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दिलीप कुमार को क्यों कहा जाता था ट्रेजेडी किंग?जानकर कलेजा कांप उठेगा।

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दोस्तों दिलीप कुमार एक ऐसा कलाकार जो सदियों तक अमर रहेगा अपने एक्टिंग स्टाइल को लेकर और अपने जबरदस्त सक्सेस रेशियो को लेकर। इस मामले में उनके टक्कर में कोई दूसरा अभिनेता नहीं हुआ। लेकिन एक दौर ऐसा भी आया था कि यही हिट फिल्में और यही एक्टिंग स्टाइल उनकी जान की दुश्मन बन गई थी और तब उन्हें डॉक्टर की सलाह लेनी पड़ी थी।

लेकिन आखिर क्या थी वो वजह और कौन-कौन सी वो फिल्में थी जिनकी वजह से उनको अपनी जान के ही लाले पड़ गए थे और सबसे बड़ा सवाल कि आखिर उन्हें अभिनय सम्राट के साथ-साथ ट्रेजडी किंग भी क्यों कहा जाता है? दोस्तों उस सवाल का जवाब जानने से पहले थोड़ा हम दिलीप साहब के करियर और उनके हिट और टॉप फिल्मों के बारे में जान लेते हैं। दोस्तों दिलीप कुमार उर्फ़ युसूफ खान का जन्म 11 दिसंबर 1922 को पेशावर यानी कि पाकिस्तान में हुआ था। उनका खानदान काफी अमीर था। लेकिन वह फिल्मों में काम करना चाहते थे। इसी बात पर पिता से लड़ाई होने के बाद वो 17 साल की उम्र में पुणे आ गए और उस समय के मशहूर फिल्म स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज के कैंटीन में एक नौकरी पकड़ ली। तब उन्होंने किसी को बताया नहीं था कि वो एक अमीर घराने से ताल्लुकात रखते हैं। एक दिन उस वक्त के मशहूर अदाकारा और बॉम्बे टॉकीज के मालकिन देविका रानी की नजर कैंटीन के बाहर सैंडविच बना रहे दिलीप साहब पर पड़ी।

फिर उनकी उर्दू और इंग्लिश पर मजबूत पकड़ को देखते हुए देविका रानी ने उन्हें बॉम्बे टॉकीज़ में बतौर स्क्रिप्ट राइटर रख लिया। फिर उन्हीं देवकर रानी ने उन्हें साल 1944 में फिल्म ज्वार भाटा से फिल्मों में पहला ब्रेक दिया। हालांकि वह फिल्म चली नहीं थी फ्लॉप हो गई थी। फिर उसके अगले 2 साल तक उनकी कोई भी फिल्म हिट नहीं हुई। दिलीप साहब की पहली हिट फिल्म थी जुगनू जो कि साल 1947 में रिलीज हुई थी और फिर इसके बाद उनका हिट फिल्म देने का सिलसिला लगभग शुरू हो गया था जो कि साल 1952 तक लगातार चलता रहा।

इस दौरान वे हर साल एक दो एक दो हिट फिल्में देते रहे। जैसे 1948 में उनकी हिट फिल्म थी मेला और शहीद। तो 1949 में उनकी हिट फिल्म थी शबनम और अंदाज। तो 1950 में उनकी हिट फिल्म आई थी। उसका नाम है जोगन और बाबुल। तो 1951 में जो उन्होंने हिट फिल्म दी थी उसका नाम है दीदार। फिर 1952 में जो हिट फिल्म उन्होंने दी थी वह थी आन और दाग। लेकिन इसके बाद उनके हिट फिल्मों का सिलसिला लगभग थम सा गया।

1953 और 54 में उन्होंने कोई क्लियर कट हिट फिल्म नहीं दी। लेकिन फिर 1955 में लगातार दो हिट फिल्में देकर उन्होंने धमाका सा कर दिया। उन फिल्मों के नाम है आजाद और उड़न खटोला। हालांकि 1956 में उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई थी। 1957 में उनकी जो एकमात्र हिट फिल्म आई थी, उस फिल्म का नाम है नया दौड़ जो कि ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। यह उनकी दूसरी ब्लॉकबस्टर फिल्म थी। इससे पहले जो उनकी पहली ब्लॉकबस्टर हिट हुई थी, उस फिल्म का नाम है अंदाज जो कि 1949 में रिलीज हुई थी। उस फिल्म में त्रिव कुमार और राज कपूर उस दौर के दो सुपरस्टार्स ने काम किया था उस फिल्म में। इसे ऐसे समझ लें कि आज के किसी फिल्म में सलमान खान और शाहरुख खान एक साथ किसी फिल्म में काम करें तो उस फिल्म का क्रेज क्या होगा? तो वही बात थी उस दौर में उस फिल्म की। 1957 से लेकर 1961 तक उनका पिक पीरियड था। इन चार सालों में उन्होंने आठ हिट फिल्में दी। जिनमें से सात सुपरहिट और तीन ब्लॉकबस्टर थी। जबकि इस दौरान उनकी सिर्फ आठ ही फिल्में रिलीज भी हुई थी। चौंक गए ना आप इस आंकड़े को सुनकर। चार साल आठ फिल्में उनमें हिट फिल्मों की संख्या भी आठ। ऊपर से उनमें तीन ब्लॉकबस्टर भी है ना कमाल का ये आंकड़ा। उन आठ फिल्मों के नाम है नया दौर, मुसाफिर, यहूदी, मधुमती, पैगाम, कोहिनूर, मुगले आजम और गंगा जमुना। इनमें से सिर्फ एक फिल्म मुसाफिर अबव एवरेज फिल्म थी जिसे आप हिट फिल्मों में काउंट कर सकते हैं।

इसके बाद उनके करियर में ढलान आने लगा और फिल्में बिलो एवरेज या फ्लॉप होने लगी और यह सिलसिला लगातार साल 1981 तक चली फिल्म क्रांति के रिलीज होने तक। 1961 के बाद और 1981 के पहले यानी कि इन 19 सालों में उन्होंने सिर्फ तीन हिट फिल्में दी। 1967 में राम और श्याम, 1968 में आगमी और 1970 में गोपी। बस इसके अलावे उनकी सारी फिल्में फ्लॉप थी। 1976 में फिल्म बैराग के फ्लॉप होने के बाद उन्होंने 4 साल के लिए फिल्मों से ब्रेक ले लिया था और फिर 1981 में कैरेक्टर रोल से उन्होंने अपने दूसरे पारी की शुरुआत की। उस फिल्म का नाम था क्रांति। फिर उसके बाद साल 1998 तक अपने करियर में उन्होंने कुल 12 फिल्मों में काम किया। जिनमें से उन्होंने पांच हिट फिल्म दिए। एक एवरेज, दो बिलो एवरेज और चार फ्लॉप। इस दौरान के उनके हिट फिल्मों के नाम है क्रांति, विधाता, कर्मा, कानून अपना-अपना और सौदागर।

और जो फिल्में एवरेज रही थी उस फिल्म का नाम है मजदूर। और जो दो फिल्में बिलो एवरेज रही थी उनके नाम है शक्ति और धर्मधिकारी। और जो चार फिल्में फ्लॉप हो गई थी उनके नाम है दुनिया, मशाल, इज्जतदार और किला। किला उनकी आखिरी फिल्म थी जो कि 1998 में रिलीज हुई थी। अब बात कर लेते हैं दिलीप कुमार के एक्टिंग स्टाइल की। तो दोस्तों, उनके एक्टिंग की एक अलग पहचान थी। उनके खास विशेषता थी। उनमें उनका कोई अस्थाई लटका झटका या कोई मैनरिज्म नहीं था। उन्होंने ही हिंदी फिल्मों में मेथड एक्टिंग की शुरुआत की। जिसमें चरित्र की गहराई में डूबकर पहले तो उसका अध्ययन किया जाता है और फिर उसके मुताबिक ही एक्टिंग की जाती है। यदि कोई व्यक्ति इस स्वभाव का है तो वह इन परिस्थितियों में कैसे यह बात कहेगा? कैसे वह रिएक्ट करेगा?

उसका बॉडी लैंग्वेज कैसा होगा? इन सब बातों पर वह पहले बहुत गंभीर रूप से सोच विचार करते थे। फिर जाकर उस पात्र का अभिनय करते करते इतना उसके अंदर घुस जाते कि उससे बाहर निकलने में उन्हें कई बार परेशानी का सामना भी करना पड़ता था। अब आते हैं मेन मुद्दे पर कि आखिर दिलीप कुमार को ट्रेजडी किंग क्यों कहा गया और क्यों वह डिप्रेशन के शिकार हो गए थे। दरअसल कई बार किरदार का असर किसी कलाकार पर इतना ज्यादा पड़ता है कि उसकी पर्सनल लाइफ भी प्रभावित होने लगती है। दिलीप कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही था। 50ज का दौर था और अभिनेता का स्टारडम अपने चरम पर था। उस वक्त उनकी धड़ाधड़ फिल्में हिट हो रही थी। उन्हीं फिल्मों में कुछ ऐसी फिल्में भी थी जिनमें उनकी कैरेक्टर काफी उदासी भरा था या जिसमें नायक के अंत में मौत हो जाती है। उन्हीं फिल्मों में से कुछ फिल्मों के नाम है अंदाज, मेला, दीदार, बाबुल, दाग, मुगलेआम, डराना और देवदास। 1949 में आई फिल्म अंदाज में उन्होंने एक ऐसे प्रेमी का किरदार निभाया जो एक तरफ़ा प्रेम में खुद को खो देता है। तो 1950 में मेला और 1951 की दीदार जैसी फिल्मों में उनका किरदार अपने प्रेम को खो देने के दर्द में डूबा हुआ होता है।

दीदार में तो उन्होंने एक अंधे युवक का किरदार निभाया जो अपनी प्रेमिका की पहचान तक खो बैठता है। यह किरदार दर्शकों को भीतर तक झकझोर देते थे। यह वही समय था जब दिलीप कुमार को गंभीर अभिनेता और इंटेंस परफॉर्मर के रूप में देखा जाने लगा था। उनके आंखों में छुपी उदासी, धीमी जाल और संवादों में भरा दर्द यह सब मिलकर एक नई एक्टिंग की शुरुआत कर रहे थे। फिर 1953 में आई फिल्म दाग और 1955 की देवदास यह वो फिल्में थी जिन्होंने दिलीप कुमार को ट्रेजडी किंग बना दिया।

देवदास शरद चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित थी और शायद उनकी सबसे दर्दनाक फिल्म थी। देवदास एक ऐसा प्रेमी है जो अपने प्यार को समाज के बंधनों में खो देता है और फिर शराब में डूब कर खुद को खत्म कर देता है। दिलीप कुमार ने इस किरदार को कुछ इस तरह से निभाया कि लोग उनके अभिनय में लगभग डूब से गए। उनकी चाल, शराबी आंखें, टूटे संवाद सब कुछ इतना असली था कि लोग यकीन करने लगे कि यह सिर्फ अभिनय नहीं कुछ निजी अनुभव है जो पर्दे पर झलक रहे हैं। साल 1958 में आई फिल्म मधुमती में उनका डुअल रोल था। एक प्रेमी और फिर उसके पुनर्जन्म की कहानी। ये भी ट्रेजडी के रंगों में रंगी हुई थी। अब सवाल उठता है, क्या इतना दर्द सिर्फ कैमरे के लिए था? दिलीप कुमार अपने अभिनय में इतने डूब जाते थे कि किरदार उन्हें प्रभावित करने लगे थे। उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में माना था कि वह कई बार गंभीर और दुखद भूमिकाओं के बाद मानसिक रूप से टूट जाते थे।

फिर उन्होंने लंदन जाकर अपना इलाज करवाया था और डॉक्टर की निगरानी में सात सालों तक साइकोथरेपी ली थी क्योंकि वह अपने किरदारों से बाहर ही नहीं निकल पा रहे थे। उसी दौरान दिलीप कुमार को साइकेटिस्ट ने सलाह दी कि उन्हें कुछ एक्शन या फिर कॉमेडी फिल्में करनी चाहिए ताकि वह गंभीर किरदारों से उभर पाए। फिर डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने कॉमेडी फिल्में करनी शुरू कर दी और हमें कोहिनूर, आजाद और राम और श्याम जैसी फिल्में दी। दिलीप कुमार का कहना था कि ट्रेजडी फिल्में करना उनके लिए एक सजा जैसी बन गई थी। वो कहते हैं ना कि अभिनय अगर दिल से किया जाए तो वह कलाकार की आत्मा में उतर जाती है। दिलीप कुमार के साथ भी यही हुआ। वह अपने किरदारों में इतने डूबते गए कि उन किरदारों का दर्द उनका अपना बन गया और लोग उन्हें ट्रेजडी किंग कहने लगे।

लेकिन क्या सिर्फ उन गंभीर किस्म की भूमिकाओं के चलते ही उन्हें ट्रेजडी किंग का खिताब दे दिया गया? तो इसका जवाब है नहीं। उन्हें ट्रेडी किंग इसलिए भी कहा गया क्योंकि उन्होंने दुख को क्लैमर नहीं गरिमा दी। उन्होंने पीड़ा को विकृति नहीं संवेदना दी। उनके किरदारों में रोना सिर्फ आंसू बहाना नहीं था बल्कि एक आंतरिक विघटन था जो हर दर्शक को खुद की पीड़ा का आईना दिखाता था। दिलीप कुमार ने भारतीय सिनेमा को एक नई गहराई दी। उन्होंने यह साबित किया कि एक अभिनेता सिर्फ नाच गाना नहीं करता बल्कि दर्शकों की आत्मा को छू सकता है। दिलीप कुमार एक युग थे। अभिनय के उस युग के प्रतीक जो अपने किरदारों में जीते थे और उन्हें आत्मा में समेट लेते थे।

आज हम जब ट्रेजडी किंग की बात करते हैं तो वह सिर्फ एक उपाधि नहीं बल्कि एक कलाकार के जीवन की उस यातना का वर्णन है जिसे उन्होंने खुद झेला ताकि हम दर्शक कुछ पल के लिए उस भावनात्मक सच्चाई से रूबरू हो सके। उन्होंने भारतीय सिनेमा को आत्मा दी। एक नई परिभाषा दी और यही कारण है कि वह सदियों तक ट्रेडिंग किंग कहलाते रहेंगे सम्मान के साथ, दर्द के साथ। तो दोस्तों, यह थी कहानी दिलीप कुमार के ट्रेडी किंग बनने की और फिर में चले जाने की।

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