पुलिस वाले के किरदार में थे। उनके किरदार से जुड़ा एक किस्सा भी बड़ा चर्चित रहा। मूवी में उनके पिता का किरदार बड़ों के भीष्म पितामह, बच्चों के शक्तिमान और बीच वालों के मुकेश खन्ना ने निभाया था। जो असल जिंदगी में फिरोज खान से 21 साल छोटे थे। तुम कानून की हद के बाहर जाकर काम करते हो। लेकिन काम तो कानून का ही करता हूं ना। बट दिस इज नॉट द वे। लॉ डैड। आप शायद भूल रहे हैं कि जिनके साथ हमारी लड़ाई है उनके पास कोई लॉ नहीं है, कोई किताब नहीं है, कोई रूल बुक नहीं है। मतलब फिल्म में उन्होंने खुद से 21 साल छोटे मुकेश खन्ना के बेटे का किरदार निभाया था। यही वह फिल्म थी जिससे संजय दत्त की बर्बादी शुरू हुई थी। क्योंकि इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान फिरोज खान ने संजय दत्त को दाऊद इब्राहिम से मिलवाया था। जिसके बाद ही संजय दत्त की जिंदगी के एल लगना शुरू हुए थे। मतलब फिरोज खान का अंडरवर में भी दबदबा था। जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। यही फिरोज खान की आखिरी फिल्म थी जिसके बाद एक लंबे समय तक उन्होंने दूसरी किसी फिल्म में काम नहीं किया और एक लंबा ब्रेक लिया। कई साल बाद 1998 में उन्होंने प्रेम अगन के साथ वापसी की। लेकिन इस बार फिरोज खान के सामने एक और खास मिशन था अपने बेटे फरदीन खान को बॉलीवुड में लॉन्च करना। फिरोज खान ने अपने ही प्रोडक्शन के जरिए फरदीन को बतौर हीरो इंडस्ट्री में उतारा। सूरज मुझे वो हसीन दर्द दे दो। वो अलग बात है कि फरदीन खान कभी बड़ा स्टार नहीं बन पाया। साल 2003 में फरदीन खान के साथ एक और फिल्म बनाई जिसका नाम था जानशी।

इस फिल्म से जुड़ा एक किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। शुरुआत में फिल्म के लिए अक्षय खन्ना को कास्ट किया गया था और शूटिंग भी शुरू हो चुकी थी। लेकिन अचानक फिरोज़ खान ने अक्षय खन्ना को फिल्म से हटा दिया और उनकी जगह अपने बेटे फरदीन खान को ले लिया गया। इतना ही नहीं इस फिल्म में फिरोज खान भी एक बेहद अलग और खतरनाक अंदाज में नजर आए। कभी बॉलीवुड के हैंडसम और स्टाइलिश हीरो के तौर पर पहचान बनाने वाले फिरोज खान ने यहां ऐसा डार्क और दमदार लुक अपनाया कि उन्हें पर्दे पर देखकर हर कोई हैरान रह गया। हमने खून खराबा बहुत देखा है कपूर साहब। हमको लहू के रंग से बहुत नफरत है। लेकिन क्या करें? कमबख्त हमारे रगों में दौड़ता है। उनके इस नेगेटिव किरदार को दर्शकों और क्रिटिक्स ने खूब पसंद किया और इसी के लिए उन्हें बेस्ट नेगेटिव एक्टर का अवार्ड भी मिला। कमाल की बात यह रही कि फिल्म का हीरो भले ही फरदीन खान थे, लेकिन महफिल फिरोज खान लूट ले गए। उनके किरदार और स्टाइलिश की इतनी चर्चा हुई कि फिल्म का पूरा फोकस ही उनकी तरफ चला गया। और एक बार फिर फरदीन खान अपने पिता की मौजूदगी के सामने फीके पड़ गए। और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर पाई। लेकिन फिरोज खान ने हार नहीं मानी और एक और फिल्म बनाई। एक खिलाड़ी एक हसीना। हमारे धंधे में एक उसूल है।

अगर दुनिया [संगीत] को जेब में करना है तो बस सिर्फ एक ही तरीका है। इसमें भी हीरो अपने बेटे को ही बनाया और यह फिल्म भी अपने अलग तरह के डायरेक्शन के लिए चर्चित हुई जिसे लोगों ने बहुत ही स्टाइलिश फिल्म बताया। फिल्म को हिट कराने के लिए फरदीन खान और हीरोइन का एक एमएमएस तक लीक कर दिया गया था ताकि लोग इसे देखने के लिए थिएटर तक भागे आए। हालांकि यह सब करने के बाद भी फिरोज खान अपने बेटे को हिट नहीं करवा पाए और फिर उन्होंने अपने बेटे से बस यह कहा तुमसे ना हो पाएगा। 2007 में फिरोज खान एक बार फिर से बड़े पर्दे पर एक दमदार और यादगार किरदार के साथ नजर आए। फिल्म थी वेलकम। [संगीत] जिसे दर्शकों ने भी खुले दिल से वेलकम किया। फिल्म की कहानी से लेकर इसके किरदार और डायलॉग तक सब कुछ हिट रहा। बुराई कितनी भी बड़ी क्यों ना हो अच्छाई के सामने बहुत छोटी लगती है। और फिरोज खान का आरडीएक्स वाला अंदाज तो दर्शकों को खासतौर पर खूब पसंद आया। दिलचस्प बात यह थी कि बतौर अभिनेता वेलकम फिरोज़ खान की आखिरी फिल्म साबित हुई। इसके बाद उन्होंने हमेशा के लिए एक्टिंग से दूरी बना ली। लेकिन फिरोज खान की असली पहचान फिल्मों में नहीं बल्कि उनकी पर्सनल लाइफ से थी। जिसके किस्से सुनकर आप लोग दंग रह जाएंगे। तो अब हम बात करेंगे फिरोज खान की पर्सनल लाइफ की। क्या देखते हो? सूरत तुम्हारी। क्या चाहते [संगीत] हो? फिरोज खान की निजी जिंदगी की बात करें तो 1965 में उनकी मुलाकात सुंदरी नाम की एक एयर होस्टेस से हुई और दोनों के बीच में प्यार हो गया। कुछ समय बाद दोनो

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